मशालें // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

‘‘आपकी शहरी जिंदगी और गाँवों में कितना बड़ा फर्क है!’’ ऐरीका ने खेत के बीच बने तंग पगडंडी पर खबरदारी से चलते कहा।

‘‘हां, कराची जैसे शहर से निकलकर यहां आकर एकदम ऐसा लग रहा है जैसे हम एक सदी पीछे चले गए हों।’’ कार्लोस ने उसके स्वर से स्वर मिलाया।

‘‘इसलिए मैंने तुम्हें कहा था कि मेरे गाँव चलकर या सिंध के किसी गाँव में चलकर तुम बोर हो जाओगी...’’ मैंने ऐरिका से कहा।

‘‘ओह, नहीं नहीं, यह बात नहीं। खामोश और शांत वातावरण का भी अपना रोमांच है। यहां आकर मैं बोर नहीं हुई हूं, मुझे खेद है कि तुमने मुझे गलत समझा। हकीकत में मैंने सोशालॉजीकल नजर से बात की थी। अजीब बात है। इक्कीसवीं सदी शुरू होने वाली है, लेकिन आपके गाँवों में कोई तरक्की नहीं हुई है, पीने के लिए साफ पानी भी नहीं है। गाँव अभी भी कई सौ साल पहले जैसे अंधेरे दौर जैसे ही हैं।’’ ऐरिका ने संभलकर पैर रखते कहा।

‘‘नहीं ऐरिका, कुछ परिवर्तन आने शुरू हो गए हैं, गाँवों में बिजली पहुंच गई है। कराची से आते नैशनल हाईवे पर तुम्हें कई जगहों पर फैक्ट्रियां और मिलें नजर आई होंगी। गाँवों के नजदीक शुगर मिलें बन गई हैं और उनके कारण गाँवों की जिंदगी पर असर पड़ने लगा है, मैं बचपन से गाँवों को देखता आया हूं। मेरे विचार से बहुत फर्क पड़ा है। सबसे बड़ी बात तो गाँव वालों में मानसिक जागृति आ गई है। ऐसा लग रहा जैसे कई सौ वर्षों से सोए लोग अचानक जाग गए हैं।’’ मैं शायद ज्यादा बोल गया था, मैंने देखा कि कार्लोस हंस रहा था।

‘‘आप एशिया के लोग मानसिक जागृति को राजनीति से जोड़ लेते हैं।’’ कार्लोस ने कहा। ऐरिका ने मेरी ओर देखा और हंस पड़ी।

ढलते सूर्य की किरणों ने गेहूं के सुनहरे बुट्टों को ज्यादा सुनहरा बना दिया। पक्षी झुंड बनाकर अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे, शाम की हल्की हवा बुट्टों से तैरती जा रही थी।

‘‘और घूमेंगे या वापस चलें?’’ ऐरिका के बाल गेहूं के बुट्टों समान हवा में हिल रहे थे।

‘‘थोड़ी देर में सूर्य ढल जाएगा, फिर अंधेरा हो जाएगा।’’ मैंने कहा और गाँव जाने वाली पगडंडी पर चलने लगे। हम गाँव से ज्यादा दूर नहीं गए थे, इसलिए जल्दी वापस पहुंच गए।

बरामदे के आँगन में कुर्सियां रखी थीं। मैंने नौकर को चाय लाने के लिए कहा। पेड़ और खेत अंधेरे की परछाईयों में गायब होने लगे। मैं बहुत दिनों के बाद गाँव आया था। कराची का शोर जब मन को थका देता है तो गाँव भाग आता हूं, लेकिन यहां पर भी जल्दी बोर हो जाता हूं। यहां पर केवल सोने के और कुछ करने के लिए नहीं है। यह ऐरिका और कार्लोस को बताया था लेकिन वे सिंध का कोई गाँव देखना चाहते थे। ऐरिका और कार्लोस से मेरी पुरानी जान-पहचान थी। यह मुलाकात भी बड़े ही मजेदार ढंग से हुई थी, मैं तब बैंकाक गया था। होटल के आगे टैक्सी ड्राइवर एक यूरोपियन औरत और मर्द से झगड़ा कर रहा था। टैक्सी ड्राइवर ज्यादा भाड़ा लेना चाहता था। मैं सिंधी ढंग से बेवजह झगड़े में कूद पड़ा था और मुसाफिरों का साईड लिया था। टैक्सी ड्राइवर बांहें रगड़कर कराटे का पोज बनाकर खड़ा हो गया। मैंने भी पहले बांहें रगड़ीं और फिर सलवार के पायचे खींचकर घुटनों से ऊपर करके मोड़ दिये।

