कहानी // ‘एक बेवफा के नाम‘ // मौ0 ताहिर ख़ाँ

मौ0 ताहिर ख़ाँ

सर्दी का मौसम था सर्दी अपने पूरे उरूज पर थी, कोहरा भी पड़ रहा था। चारों तरफ़ सन्नाटा था। रात के तकरीबन 10 बजे का वक़्त था। इमरान अपने घर के लिए आ रहा था। घर के क़रीब आके उसे कुछ आह-आह...... के कराहने की आवाज़ सुनाई दी, इमरान कुछ देर रूका और इस कराहने की आवाज़ को सुनकर वह उसकी तरफ़ चल दिया। वहाँ जाकर उसने देखा वहाँ एक नौजवान पड़ा था। वह कोई और नहीं बल्कि उसका सबसे प्यारा हरदिल अज़ीज़ दोस्त ’’तनज़ीम’’ था। ’’तनज़ीम’’ को वह इस हालत में देखकर घबरा गया और उसे गोद में उठा लिया और कहने लगा।

तनज़ीम तुमको ये क्या हो गया है। ’’तनज़ीम’’ सही से बोल नहीं पा रहा था। अपनी दबी हुई आवाज़ में कहने लगा ’’इमरान’’ मेरे दोस्त मत पूछो कि मुझे ये क्या हुआ। अब मेरा आख़िरी वक़्त चल रहा है। मैं अब और जीना नहीं चाहता, इमरान, तनज़ीम से कहता है कि ऐसा मत कहो मेरे दोस्त तुम्हें जीना होगा, मेरे लिऐ अपने दोस्त ’’इमरान’’ के लिए, ऐसा मत कहो बताओ तो सही ये तुम्हें क्या हुआ, ’’इमरान’’ के बहुत ज़्यादा गुज़ारिश करने पर ’’तनज़ीम’’ ने कहा कि लो सुनो। तनजीम - काश इमरान मैं, उस दिन तबरेज़ की बात मान जाता और बिना कुछ कहे घर वापस आ जाता।

’’इमरान’’ - क्या हुआ था उस दिन, क्या कहा था तबरेज़ ने तुमसे?

’’तनज़ीम’’ - जनवरी का महीना था। ठण्ड ऐसी ही थी जैसी इन दिनों है। मैं अपनी एक दोस्त शमाँ की शादी में शामिल होने दिल्ली गया था। वहाँ में दोपहर के वक़्त पहुँचा, पहुँचने पर मेरे दोस्तों ने मेरा पुरखुलूस अन्दाज़ में इस्तक़बाल किया। इन सभी में मेरी ख़ास दोस्त, ’’कमरजहाँ’’ थी। उसने मुझसे ख़ैरियत पूछी और मैंने उससे। थोड़ी देर में वो मेरे लिए, चाय और नाश्ता ले आई, चाय पीते वक्त ’’कमरजहाँ’’ अचानक बोली की तनजीम मुझे पता है कि तुम यहाँ क्यों आये हो’’ मैं एकदम चौंका और बोला कि क्यों आया हूँ बताओ।

’’कमरजहाँ’’ - तुम शमाँ की शादी में अपने लिए लड़की तलाश करने आये हो। मैं हँसते हुए बोला नहीं-नहीं। जैसा तुम समझ रही हो वैसा कुछ भी नहीं हैं। मैं तो बस शमाँ की शादी में शरीक होने और तुम जैसे ख़ास दोस्तों से मिलने आया हूँ।

’’कमरजहाँ’’ मेरी इतनी अच्छी दोस्त थीं कि हम दोनों जिस खुले अन्दाज़ मैं बात करते थे लोग हमें शक कि निगाह से देखते थे। जबकि हम सिर्फ़ अच्छे दोस्त थे। मैं और ’’कमरजहाँ’’ काफ़ी देर तक बातें करते रहे।

इसके बाद ’’कमरजहाँ’’ ने मुझसे कहाँ कि तनज़ीम उधर शमाँ उस कमरे मैं बैठी है और तुम्हें याद कर रही है। चलो उससे मिल लो वरना शमाँ नाराज़ हो जायेगी। तनज़ीम - चलो शमाँ के पास चलते हैं। हम दोनों शमाँ के कमरे में चले गये। शमाँ ने मुझे देखते ही सलाम किया।

’’शमाँ’’ मुझसे कुछ रूठे हुए अन्दाज़ में बोली, मुझे पता है ’’तनज़ीम’’ तुम काफ़ी देर के आये हो और बाहर बैठे इस ’’कमरजहाँ’’ के साथ गप्पें हाँक रहे थे और मेरे पास अब आये हो। मैंने सोचा की मुझे भूल ही गये मैंने शमाँ को समझाया कि काफी दिनों के बाद मिले हैं, इसलिए बातों में इतने मशगूल हो गये की वक़्त का पता ही नहीं चला, फिर मैं शमाँ से बातें करने लगा वहाँ पर और लड़कियाँ भी बैठी थीं, सबकी निगाहें हम लोगों पर थीं। ’’शमाँ’’ ने उन लड़कियों से मेरा ताररूफ़ कराया कि ये मेरे दोस्त ’’तनज़ीम’’ हैं। जो कानपुर में रहते हैं। कभी हम दोनों साथ-2 पढ़े थे, मैंने बीच में बात काटते हुए कहा कि शमाँ मेरे बारे में ही बताती रहोगी या अपनी दोस्तों का भी मुझसे ताररूफ़ कराओगी फिर शमाँ ने अपनी सब दोस्तों के बारे में बताया और फिर आख़िर में एक लड़की की तरफ इशारा करते हुए बोली कि ये मेरी दोस्त बिल्ली है। इतना सुनते ही वहाँ बैठीं कई लड़कियों ने म्यायुँ की आवाज़ निकाली जिसे सुनकर वह लड़की (बिल्ली) वहाँ से उठकर चली गयी। शायद वो नाराज़ हो गयी थी।

’’तनज़ीम’’ - ’’शमाँ’’ तुमने ठीक नहीं किया शायद तुम्हारी दोस्त को बुरा लगा वह बोली नहीं ’तनज़ीम’ तुम नाज़ को नहीं जानते वह ऐसी लड़की नहीं हैं। देखना वह थोड़ी देर में ठीक हो जायेगी।

