बहता पानी // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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बहता पानी

शहनाई का तेज स्वर। कानों से गुजरकर पर्दे में शोर करता। चारों ओर लोग। लोगों का शोर शहनाई के स्वर से मिलकर ज्यादा ऊंचा, ज्यादा फैला हुआ। काम करने वालों की चि­ल्ल पों। (चीखना चिल्लाना)

‘‘फलां, अरे इधर।’’

‘‘ऐ... साहब को पानी दे।’’

‘‘अरे अंधे, साहब को टॉवेल दे।’’

‘‘अरे एकदम मरणींग हो, आगे बढ़ो।’’

शोर, चीख-चिल्लाहट एक दूसरे के ऊपर गिरते, काटते, उभरते, दबते, दौड़ते रहे।

हंसी, ठहाके-खुशी के चिन्ह। खुशी एक पल की जो अब है, वह बाद में नहीं होगी। बाद में होगी केवल परेशानी, जागना, थकावट।

वह चलता रहता है पागलों की तरह, बैठना नहीं चाहता। बैठने से बेचैनी बढ़ जाती है। हर कोई अपने में मस्त है। उसे कोई नहीं पूछ रहा।

‘‘यार, मेरे घर में एक पैसा नहीं था। और यहां जमींदार की शादी में भी जरूर आना था। साली मेरी औरत कह रही थी कि बच्चों के कपड़े फटे पुराने हैं, मैं ऐसे कैसे जाऊंगी शादी में। यहां वहां से व्यवस्था करके काम किया। भगवान मालिक है।’’

‘‘मैंने तो भाई गाय को जा थामा। भांग के पैसे अभी अभी मिले हैं। ऐसे अवसर तो कभी कभी ही आते हैं। लोगों को कुछ वैसा वैसा भी तो होना चाहिए।’’

‘‘बराबर, लेकिन हम ऐसे कामों से दूर हैं। हमसे तो ऐसे परेशानी भरे काम होते नहीं।’’

‘‘कंधे पर रस्सा लटकाए हम भी नहीं चल रहे, लेकिन एक बार काम हाथ में लेते हैं तो उसे पूरा करके ही छोड़ते हैं।’’

‘‘अच्छा, बीड़ी तो पिला।’’

‘‘चल बाहर दुकान पर तो तुम्हें कैप्टन सिगरेट पिलाता हूं। तुम भी क्या याद करोगे?’’

बरामदे के बाहरी मैदान पर पान बीड़ी की कैबिन के बाजू में चूल्हे पर चाय का देगडी, धरती पर रखे कप।

‘‘जमींदार की शादी है या घमासान।’’

‘‘भाई, आखिर हम भी जमींदार है, हम कोई गरीब नहीं हैं जो थोड़ी सी खातिरदारी करके, केवल खाना खिलाकर लोगों को विदा कर दें।’’

‘‘शादी में मवेशी कितने हैं?’’

‘‘चार गायें हैं, आठ दस बछड़े हैं।’’

कान के नजदीक मुंह, बुदबुदाहट।

‘‘मवेशी हैं सब चोरी के।’’

‘‘नहीं नहीं! तुम्हें कैसे पता चला?’’

‘‘मुझे पता है कि किन किन लोगों पर यह बार रखा गया था।’’

वह बूट से मट्टी छटककर फिर से पहनकर उठकर चलता है।

‘‘बहुत शोर है। जमींदार भी रिश्तेदार हैं। एक दूसरे से शादी नहीं की है, मेला लगा दिया है।’’

एक किसान दौड़ता हुआ उनके पास आता है।

‘‘साहब, शहर से मेहमान आए हैं।’’

मेहमान! कौन से? कौन आए होंगे?

चलता है।

‘‘दूल्हा ये है।’’

‘‘ये है?’’

‘‘और नहीं तो, नहीं पहचानते क्या?’’

‘‘बचपन में देखा होगा, अभी बच्चे ही थे तो शहर चले गए।’’

वह आगे बढ़ आया है। बारातियों की आंखें उस पर हैं। वह लोगों की ओर देखे बिना चलता रहता है। खास मेहमानों के लिए बने बरामदे में उसके मित्र बैठे हैं, शहर से आए हुए।

गले लगकर मिलता है।

‘‘गाँव तक पहुंचने में कोई परेशानी तो नहीं हुई?’’

‘‘नहीं, सीधे आ उतरे हैं।’’

‘‘हम तो सफर करके आए हैं, लेकिन तुम कुछ थके हुए नजर आ रहे हो। नींद नहीं की है क्या?’’

‘‘अब साहब खुशी की वजह से नींद कैसे करेगा? साहब के लिए तो वक्त काटना ही मुश्किल होगा।’’

‘‘अब सब कसर निकालेगा।’’

‘‘लेकिन बाद में पता चलेगा कि शादी से पहले हमसे सलाह लेता। मैं कहता भाई, ऐसा काम ही मत कर।’’

वह उस दोस्त की ओर देखता है। दो शादियां की हुई हैं और अभी और ताड़ में।

‘‘खैर, शादी है तो एक सामाजिक बंधन, लेकिन सेक्स प्रॉब्लम का एक अच्छा हल है। वैसे हम लोग कहां एफोर्ड कर सकते हैं!’’

