मालिक की कयामत // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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अल्लाह रखा की तबियत कई दिनों से खराब थी, उसके पिता ने उसे शहर ले जाकर डॉक्टर को दिखाकर दवा भी ली थी, लेकिन अभी तक कुछ फर्क नहीं पड़ा था। अल्लाह रखा के पिता चौधरी खुदा बख्श अपने गाँव का छोटा मोटा जमींदार था, उसकी जमीन छोटी लेकिन अच्छी थी, अच्छी पैदावार होती थी। चौधरी खुदा बख्श खुशहाल जमींदार माना जाता था, उसे पांच लड़कियों के बाद एक पुत्र हुआ था। इसलिए अल्लाह रखा उसका लाडला पुत्र था, अठ्ठारह वर्ष का नौजवान हो गया था, लेकिन चौधरी खुदा बख्श के लिए अभी तक वही बच्चा था, अल्लाह रखा की थोड़ी भी तकलीफ उससे बर्दाश्त नहीं होती थी। अल्लाह रखा जब गांव के प्रायमरी स्कूल से पढ़कर शहर के हाई स्कूल में दाखिल हुआ तो वहां पर उसका मन नहीं लगा, वह स्कूल जाने से कतराने लगा। चौधरी खुदा बख्श ने जब यह देखा तो उसने भी ज्यादा जोर नहीं दिया।

‘‘बेटे, तुम्हारा मन नहीं लगता तो ठीक है, मेरे कौने-से सात लड़के हैं? तुम इकलौते हो, तुम्हारी पालना के लिए बहुत खेत है।’’ चौधरी खुदा बख्श ने कहा।

असल बात यह थी कि चौधरी खुदा बख्श को अल्लाह रखा में इतना मोह था कि वह अपने पुत्र को अपनी आंखों से दूर नहीं करना चाहता था, अल्लाह रखा पढ़ाई छोड़कर पिता के साथ खेत संभालने लगा। अल्लाह रखा की माँ फातिमा और उसकी बहन हाजिरां जिसकी अभी तक शादी नहीं हुई थी, वे भी खुश हुईं, लेकिन अल्लाह रखा की अचानक बीमारी ने सबको परेशान कर दिया था।

अल्लाह रखा कुछ खाता था तो उसे मितली आती थी, कभी कभी उल्टी कर देता था, यह हालत देखकर परिवार के सदस्यों का दिल घबरा जाता था।

‘‘जरूर मेरे बच्चे को किसी की नजर लग गई है,’’ एक दिन फातिमा ने चौधरी खुदा बख्श से कहा।

‘‘हमारी किसी से कौन-सी दुश्मनी है! नजर कौन लगाएगा?’’ चौधरी खुदा बख्श ने फीकी मुस्कान से हाजिरां की ओर देखा।

‘‘पिताजी, हमारे भाई जैसा सुंदर लड़का हमारे रिश्तेदारों में हो तो बताइए?’’ हाजिरां ने पिता से कहा।

‘‘भगवान लंबी उम्र दे, हमारे अल्लाह रखा जैसा सुंदर जवान रिश्तेदारों में तो छोड़, पूरे गाँव में नहीं है।’’ चौधरी खुदा बख्श ने गर्व से कहा।

‘‘और नहीं तो क्या? लोग तो हैं जलने वाले, किसी बुरी नजर वाले की नजर मेरे बच्चे को लग गई है,’’ फातिमा ने परेशान होकर कहा।

‘‘हां, डॉक्टर की दवा से थोड़ा भी फायदा नहीं हुआ है।’’ अब चौधरी खुदा बख्श को भी शक होने लगा।

‘‘मौसी खतू नजर उतारती है, मैंने उसे कहा है कि धागा कटोरी दो और मुल्ले से पानी भी पढ़वाते हैं। भगवान की दया से नजर उतर जाएगी,’’ फातिमा को जैसे पूरा विश्वास था।