मैंने ’शमाँ’ से पूछा, अच्छा तो उसका नाम नाज़ है। वह बोली ’हाँ‘-। मैं सफ़र का थका हुआ था, थोड़ा आराम चाहता था ’कमरजहाँ’ मेरे चेहरे को पढ़ते हुए बोली ’’तनज़ीम’’ तुम सफ़र में थक गये होगे। आओ थोड़ा आराम कर लो और वह मुझे एक कमरे में छोड़ गयी और मैं बिस्तर पर लेटते ही नींद के आगोश में चल गया और मेरी आँख तकरीबन चार-पाँच घन्टे बाद खुली कमरे में बाथरूम था लेकिन ठण्ड ज़्यादा थी ये सोचते हुए मैंने नहाना मुनासिब न समझा और सिर्फ़ मुँह हाथ धोकर ही काम चला लिया। कपड़े मुझपर कई जोड़ी थे जो मैंने बदल लिये मैं तैयार होकर शमाँ के कमरे की तरफ़ बढ़ चला कमरे का माहौल बड़ा ही रंगीन था, वहाँ लड़कियाँ अंताक्षरी खेल रही थीं, नाज़ भी वहाँ मौजूद थी उसके चेहरे से लग नहीं रहा था कि वह नाराज़ है ’’शमाँ’’ ने ठीक कहा था कि नाज़ ऐसी लड़की नहीं है। जो ज़्यादा देर तक नाराज़ रहे, फिर अचानक अंताक्षरी में नाज़ एक गाने में अटक गयी, और मुझसे न रहा गया मैं उसकी मदद करते हुए बोल पड़ा, इस बात पर दूसरी लड़कियाँ मुझसे नाराज़ होते हुए बोलीं कि ’’तनज़ीम भाई’’ नहीं आप नहीं बोलेंगे। मैं बोला चलो आगे से नहीं बोलूंगा। मैंने नाज़ की तरफ़ देखा उसकी आँखों में अज़ीब सी खुशी थी, जैसे वो मेरा शुक्रिया करना चाहती हो और जब तक मैं कमरे में रहा, वह मुझे मुस्कुराकर बार-बार देखती रही। अचानक मेरे पीछे से ’’कमरजहाँ’’ ने हाथ रखते हुए कहा कि आओ ’’तनज़ीम’’ खाना खा लो और में नाज़ कि तरफ़ देखता हुआ कमरे से बाहर चला आया।

बाहर काफ़ी लोग खाना खा रहे थे, मैं ’’कमरजहाँ’’ से बोला, ’’कमरजहाँ’’ मैं अभी हाथ धोकर आता हूँ मैं हाथ धोकर जब वापस खाने की टेबिल पर पहुँचा तो वहाँ और लड़कियाँ भी आ गयीं थीं, उनमें नाज़ भी थी, मैं अपने आपको रोक न सका और नाज़ के सामने वाली खाली कुर्सी पर जा बैठा, नाज़ मेरी तरफ़ देखने लगी पता नहीं उसने मरे ऊपर क्या जादू कर दिया था कि मेरा दिल मेरा साथ छोड़ रहा था, मैं खाने की मेज़ पर उससे बात करना चाहता था, लेकिन मेरे दिल की धड़कने इतनी तेज़ी से धड़क रही थीं कि अल्फ़ाज़ मेरी ज़ुबान पर आ ही नहीं रहे थे, मैं उसके बारे में पूछना चाहता था अचानक उसने मेरी तरफ़ खाने की डिश बढ़ा दी और बोली बिरयानी लीजिए। मैंने हाथ बढ़ाते हुऐ डिश पकड़ ली और बोला ’शुक्रिया’। नाज़ बोली आप कानपुर से आये हैं।

’’तनज़ीम’’ - ’’हाँ’’

’’नाज़’’ - मैं देहली में रहती हूँ,

’’तनज़ीम’’ - मैंने पूछा कहाँ

’’नाज’’’ - दरियागंज में,

’’तनज़ीम’’ - शादी में आपके साथ कौन आया है

’’नाज़’’ - मेरी भाभी। नाज़ अंताक्षरी में आपने मेरी मदद की उसके लिए ’शुक्रिया’- तनज़ीम - अरे नहीं वह कोई इतनी बड़ी बात नहीं है। नाज़-आप यहाँ कब तक रूकेंगे,

’’तनज़ीम’’ - वैसे तो कल रात को निकलने का इरादा था पर आपसे मिलने के बाद सोचता हूँ कि एक दो दिन और रूक जाऊँ, मेरी इस बात पर वह मुस्कुरा गयी। रात काफी हो गयी थी, मैं अपने कमरे में आ गया, लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही थी, मैं नाज़ के ख़्यालों में खोया हुआ था मैं सोच रहा था कि इस लड़की ने मेरे दिल को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है जो आग इधर लगी हुई है क्या उधर भी यही हाल होगा, इसी कशमकश में सुबह हो गयी और बाहर से शोरगुल की आवाज़ आने लगी, अचानक कमरजहाँ ने दरवाज़ा पीटते हुए कहा कि तनज़ीम अगर उठ गये हो तो तैयार हो जाओ थोड़ी देर में बारात आने ही वाली है।

मैंने आवाज़ लगाते हुए ’कमरजहाँ’ से कहा ठीक है। ’कमरजहाँ’ मैं तैयार होकर आता हूँ, मैंने घड़ी की तरफ़ देखा तो नौ बज रहे थे, मैं जल्दी तैयार होने लगा। मैं तैयार होकर बाहर बाया तो मेरी नज़रें किसी को तलाश कर रही थीं, अचानक एक लड़के ने मेरी तरफ़ चाय का कप बढ़ाते हुऐ कहा कि भाई जान चाय लीजिए।

’’मैंने’’ चाय का कप उस से ले लिया वह ’’शमाँ’’ का छोटा भाई ’अनवर’ था, मैंने उससे पूछा कि अनवर कैसे हो और किस क्लास में आ गए, वह बोला, नवीं क्लास में, मैंने कहा ’’शाबाश’’,

