भूखी सुंदरता // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी


मर्दान से आगे मालाकुंड एजंसी वाले खतरनाक तंग पहाड़ी रास्ते ने अहमद अली की नसों को तनाव में लाकर थका दिया था। रास्ता क्या था नाग की लकीर था जो टेढ़ा मेढ़ा होकर पहाड़ की ऊंचाई पार करता स्वात की वादी की ओर जा रहा था। मालाकुंड एजंसी के खौफनाक नंगे पहाड़, जिन पर हरियाली का कोई निशान नहीं था। नीचे सफेद लकीर की तरह कोई नदी बहती जा रही थी। रास्ते पर कहीं कहीं कोई व्यक्ति नजर आ रहा था। कबायली इलाके का पठान कंधे पर रायफल लटकाए दोस्तों और दुश्मनों के अनंत दायरों में जीता नंगे पर्वत की भांति सर घूमा हुआ। कुदरत व्यक्ति को अपने जैसा बना देती है। जैसी मट्टी वैसे लोग। मालाकुंड में एक ऊंचे पर्वत पर ब्रिज बना हुआ था जो अंग्रेजों }kjk पठानों पर नजर रखने के लिए बनाया गया था। इन पहाड़ों पर लोग सदियों से अपनों और परायों का रक्त बहाते आए हैं, जिसने शायद पहाड़ों को भूरा, सूखे रक्त का रंग दे दिया है।

फिर ऊंचाइयों से नीचे उतरते अचानक अहमद अली को हरियाली ही हरियाली नजर आई तो वह एकदम सीधा होकर बैठ गया। यह स्वात की वादी थी-सुंदरता और हरियाली की वादी।

बेशुमार बरसाती झरने चौड़ी वादी में से अपना रास्ता खुद बनाते एक नदी में आकर मिल रहे थे। यही नदी उसे सफेद लकीर की तरह नजर आई थी। ड्रायवर ने वैगन को एक झरने के नजदीक खड़ा किया। क्लीनर लड़का डब्बा लेकर पानी भरने के लिए नीचे उतरा। अहमद अली भी और लोगों के साथ नीचे उतर गया।

उसने बांहें ऊपर उठाकर आलस तोड़ते लंबी सांस ली। ठंडी नम हवा ने जैसे उसके थके, सुनक् शरीर को ताजगी दे डाली। वह बरसाती झरने के पास आ बैठा और हाथों में पानी भरकर होंठों तक लाया। ठंडे पानी ने उसके अंदर ठंडक पहुंचायी। उसने हाथों में चार पांच बार पानी भरकर पीया। उसके बाद वह सीधा होकर खड़ा हो गया और अपनी गीली मूंछों को पोंछते वादी पर नजर डाली। मैदान, हरियाली, पानी के झरने, उसे विचार आया कि कुदरत की सुंदरता के भी कई रंग और कई रूप हैं। पहाड़ों की ऊंचाइयों पर, रास्ते और मट्टी की अपनी सुंदरता थी और स्वात की वादी की अपनी सुंदरता थी। हर जगह एक अलग नजारा था। सुंदरता का, खूबसूरती का एक ही तरीका, मापदंड नहीं है। कई रूप हैं। जब वह वैगन में आकर बैठा तो अपनी सारी थकान भूल गया।

अहमद अली को अहसास हुआ कि उसने गल्ती की थी अकेला आकर। उसने चाहा कि किसी से बात करे। स्वात की सुंदरता की सराहना (प्रशंसा) करे। लेकिन उसकी बगल का साथी पूरे रास्ते नींद करता आया। कोई संगी साथी उसके साथ होता तो कम से कम वह उससे बातें तो करता रहता। ऐसे सुंदर नजारों को देखकर मुंह बंद करके बैठना अच्छा नहीं था। लेकिन उसने पहले से कोई कार्यक्रम नहीं बनाया था। रोजमर्रा के कामों की मशगूली से तंग होकर, अचानक ही मशगूलियों की जंजीरों को तोड़कर भाग आया था। उसने अपनी मशगूलियों और समस्याओं को दिलो दिमाग से निकाल देना चाहा-इसीलिए तो वह यहां आया था, जिससे की ज़िंदगी की रोजमर्रा की समस्याओं से कुछ दिनों के लिए छुटकारा मिल जाए।

वैगन ने मेंगोरा में आकर सभी मुसाफिरों को उतारा। मेंगोरा स्वात का सबसे बड़ा शहर है। दोपहर हो चुकी थी।