‘‘भगवान ठीक कर देगा।’’ चौधरी खुदा बख्श भी परेशान हो गया था, लेकिन कटोरी धागे और पढ़े गए पानी से भी कोई फर्क नहीं पड़ा। अल्लाह रखा की तबियत वैसी ही खराब रही, आखिर डॉक्टर ने कहा कि हैदराबाद के किसी स्पेशलिस्ट को दिखाइए, उसने चौधरी खुदा बख्श को एक मशहूर डॉक्टर का नाम बताया।

पहले तो फातिमा ने जिद की कि वह भी अपने बेटे के साथ चलेगी, लेकिन चौधरी खुदा बख्श ने उसे समझाया कि घर में जवान लड़की को अकेला छोड़कर चलना ठीक नहीं है।

‘‘तुम वहां चलकर करोगी भी क्या? तुम माँ हो उसकी, घर में बैठकर उसकी दुआ करो।’’ चौधरी खुदा बख्श ने कहा।

‘‘माँ तुम बेकार परेशान हो रही हो, तुम देखना जल्दी ही ठीक होकर घर आऊंगा।’’ अल्लाह रखा ने माँ को सांत्वना दी।

‘‘भगवान ठीक कर देगा, बेटा भगवान सब ठीक कर देगा,’’ फातिमा ने दोनों हाथ ऊपर उठाए, ‘‘हे भगवान! अल्लाह रखा तुमने ही दिया है, अब तुम ही उसकी रक्षा करना। भगवान करे जल्दी ठीक होकर अपने घर लौट आए।’’

‘‘माँ, भैया जल्दी ठीक होकर घर आ जाएगा तो दान करेंगे।’’ हाजिरां ने पिता की ओर देखा, ‘‘क्यों पिताजी?’’

‘‘हां हां, बहुत बड़ा दान करेंगे।’’ चौधरी खुदा बख्श ने मुस्कराकर कहा।

‘‘अच्छा माँ, चलता हूं।’’ अल्लाह रखा ने माँ से विदा ली।

‘‘बेटे, भगवान तुम्हारी रक्षा करे।’’ फातिमा ने अल्लाह रखा को गले लगाकर माथा चूमा, उसके बाद अल्लाह रखा बहन से विदा लेकर पिता के साथ बाहर निकल गया। फातिमा उसे जाता देखकर रुआंसी हो गई, हाजिरां की आंखों में भी आंसू आ गए।

हैदराबाद के सदर वाली डॉक्टरों की गली में मशहूर डॉक्टर की क्लिनिक पर जबरदस्त भीड़ थी, डॉक्टर के सेक्रेटरी ने चौधरी खुदा बख्श को साफ जवाब दे दिया कि आज वक्त नहीं है।

‘‘देखते नहीं कितनी भीड़ है। नाम लिखवाकर जाइए, कल आना।’’ उसने कहा।

‘‘दोस्त, हम दूर से आए हैं, मेरे बेटे की तबियत बहुत खराब है, मेहरबानी करो।’’ चौधरी खुदा बख्श ने उससे हाथ जोड़कर विनती की और फिर उसके करीब जाकर धीरे से कहा, ‘‘तुम्हें [kpkZ पानी देंगे।’’

सेक्रेटरी ने अल्लाह रखा की ओर देखा और फिर कहा, ‘‘मरीज अंदर से निकले तो मैं डॉक्टर साहब को बताता हूं कि इमरजेंसी है। फीस के पांच सौ रुपए दे दीजिए।’’

‘‘भगवान तुम्हारा भला करे।’’ चौधरी खुदा बख्श ने जेब से पाँच सौ रुपए के नोट के साथ एक सौ रुपए का नोट निकालकर सेक्रेटरी को दिया।

इमरजेंसी के कारण डॉक्टर ने अल्लाह रखा को जल्दी बुलाया ऐर अच्छी तरह जांच करके देखा, चौधरी ने उसे पिछले डॉक्टर की लिखी दवाओं का कागज़ भी दिखाया।