मेरी नज़रें अभी-भी नाज़ को तलाश कर रहीं थीं। मैं सोच रहा था कहीं नाज़ रात अपने घर तो नहीं चली गयी और शायद वहीं से तैयार होकर आये वैसे भी लड़कियाँ तैयार होने में ज़्यादा वक़्त लेती हैं। अचानक पीछे से शमाँ के कमरे से कुछ लड़कियाँ खिलखिलाती हुई निकलती हैं, उनमें ’’नाज़’’ भी मौज़ूद थी, वो काले रंग के कपड़ों में थी और वह इतनी खूबसूरत लग रही थी कि जैसे कोई हूर जन्नत से ज़मीं पर आ गयी हो मैं चाहकर भी अपनी निगाहें उसके चेहरे से हटा नहीं पा रहा था, उसने मेरी तरफ़ देखा और मैं मुस्कुराने लगा उसने शर्माकर निगाहें नीची कर लीं और वापस शमाँ के कमरे में चली गयी। थोड़ी देर बाद ’कमरजहाँ’ मेरे पास आयी और बोली तनज़ीम शमाँ तुम्हें याद कर रही है उससे मिल लो, फिर पता नहीं उससे तुम्हारी मुलाकात कब हो, ’आओ’, मैं ’कमरजहाँ’ के साथ शमाँ के कमरे में चला गया शमाँ ज़री का कीमती लाल जोड़ा पहने और बेशुमार ज़ेवरात से लदी, होंठों पर मीठी मुस्कान लिए अपने दाएं-बाएं बैठी सहेलियों से बात कर रही थी। मुझे देखते ही शमाँ बोली तनज़ीम मैं कैसी लग रही हूँ। मैंने कहा बहुत खूबसूरत और नाज़ की तरफ़ देखते हुए मैं शमाँ से बोला, किसी से अपनी नज़र उतरवा लेना, शायद ’नाज़’ समझ गयी कि ये बात मैंने उसके लिए कही है और नाज़ मुस्कुराते हुए अपना होठ चबाने लगी बराबर खड़ी ’कमरजहाँ’ बोली ’तनज़ीम’ तुमने मेरे बारे में नहीं बताया मैं कैसी लग रही हूँ माशाअल्लाह आज सभी लोग बहुत खूबसूरत लग रहे हैं। मुझे ऐसा लग रहा है। जैसे कि मैं परियों के बीच आ गया हूँ। मेरी इस बात पर सब खिलखिलाकर हँस पड़े। थोड़ी देर बाद कारों का काफ़िला मकान के बाहर आकर रूक गया, तभी मेरा दोस्त तबरेज़ आया और मेरे हाथ में कुछहार देते हुए बोला कि आओ तनज़ीम बारातियों का इस्तक़बाल करते हैं। ’’तबरेज़’’ और मैं बाहर खडे़ लोगों के साथ बारातियों के गले में हार डालने लगे थोड़ी देर में खाना शुरू हो गया तबरेज़ दूल्हे मियाँ को खाना खिलाने में लग गया और मैं अपनी दुल्हन (नाज़) को तलाश करने लगा एक पल के लिए मेरे दिमाग में ’कमरजहाँ’ के कहे अल्फ़ाज़ गूँजने लगे कि ’तनज़ीम’ तुम शमाँ की शादी में अपने लिए लड़की तलाश करने आये हो। ’कमरजहाँ’ की कही हुई बात हक़ीकत में बदल रही थी मैं एक तरफ़ बैठा अपने ख़्यालों की दुनिया में था, तभी तबरेज़ आया और बोला ’’तनज़ीम’’ सब लोग खाना खा चुके हैं। तुम कहाँ खोये हुए हो, मैंने कहा कहीं नहीं यार और मैं उठकर अन्दर की ओर चला आया, यहाँ लड़कियाँ फ़ोटोग्राफ़ी कर रही थीं, ’’अनवर’’ के हाथ में कैमरा था वह बोला आइये भाईजान आपका फोटो खींचता हूँ। ’’नाज़’’ मुझसे थोड़ी दूरी पर अकेली खड़ी थी, मैंने हिम्मत करते हुए ’नाज़’ से कहा कि आइये फोटो ख़िचवाते हैं, लेकिन उसने मुझसे मना कर दिया कि मुझे फ़ोटो खिचवाने का शोक नहीं है और वह एक तरफ़ चली गयी मुझे बड़ा बुरा लगा और मैं भी ’अनवर’ को मना करता हुआ बाहर आ गया मेरा मूड (ऑफ़) ख़राब हो चुका था और मैं अपने आप को तन्हा समझ रहा था मेरे कदम ख़ुद व ख़ुद शादी का माहौल छोड़ बाहर आ गये थे, थोड़ी ही दूरी पर लालकिला था, मैं वहाँ जाकर बैठा और सोचने लगा कि शायद ये मेरी ग़लत फ़हमी थी, नाज़ के दिल में मेरे लिए कुछ भी नहीं हैं। मेरे दिमाग में ऐसे और न जाने कितने सवाल खड़े हो रहे थे फिर मैंने सोचा कि मैं दिल्ली नाज़ के लिए नहीं बल्कि अपनी दोस्त ’’शमाँ’’ की शादी में शरीक होने आया हूँ मुझे वहीं वापस चलना चाहिए और मैं फिर वापस आ गया, तबरेज़ मुझे देखते हुए बोला कि कहाँ थे यार आओ तुमने कुछ नहीं खाया, खाना खा लो। दिल तो नहीं कर रहा था पर ’’तबरेज़’’ के ज़ोर देने पर मैंने थोड़ा बहुत खा लिया और उसके बाद विदाई का वक़्त आ गया सब लड़कियाँ आँखों में आँसू लिए शमाँ के साथ कमरे से बाहर आयीं उनमें नाज़ भी थी उसने मेरी और देखा मैंने मुँह फेर लिया उसके बाद सबने नम आँखों से शमाँ को विदा किया।

’’तनज़ीम‘‘ - मैं सोचने लगा कि अब मेरा क्या काम रात ही मैं निकल जाता हूँ सुबह पहुँच जाऊँगा ये सोच मैं अपने कमरे में चला आया और अपना सामान पैक कर लिया। फिर मैंने सोचा कि शमाँ के अम्मी अब्बू से जाने की इजाज़त ले लूँ, और दूसरे दोस्तों से भी थोड़ी देर मिल लूँ यह सोच मैं बाहर आकर ’कमरजहाँ’ ’तबरेज़’ वगैराह को ढूंडने लगा, तभी सामने से ’’नाज़’’ अपनी भाभी और भतीजियों के साथ खाने की मेज़ पर आ बैठी और मुझे देख मुस्कुराने लगी लेकिन मैं नहीं मुस्कुराया वह उठकर मेरे पास आयी और बोली आप शायद हम से नाराज़ हैं। मैंने कहा नहीं मैं भला आपसे क्यों नाराज़ होने लगा। ’’नाज़’’, तो आइये हमारे साथ खाना खा लीजिए।