अहमद अली ने शहर में थोड़ा चक्कर लगाकर, किसी होटल में खाना खाकर, फिर किसी दूसरी वैगन में चढ़कर रात बहरीन में जा बिताई। किसी मित्र ने उसे बताया कि बहरीन स्वात की बहुत खूबसूरत जगह है। उसने एक होटल में खाना खाया और उसके बाद काऊंटर वाली बैग को संभालने के लिए कहकर मेंगोरा के बाजार में घुस गया। मेंगोरा उसे एक मामूली शहर लगा, सिवाय एक बाजार के जहां पर विदेशों से स्मगलिंग होकर आए सामानों की दुकानें थीं। लौटकर उसने बैग उठाई और बस स्टैंड पर आकर बेहरीन जाती वैगन में बैठ गया।

आकाश पर बादल छाए हुए थे और हवा में नमी थी। बादलों के कारण वादी का हुसक् और भी निखरकर मोहक हो गया था। रास्ता पहाड़ की गोद में बना हुआ था। रास्ते के नीचे स्वात नदी गरजकर बह रही थी। जैसे ही वैगन आगे बढ़ी वैसे ही वादी की खूबसूरती में और पहाड़ की हरियाली में इजाफा होता गया। रास्ते के एक ओर अमरूदों के पेड़ थे जिन में कच्चे अमरूद थे। जमीन का कोई भी टुकड़ा ऐसा नहीं था जहां जवाहरी न बोयी गई हो। पहाड़ के उतारों पर भी जवाहरी बोयी गई थी। घर भी पहाड़ के उतारों पर बनाए गए थे। कुदरत ने अपनी सुंदरता से लोगों को भी हिस्सा दिया था। अहमद अली ने स्वात की सुंदरता की चर्चा सुनी थी और कभी कभी उसे वह रास्ते पर नजर आ जाती थी। लोग हीन और बेचारे लग रहे थे। शायद इसलिए कि स्वात में बहुत गरीबी थी। वर्षा शुरू हो गई और वैगन धीरे धीरे चलने लगी-बादल, वर्षा, पहाड़ पर गहरी घनी हरियाली, स्वात नदी में पानी का शोर। अहमद अली चारों ओर फैली अनंत सुंदरता को आँखों से पीता घूंट भरता गया और उसके मन में मस्ती भर गई, अंग अंग भर गया। खुद को बेहद हल्का जैसे हवा में बारिश की बूंदों के साथ पहाड़ों पर उड़ता महसूस (अनुभव) किया। वैगन की पिछली सीट पर कोई व्यक्ति अंग्रेजी में बुदबुदाने लगा। अहमद अली ने पीछे मुड़कर देखा। एक अकेला हिप्पी बैठा था। जिसकी खोयी आँखें वैगन की खिड़की के बाहर पहाड़ों की ऊंचाइयों पर किसी को ढूंढ रही थीं। वह अकेला था, शायद उससे उसका साथी बिछड़ गया था। उसकी आवाज में बहुत दर्द था - अहमद अली ध्यान से सुनने लगा।

This evening in rain,

My sad heart full of pain,

I listen onbe again,

For the ebho of your step.

हिप्पी की आवाज ने पूरे वातावरण को उदास बना दिया। पहाड़ के ऊपर से शोर करके गिरता झरना, बारिश और नीचे बहती नदी सब जैसे उस अजनबी व्यक्ति के दुख में हिस्सेदार बन गए थे। अहमद अली ने भी अपने मन में एक विचित्र बेचैनी अनुभव की। उसने न कभी मुहब्बत की थी और न ही कोई उससे बिछुड़ा था। लेकिन फिर भी उसे अपने अकेलेपन का शिद्दत से एहसास हुआ। उसे लगा जैसे कि हिप्पी ने उसे अपने आगे जाहिर कर दिया था। उसकी पूरी जिंदगी खाली और खोखली थी। जिंदगी में न ही प्यार का रंग था और न ही बिछोड़े का। पहली बार उसे पता चला कि एहसास और भावनाएं क्या होती हैं।

वैगन बहरीन आ पहुंची थी। बादल बरस चुके थे और सामने पहाड़ों की ऊंचाइयों पर लंबे सीधे पेड़ों में अटककर ठहर गए थे। शाम होने वाली थी। बहरीन के छोटे बाजार में रिहायशी लोगों की अपेक्षा बाहरी लोग मर्द और औरतें ज्यादा चलते फिरते नजर आए। बहरीन की सीजन जोश में थी। बाजार के पीछे पहाड़ पर घर बने हुए थे। बहते पानी का जोरदार शोर था। झरना पहाड़ से होता हुआ सीधे बड़े बड़े पत्थरों पर गिरकर नदी में मिल रहा था। झरने के गिरने और नदी के बहने की तेज आवाजें आपस में मिलकर एक जोरदार गर्जना पैदा कर रहे थे। झरना जो रास्ता पार करके नदी में मिल रहा था उस पर पुल बना हुआ था। होटल पुल के दूसरी ओर थी। अहमद अली ने थोड़ी देर पुल पर खड़े होकर झरने को देखा और उसके बाद पुल पार करके होटल में गया। उसने काऊन्टर पर जाकर कमरे के लिए बात की। सीजन होने के कारण होटलों में भीड़ थी। बैरा उसे कमरा दिखाने के लिए ले गया।