‘‘ओके, कम ऑन,’’ बांहें फैलाकर टैक्सी ड्राइवर को कहा। टैक्सी ड्राइवर मुंह खोलकर अचरज से मुझे देख रहा था। उसने समझा मैं कराटे से भी ज्यादा खतरनाक लड़ना जानता हूं। वह डर गया और थाई भाषा में गालियां देता टैक्सी लेकर चला गया।

कार्लोस और ऐरिका यह पूरा दृश्य आश्चर्यचकित हो देख रहे थे। टैक्सी ड्राइवर के जाने के बाद कार्लोस मेरी ओर बढ़ आया और हाथ बढ़ाकर मेरा शुक्रिया अदा किया। उसने मुझे बार में चलने का निमंत्रण दिया। मैं अकेला था और मुझे साथ चाहिए था। बार में बैठकर हमने एक दूसरे की पहचान कराई। वे दोनों अमेरिकी थे। कार्लोस यूनिवर्सिटी में
आर्ट्स पढ़ाता था और ऐरिका किल शायद लेखिका थी। उसके कुछ उपन्यास छप चुके थे।

व्हिस्की आने के बाद हम तीनों के जाम टकराए और घूंट भरे।

‘‘यह लड़ने का कौन-सा तरीका था?’’ कार्लोस चकित था। ‘‘टैक्सी ड्राइवर डरकर भाग गया!’’

‘‘यह सिंधी तरीका था,’’ मैंने हंसते कहा। हकीकत में यह एक नकल थी। हमारे यहां सिंध में एक खेल है मल्ल युद्ध। मुझे वह आती तो नहीं, लेकिन टैक्सी ड्राइवर कराटे का पोज बनाकर ठहरा, तो मैंने भी मल्ल युद्ध का पोज मारा।’’

‘‘अगर टैक्सी ड्राइवर कराटे लड़ना शुरू कर देता तो?’’ ऐरिका ने पूछा।

‘‘हमारे यहां कहावत है कि केवल दिखावट करना चाहिए, अगला नहीं भागे तो खुद भागना चाहिए, इसलिए मैंने भी सोचा कि अगर टैक्सी ड्रायवर सचमुच कराटे जानता होगा और मेरी ओर बढ़ेगा तो मैं भाग खड़ा होऊंगा।’’

ऐरिका और कार्लोस ठहाके लगाकर हंसने लगे और हमारी दोस्ती पक्की हो गई। हम एक दूसरे को पत्र लिखते रहते थे और बाहरी देशों का प्रोग्राम कुछ इस प्रकार बनाते थे कि तीनों वहीं जाकर इकट्ठे होते थे। अभी वे मेरी दावत पर सिंध घूमने आए थे।

‘‘वे कौन हैं?’’ ऐरिका ने पूछा।

मैंने उस ओर देखा। बरामदे से कुछ दूरी पर खाली मैदान पर झोंपड़े बने हुए थे और उसके आगे आग जल रही थी।

‘‘वे खानाबदोश हैं, जिनको आप जिप्सी कहते हो। इनका कोई ठिकाना नहीं है। बस कभी यहां तो कभी वहां, ऐसे ही भटकते रहते हैं।’’

नौकर चाय लेकर आया था।

‘‘तुम्हारे पास व्हिस्की नहीं है?’’ कार्लोस ने पूछा।

‘‘ओह! गल्ती हो गई। कराची से व्यवस्था करके आना चाहिए था।’’ मुझे दुःख होने लगा।

‘‘हकीकत में मुझे भी याद नहीं रहा। ऐसे खामोश और रोमांटिक माहौल में व्हिस्की ज्यादा मजा देती और वक्त अच्छा बीत जाता। अभी तो आठ ही बजे हैं, और ऐसा लग रहा है जैसे काफी रात बीत चुकी है।’’ कार्लोस ने कहा।

‘‘हां, यहां ऐसा ही लगता है। वक्त सुस्त रफ्तार से बीतता है।’’

‘‘आपके शहर में शराब पर पाबंदी है, तो फिर कैसे मिलेगी!’’ ऐरिका ने पूछा।

‘‘हमारे शहर में जिन बातों पर पाबंदी होती है, उनका महत्व बढ़ जाता है।’’

‘‘मतलब सब कुछ चलता है, लेकिन चोरी छिपे!’’ कार्लोस ने कहा।

‘‘हां और इस प्रकार लोगों को अनुशासन सिखाया जाता है मतलब लोग बाहर से एक हों और अंदर से और...’’