’’तनज़ीम’’ - नहीं मैंने खाना खा लिया।

’’नाज़’’ - शायद आप फ़ोटो वाली बात को लेकर नाराज़ हैं तो उस बात को लेकर मैं आपसे सॉरी बोलती हूँ और आप कहें तो कान भी पकड़ लूँ।

’’तनज़ीम’’ - नहीं-नहीं आइये ख़ाना खाते हैं। उसने अपनी भाभी से मुझे मिलवाया कि ये ’तनज़ीम’ हैं और ’शमाँ’ की शादी में कानपुर से आये हैं, हम लोग साथ-साथ खाना खाने लगे, खाना सच में बहुत लाजवाब बना था, मैं एक प्लेट में बिरयानी खा रहा था, वह बोली मैं आपकी प्लेट में खा सकती हूँ मैंने मुस्कुराते हुए हाँ कर दी, मेरी खुशी का ठिकाना न था।

’’नाज़’’ - आप कानपुर कब जायेंगे।

’’तनज़ीम’’ - वैसे तो अभी जाने वाला था लेकिन आप जब कहेंगी तभी जाऊँगा, वह हँस पड़ी उधर भाभी बच्चों को खाना खिलाने में मसरूफ़ थीं। हम लोग काफ़ी देर तक बातें करते रहे, भाभी बोलीं कि नाज़ आओं चलते हैं। बच्चों को नींद आ रही है। ’’नाज़’’ ने मुझसे इजाज़त ली और भाभी के साथ चली गयी।

आज मेरी ख़ुशी का ठिकाना न था, मुझे ऐसा लग रहा था मानों मैंने कोई जंग फतह कर ली हो, अब मुझे सुबह का इन्तज़ार था और इन्हीं बातों में कब आँख लग गयी, पता ही नहीं चला। सुबह शमाँ के अब्बू ने आकर जगाया मैं नहा-धोकर बाहर आया और शमाँ की अम्मी अब्बू के पास नाश्ते की टेबिल पर आ बैठा, वह लोग मुझसे मेरे बारे में पूछने लगे कि बेटा अब तुम भी कोई अच्छी सी लड़की देखकर शादी कर डालो, तभी ’कमरजहाँ’ आ गयी और बोली कि ’’तनज़ीम’’ आज हमने घूमने का प्रोग्राम बनाया है, अगर तुम चाहो तो थोड़ी देर बाद हमारे साथ घूमने चलना, या फिर अम्मी-अब्बू के साथ घर पर ही रहो।

मैंने जाने के लिए मना कर दिया क्योंकि मुझे तो ’’नाज़’’ से मिलना था मैं अम्मी-अब्बू से बातों में लग गया, ’’कमरजहाँ’’ कमरे से बाहर चली गयी मैं काफ़ी देर तक उन लोगों से बातें करता रहा अचानक बाहर से कुछ ज़ोर से हँसने की आवाज़ आने लगी मैंने सोचा शायद नाज़ आ गयी और मैं अम्मी अब्बू से इजाज़त लेकर बाहर आ गया, वो ’’नाज़’’ ही थी, और कमरजहाँ’’ के साथ घूमने जा रही थी, मैंने सोचा ये मैंने क्या किया मुझे कमरजहाँ’’ को मना नहीं करना चाहिए था, सामने कमरजहाँ, ’’तबरेज़’’ से बात कर रही थी। मैं उसके पास गया, मैंने उससे पूछा कि कमरजहाँ तुम लोग कहाँ घूमने जाओगे ’’कमरजहाँ’’ बोली क्या तुम चल रहे हो हमारे साथ, मैं बोला कि बार-बार तो दिल्ली आना होता नहीं हैं, चलो इसी बहाने तुम्हारे साथ शोपिंग कर लूँगा।

’’कमरजहाँ’’ - ठीक है और हम सब लोग घूमने के लिए निकल पड़े मौका देख मैं ’नाज़’ के बराबर आ गया और बोला कैसी हो ’नाज़’ वह बोली ठीक हूँ और आप मैंने कहा ठीक, पर दिल ही दिल में सोच रहा था कि ठीक कहाँ हूँ मेरा सब्रो करार तो तुमने छीन लिया है।

’’नाज’’ - कहाँ खो गये तनज़ीम, क्या किसी की याद आ रही है।

’’तनज़ीम’’ - हाँ

’’नाज़’’ - कौन है वो खुशकिस्मत हमें उसका नाम नहीं बतायेंगे आप,

’’तनज़ीम’’ - नाम बता दूँगा तो वो बदनाम हो जायेगी।

’’नाज़’’ - नहीं हम उसे बदनाम नहीं होने देंगे, आप बताइये तो सही।

’’तनज़ीम’’ - फिर कभी बताऊँगा।

’’नाज़’’ - प्रोमेस/नाज़ ने हाथ मेरी तरफ बढ़ाया और मैंने भी हाँ करते हुए उसके मख़मली और दूध जैसे सफेद हाथ से अपना हाथ मिलाया।