‘‘ये दवाएं तो किसी जाहिल ने लिखी हैं।’’ डॉक्टर ने गुस्से से कागज़ को हटाते कहा। ‘‘साहब हमारे शहर वाली अस्पताल का नौजवान डॉक्टर है।’’ चौधरी खुदा बख्श ने उसे बताया।

‘‘हां मुझे पता है, ये नौजवान डॉक्टर सब जाहिल हैं। हमारे ही कॉलेज से पढ़कर कापी करके जाकर डॉक्टर बने हैं।’’ डॉक्टर ने मुंह बनाकर टोकते कहा।

‘‘साहब, मेरा इकलौता लड़का है, आपके हाथ में जादू है, ऐसी कोई दवा दीजिए जो मेरा बेटा जल्दी ठीक हो जाए।’’ चौधरी खुदा बख्श ने विनती भरे स्वर में कहा।

‘‘चिंता करने की बात नहीं है, कुछ टेस्ट करवानी पड़ेंगी, वे करवा लीजिए। तब तक मैं दवाएं देता हूं, वे खिलाइए।’’ डॉक्टर ने कहा।

उसने दवाएं लिखते कहा, ‘‘यहां हैदराबाद में रहते हैं?’’

‘‘नहीं साहब, हमारा गाँव बहुत दूर है।’’

‘‘फिर ऐसा कीजिए, यहां करीब ही एक प्राइवेट अस्पताल है, वहां रहिए, इलाज मेरी नजरदारी में होना जरूरी है, मैं रोज आकर देखकर जाऊंगा।’’ डॉक्टर ने चौधरी खुदा बख्श की ओर देखा, ‘‘कैसे, ठीक है?’’

‘‘डॉक्टर साहब, जैसा आप ठीक समझें।’’ डॉक्टर ने अस्पताल में भर्ती होने के लिए चिठ्ठी लिखकर दी, चौधरी खुदा बख्श ने बाहर आकर सेक्रेटरी का शुक्रिया अदा किया और अस्पताल का पता पूछा।

अस्पताल में भर्ती होने के बाद बाप बेटे कमरे में आकर बैठे तो अल्लाह रखा ने कहा, ‘‘पिताजी, लगता है बड़ा डॉक्टर है।’’

‘‘हां बेटे, कहते हैं कि बड़ा प्रोफेसर है, जो लड़कों को पढ़ाकर डॉक्टर बनाता है वह जरूर बड़ा लायक होगा।’’ चौधरी खुदा बख्श ने कंधा हिलाकर कहा।

डॉक्टर रोज अल्लाह रखा को देखने आता था और एक मिनट रुककर अपनी फीस लेकर चला जाता था।

‘‘बेटे, इलाज से कुछ फर्क महसूस हुआ?’’ चौधरी खुदा बख्श अल्लाह रखा से पूछता था।

अल्लाह रखा परेशान हो जाता था कि पिताजी को क्या उत्तर दे। उसे इलाज से कोई फर्क महसूस नहीं हो रहा था, उल्टा दवाओं के कारण उसकी तबियत ज्यादा खराब हो गई थी।

‘‘हां पिताजी, कुछ फर्क पड़ा है।’’ वह पिता का दिल रखने के लिए कहता था।

कुछ दिनों के बाद चौधरी खुदा बख्श को भी साफ नजर आ रहा था कि अल्लाह रखा पहले से ज्यादा कमजोर हो गया है, उसके मन में विचार उठने लगे कि पता नहीं कौन-सी बीमारी है, जो इतने बड़े डॉक्टर के इलाज के बाद भी नहीं उतर रही!