बातें चलते खाना आया और एक बार फिर से चाय का दौर चला।

‘‘नींद तो नहीं आ रही?’’ मैंने ऐरिका से पूछा।

‘‘मेरे विचार से अब हमें सोना चाहिए। मैं सुबह के सूर्य उगने का दृश्य देखना चाहती हूं...’’ ऐरिका ने उत्तर दिया।

‘‘ठीक है। आप अंदर के कमरे में सो जाइये।’’ मैंने उठते कहा।

पहले मैंने सोचा कि घर जाकर सो जाऊं। बहुत दिनों के बाद गाँव आया था इसलिए घर वालों के साथ कुछ वक्त बिताऊं। लेकिन ऐरिका और कार्लोस को अकेले छोड़कर जाना उचित नहीं समझा। गाँवों के हालात बेहद खराब थे, डाके और छीना झपटी तो अपनी जगह, लेकिन डाकू लोगों को उठा ले जाते थे और पैसे लेकर लोगों को लौटाना रोजमर्रा का खेल बन गया था। इसलिए मैंने बरामदे में ही सोना ठीक समझा। नौकर ने मुझे बरामदे में खाट बिछाकर दी।

‘‘चौकीदार को कह कि खबरदारी से पहरा दे। तू भी वहीं बाहर सो जा। चौकीदार वाली बंदूक छूटती है न?’’

‘‘हां साहब, बंदूक ठीक है।’’

‘‘ठीक है। कारतूस डालकर तैयार करके रख।’’ मैंने कहा और फिर खाट पर लेट गया।

सोचा, पूरे दिन की थकान के कारण नींद जल्दी आ जाएगी, लेकिन काफी वक्त बीत जाने के बाद भी नींद नहीं आ रही थी। अंदर कमरे में पड़ा पलंग शायद पुराना हो गया था, जो उसमें से चरचराने की आवाजें आ रही थीं। कार्लोस और ऐरिका के बुदबुदाने की आवाजें आ रही थीं।

‘चुप करके सो नहीं जाते,’ मुझे गुस्सा आने लगा। जब तक वे नहीं सोएंगे, मुझे भी नींद नहीं आएगी, कोशिश करके मैंने उन पर से ध्यान हटाकर सोना चाहा, शायद मुझे कामयाबी मिल रही थी। मैं आधी नींद में था। अचानक बाहर कोई चीखा।

‘‘कौन हो? वहीं खड़ा रह...’’,

लगा कि कुछ लोग दौड़ रहे थे। फिर बंदूक की जोरदार आवाज हुई। मैं जल्दी जल्दी उठकर बाहर आ गया। नौकर और चौकीदार दोनों नहीं थे। दूर टार्च की रोशनी नजर आई, शायद वे दोनों थे। ऐरिका और कार्लोस नाईट गाऊन में बाहर निकल आए थे।

‘‘क्या हुआ?’’ ऐरिका घबराई हुई थी। ‘‘फायरिंग क्यों हुई?’’

‘‘पता नहीं!’’ मैंने कहा।

टार्च की रोशनी जल्दी जल्दी बरामदे की ओर बढ़ती आई। चौकीदार और नौकर दोनों साथ थे।

‘‘क्या था?’’ मैंने उतावलेपन में पूछा।

‘‘साहब, झोेंपड़पट्टी वालों का लड़का मर गया।’’ नौकर ने घबराकर कहा।

‘‘क्या!’’ मुझसे चीख निकल गई। ‘‘कैसे?’’

‘‘मुझे कुछ पता नहीं चला कि लड़का है। बरामदे में अंदर घुस रहा था तो मैंने देख लिया, उस पर चिल्लाया तो भागने लगा। मैंने उसके पीछे दौड़कर कारतूस छोड़ा तो...’’ वह चुप हो गया।

‘‘लाश कहां है?’’