’’नाज़’’ - आप कानपुर जाने के बाद हमें भूल तो नहीं जाओगे।

’’तनज़ीम’’ - मैं अपने आपको भूल सकता हूँ लेकिन आप को नहीं।

’’नाज़’’ - कानपुर में मेरी खाला रहती हैं।

’’तनज़ीम’’ - मैं बोला ’सच’ तो कानपुर घूमने कब आओगी।

’’नाज़’’ - कभी अम्मी के साथ आऊँगी।

’’तनज़ीम’’ - मुझे उस दिन का इन्तज़ार रहेगा। मैंने उसे अपना एड्रेस बता दिया, और नाज़ बोली कि तनज़ीम ये मेरा फोन नम्बर है, जाकर मुझे फोन करना। मैंने कहा ठीक है ज़रूर करूँगा, घूमते हुए हम लोग एक रेस्टोरेन्ट में पहुँच गये हम लोगों ने फिर कुछ खाया-पिया, रेस्टोरेन्ट से निकलते वक़्त मैंने ख़ामोशी से एक चॉकलेट ख़रीद ली और रास्ते में सबकी निगाहों से बचाते हुए उसे ’नाज़’ की तरफ़ बढ़ा दिया। मैंने कहा नाज़ तुम्हें अगर बुरा न लगे तो यह आप के लिए है। पहले तो वो मना करने लगी लेकिन बाद में उसने शुक्रिया कहते हुए अपने पर्स में रख ली, घूमते-घूमते हमें काफ़ी टाईम हो गया, मुझे शाम को वापस कानपुर भी आना था हम लोग घर आ गये, मैंने अपना सामान पैक किया और शमाँ के अम्मी-अब्बू से जाने के लिए इजाज़त माँगने लगा, वह बोले बेटा तुमने शादी में आकर बहुत अच्छा किया हमारी तरफ से अपने अम्मी और पापा से सलाम कहना। मैंने कहा ज़रूर, मैं कानपुर जाकर फ़ोन करूँगा। वह बोले अच्छा ख़ुदा हाफ़िज़, ’तबरेज़’ मुझे स्टेशन तक छोड़ आने के लिए तैयार खड़ा था, ’कमरजहाँ’ ने भी मुझे फिर आने की कहकर रूख़सत किया, रास्ते में तबरेज़ बोला कि तनज़ीम एक बात पूछूँ, बुरा तो नहीं मानोगे, मैंने कहा तुम मेरे अच्छे दोस्त हो, मैं तुम्हारी बात का क्यों बुरा मानूंगा।

’’तबरेज़’’ बोला, तनज़ीम मुझे लगता है शायद तुम्हें नाज़ से प्यार हो गया है। मैंने कहा नहीं तबरेज़, वह बोला तनज़ीम तुम्हारे दिल में नाज़ के लिए कुछ है तो निकाल दो वह तुम्हारे लायक नहीं है, मैंने कहा, क्या उसको किसी और लड़के से प्यार है।

’’तबरेज़’’ - नहीं

मैंने बोला, क्या वो करेक्टर की ख़राब है,

’’तबरेज़’’ - नहीं। मैंने कहा छोड़ो यार ये सब बातें, अब तुम शादी कब कर रहे हो। तबरेज़ बोला पहले ’कमरजहाँ’ आपा की शादी होगी फिर हमारा नम्बर आयेगा। यूंही बात करते-करते हम लोग रेलवे स्टेशन पहुँच गये, गाड़ी तैयार खड़ी थी, मैं तबरेज़ से हाथ मिलाकर गाड़ी में जा बैठा, घर पहुँचकर मुझे लगा जैसे मैं अपनी कोई कीमती चीज़ दिल्ली ही में छोड़ आया हूँ, वो शायद मेरा दिल था जो ’नाज़’ ने चुरा लिया था। मैं खोया-खोया रहने लगा वह मुझे हर वक़्त सामने नज़र आती थी, वह अपनी पलकें बड़ी जल्दी-जल्दी झपकती थी, वह बहुत ज़्यादा बेबाक और जज़्बाती लड़की थी, जो चन्द रोज़ मैंने दिल्ली ’शमाँ’ की शादी में बिताये, ये वह मेरी ज़िन्दगी पर हावी होने लगे, मुझे दिल्ली से आये एक हफ़्ता हो गया था। नाज़ का फ़ोन नम्बर मेरे पास था, मैंने नाज़ के पास फ़ोन करने का मन बना लिया मगर ये सोचकर चुप रह जाता नाज़ न जाने मुझसे बात करेगी भी या नहीं, क्योंकि हमारी दो दिन की मुलाकात थी, या घर पर किसी और ने फ़ोन उठा लिया तो क्या होगा। लेकिन मैंने हिम्मत कर फोन कर ही डाला, फोन पर किसी बच्ची की आवाज़ थी मैंने कहा तनज़ीम बोल रहा हूँ इतना कहते ही उसने मुझे सलाम किया और बोली अंकल मैं ’अनम’ बोल रही हूँ, मैं शादी में नाज़ फुफ्फो के साथ आयी थी। मैंने उससे पूछा कैसी हो ’अनम’ वह बोली ठीक हूँ क्या फुफ्फो से बात करोगे, मैंने कहा हाँ, शायद उसने मेरे मन की बात भाँप ली थी इतनी देर में ’नाज़’ आ गयी और उसने रिसीवर अपने हाथ में ले लिया और बोली अस्सलामुअलैकुम, मैंने कहा वालेकुमअस्सलाम, ’नाज़’ बोली अब आपको हमारी याद आयी है। हम तो समझे थे आप शायद हमें भूल ही गये हमसे आपने एक बात के लिए प्रोमिस किया था।