‘‘एक कमरा अभी अभी खाली हुआ है। बहुत ही अच्छी जगह पर है। कोने पर है। वहां से आपको झरना भी नजर आएगा और पहाड़ भी...’’ बैरा सीढ़ी चढ़ते बातें करता रहा।

कमरा बड़ा था। अहमद अली को अच्छा लगा।

‘‘क्या साहब, कमरा पसंद आया?’’ बैरे ने कमरा दिखाने के बाद अहमद अली की ओर देखते कहा।

‘‘हां ठीक है,’’ अहमद अली ने एक नजर दोबारा कमरे पर डाली। ‘‘बिस्तरे की चादर तो बदली है न?’’

‘‘हां साहब, मैंने अभी अभी बदली है। आप रुकिए तो मैं रजिस्टर लेकर आता हूं।’’ बैरा जल्दी जल्दी नीचे उतर गया।

अहमद अली ने बैग खोलकर कपड़े, टॉवेल और चप्पल निकालकर बाहर रखे। टॉवेल लेकर बाथरूम में गया और जल्दी जल्दी नहाकर बाहर निकला। उसने चाहा कि सूर्य ढलने से पहले कुछ घूम फिर ले। आँखों का नजारों से पेट ही नहीं भर रहा था - बैरा रजिस्टर लेकर आया तो अहमद अली ने उसमें नाम और पता लिखकर हस्ताक्षर किए।

‘‘साहब, चाय लेकर आऊं?’’ बैरे ने पूछा।

‘‘नहीं, अभी जरूरत नहीं,’’ अहमद अली चाय के लिए रुककर वक्त नहीं गंवाना चाहता था।

वह होटल से नीचे उतरकर रास्ते पर आ खड़ा हुआ। वह रास्ता कलाम की ओर जा रहा था, जिसके लिए उसने सुना था कि वह जगह बहरीन से भी ज्यादा सुन्दर है। दूसरे दिन उसने कलाम की ओर जाने का कार्यक्रम बनाया था। रास्ते के इस ओर पहाड़ के दामन में स्वान नदी बह रही थी। हरियाली से ढका पहाड़ बहुत ही गहरा था और ऊपर लंबे लंबे और सीधे पेड़ खड़े थे। पहाड़ में कुदरत की सुंदरता के साथ एक अजीब प्रकार का डर भी था। नीचे कहीं कहीं घर नजर आ रहे थे। नदी के दूसरी ओर पहाड़ पर जाने के लिए लकड़ी का मजबूत पुल बना हुआ था। अहमद अली पुल पार कर दूसरी ओर आया और नदी के किनारे वाले रास्ते पर चलने लगा। लोगों के कदमों ने रेती और पत्थरों से भी रास्ता बना दिया था। नदी में पानी उछलता हुआ, घुसता आ रहा था। हल्की बूंदा बांदी शुरू हो गई थी। अहमद अली एक बड़े पत्थर पर जाकर बैठ गया और नदी के गुस्सैल पानी को देखने लगा। जब अंधेरा हो गया और पानी का रंग गहरा काला हो गया तो वह पत्थर से उठकर वापस लौटा। उसने नदी किनारे बने एक छोटे होटल में चाय पी। नदी की आवाज और ज्यादा ऊंची और तेज हो गई थी। अहमद अली उठा और बाजार में आकर दुकानों में रिहायशी लोगों के कलाकारी के नमूने देखने लगा। उसका कुछ चीजें खरीद करने का इरादा था, लेकिन दूसरे दिन लेने की सोचकर वापस अपने होटल लौट आया। उसने बैरे को बुलाकर खाने के लिए पूछा।

‘‘साहब, हमारे यहां मटन कढ़ाई फर्स्ट क्लास बनता है, यह खाइए।’’

‘‘ठीक है, लेकर आओ।’’ अहमद अली उसे ऑर्डर देकर पलंग पर लेट गया और आँखें बंद करके रिलेक्स होने की कोशिश की। दिमाग को खाली रखने के लिए उसने पानी की गरजदार आवाज पर ध्यान दिया।

कमरे में खटखटाहट हुई तो उसने आंखें खोलीं, बैरा खाना लेकर आया था। अहमद अली ने उठकर खाना खाया और फिर बैरे को बुलाकर चाय लाने के लिए कहा।

‘‘साहब, और कुछ चाहिए?’’ बैरे ने थाली उठाकर कहा।

अहमद अली ने प्रश्नात्मक नजरों से बैरे की ओर देखा। खाना और चाय के बाद और कौन-सी चीज उसे चाहिए थी?