छुट्टी का दिन था। छुट्टी होने के कारण परम्परा के उलट सुबह सुबह ही डॉक्टर सलवार कमीज में चक्कर लगाने आया।

‘‘कैसी तबियत है?’’ डॉक्टर ने पूछा, ‘‘अब तो कुछ ठीक लग रही है।’’

‘‘डॉक्टर साहब, तबियत अभी भी वैसी ही है। कुछ फर्क नहीं पड़ा है...’’ चौधरी खुदा बख्श ने हिचकते कहा।

‘‘मैं डॉक्टर हूं, जादूगर नहीं हूं, इलाज ठीक तरह से चल रहा है। कुछ वक्त तो लगेगा ही।’’ डॉक्टर ने गुस्से से कहा और अपनी फी लेकर चला गया।

‘‘पिताजी, आपने डॉक्टर को क्रोधित कर दिया।’’ अल्लाह रखा ने फीकी मुस्कान से कहा।

‘‘मैंने ऐसी तो कोई बात नहीं की! आखिर हम यह भी नहीं बताएं कि अभी तक इलाज से कोई लाभ हुआ है या नहीं?’’

अल्लाह रखा ने पिता की परेशानी को देखकर सांत्वना के कुछ शब्द कहने चाहे, लेकिन कह नहीं पाया।

उसने दिल ही दिल में भगवान को पुकारा कि वह उसे जल्दी ठीक कर दे, ‘‘मेरे कारण सभी घर वाले परेशान हैं। बेचारी माँ का पता नहीं क्या हाल होगा!’’ उसने सोचा।

वहां बैठे बैठे चौधरी खुदा बख्श की सांस घुटने लगी। उसके मन ने चाहा कि अल्लाह रखा को गले लगाकर रोये। उसने जबरदस्ती खुद को रोका।

‘‘मैं थोड़ा बाहर से होकर आता हूं।’’ उसने अल्लाह रखा की ओर देखे बिना कहा और बाहर चला गया, वह अस्पताल से बाहर निकलकर रास्ते पर आ खड़ा हुआ। रास्ते पर गाड़ियों और fjD'kkvksa का शोर था, वह उस शोर से, आसपास की हालतों से अनजान अपने आप में खड़ा रहा, अचानक किसी व्यक्ति ने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे आवाज दी। चौधरी खुदा बख्श ने हड़बड़ाकर उसे देखा, वह उसके तालुके का क्लर्क नवाज़ था।

‘‘चौधरी, सब ठीक तो है, यहां खड़े हो?’’ नवाज़ ने पूछा।

हैदराबाद के पहचान वाले व्यक्ति को देखकर चौधरी खुदा बख्श को कुछ सांत्वना हुई, उसने नवाज़ को पूरा हाल कह सुनाया।

‘‘पहले मैं भी जब बीमार हुआ था तो इसी डॉक्टर के पास आया था, इसने मुझे लूटकर बरबाद कर दिया, फिर भागकर अपनी जान छुड़ाई।’’ नवाज़ ने चौधरी खुदा बख्श के साथ अस्पताल की ओर जाते कहा।

‘‘आज जब सुबह आया था तो मैंने उसे कहा कि इलाज से कोई लाभ नहीं हुआ है तो उल्टे क्रोधित हो गया। डांटकर फी के पैसे लेकर चला गया!’’ चौधरी खुदा बख्श ने जैसे उससे शिकायत करते कहा।

‘‘अरे!’’ नवाज़ ने चकित होकर हाथ गाड़ी पर उंगली रखी, ‘‘अभी अभी ही जब मैं लाजपत नगर के मार्केट से आ रहा था तो यह डॉक्टर टोकरी लेकर खड़ा था, सब्जियां ले रहा था!’’

