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सुरंग // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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कभी कभी उसे लगता था कि रोड को लाकर उसके घर के अंदर रखा गया है... ट्रकें, बसें और कारें जैसे दरवाजे से घुसकर अंदर आ जाती थीं। एक दिन खाट पर ल...

कभी कभी उसे लगता था कि रोड को लाकर उसके घर के अंदर रखा गया है... ट्रकें, बसें और कारें जैसे दरवाजे से घुसकर अंदर आ जाती थीं। एक दिन खाट पर लेटा हुआ था कि उसे लगा कि शोर उसके ऊपर चढ़ता जा रहा है। उसने जोर से कहा, ‘ले जाओ रोड को यहां से! कैसी मुसीबत है यह?’ और चिल्लाता हुआ कमरे से बाहर चला आया। ‘सूखी लकड़ी की तरह कमजोर उसकी बूढ़ी माँ डरती डरती उसकी ओर आई और हिलते होंठों से बुदबुदाते ऊपर आकाश की ओर आँखें उठाकर देखा। उलटे वह और क्रोधित हो उठा। ‘ऐसे होंठों में क्या बुदबुदा रही हो? जोर से कह तो भगवान भी सुने! मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि मेरे लिए दुआ मत मांगा कर...’ माँ डरकर सिमटकर, चुपचाप आँखें नीचे झुकाकर खड़ी रही, लेकिन उसका शरीर अब भी काँप रहा था। उसे माँ पर रहम आया और खुद पर क्रोध। लौटकर अंदर कमरे में चला गया, लेकिन हकीकत में रहम उसे अपने आप पर आता था, अपनी जाति पर, अपनी बिगड़ती दिमागी हालत पर और अपने चारों ओर के माहौल पर। यही बात उसे अच्छी नहीं लगती थी कि और लोग उस पर रहम खायें और उसे अपने आप पर भी रहम आए!

कमरे में अंधेरा हो गया था। उसने बल्ब जलाने के लिए सोचा, लेकिन बटन नीचे करने के लिए उसका हाथ बढ़ नहीं पाया। खाट पर पड़े पड़े थक गया था और अब कमरे में उसको घुटन हो रही थी। वह घर से बाहर निकल गया, रास्तों पर भटकने के लिए। पैरों में चप्पल पहनी हुई थी और दाढ़ी दो दिनों में बढ़ गई थी। फुटपाथ पर चलते उसे अपने पिछले चौकीदार से सामना हो गया। वह जब नौकरी में था और कभी इत्तेफाक से बाजार में चौकीदार सामने आ जाता था तो उसे सलाम करके, अपने रास्ते चला जाता था। उसने देखा कि जैसे ही चौकीदार की उस पर नजर पड़ी, वह पहले तो थोड़ा हिचका, शायद घबरा गया था, उसे इस हालत में देखकर, वह तुरंत सलाम करके सामने खड़ा हो गया और हल्का झुकते हाथ दिया।

‘‘क्या हाल हैं, मियां?’’ उसने परम्परा के तौर पर चौकीदार से पूछा। चौकीदार शर्मिंदा होकर उसे देख रहा था, जैसे कि उसकी नौकरी खत्म होने का कारण वह खुद हो।

‘‘साहब, सब ठीक है... आप तो खुश हैं न साहब!’’

उसकी बढ़ी हुई दाढ़ी और उतरा चेहरा देखकर शकी हो गया। ‘‘आपकी तबियत तो ठीक है न?’’

‘‘हां हां, तबियत ठीक है। तुम बताओ, तुम कैसे हो? कामकाज कैसा चल रहा है?’’ उसे समझ में नहीं आया कि क्यों वह चौकीदार से इतनी बातचीत करने के लिए ठहर गया।

‘‘बस साहब, काम ऐसे ही चल रहा है... साहब, आप...’’ चौकीदार हिचका और रुक गया और उसके चेहरे पर हमदर्दी के भाव उभर आए।

‘यह बेवकूफ क्या समझ रहा है कि नौकरी खोने के बाद मैं पागलों सरीखा हो गया हूं,’ वह जानबूझकर मुस्कराया और कहा, ‘‘सब ठीक है, अच्छा...’’ उसने चौकीदार को हाथ दिया और आगे बढ़ गया। उसने देखा हाथ मिलाते वक्त चौकीदार की आंखों में उसके लिए रहम था। उसे सख्त क्रोध आया। उसके लिए कहीं भी जगह नहीं थी। बाहर कोई न कोई पहचान वाला मिल ही जाता था और सभी अपनी रहम भरी हमदर्दी दिखानी शुरू कर देते थे। घर पर कोई सुख नहीं था। वहां भी दिल घबरा रहा था और घर के सभी सदस्य उसके सामने जैसे खुद को दोषी मानते थे।

ऑफिस में आखिरी दिन पर जब साहब ने उससे हमदर्दी दिखायी, तो ऐसा लगा जैसे वह भी खुद को दोषी मान रहा था। उसने उसे विश्वास दिलाया कि टमिZनेशन में उसका कोई हाथ नहीं था। नौकरी के खत्म होने का कारण नौकरी वाले निवेदन पत्र पर लिखा सिफारशी नोट था।

‘‘मैं तुम्हारे काम से सैटिस्फाइ (संतुष्ट) हूं। मुझे पता है कि तुम बिल्कुल इफीशंट हो, लेकिन हालात तुम खुद देख रहे हो। ऊपर से ऑर्डर आया है कि जिन लोगों को राजनैतिक बुनियाद पर भर्ती किया गया है, उनको निकाला जाए। मुझे तुम से हमदर्दी है, लेकिन मैं कुछ नहीं कर सकता...’’