‘‘यहां पर सब कुछ मिलता है, साहब!’’ बैरे ने मतलब भरे ढंग से मुस्कराते कहा।

‘‘सब कुछ में क्या क्या है?’’ अहमद अली को आश्चर्य हुआ।

‘‘औरत, व्हिस्की...’’ बैरा मुस्कराने लगा।

‘‘व्हिस्की तो मैं पीता नहीं, बाकी औरत कुछ अच्छी मिलेगी या ऐसी वैसी?’’

‘‘फर्स्ट क्लास, साहब! आप खुद देखना-फिर आपकी मर्जी।’’

‘‘पैसे कितने?’’

‘‘पैसे थोड़े ही हैं, साहब-केवल सौ रुपए।’’

अहमद अली ने थोड़े देर तक सोचा।

‘‘हूं! ठीक है।’’

‘‘अच्छा साहब, फिर 10 बजे।’’

अहमद अली ने गर्दन हिलाकर हां की और बैरा बाहर चला गया। अहमद अली कपड़े बदलकर पलंग पर लेट गया। उसने सोचा स्वात की सुंदरता का यह मजा भी चखके देख लेना चाहिए। थकावट होने के कारण उसे जल्दी नींद आ गई। दरवाजे पर खटखटाहट की आवाज ने उसे जगा दिया। उसने घड़ी पर नजर डाली, पौने बारह बज रहे थे-उसने उठकर दरवाजा खोला। दरवाजे पर वही बैरा खड़ा था और उसके पीछे चदर में लिपटी एक औरत थी। बैरा औरत को लेकर अंदर आया। कमरे में आकर औरत ने मुंह पर से कपड़ा हटा दिया। उसकी नजरेेंं नीचे फर्श पर थीं। अहमद अली ने अंदाजा लगाया कि वह 24-25 वर्ष की होगी। किसी वक्त बहुत सुंदर रही होगी, लेकिन अभी भी उसकी सुंदरता का कुछ अंश उसमें था। आंखों के नीचे काले नीले घेरे थे, लेकिन भारी रंग पर वे ज्यादा जंच रहे थे।

अहमद अली ने बैरे की ओर देखा जो उसे परख रहा था। बैरे ने बाहर आने का इशारा करके कमरे से निकल गया। अहमद अली उसके पीछे गया।

‘‘साहब, क्या विचार है?’’ बैरा फर्राटे से बोला।

‘‘ठीक है,’’ अहमद अली ने धीरे से कहा।

‘‘फिर साहब पैसे दीजिए। औरत का मर्द नीचे खड़ा है। उसे देने हैं।’’

अहमद अली ने सौ के नोट के साथ बैरे को पांच रुपए खर्ची (टिप) दी। बैरा पैसे लेकर जल्दी जल्दी नीचे उतर गया। अहमद अली कमरे में लौट आया। उसने देखा कि औरत अभी भी उसी स्थान पर खड़ी थी। उसने दरवाजा बंद करके अंदर से कुंडी लगा दी।

‘‘खड़ी क्यों हो?’’ अहमद अली की आवाज पर गुमसुम खड़ी औरत हड़बड़ाई। ‘‘यहां आकर बैठ,’’ अहमद अली ने पलंग की ओर इशारा किया। उसने कमरे की बत्ती बुझा दी।

हल्के अंधेरे में औरत के शरीर का भारी रंग सोने की तरह झलक रहा था। अहमद अली को लगा जैसे उसके पैरों के नीचे शोले आ गए थे। उसने पलंग पर दोनों बांहें घुसाकर खुद को ऊपर किया और औरत के मुंह में देखने लगा। औरत ने आंखें बंद कर ली थीं, वह किसी बेजान बुत की तरह पड़ी थी। अहमद अली औरत के करीब आया तो उसे दूध भरे स्तनों की बू आई, कच्चे दूध की गंध के कारण उसका मन घबराने लगा। शायद वह अभी अभी अपने दुधमुंहे बच्चे को दूध पिला आई थी।

वह औरत से दूर होकर लेट गया। कुछ देर तक वह कुछ न बोला और उसके शरीर में कोई हलचल नहीं हुई।

आखिर बोरियत मिटाने के लिए उसने औरत से पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘अनार गुल’’ औरत ने हिचकते कहा।

‘‘अनार गुल!’’ अहमद अली ने उसकी ओर देखते कहा, ‘‘तुम्हारे कितने बच्चे हैं?’’