‘‘तो फिर सुबह सब्जियां लेने के लिए घर से निकला होगा और इस बहाने अल्लाह रखा को देखकर पैसे लेकर गया!’’ चौधरी खुदा बख्श ने टोकने वाले अंदाज से कहा।

नवाज़ ने ठहाका लगाया।

‘‘तुम्हारे पैसों से डॉक्टर की सब्जियों का खर्च निकल आया।’’ परेशान होते हुए भी चौधरी खुदा बख्श इस बात पर हंस पड़ा।

नवाज़ ने उसके साथ जाकर अल्लाह रखा को देखा।

‘‘बाप रे! दोस्त तो बेचारा काफी कमजोर होकर हड्डियों का ढांचा रह गया है।’’ नवाज़ ने अल्लाह रखा को देख चकित होकर कहा।

‘‘यहां आया था तो इससे अच्छा था।’’ चौधरी खुदा बख्श ने कहा।

‘‘चौधरी! इस डॉक्टर से जान छुड़ा। यह कीड़े की तरह खून चूसता रहेगा।’’

‘‘यार मैं खुद उलझन में पड़ गया हूं कि क्या करूं ?’’ चौधरी खुदा बख्श ने बेबसी से कहा।

‘‘कराची में बहुत बड़े अस्पताल हैं, वहां पर खर्च बराबर होता है, लेकिन इलाज बहुत अच्छा है, मेरी सलाह मान, आज ही यहां से टीन टपड़ उठा और कराची जाओ।’’

‘‘लेकिन यार मैंने सुना है कि कराची में शोर शराबा, लूटमार और घमासान लगा हुआ है...’’ चौधरी खुदा बख्श ने मन मसोसकर से कहा।

‘‘आपस में लड़ रहे हैं, इसमें हमारा क्या? यहां रहकर बेकार वक्त गंवाओगे।’’ नवाज़ ने उसे समझाते कहा।

चौधरी खुदा बख्श को वक्त गंवाने की बात दिल से लगी। अस्पताल वालों से हिसाब करके, अल्लाह रखा को लेकर कराची के लिए रवाना हो गया।

नवाज़ की बतायी अस्पताल में आकर चौधरी खुदा बख्श की आंखें फट गईं, इतनी आलीशान अस्पताल उसने कभी जिंदगी में नहीं देखी थी, उसे डर लगा कि यहां पर बहुत बड़ा खर्च होगा।

‘‘ज़रूरत पड़ी तो खेत खलिहान बेचकर भी अल्लाह रखा का इलाज करवाऊंगा, इससे बढ़कर मेरे लिए और क्या है?’’ उसने खुद को समझाया।

पहले तो डॉक्टर की पूछताछ करते करते ही वह परेशान हो गया, लेकिन आखिर अल्लाह रखा को भर्ती किया गया, पहले दो दिन तो केवल टेस्टों पर ही जोर था, उसके बाद इलाज शुरू हो गया। धीरे धीरे अल्लाह रखा की तबियत ठीक होने लगी। चौधरी खुदा बख्श के बेजान शरीर में भी जैसे नया उत्साह भर गया। उसने गांव में संदेश भेजा कि अल्लाह रखा अब ठीक हो गया है और जल्दी ही यहां से छुट्टी मिलेगी।

फातिमा ने अल्लाह रखा के ठीक होने का संदेश सुनकर बांहें ऊपर उठाकर हाथ जोड़कर भगवान का शुक्रिया अदा किया, उसे जितनी खुशी अल्लाह रखा के जन्म लेने पर हुई थी उतनी खुशी उसके ठीक होने पर हुई। गांव वालों ने बात सुनी तो चौधरी खुदा बख्श के घर में औरतों का जमघट लग गया। सभी ने फातिमा को बधाइयां दीं।

‘‘मेरा अल्लाह रखा ठीक होकर जल्दी घर आ जाए तो बड़ी पार्टियां करेंगे, सब मिलकर नाचेंगे गायेंगे।’’ फातिमा ने खुशी से औरतों को गले लगाते कहा।

‘‘अल्लाह रखा हमारे चौधरी का लाडला बेटा है, उसकी खुशी में नाच नाचकर धरती हिला देंगे।’’ औरतों ने कहा। उसके बाद सुरीली और बेसुरीली सभी गाने लगीं।