वह बोर होने लगा। उसे साहब की हमदर्दी बेकार लगी। उसने जल्दी जान छुड़ाने के लिए कहा, ‘‘मैं समझता हूं, साहब, आप मजबूर हैं। आपको मुझसे हमदर्दी है, यह भी बड़ी मेहरबानी। अच्छा साहब...!?’’

उसने सोचा कि जितनी आसानी से और बिना देरी उसे नौकरी से निकाला गया था, उतनी आसानी से नौकरी मिली नहीं थी। उस आधी पंक्ति वाले नोट को लिखाने के लिए कितना भटका था, दर दर भटका था और कितने लोगों को निवेदन किए थे। और उसके बाद नौकरी गई तो उस आधी पंक्ति के नोट के कारण!

उसकी नजर ऑफिस के एक क्लर्क पर पड़ी, जो मजे से सिगरेट पीता आ रहा था। वह घबरा गया और घूमकर (कन्नी काटकर-गच्चा देकर) बाजू वाली गली में घुस गया। उसने सोचा अच्छा हुआ जो क्लर्क की नजर उस पर नहीं पड़ी, नहीं तो फिर से वही सिलसिला शुरू हो जाता। वह बार बार उसी हमदर्दी वाले अंदाज में कही बातें सुन सुनकर परेशान हो गया था। कभी कभी उसके मन में आता था कि कह दे, ‘‘नौकरी गई है तो मेरी गई है, आप क्यों मेरे पीछे लग गये हैं?’’ और वह डर रहा था कि सचमुच कभी वह फट न पड़े। ज्वालामुखी की तरह फट न पड़े।

गली तंग और खराब थी। साथ में बहते नाले में से कहीं कहीं खराब पानी और कचरा उछलकर गली में भर गया था। वह उस गली में पहली बार आया था। उसे विचार आया कि पीछे लौट जाने से अच्छा है कि सीधा चलता रहे। यह गल्ली आखिर तो कहीं पूरी होगी और किसी दूसरे रास्ते से जा लगेगी। वैसे रास्ते पर चलना ठीक नहीं था। ऑफिस के लोग टकरा रहे थे उस रास्ते पर।

वह जल्दी लौटकर घर नहीं जाना चाहता था। उसने सोचा कि जब चल चलकर बिल्कुल थक जाएगा तब घर लौट जाएगा। थकान के कारण नींद जल्दी आ जाएगी, जो रात को नहीं आती थी। जागकर सर भारी हो जाता था और आंखें दर्द करने लगती थीं। अगर नींद आती भी थी तो सख्त बे आरामी (बेचैनी) वाली। केवल उलट पलट। रह रहकर नींद खुल जाती थी। उसे घर के लोगों ने बताया कि वह नींद में चिल्लाता है, जैसे कि कोई सख्त तकलीफ में हो। उसकी माँ उसकी चीखों पर डरकर आ जाती थी, कि कहीं उसकी तबियत तो खराब नहीं हो गई है। वह डर डरकर पुकारती थी और जब उसे विश्वास होता था कि वह नींद में है, तब लौट जाती थी। गली में पड़े खराब पानी पर से उछलते उसने याद करने की कोशिश की, कि उसे यह आदत कब पड़ी! उसके दिमाग में बहुत सी यादें घुल मिल गईं और कोई भी बात स्पष्ट नहीं थी। पूरी जिंदगी दुख ही दुख थे, रुसवाइयां ही रुसवाइयां थीं। भूख, बीमारी और बेइज्जती। मैट्रिक पास करने के बाद तीन वर्ष तक बेरोजगारी का तकलीफदेह दुख। यादें, जिनमें केवल पीड़ा थी, उसका एक ढेर था और वह उस ढेर में से कोई एक याद चुन नहीं सकता था। नींद में चिल्लाने की आदत उसे काफी वक्त से थी। उसे डर था कि जब उसका विवाह हो जाएगा तो उस आदत के कारण नसरीन की नींद खराब हो जाएगी। वह इस परेशानी में था कि यह आदत खुद से कैसे छुड़वाए। नौकरी जाने के कारण और नहीं तो कम से कम इस परेशानी से तो उसे छुटकारा मिला था। वह मन ही मन मुस्कराया।