‘‘हां यार, है बड़ा प्रॉब्लम। हमें खुशी है कि हमारे इस दोस्त की सेक्सुअल फ्रस्ट्रेशन तो कम से कम दूर होगी।’’

ठहाके सभी के एक साथ। आँखों में चमक। इशारे। वह भी चाहता है एन्जॉय करना। बड़े ठहाके लगाना। लेकिन एकदम बोरियत का एहसास इन सब से। तटस्थ। दोस्त एक दूसरे से बातें करने लगते हैं। राजनैतिक बहस छिड़ी हुई। बहस में जोर पैदा करने के लिए और जोर से बातें करना! गाने चालू हो गए। लाऊड स्पीकरों की कान के पर्दे फाड़ देने वाली आवाजें। बातें करने की तेज आवाजें। वह भागना चाहता है इन सभी आवाजों को पीछे छोड़कर। आवाजों को किसी गठरी में बांधकर, गठरी को पीछे फेंककर दौड़ भागने की इच्छा। शोर। चलना। माथापच्ची, भाग-दौड़। डींगें, शोरगुल, बुदबुदाहट। वह इन सबसे अलग-दूर। अनजान, रास्ता भूले मुसाफिर की तरह बैठा है। जिसका कोई संबंध न हो और जिससे किसी का संबंध न हो-एक भुला दिया गया पराया व्यक्ति।

वह उठता है।

‘‘कहां?’’

‘‘घर से होकर आता हूं।’’

‘‘हां भाई, तुम हमारे पास कैसे बैठोगे?’’

‘‘अभी से घर का आकर्षण!’’

ठहाका, बेवजह।

घर - औरतों और बच्चों की भीड़।

मैं घर क्यों आया हूं? बिना किसी काम के! औरतें क्या कहेंगी। पीछे दोस्त क्या कहेंगे? और यह मुझे हुआ क्या है? मेरा अंदर जमी बर्फ का पहाड़ क्यों बन गया है? यह क्या बात है? परेशानी... बोरियत और बेबसी... तटस्थता। लेकिन आखिर क्यों? शायद मैं डरा हुआ हूं। मैं ऐसा नहीं चाहता था जो अब हो रहा हूं।

वह औरतों की भीड़ में से होकर कमरे में अंदर जाना चाहता है।

‘‘बेटे यहां आओ।’’

माँ के कहने पर सर घुमाता है। कुछ औरतों के साथ बैठी हुई ‘‘मुसीबत’’, वहां जाता है।

‘‘बेटे, ये तुुम्हारी चचेरी ममेरी बहनें हैं। कहती हैं हमने दूल्हा नहीं देखा है।’’

माँ नाम बताती जाती है और वह क्रम से हाथ देता है। ‘‘हूं... तो यह है वह।’’ फीचर्स बहुत मोहक हैं। लड़कियां फीकी फीकी। एक बात करती है। चेहरे पर दृढ़ता है।

‘‘भाई, हमें शादी से ज्यादा तुम्हें देखने की चाहत है।’’

‘‘फिर अभी देख लो।’’

हंसी।

‘‘भाई, मुझे नहीं पहचानते?’’ एक अधेड़ उम्र की औरत पूछती है।

वह शर्मसार होता है। उत्तर नहीं सूझता।

‘‘नहीं मुझे तो याद नहीं।’’

‘‘वाह भाई वाह, मैं तेरी मामी हूं, मुझे भी नहीं पहचानते?’’

‘‘बहुत दिन हो गए हैं न मामी।’’

हंसी। वह शर्मसार होता है। माँ उसकी जान छुड़ाती है।

‘‘बेटे, काम से आए थे?’’

काम से! काम... कौन-सा काम...

‘‘गर्मी है। नदी पर नहाने जाता हूं। टॉवेल और साबुन लेने आया था।’’

माँ उसे टॉवेल और साबुन लाकर देती है। जल्दी जल्दी निकल जाता है। नदी घर के पीछे है। सामने खेतों से और घने पेड़ों के पीछे से ढलता सूर्य। खेतों की हरियाली और शाम का नीलापन मिले हुए। अकेलापन। सभी लोग शादी के शोर में। गानों का शोर कुछ धीमे वहां तक पहुंचता।

कपड़े उतारकर, धोती पहनकर नदी में घुस जाता है। उसे पानी का ठंडापन महसूस होता है। हर वक्त नया पानी। यह पंक्ति शायद उसने हर्मन हेस के उपन्यास ‘‘सिद्धारथा’’ में पढ़ा था, ‘‘पानी जो हमेशा बहता रहता है और हमेशा नया होता है।’’

चाहता है कि आंखें बंद करके खुद को छोड़ दे। ठंडे पानी में बहता जाए।

‘‘ये इतना शोरगुल कैसा है? क्या हो रहा है?’’ आंखें खोलकर किनारे के नजदीक आता है। सचमुच पानी में बहता जा रहा था।

मेरा शरीर है। मेरा मन है। फिर भी मैं कुछ नहीं हूं। मेरी कोई मर्जी नहीं। इरादा नहीं। चुनाव नहीं। कुछ भी नहीं है। मेरा होना न होना है। औरों की मर्जी है। औरों का चुनाव है। औरों का निर्णय है। हो वही रहा है जो मैं नहीं चाहता।

बहते पानी की ओर देखते उसे लगता है : दुख अनंत पानी की तरह उसकी ओर बहता आ रहा है, उसकी आने वाली नस्ल की ओर और वह उस पानी को रोकने की बेवजह कोशिश कर रहा है।

वह नदी से बाहर निकलकर कपड़े पहनता है।

शोरगुल धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ता आ रहा है।

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