’’तनज़ीम’’ - कौन सी,

’’नाज़’’ - आपने उसका नाम बताने के लिए कहा था। मैंने कहा वो सब तो मज़ाक था।

’’नाज़’’ - नहीं आप हमसे कुछ छुपा रहे हैं। मैंने कहा अच्छा तो चलो तुम्हें मैं उसका नाम बता देता हूँ। उधर वह ख़ामोश थी, मैं बोला उसका नाम ’नाज़’ है। उधर से आवाज़ आयी, बनो मत। पता नहीं मेरे अन्दर कहाँ से इतनी हिम्मत आ गयी थी कि मैं उसे अपने दिल पर पड़े घाव को दिखाने लगा, मैं बोला नाज़ जिस दिन से मैंने तुम्हें देखा है, मैं खुद को भूल गया हूँ। मुझे हर वक़्त तुम्हारा ही चेहरा नज़र आता है, उधर से नाज़ बोली तनज़ीम तुम तो लड़के हो तुमने तो अपने दिल की हालत बता दी लेकिन मैं भी तो तुम्हें अपनी जान से ज़्यादा चाहने लगी हूँ और हर वक़्त तुम्हें ही याद करती रहती हूँ शादी में बिताए दो-तीन दिन ज़िन्दगी के ऐसे सुनहरे लम्हे हैं जो तमाम उम्र में भूल नहीं पाऊँगी, मैंने पहली बार किसी से प्यार किया है अचानक नाज़ बोली ’’तनज़ीम‘‘ अब्बू आ रहे हैं, खुदा हाफ़िज़ और उसने फ़ोन रख दिया। इसके बाद मेरा हाल और बुरा हो गया, मेरा किसी से बात करने को दिल नहीं करता ’’नाज़’’ मेरे दिलो-दिमाग़ पर नशा बनकर छा गयी थी क्योंकि इससे पहले मैंने कभी किसी से प्यार नहीं किया था। यह मेरा पहला प्यार था, मैं ऐसी हालत में बैठा था कि इमरान तुम आ गये और मुझसे कहने लगे कि ’तनज़ीम’ मेरे दोस्त कैसे उदास बैठे हो पर इमरान मैंने तुम्हें कुछ नहीं बताया था और मैंने दूसरे दिन नाज़ को फिर फोन किया, लेकिन बेल जाती रही, किसी ने फ़ोन नहीं उठाया और ये सिलसिला कई दिन तक चलता रहा, मैं समझ नहीं पा रहा था कि बात क्या है, क्या ’नाज़’ का फ़ोन ख़राब हो गया है या उसकी फैमिली कहीं घूमने तो नहीं चली गयी, मैंने सोचा कुछ दिन के लिए घर हो आऊँ और मैं अपने गाँव आ गया। घर आने पर मुझे अम्मी ने बताया कि बेटा तुम्हारी किसी दोस्त का कल दिल्ली से फोन आया था मैंने अम्मी से पूछा के उसने अपना क्या नाम बताया था, अम्मी बोली बेटा उसने अपना कोई नाम नहीं बताया। ’’शमाँ’’ या ’’कमरजहाँ’’ में से कोई एक होगी, मैं ख़ामोश हो गया, अचानक दो दिन बाद फिर फ़ोन की घण्टी बजी फ़ोन मैंने उठाया, फोन पर ’नाज़’ थी, नाज़ ने सलाम करते हुए मुझसे ख़ैरियत पूछी और बोली कि तनज़ीम हमारा फ़ोन कई दिन से ख़राब है, मैंने तुम्हें तीन-चार दिन पहले फ़ोन किया था। फ़ोन आपकी अम्मी ने उठाया था, आप उस वक़्त घर पर नहीं थे। मैंने कहा, नाज़ मैं तुम्हें रोज़ फ़ोन मिला रहा हूँ और सुनाओ कैसी हो, तुम्हारे बिना एक-एक दिन कई-कई साल के बराबर लगता है। उधर से नाज़ बोली मेरा भी यही हाल है, अब तो बस ख़ुदा से यही दुआ माँगती हूँ कि वह हमारा मिलन जल्द करा दे, मैंने कहा ’आमीन’, नाज़ बोली तनज़ीम मैं पी.सी.ओ. से फ़ोन कर रही हूँ, ’अनम’ मेरे साथ है, एक दो दिन में फ़ोन ठीक हो जायेगा फ़िर फ़ोन करना अच्छा ’ख़ुदा हाफ़िज़’। घर पर आये मुझे पाँच-छः दिन गुज़र चुके थे मैं टी0वी0 पर समाचार सुन रहा था पता चला आज ’वेलेनटाइनडे’ है, मैंने सोचा आज तो मुझे नाज़ को ज़रूर फ़ोन करना चाहिए ख़ुदा करे उसका फ़ोन सही हो गया हो और मैंने, बिस्मिल्लाह कहकर नम्बर लगा दिया उधर फ़ोन पर बेल बजते ही एक खूबसूरत आवाज़ सुनाई दी वो नाज़ की आवाज़ थी, नाज़ बोली तनज़ीम मुझे पता था कि आप आज मुझे फ़ोन ज़रूर करोगे, मुझे आपके फ़ोन का सुबह से ही इन्तज़ार था, में उससे कहने लगा कि ऐसे कैसे हो सकता है कि आज के दिन मैं अपने सबसे अच्छे दोस्त को फ़ोन न करूँ, तनज़ीम आप कहाँ से बोल रहे हो। मैंने कहा आजकल मैं घर पर ही हूँ, नाज़ बोली पढ़ाई कैसी चल रही है। मैं तो ये समझी थी कि आप कानपुर में होंगे, मैंने यही सोचकर फ़ोन नहीं किया था, हमारा फ़ोन तो दो-तीन दिन पहले ही सही हो गया था, मैं बोला अभी कुछ दिन तक यहीं रहुँगा, क्योंकि मेरी छोटी बहन ’तलत’ की अगले महीने शादी है, तैयारियाँ चल रही हैं मैं भी अम्मी-पापा का कुछ हाथ बटा रहा हूँ। नाज़ मुझसे बोली, तनज़ीम क्या आप हमें अपनी बहन की शादी में नहीं बुलायेंगे, मैंने कहा आप आयेंगी, उसने कहा बुलायेंगे तब ना, अच्छी बात है। मैं कार्ड लेकर आऊँगा, उसने कहा फ़ोन रख दूँ, मैंने कहा दिल तो नहीं चाहता, अच्छा ठीक है। ख़ुदा हाफ़िज- यह कहकर उसने फ़ोन रख दिया।