अल्लाह रखा उठकर थोड़ा घूमने फिरने लगा था, ‘‘पिताजी, अब मुझे थोड़ी थोड़ी भूख भी लगती है। मितली भी नहीं आती है।’’ अल्लाह रखा ने पिता को बताया।

चौधरी खुदा बख्श का मन खुशी से खिल उठा।

‘‘भगवान भला करे नवाज़ का जिसने यह सलाह दी, नहीं तो हैदराबाद वाले डॉक्टर ने तो मार ही डाला था।’’ चौधरी खुदा बख्श बहुत खुश था।

डॉक्टर ने कहा कि अल्लाह रखा अब ठीक है, उसे अब ज्यादा अस्पताल में रखने की जरूरत नहीं है, बाकी दवाएं और मिलेंगीं वे घर जाकर खाए। एक महीने के बाद फिर से तबियत दिखाने आए।

छुट्टी मिली तो चौधरी खुदा बख्श अस्पताल जाकर हिसाब चुकता कर आया। गांव जाने के लिए उसने पूरी गाड़ी भाड़े सेे ली, गाड़ी अस्पताल से निकली तो उसने दिल ही दिल में वहां डॉक्टरों को दुआएं दीं।

‘‘फातिमा अल्लाह रखा को ठीक देखेगी तो कितना खुश होगी...’’ वह सोचकर मुस्कराने लगा।

गाड़ी कराची के भीड़ भाड़ वाले रास्तों से होते घूमती रही। चौधरी खुदा बख्श बार बार पिछली सीट पर बैठे अल्लाह रखा की ओर शांत नजरों से देखता रहा।

‘‘बेटे, लेट जाओ, बैठ बैठकर थक जाओगे।’’ उसने अल्लाह रखा से कहा।

‘‘नहीं पिताजी, अभी बैठना है, शहर से बाहर निकलेंगे तो लेट जाऊंगा।’’

चौधरी खुदा बख्श मुस्कराया। अचानक फायरिंग की आवाजें सुनने में आईं।

‘‘भाई साहब ये आवाज कैसे हैं?’’ चौधरी खुदा बख्श ने ड्रायवर से पूछा।

‘‘फायरिंग हो रही है।’’

‘‘डरने की बात तो नहीं न?’’ चौधरी खुदा बख्श परेशान हो गया।

‘‘यह तो कराची के रोजमर्रा की बात है।’’ ड्रायवर ने लापरवाही से कहा।

‘‘यार, रास्ता बदलकर दूसरे रास्ते से चल।’’ आवाज करीब आते गये तो चौधरी खुदा बख्श सख्त परेशान हो गया।

‘‘नहीं, नहीं, हम तेज तेज चलते चले जाएंगे, यहां निकलने का और कोई रास्ता नहीं है।’’ ड्रायवर ने रफ्तार बढ़ा दी, कहीं से एक गोली गाड़ी के पिछले शीशे को तोड़कर अल्लाह रखा के सर के नीचे आ लगी और अल्लाह रखा सीट पर गिर पड़ा।

‘‘अरे बेटे, मेरे बेटे...’’ चौधरी खुदा बख्श से चीख निकल गई, वह उछलकर पिछली सीट पर गया, वह अल्लाह रखा का रक्त से सना चेहरा हाथों में उठाकर दहाड़ें मारने लगा ‘‘बेटे, मेरे बेटे! यह क्या कयामत हो गई?’’

ड्रायवर गाड़ी को तेज चलाकर वापस उसी अस्पताल में आ गया।

‘‘अरे मेरे अल्लाह रखा को बचाइये... मेरे से पता नहीं किसने कयामत की...’’ चौधरी खुदा बख्श पागलों की तरह चीखने लगा।

डॉक्टर ने देखा और उसके बाद कहा कि अल्लाह रखा अपने भगवान के पास पहुंच गया है।

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