हिन्दी भाषा का दुनिया में बढ़ता वजूद // चन्द्रशेखर

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वर्तमान समय में हिन्दी साहित्य को जानना और समझना इसलिए आवश्यक है ताकि हिन्दी भाषा की दशा और दिशा का पता चल सके और हम सब एक लक्ष्य की ओर पहुंच सके। हिन्दी भाषा के मकसद की तरफ पहुंचना एक जिम्मेदारी का भाव है , यह जिम्मेदारी हिन्दी साहित्य के प्रति है । भाषा की अभिव्यक्ति तथा हिन्दी भाषा के प्रति जागरूकता का भाव होना अत्यंत महत्वपूर्ण है जो हिन्दी साहित्य की सृजनशीलता से जुड़ा हुआ है । हिन्दी भाषा का वर्तमान समय में सृजनात्मक माध्यम में भले ही यह आरोप लगाया जा रहा है कि भारत भाषा के प्रति जो गर्व का भाव होना चाहिए उसे देश खो रहा है। लेकिन हिन्दी भाषा और हिन्दी भाषी प्रदेश , भारत तथा विदेश में हिन्दी साहित्य लेखन का एक माध्यम रही है । इसे हमें हिन्दी साहित्य की गहराई में जाकर दीदार करना चाहिए और हिन्दी भाषा का विस्तार समझना चाहिए। भारतीय उपमहाद्वीप, यूरोप तथा अफ्रीका इत्यादि देशों में रह रहे प्रवासी भारतीय हिन्दी भाषा के माध्यम से साहित्य सृजन कर रहे हैं । साहित्य के प्रति उनकी जागरुकता कहीं ना कहीं हिन्दी भाषा के प्रति झुकाव को दिखा रही है , प्रवासी साहित्य लेखन की संवेदना भारतीय संस्कृति के प्रति उत्थान का उदाहरण है। वह अपनी घटना शीलता में भारत के प्रति तथा स्थानीय परिवेश में रहते हुए भारतीय संस्कृति के प्रति झुकेंगे नहीं उन्हें ऐसा लगता है ।

हमारी अस्मिता भारतीय केंद्रीय पहचान है , यह अस्मिता संस्कृति से जुड़ी हुई है कहीं ना कहीं उस भारतीय संस्कृति से दूर हो रहे हैं और हम ऐसी जगह पर रह रहे हैं जहां की अपनी निजी संस्कृति प्रवासी लेखन की यह स्थिति विदेश में हिन्दी भाषा और साहित्य लेखन के प्रति झुकाव को दिखाता है। बल्कि यह भी दिखाता है कि आज दुनिया के किसी भी हिस्से में रह रहा व्यक्ति हिंदी भाषा में अपनी अभिव्यक्ति कर सकता है । आज दुनिया का कोई ऐसा कोना नहीं है जहाँ भारतीयों का अस्तित्व न हो। दुनिया के डेढ सौ से अधिक देशों में दो करोड़ से ज्यादा भारतीयों का बोलबाला कायम है । अधिकांश प्रवासी भारतीय अन्य भाषाओं के साथ-साथ विदेश की सरजमीं पर विलक्षण प्रतिभाओं के वजह से हिन्दी भाषा का परचम लहरा रहे है । सन् 1999 में मशीन ट्रांसलेशन शिखर सम्मेलन बैठक में टोक्यो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर होजुमि तकाना जी ने भाषाई आकड़े प्रस्तुत किए थे। उसके अनुसार विश्व में चीनी भाषा बोलने वालों का स्थान प्रथम और हिन्दी भाषा द्वितीय स्थान पर कायम थी तथा अंग्रेजी तृतीय पायदान पर थी । हिन्दी दुनिया के सर्वाधिक आबादी वाले दूसरे सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश भारत की राष्ट्रभाषा है । आज भी दुनिया भर में चालीस से अधिक देशों के लगभग छः सौ से अधिक विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है । भारत और फिजी में औपचारिक एवं मानक का हिन्दी प्रयोग पाठशाला के अलावा शादी, पूजन, मांगलिक कार्यक्रमों सभा आदि के अवसरों पर होता है। फिजी के संविधान में हिंदी भाषा को मान्यता प्राप्त है , कोई भी व्यक्ति सरकारी कामकाज , अदालत संसद में हिंदी भाषा का प्रयोग कर सकता है ।

हिंदी साहित्य और हिन्दी भाषा अध्ययन और अध्यापन किया जा रहा है जहां भारतीय मूल के लोगों की संख्या अधिक है जैसे पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश ,म्यांमार ,श्रीलंका और मालदीव वही भारतीय संस्कृति से प्रभावित दक्षिणी पूर्वी एशियाई देश जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया ,थाईलैंड ,चीन, मंगोलिया, कोरिया, जापान, आदि जहां हिन्दी को विश्व आधुनिक भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है जैसे अमेरिका , आस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोप के दर्शन अरब और इस्लामिक देश संयुक्त अरब अमीरात (दुबई) अफगानिस्तान, मिस्र, कतर, उज्बेकिस्तान ,कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि देशों में हिंदी साहित्य का पर्याप्त मात्रा में सृजन हो रहा है ।