उसके बाद मैं उसका एड्रेस देखने लगा और फिर पहले मैंने सोचा कि यह उसके घर जाने का अच्छा मौका है, कार्ड के बहाने उसके घर वालों से भी मुलाक़ात हो जायेगी लेकिन फिर अपने घरवालों का ख़्याल आया उनसे क्या कहकर इन्ट्रोडयूज़ कराऊँगा, वैसे अम्मी पापा बहुत रोशन ख़्याल के थे लेकिन मैं शुरू से ही लड़कियों से दूर रहा था, जिस पर मेरी बड़ी तारीफ़ भी होती थी इसलिए मुझे अज़ीब सा लग रहा था कि अम्मी पापा नाराज़ तो नहीं होंगे, लेकिन हैरान ज़रूर होंगे। फिर शादी में तमाम रिश्तेदार भी होंगे, जो ज़रूर उसके बारे में सवाल करेंगे तो मैं उसका जवाब क्या दूँगा, इसलिए मैंने नाज़ को शादी में बुलाने का ख़्याल छोड़ दिया और शादी में मसरूफ़ हो गया। यूँ ही सरा हफ़्ता शादी के खूबसूरत हंगामों और फ़ंक्शन में गुज़र गया, मगर में नाज़ को भूला न था बस यही सोचकर रह जाता कि शादी की मसरूफ़ियात से फ़ारिग होकर नाज़ के पास फ़ोन करूँगा बहरहाल ’तलत’ रूकसत हो गयी, उसके जाते ही सारे हंगामे ठण्डे पड़ गये। अगले रोज़ सुबह जब मैं नाश्ते की टेबिल पर आया तो वही घर के लोग थे बल्कि उनमें एक कम हो गया था जिसकी कमी डायनिंग हाल में दाखिल होते ही महसूस हुई थी मैं तो कुछ नहीं बोला मगर छोटा भाई ’वकार’ बैठते ही बोला कि ’तलत’ की शादी बहुत ज़ल्दी कर दी। मैंने कहा बाइस (22) साल की हो गयी थीं और यही शादी की सही उम्र होती है। अम्मी, बेटी की शादी करके बहुत संजीदा लग रहीं थीं वह पापा से कहने लगीं कि अब कौन सी बेटियाँ बैठी हैं। एक थी उसे भी रूख़्सत कर दिया। अब देखिये कैसी ख़ामोशी छाई हुई है। बच्चे भी मुँह लटकाए बैठे हैं। तनज़ीम की शादी कर लेंगे और इसी तरह से हम लोग बातें करने लगे एकदम से मुझे नाज़ का ख़्याल आया नाज़ के पास फ़ोन करना है और मैं फ़ोन करने चला गया, मैंने नाज़ का नम्बर लगा दिया, घंटी बजने लगी और उधर से किसी ने हैलो कहा, मैंने कहा ’नाज’़ वो सलाम करते हुए बोली हाँ में ’नाज़’ बोल रही हूँ ’तनज़ीम बहुत दिनों बाद फ़ोन क़िया है मैंने सोचा कि कहीं तनज़ीम भूल तो नहीं गये, मैंने कहा भूल कैसे सकता हूँ। नाज़ बोली शादी में तो भूल ही गये, नहीं नाज़ भूला नहीं था मैं तुम्हें शादी मैं न बुलाने के लिए शर्मिंदा हूँ और माफ़ी चाहता हूँ मैं तुम्हें चाहकर भी ना बुला सका, मैं इस बात के लिए तुमसे एक बार फिर सॉरी बोलता हूँ, उधर से नाज़ की आवाज़ आती है। चलिये हमने आपको माफ़ किया। पर साहब ये तो बताइये ऐसी क्या मजबूरी थी। मैं बोला कि ’नाज़’ तुम मेरे अम्मी-पापा को नहीं जानते, वो थोड़े पुराने ख़्यालात के हैं, तुम्हें देखकर जाने क्या सोचते और इसलिए मैंने दिल्ली से शमाँ और ’कमरजहाँ’ को भी नहीं पूछा, लेकिन वो मेरे अम्मी-पापा के ख़्यालात से पूरी तरह वाकिफ़ हैं, तुम्हें नहीं मालूम ये दोनों जब एक बार घर आयीं थी तो अम्मी इन दोनों में अपनी बहूँ की झलक देखने लगीं और अलग कमरे में ले जाकर दोनों से पूछा कि तुम में से तनज़ीम किस को चाहता है और भी कई सवाल अम्मी ने उन दोनों से किये, जब ये बात मुझे इन लोगों ने बताई तो बड़ा शर्मिंदा हुआ मैं तो नाज़ बस उन्हें अपनी अच्छी दोस्त समझता हूँ इसके अलावा कुछ नहीं, यही सोचकर मैंने तुम्हें तलत की शादी में नहीं बुलाया कि अम्मी कहीं तुम में भी अपनी बहू की झलक देखने लगतीं और तुमसे कुछ पूछती तो शायद तुम नाराज़ हो जातीं।

