अकेला बेचारा एक राष्ट्र // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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हिन्दी में एक मुहावरा है। आदमी अकेला आया है और अकेला ही जाएगा। लेकिन विडम्बना देखिए कि इस आने और जाने के बीच आदमी न तो अकेला रह पाता है और न ही रहना चाहता है। फिर भी शायद हर मनुष्य के जीवन में कभी न कभी एक ऐसा वक्त आता ज़रूर है, जब वह बड़ी शिद्दत से अकेलापन महसूस करता है। जब आप अपने किसी प्रिय को खो देते हैं, तो उसकी याद भले ही आपके साथ रहती हो, लेकिन आप अकेलापन महसूस करते हैं। जब आप उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच जाते हैं, जहां आपके ही बच्चे आपसे कतराने लगते हैं और आपकी बात सुनने वाला कोई नहीं रहता. आप अकेलापन अनुभव करते हैं। बदलते परिवेश में जब आप स्वयं को समायोजित नहीं कर पाते, आप अकेले हो जाते हैं। ये वो परिस्थितियाँ हैं जहां अकेलापन कचोटने लगता है।

कवियों और साहित्यकारों की बात ही अलग है। वे तो अक्सर भीड़ में भी अकेलापन अनुभव करते हैं। प्रकृति के पास होते हैं तो प्रकृति में भी अकेलापन ढूँढ़ लाते हैं। अपने अकेलेपन से मुक्ति पाने के लिए, वे कविता और कहानियों में अकेलेपन का, उसे क्या कहते है, “उदातीकरण” कर लेते हैं। मैं दूसरों की बात क्यों कहूँ, अकेलापन तो कभी कभी मैं भी महसूस करता हूँ। अब आप अगर एक कवि के साथ टहल रहे हैं तो भले ही छोटी छोटी क्यों न हों उसकी कुछ रचनाएं तो आपको सुनने ही पड़ेंगीं। कुछ हाइकु अर्ज़ करता हूँ –

चलता रहा /

सांझ पतझर की /

मार्ग अकेला


अकेला पात /

अटका दाल पर /

राह देखता


विचार ग्रस्त /

किंकर्तव्य विमूढ़ /

एकाकी मन


बहरहाल मुद्दे की बात यह है कि प्रकृति में भी अकेलापन तो ढूँढा ही जा सकता है। चाँद अकेला है, सूर्य अकेला है- ऐसे में मनुष्य भी कभी कभी अकेला हो जाता है, तो कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई राष्ट्र या पूरा देश ही कभी अकेलेपन का दंश झेलने लग सकता है ? लगता तो ऐसा ही है। इन दिनों ब्रिटेन अकेलेपन की यही कचोट झेल रहा है और यह अकेलापन इतना बढ़ गया है कि वहां की संवेदन - शील सरकार ने अकेलेपन को निरस्त करने के लिए एक ‘अकेलापन’ मंत्रालय ही बना डाला है।

सरकारें किसी भी देश की क्यों न हों, उनके लिए मशहूर है कि वे बड़ी असंवेदनशील होती हैं। जनता पर तरह तरह के टेक्स लगाती हैं, उसको तरह तरह के कानूनों में जकड़ती हैं; और कुल मिलाकर उनका एक ही काम होता है – सख्ती से शासन करना। अगर देश की जनता की स्वतंत्रता का हनन कोई करता है तो वह उस देश की सरकार ही होती है। सरकार जनता की खुशी नहीं देख सकती। लेकिन इधर कुछ सरकारें जनता की भावनाओं के प्रति बड़ी संवेदनशील हो गईं हैं ! आपको याद होगा हाल ही में भारत में मध्यप्रदेश की सरकार नें जनता के लिए एक ‘आनंद विभाग’ बनाया है। सऊदी अरब में तो पूरा एक ‘खुशी मंत्रालय’ ही खोला जा चुका है। यह संवेदनशीलता अब खरामा खरामा ब्रिटेन तक पहुँच गई है। अच्छी बात है।

वस्तुत: ब्रिटेन को यूरोपियन यूनियन से निकले हुए एक साल से भी ज्यादह हो गया है। जिस समय इस देश ने यूरोपियन यूनियन से निकलने का फैसला किया था तभी यूनियन ने ब्रिटेन से कहा था की वह अकेला ही रह जाएगा। और ऐसा ही हुआ। ब्रिटेन अकेला हो गया और अकेलापन वहां चर्चा का विषय बन गया।

एक समय था जब कहा जाता था, इंग्लेंड का सूरज कभी डूबता नहीं। पर तब भी सूरज अकेला था और आज जब वह डूब गया है, तो भी अकेला ही है। बदलती दुनिया में तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल से ज़िंदगी बेशक आसान तो हुई है लेकिन इस सकारात्मक पहलू के साथ एक कड़वी सच्चाई भी है। लोगों में अकेलापन भी तेज़ी से बढ़ रहा है। इससे निपटने के लिए ही इंग्लैण्ड में अलग से एक पूरा का पूरा ‘अकेलापन मंत्रालय’ ही बना डाला गया है।

ब्रिटिश रेड-क्रास ने गणना करके बताया है कि ब्रिटेन की कुल ६.५ करोड़ की आबादी में से ९० लाख से अधिक लोग अकेलेपन के शिकार हैं। उनका अकेलापन दूर करने के लिए अब सरकार आगे आई है। जो अकेला महसूस करते हैं उन्हें अब चिंता की कोई ज़रूरत नहीं है। अकेलापन मंत्रालय लोगों के दुःख को बांटेगा। अकेलेपन से दुखी लोग मंत्रालय की हेल्प-लाइन पर अपनी परेशानियों को साझा कर सकेंगे। बाक़ी सब तैयारियां तो हो गई हैं, बस अभी तक अकेलेपन को नापने का कोई पैमाना नहीं बन सका है ! इस दिशा में भी मंत्रालय को उम्मीद है कि जल्दी ही कोई न कोई सूत्र मिल ही जाएगा। आशा की जानी चाहिए की इंग्लेंड में अब किसी को अकेलेपन को महसूस तक नहीं करने दिया जाएगा – ‘अकेलापन मंत्रालय’ जो साथ है। अब देखते हैं, अकेलापन तुम कैसे महसूस करते हो ? आखिर जाओगे कहाँ ? अकेलापन महसूस करने के लिए सरकार तुम्हें छोड़ने वाली नहीं है। विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि वहां अकेलापन भोगने वाले ९० लाख लोग अकेलेपन की अपनी निजता को सुरक्षित रखने के लिए सड़कों पर उतरने वाले हैं। वह तो इंग्लैड भारत नहीं है वरना वहां की संसद में भी अब तक बवाल कटने लगता !

--डा, सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

2 टिप्पणियाँ "अकेला बेचारा एक राष्ट्र // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. सबसे बढ़िया लाइन-"अब देखते हैं कि तुम अकेलापन कैसे महसूस करते हो?आखिर जाओगे कहाँ?

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन नमन उस नामधारी गुमनाम को : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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