व्यंग्य // आलू-कचालू // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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हिन्दी की एक प्रसिद्ध बाल-कविता है – ‘आलू-कचालू कहाँ गए थे’। उस कविता में आलू बेचारा बैगन की टोकरी में सो गया था। लेकिन आलू अब जाग गया है। उसने उत्तरप्रदेश में विधान सभा के बाहर रात भर धरना दिया है। मुख्य-मंत्री के आवास के सामने और राजभवन के बाहर भी बड़ी तादाद में आलुओं का जमघट रहा। सड़क पर इतनी बड़ी मात्रा में आलू देखकर सोती हुई पुलिस और प्रशासन में हडकंप मच गया। दरोगा सहित पांच पुलिस कर्मी सस्पेंड कर दिए गए। वाहनों से दब कर आलू खराब हो गए, कुचल गए।

आलू के साथ सचमुच बड़ी ज्यादती हुई है। उत्तर प्रदेश में आलू हर जगह बड़ी इफरात से पैदा हुआ। आलू चिल्लाता रहा। कुछ करो। पुराना आलू पडा हुआ है, और नया आ गया। लेकिन शासन ने कोई सुनवाई नहीं की। नेता लोग बस जुमले फेंकते रहे। किसान क्या करता उसने आलू फेंक दिए।

कहाँ तो आलू के लिए बड़ी बड़ी बातें की जा रहीं थीं। आलू उगाओ। मशीन में इस तरफ से डालोगे, उस तरफ सोना निकलेगा। मशीन बनने से पहले ही फेल हो गई। आलू फेंक दिया गया। मशीन बनाने वाले नेता मुंह ताकते रह गए। वैज्ञानिकों ने रिसर्च कर डाली। एक आलू से इतनी ऊर्जा निकल सकती है कि एक बल्ब जल सके, एक पंखा चल सके। लो बना लो आलू से बिजली, आलू बेसहारा सड़क पर पडा है !

यह भी एक बड़ा इत्तेफ़ाक है। इधर लालू जेल गए, और दूसरे ही दिन आलू सड़क पर आगया। कभी सोचा नहीं था कि लालू के समर्थन में आलू भी इस तरह एक-जुट हो जाएगा। क्या लालू की आलू से भी कोई गुप्त साठ-गाँठ थी ? लगता तो यही है। आलू भी राजनीति खेलने लग गया है।

वैसे सब्जी के रूप में भी आलू ही एकमात्र ऐसी सब्जी है जो किसी भी अन्य सब्जी के साथ अपनी सब्जी पका लेती है। आलू-टमाटर। आलू मटर। आलू गोभी। आलू मेथी। आलू-पनीर। इत्यादि ...| अलग से तो आलू खैर, तरह तरह से पकता ही है। भुना हुआ आलू। उबला हुआ आलू। आलू मुसल्लम। आलू लच्छा। दम- आलू आदि आदि। इसके अतिरिक्त आलू का पराठा, आलू की कचौड़ियाँ। मुंह में पानी आ जाता है। आलू न हो तो रसोई सूनी हो जाती है।

यही आलू जो सब्जियों का राजा कहा जाता है आज रंक हो गया है। यह ज़मीन के नीचे बेशक पैदा होता है, लेकिन ज़मीन के ऊपर उगने वाली सब्जियों में इसका एक-छत्र राज रहा है। पर आज तो आलू के पौधे में आलू का अपना स्थान कौन सा है इस पर ही सवाल उठ खड़े हुए हैं। सामान्य जन के लिए तो आलू कंद-मूल ही है, लेकिन विद्वतजन सवाल उठाने लगे हैं की क्या वास्तव में आलू पौधे की जड़ ही है ? आलू, आलू के पौधे की जड़ है या तना है ? अच्छी खासी एक बहस चल पडी है। वनस्पति शास्त्री तो अंतत: इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि आलू वस्तुत: पौधे की जड़ न होकर उसका तना है –एक प्रकार का ‘परिवर्तित’ तना। अब यह परिवर्तित तना क्या होता है, वही जानें।

आलू के कितने ही प्रकार हुआ कटते थे। आलू का दुर्भाग्य देखिए, भारत में आज आलू के कई प्रकार तो गायब ही हो गए हैं। पहले एक पहाडी आलू हुआ करता था। पहाड़ों पर उगता था। बेहद बारीक छिलके वाला सबसे अधिक स्वादिष्ट आलू था यह। पर मैदान में क्या पहाड़ों पर भी नहीं मिलता है आजकल। कारण जो भी हो। कहते हैं कि पहाड़ों पर शहरीकरण ने इसकी ज़मीन छीन ली। इसी तरह एक ज़माने में, अन्दर से लाल निकलने वाला, कटुई आलू भी गायब हो गया है। आलू की और भी कई किस्मे गायब हो गईं। न जाने किसकी नज़र लग गई बेचारे आलू पर !

वैसे कहते तो यह भी हैं कि सरकार का जिस जिस चीज़ पर भी ध्यान जाता है, वह गायब ही हो जाती है। सरकार ने इस साल अधिक से अधिक आलू की पैदावार के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया, और आलू के बुरे दिन आ गए। सामान्यत: बसंत और आलू एक साथ आते हैं। दोनों को साथ साथ देखकर जनता दोनों के रंग में रम जाती थी। घोंघा-बसंत के वज़न पर आलू-बसंत हो जाती थी। सरकार ने प्रोत्साहित किया तो आलू इस बार बसंत से पहले ही आ गया। इतना आया, इतना आया कि सडकों पर छा गया। कहीं नहीं गया है आलू – सड़क पर आ गया है। राजनीति उसे भी भा गई है।

लेकिन साहित्य में आलू पर अभी तक कोई आंच नहीं आई है। आज भी हम प्रेमचंद का ‘कफ़न’ याद करते हैं जिसमें घीसू माधव को आलू भून कर खाते हुए दिखाया गया है। आलू-कचालू वाला बच्चों का गीत. बच्चों का आज भी प्रिय गीत बना हुआ है --

आलू-कचालू बेटा कहाँ गए थे

बैगन की डलिया में सो रहे थे

बैंगन ने लात मारी रो रहे थे

मम्मी ने प्यार किया हंस रहे थे।

आलू –कचालू बेटा कहाँ गए थे

बैंगन की टोकरी में सो रहे थे

बैगन ने लात मारी रो रहे थे

पापा ने पैसे दिए नाच रहे थे ।

आलू-कचालू बेटा कहाँ गए थे

बैगन की डलिया में सो रहे थे

बैगन ने लात मारी रो रहे थे

भैया ने लड्डू दिए नाच रहे थे।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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1 टिप्पणी "व्यंग्य // आलू-कचालू // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. बहुत बढ़िया। आलू टिक्की खाने को जी करता है।

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