‘‘हम लाश के ऊपर जा खड़े हुए, तो दूर से दो-तीन झोपड़पट्टी वालों को आते देखा। हम वहां से भाग आए,’’ नौकर ने कहा।

मैंने ऐरिका और कार्लोस को पूरी बात बताई। दोनों परेशान हो गए।

‘‘वैरी सैड...वैरी सैड...’’ ऐरिका रुक रुककर कहने लगी।

हम बाहर बरामदे में पड़ी कुर्सियों पर बैठ गए। मैंने कार्लोस से सिगरेट ली। हम तीनों डिप्रेशन की वजह से सिगरेट पीने लगे। मेरा ध्यान झोपड़पट्टी वालों की ओर था। सोचा कि अब क्या होगा। नौकर और चौकीदार की ओर देखा। वे भी डरे डरे चुपचाप बैठे थे।

झोपड़पट्टी वालों की झोपड़ियों से आवाजें आने लगीं और कई लोगों के आवाज मिलकर शोर बन गया था। झोपड़ियों के आगे बुझी आग फिर से धीरे धीरे जलने लगीं।

‘‘जाकर हालचाल तो ले। झोपड़पट्टी वालों से बातचीत कर मामला ठीक करने की कोशिश कर, नहीं तो बहुत ही बुरा हो जाएगा,’’ मैंने नौकर से कहा। वह डरता डरता झोपड़ियों की ओर जाने लगा और अंधेरे में गायब हो गया।

मुझे अचरज इस बात पर था कि झोपड़ियों में से कोई रोने की आवाज नहीं आ रही थी। केवल शोर था। मर्द और औरतें जोर जोर से बातें कर रहे थे। नौकर को गए कुछ देर हुई तो अचानक शोर बहुत बढ़ गया, झगड़ा हो गया था।

अंधेरे में कोई दौड़ता बरामदे की ओर आने लगा। चौकीदार ने टार्च जलाकर उस ओर रोशनी की। नौकर सहमता आ रहा था।

‘‘साहब, झोपड़पट्टी वाले बहुत ही गुस्से में आ गए हैं। कहते हैं हमारे लड़के को साहब (जमींदार) ने मरवाया है। हम उसे नहीं छोड़ेंगे। बंगले को भी आग लगाकर जला देंगे,’’ वह सहमता धरती पर बैठ गया। ‘‘जैसे तैसे जान बचाकर मैं वहां से भागा हूं।’’

तब तक सभी झोपड़ियों में रोशनी हो गई थी। शायद झोपड़पट्टी वाले मशालें जलाकर बरामदे की ओर बढ़ने वाले थे।

‘‘साहब, आप यहां से निकल जाइए, तब तक मैं बंदूक तानकर आगे होकर उनको रोकता हूं।’’ चौकीदार ने कहा।

‘‘नहीं नहीं, पागल हो गए हो क्या? तुम्हारी बंदूक कितने लोगों को रोक पाएगी। आप दोनों यहां से भाग जाओ। हम जाते हैं।’’

‘‘फिर साहब बंगला?’’ नौकर ने पूछा।

‘‘जलने दो। अभी तो केवल अपनी जान बचाने की सोच।’’ मैंने गुस्से से कहा। ऐरिका और कार्लोस परेशान होकर हमें देख रहे थे। मैंने जल्दी-जल्दी में उन्हें बात समझाई।

‘‘आप तैयार हो जाइए, मैं कार लेकर आता हूं।’’ मैं चाबी लेकर कार की ओर दौड़ा। कार को बाहर के बरामदे की ओर लाया तो कार्लोस और ऐरिका नाईट गाऊन में ही दौड़कर आकर कार में बैठ गए।

मशालें बंगले की ओर बढ़ रही थीं। अंधेरा होने के कारण कार की बत्तियां जलानी भी जरूरी था। मैंने एक्सीलेटर पर जोर दिया और कच्चे रास्ते की परवाह नहीं की। मशालें दौड़ने लगीं, लेकिन तब तक हम गाँव से निकल चुके थे। पक्के रास्ते पर आने के बाद मैंने कार को रोका। हम कार से उतरकर गाँव की ओर देखने लगे। गाँव की ओर आकाश में लालिमा थी, जैसे सूर्य उगने वाला हो। लेकिन अभी तो आधी रात हुई होगी, मैंने सोचा। बंगले को आग लग चुकी थी। ऐरिका, कार्लोस और मैंने एक दूसरे की ओर देखा। बात किसी ने भी नहीं की। बोलने के लिए किसी के पास शब्द नहीं थे।

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