अचानक उसका एक पैर खराब पानी में जा पड़ा। चप्पल कीचड़ में फंस गया और छींटे उड़कर कपड़ों पर आ पड़े। उसने जोर लगाकर चप्पल कीचड़ में से निकाला। बदबू नथुनों में घुस आई। गली तंग थी और उसमें पूरी तरह से रोशनी भी नहीं थी, वह घबराकर रुक गया। ‘मैं कहां हूं? कहां जा रहा हूं?’ उसने खुद से पूछा। उसे कुछ समझ में न आया। गली अनजान थी। कितनी लंबी थी और कहां जाकर खत्म हो रही थी, इसकी कोई जानकारी नहीं थी। वह उलझ गया कि क्या करे। उसे लगा कि काफी चल चुका है। इतना पैदल चलने के बाद अब पीछे लौटना नामुमकिन था। ‘हो सकता है कि अब गली खत्म होने को हो’, उसने सोचा और चलने लगा।

‘अगर नसरीन से मेरा विवाह हो गया होता, तो इस वक्त क्या हालत होती?... वह मुझे छोड़कर अपने रिश्तेदारों के पास चली जाती। ऐसा ही होता,’ इस बात का उसे विश्वास था। उसे ताज्जुब हुआ कि नसरीन और उसकी आपस में किस प्रकार की मोहब्बत थी! जहां तक उसने सुना था या पुस्तकों में पढ़ा था, जैसे मोहब्बत हर प्रकार के लालच और स्वार्थ से ऊपर कोई आकाशीय चीज होती है। शायद उनकी मोहब्बत कम दर्जे वाली थी। उसे विचार आया कि नसरीन और उसकी मोहब्बत परम्परायी नहीं, बल्कि व्यवहारी मोहब्बत थी। ‘हां, हकीकत यही है।’ वह खुश हुआ कि सच्चाई के तह तक जा पहुंचा था। उसने पूरी बात को परखना चाहा। उसकी नसरीन से उस वक्त से मोहब्बत थी, जब वह एक क्लर्क ही था। वे एक दूसरे को देखते थे, तो नजरें अटक जाती थीं और फिर नसरीन के शरीर में एक हलका कंपन पैदा होता था, नजरें झुका देती थी। उसने कभी नसरीन से मोहब्बत का इजहार नहीं किया था, लेकिन उसे पता था कि दोनों को एक दूसरे से प्यार है। उस वक्त उसकी माँ उसका हाथ मांगने गई, तो नसरीन के रिश्तेदारों ने इन्कार कर दिया। उन्होंने एक क्लर्क को लड़की देकर, उसका भाग्य हमेशा के लिए खराब करना नहीं चाहा। उसे अपनी रुस्वाइयों का शिद्दत से अहसास हुआ था। उसने देखा कि नसरीन को इस बात का कोई दुख नहीं हुआ। वह उन लड़कियों में से थी, जो मोहब्बत तो गरीबों से करती हैं और शादी साहूकारों से। इसके बावजूद वह नसरीन से मोहब्बत करता रहा। उसके बाद जब बड़ी कोशिशों के बाद सिफारिश करवाकर ऑफिसर हुआ, तो नसरीन के रिश्तेदारों ने खुद हाथ देने की इच्छा जताई। मंगनी हो गई। शादी में अभी थोड़ा ही वक्त था, कि उसकी नौकरी खत्म हो गई। नसरीन के रिश्तेदारों ने मंगनी तोड़ दी। उसे उम्मीद थी कि अगर नसरीन रिश्तेदारों के निर्णय का विरोध नहीं कर पाएगी, तो भी इसे मन के तौर पर कबूल नहीं करेगी। उसने नसरीन से मिलने और उससे बात करने की कोशिश की थी। अब मिलने से क्या लाभ और बात करने के लिए कुछ रहा ही नहीं है। नसरीन ने उसे उत्तर भेजा था। वह चलते चलते हंसा। उसने चाहा कि एक बड़ा ठहाका लगाए, मन के डिप्रेशन को हल्का करे, लेकिन उसे लोगों का ख्याल आया, जो उसे पागल समझते। अचानक उसे एहसास हुआ कि वह इतनी देर तक गली में चलता रहा था, लेकिन उसे कोई एक भी व्यक्ति नहीं मिला था। गली अब भी पूरी (खत्म) नहीं हुई थी और ज्यादा तंग हो गई थी। वह ठहर गया। उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। गली में हवा बिल्कुल नहीं थी। उसने ऊपर आकाश की ओर देखा, लेकिन आकाश नजर नहीं आया। गली के दोनों ओर पत्थर की लंबी दीवारें थीं और आकाश गायब था। अचानक उसे विचार आया और उसके बाल खड़े हो गये। वह जहां खड़ा था, वह कोई गली नहीं थी, बल्कि एक लंबी अंधेरी सुरंग थी। वह डर गया और सुरंग में से जल्दी निकलने के लिए दौड़ने लगा। अंधेरे में पत्थर की दीवारों से टकराकर कीचड़ में गिर रहा था और उठकर फिर से दौड़ने लगता। उसे विश्वास हो गया था कि यह सुरंग कहीं पर भी खत्म नहीं होगी, लेकिन फिर भी वह दौड़ता रहा...

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रचनाकार: सुरंग // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी
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रचनाकार
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