विश्व हिन्दी सम्मेलन हिन्दी भाषा का सबसे बड़ा अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन है, जिसमें विश्व भर से हिन्दी विद्वान, साहित्यकार, पत्रकार, भाषा विज्ञानी, विषय विशेषज्ञ तथा हिन्दी प्रेमी जुटते हैं। पिछले कई वर्षो से यह प्रत्येक चौथे वर्ष आयोजित किया जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की राष्ट्रभाषा के प्रति जागरुकता पैदा करने, समय-समय पर हिन्दी की विकास यात्रा का आंकलन करने, लेखक व पाठक दोनों के स्तर पर हिन्दी साहित्य के प्रति सरोकारों को और उसे सशक्त करने के लिये जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहन देने तथा हिन्दी के प्रति प्रवासी भारतीयों के भावुकतापूर्ण व महत्त्वपूर्ण रिश्तों को और अधिक गहराई व मान्यता प्रदान करने के उद्देश्य से 1975 में विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शृंखला शुरू हुई। इस बारे में पूर्व प्रधानमन्त्री स्व० श्रीमती इन्दिरा गाँधी जी ने पहल की थी। पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के सहयोग से नागपुर में सम्पन्न हुआ जिसमें विनोबा भावे जी ने अपना बेबाक सन्देश भेजा। तब से अब तक दस विश्व हिन्दी सम्मेलन और हो चुके हैं- मॉरीशस, नई दिल्ली, पुन: मॉरीशस, त्रिनिडाड व टोबेगो, लन्दन, सूरीनाम, न्यूयार्क , जोहांसबर्ग और दसवां विश्व हिंदी सम्मेलन 10 से 12 सितंबर 2015  भोपाल (म.प्र.) में सम्पन्न हुआ ।

राष्ट्र संघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए अब समुचित और समयबद्ध कार्रवाई की जाएगी। इतना ही नहीं, अब हर तीन साल पर विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा और इसका अगला आयोजन नई दिल्ली में होगा। प्रवासी लेखन के प्रति भारत के हिंदी भाषी प्रदेश के चिंतन और आलोचना होती है कि क्या वह इस बात की बहस होती है कि क्या वह हमारे भाषा और साहित्य का हिस्सा है प्रवासी लेखन भले ही दूसरे देशों में हो रहा हो, यह कहीं ना कहीं हमारी भाषा और साहित्य को समृद्ध प्रदान करते हैं और हमें इसी भाषा और साहित्य विस्तार ही समझना चाहिए वहीं दूसरी ओर भारत से गए ऐसे लोग जिन्होंने इंसानी संस्कृति में अपनी एक पहचान बनाई है और उनकी हिंदी भाषी प्रदेश से उनकी एक दूरी कायम है इसे हम में उनकी निजी विशेषता माननी होगी । वर्तमान समय साहित्य लेखन में आधुनिक विधाओं में हो रहा है उपन्यास कहानी निबंध नाटक कविता आलोचना स्मरण और हिन्दी भाव की विधाओं उपन्यास लेखक मुंशी प्रेमचंद का लेखन हिंदी प्रदेश के स्थानीय हिंदी भाषा प्रदेश तक कायम रहा जो दूसरे देशों में भी पढ़े जाने वाले सबसे बड़े लेखक है पश्चिमी देशों में यह देखा गया कि जिन देशों में स्थानीय परिवेश का आधार बनाकर लेखन कार्य किया गया। वह अत्यंत प्रसिद्ध हुआ और उनका साहित्यिक प्रतिनिधि बनकर उभरता रहा है आधुनिक दौर में सोशल मीडिया को विस्तार दिया जा रहा है आधुनिकता का एक हिस्सा प्रौद्योगिकी ने व्यक्ति को एक दूसरे से संवाद करने का एक नया प्लेटफार्म मुहैया कराया है । सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति में भिन्नताएं देखी जाती भिन्नताओं के रूप में भाषा की क्षमता से जुड़ा हुआ है हिंदी भाषा सोशल मीडिया सहज रुप से लिखी पढ़ी जाती रही है । सोशल मीडिया के भाषा के प्रति सचेत और जागरूक समूह भले दिखाई ना देता हो लेकिन अभिव्यक्ति हिंदी भाषा में हो रही है हम सभी को भाषा के प्रति सम्मान व भाषाई मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए ताकि हिन्दी भाषा मालामाल हो सके और अभिव्यक्ति की दुनिया में अपनी अमिट छाप छोड़ सके।

हिंदी भाषा से अपने आप में विश्व स्तर पर जिस तरीके से दिन-प्रतिदिन लोग हिन्दी से जुड़ रहे हैं यह हिंदी भाषा के लिए शुभ शगुन है इसमें लेखकों पाठकों , कवियों, विचारकों सामाजिक कार्यकर्ताओं ,नेताओं, दैनिक दिनचर्या से जुड़े तमाम लोगों का जिस तरीके से हिन्दी भाषा के प्रति प्रेम उत्साह उमड़ रहा है इससे निश्चित रूप से यह जाना जा सकता है आने वाला युग हिंदी भाषा के लिए मील का पत्थर साबित होगा । हिन्दी साहित्य , हिन्दी भाषा का बेहतरीन शब्दों का संगम है यदि कोई भाषा अपने वजूद को आगे बढ़ाती है तो उस देश के गौरव गाथा का माथा ऊंचा करती है।

अभिमत चन्द्रशेखर

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