औरत ने खुद को ढकते,

‘‘चार बच्चे हैं,’’ उसने कहा।

‘‘सबसे छोटा दूध पीता है क्या?’’

‘‘हां आ...’’ औरत हिचकी।

‘‘तुम्हारा पति क्या करता है?’’ अहमद अली को अपना प्रश्न अजीब लगा।

‘‘मजदूरी।’’

‘‘मजदूरी अच्छी मिलती है?’’

‘‘नहीं बाबू साहब, कभी मिलती है, कभी नहीं। सर्दी में जब बर्फ पड़ती है तब कोई काम नहीं मिलता।’’

‘‘तुम्हारा पति तुम्हें औरों के पास कैसे छोड़ता है?’’

‘‘पेट, बाबू साहब, भूखे पेट के नर्क को तो भरना है...’’ औरत ने दुख से कहा।

अहमद अली को बात सुनकर सचमुच दुःख हुआ। उसने चाहा कि दो तीन शब्द हमदर्दी के कहे, कोई आश्वासन दे, लेकिन वह क्या कहे? और ऐसा कहने से होता भी क्या! उसने औरत के कमर के नीचे बांह देकर उसे अपनी बांहों में भर दिया।

झरने का शोर करता गिरता पानी नदी की तेज धारा में मिल गया था। अहमद अली को लगा कि उसका पलंग गरजती नदी के तेज बहाव में बहता जा रहा है।

अहमद अली की आंख खुली तो अभी अंधेरा छाया हुआ था। औरत जा चुकी थी। कुछ देर तक वह नदी की आवाज सुनता रहा। आवाज में वह जोश और तेजी नहीं थी। अहमद अली को अचरज हुआ। वह उठकर बाथरूम में गया। लौटकर कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर बालकनी में आ खड़ा हुआ। सामने सदियों से बुलंद और रौबदार पहाड़ था, जिस पर हल्का धुंध फैला हुआ था। अहमद अली ने एक लंबी सांस ली। ठंडी अर्ध नींद की हवा ने उसके अंदर आनंद पैदा कर दिया। उसने दोनों बांहें ऊपर उठाकर शरीर को खींचकर आलस तोड़ा। तभी उसे अनार गुल याद आई-अनार गुल जिसकी सुंदरता यहां के कुदरती हुसक् का एक भाग थी। अचानक उसके मन में एक विचार आया कि उसने कुदरत से ज्यादती की थी। उसने कुदरत को सौ रुपयों में खरीद करके उसकी सुंदरता को लूटा था। अहमद अली का पूरा व्यक्तित्व हिल गया। उसकी निगाहें सामने लेकिन खौफनाक पहाड़ से होतीं नीचे नदी पर आईं। उसे अपनी हीनता का शिद्दत से एहसास हुआ।

स्वात की खूबसूरत वादी जिसकी चर्चा दूर दूर तक थी, वहां पर इतनी भूख होगी इसका विचार बाहर से आने वाले लोगों को नहीं होता है। वे तो केवल सुंदरता को देखने और उसे लूटने आते हैं। परंतु इस कुदरती सुंदरता से यहां के लोगों का पेट नहीं भर सकता। अहमद अली को कुदरत की सुंदरता में भूख का एहसास हुआ। उसका मन उचाट हो गया, उसे अपने आप से नफरत होने लगी। वह यहां पर कुदरत की सुंदरता देखने आया था, यहां की मजबूर सुंदरता को पीने और लूटने के लिए नहीं आया था। लेकिन यह सब क्यों था? सुंदरता इतनी बेचारी, इतनी कठिन और भूखी क्यों थी? लोग जो कुदरती सुंदरता के भाग हैं उनके शरीर और जवानी की बोली कागज के कुछ नोट हैं?

अहमद अली को चक्कर आने लगा। उसने चाहा कि यहां से भाग निकले। वह लौटकर कमरे में गया। जल्दी जल्दी सामान बैग में बंद करके नीचे उतर गया। सुबह की पहली वैगन वापस जाने के लिए तैयार खड़ी थी। अहमद अली वैगन में जा बैठा। उसने आँखें बंद कर दीं। उसने कुछ भी देखना नहीं चाहा।

lll

0 टिप्पणी "भूखी सुंदरता // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.