’’नाज़’’ - नहीं तनज़ीम मैं नाराज़ नहीं होती, मैं तो यही चाहती हूँ कि तुम्हारी अम्मी मुझे अपनी बहू समझें, बल्कि मुझे तो ख़ुशी होती। ’’तनज़ीम’’ मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं हैं तुम मेरी तरफ़ से अपनी बहन को मुबारकबाद दे देना, उसके लिए में गिफ़्ट लायी थी, मुलाकात होने पर मैं तुम्हें दूँगी तुम उस तक पहुँचा देना फिर वो मुझसे कहने लगी, तनज़ीम अब तो तुम्हारे फ़ोन की घंटी मेरे दिल के अन्दर एक खूबसूरत सा शोर मचा देती है। हाय ये दिल क्या करे जब किसी से प्यार हो जाए। वह बड़े भरपूर अन्दाज़ में मुस्कुरायी और बेहद पुरसुकून अन्दाज़ में रिसीवर के ज़रिए मेरे बेहद क़रीब आ गयी इधर बेकरारियाँ थी उधर भी बैचेनियाँ, मगर दूरी कितनी थीं, मोहब्बत की मदहोशी में डूबा-डूबा चूर-चूर सा लहजा था, नाज़ बोली तनज़ीम यकीन करो मेरी चाहत का मेरा बस चले तो दिल चीरकर दिखा दूँ। मैं बोला नाज़ तुम्हारा प्यार मेरे जिस्म में लहू बनकर नस-नस में दौड़ रहा है। नाज़ मुझसे कहने लगी यह कैसा प्यार है। तनज़ीम कि हम एक दूसरे से दो दिन मुलाकात में एक दिल दो जान हो गये। मैं बोला नाज़ प्यार के लिए दो दिन तो क्या, यह तो एक पल में हो जाता है। तनज़ीम हम कब तक ये ज़ुदाई का ज़हर पीते रहेंगे औैर फ़ोन के सहारे मिलते रहेंगे, अब मुझे ये अच्छा नहीं लगता कि मैं फ़ोन की घंटी पर अपनी उम्र ग़ुज़ार दूँ, तुम ऐसा करो अपने अम्मी-पापा को रिश्ता लेकर हमारे घर भेज दो। मैं बोला नाज़ अभी तुम्हें कुछ दिन और इन्तज़ार करना पड़ेगा, मैं नहीं चाहता कि मैं तुम्हें अपने माँ बाप के सहारे लाऊँ , मैं तो ये चाहता हूँ कि अगले साल पढ़ाई ख़त्म होते ही कोई नौकरी तलाश करूँ फिर तुमसे शादी करूँ, अम्मी पापा पर मैं और बोझ नहीं डालना चाहता वह अभी ही छोटी बहन की शादी में अपनी सारी जमा पूँजी लगा चुके हैं और मेरी शादी कहाँ से करेंगे। यह सब सुन नाज़ ख़ामोश हो गयी। मैंने कहा ’नाज़’ क्या आप अभी से हार मान गयीं, नाज़ बोली, नहीं तनज़ीम क्या ऐसा नहीं हो सकता कि तुम एक दो दिन के लिए दिल्ली आ जाओ पहले तो मैंने उससे मना किया लेकिन उसके प्यार के आगे मुझे झुकना पड़ा और मैंने कहा ठीक है। मैं एक-दो दिन में दिल्ली आता हूँ, और-ख़ुदा हाफ़िज़ कहकर फ़ोन रख दिया, और मैं हॉस्टल के कमरे में जाकर बैठ गया। और मैं नाज़ के ख़्यालों में खोया हुआ था कि इमरान तुम आ गये और बोले कि तनज़ीम किस सरगोशियों में डूबे-हुऐ हो, मैं यहाँ आधा घंटे से खड़ा हूँ और तुम्हें पता भी नहीं है, ज़रा हमें भी तो बताओ कि वह कौन है जिसने हमारे यार को हमसे छीन लिया है, कई-कई दिन हो जाते हैं तुम मिलने भी नहीं आते हो दूसरे लड़के भी शिकायत कर रहे हैं कि पता नहीं तनज़ीम को क्या हो गया है। गुमसुम सा रहता है। न किसी से मिलता है न ज़्यादा बात करता है। लेकिन ’इमरान’ मैंने उस दिन तुम्हें कुछ नहीं बताया फिर मैंने ’नाज़’ के पास फ़ोन किया कि मैं परसों दिल्ली आ रहा हूँ यह सुनकर नाज़ बहुत ख़ुश हुई मैंने उसे ’ताज’ रेस्टोरेन्ट में मिलने के लिए कहा कि मैं बारह बजे वहाँ आ जाऊँगा, नाज़ ने कहा ठीक है। इसके बाद मैं दिल्ली के लिए ट्रेन में बैठ गया, दिल्ली पहुँचकर स्टेशन से मैंने एक ऑटोरिक्शा किया, और ताज रेस्टोरेन्ट पहुँचा, मगर नाज़ वहाँ अभी नहीं आयी थी मैं उसका इन्तज़ार करता रहा, मेरी बेकरारियाँ बढ़ती जा रही थीं मैं सोचने लगा कि जाने क्या हो गया जो नाज़ अभी तक यहाँ नहीं आई मैं सोच ही रहा था कि इन्तज़ार की घड़ियाँ ख़त्म हुई मुझे सामने से नाज़ आती दिखाई दी, मैं उससे बोला नाज़ मैं कब से तुम्हारा इन्तज़ार कर रहा हूँ। नाज़ कहने लगी, तनज़ीम तुम मेरे घरवालों को जानते नहीं हो, वे किस तरह के आदमी हैं और कुछ दिनों से तो सारे घरवालों की निगाहें मुझ पर ही रहती है। बड़ी मुश्किल से कम्प्यूटर सीखने का बहाना बनाकर आई हूँ। फिर मैंने उसकी तरफ़ देखा वह नीले रंग के कपड़ों में बेहद ख़ूबसूरत लग रही थी मैं उसकी ख़ूबसूरती की तारीफ़ करने लगा तो वह हँसने लगी मैंने कहा नाज़ तुम हँसती हुई बहुत अच्छी लगती हो, मेरे ये कहने पर वो एक दम चुप हो गयी, मैंने साफ़ महसूस किया कि उसकी आँख में मेरे लिए बेपनाह मोहब्बत थी, मैं ख़ुश था बेहद ख़ुश, मुझे पहली बार अन्दाज हुआ कि ज़िन्दगी इतनी हसीन है। नाज़ मुझसे बोली तनज़ीम कहाँ खो गये और फिर उसने मुझसे कहा तनज़ीम मैं तुमसे इतना प्यार करती हूँ इस बात का अन्दाज़ आपने अभी तक नहीं लगाया होगा, तनज़ीम मैं तुमसे बेइन्तहा प्यार करती हूँ। मैं तो चाहती हूँ तनज़ीम कि तुम अपने घरवालों को मेरे यहाँ रिश्ता लेकर भेज दो चाहें हमारी शादी साल भर के बाद हो हम दोनों एक घंटे तक साथ रहे घरवालों के डर की वज़ह से नाज़ मुझसे कहने लगी कि ’’तनज़ीम’’ अब मैं चलती हूँ काफ़ी देर हो गयी। घरवाले इन्तज़ार कर रहे होंगे, यह कहकर नाज़ चली गयी। मैं भी दिल्ली में अपने किसी और दोस्त से बिना मिले कानपुर वापस आ गया। यहाँ आकर मैं सोच रहा था कि घरवालों से किस तरह बात हो,यह सोचते हुए मैं घर जाने के लिए तैयार हो गया, जब मैं घर पहुँचा तो मेरी छोटी बहन ने मुझे बताया कि ’तनज़ीम’ पापा के बचपन के जो दोस्त हैं वहाँ से पापा ने आपका रिश्ता कर दिया है। इस ख़बर को सुनने के बाद मेरे होश उड़ गये मैं सोचने लगा कि अब क्या होगा, इसके बाद मैं अपने कमरे में चला आया और बैड पर आकर लेट गया, रात भर रोता रहा सुबह हुई तो अम्मी नाश्ता लेकर आ गयीं और मेरा चेहरा देखकर कहने लगीं ’तनज़ीम’ बेटे तुम ठीक तो हो न। मैंने कहा हाँ अम्मी मैं ठीक हूँ। अम्मी मुझसे कहने लगीं ’तनज़ीम’ बेटे तुम्हारी आँख़ें और चेहरा बता रहा है कि तुम ठीक नहीं हो, और मुझसे कुछ छिपा रहे हो।

आख़िर मैंने हिम्मत करके अम्मी से कहा अम्मी मैं एक लड़की से प्यार करता हूँ और उससे शादी करना चाहता हूँ यह बात सुनकर अम्मी कहने लगीं, ’तनज़ीम’ तुम्हारा दिमाग़ तो ठीक है। तुम्हें पता है कि तुम्हारे पापा ने तुम्हारा रिश्ता अपने बचपन के दोस्त की लड़की से तय कर दिया है और हमारे ख़ानदान की यह परम्परा रही है कि कोई भी फ़ैसला घर के बड़े करते हैं और तुम्हारा ये फ़ैसला हमारी परम्परा के ख़िलाफ़ होगा। अम्मी ने मुझे बहुत समझाया मगर मेरे ऊपर प्यार का ज़ुनून था, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था, मुझे चारों तरफ़ नाज़ दिखाई दे रही थी, पापा को पता चलने के बाद घर में एक तूफ़ान सा आ गया, आख़िर मेरी ज़िद के आगे मेरे घरवालों को झुकना ही पड़ा और वो रिश्ता ख़त्म कर दिया। ’’तनज़ीम’’, मैंने इस बात की ख़बर नाज़ को दी तो नाज़ बोली, तनज़ीम तुम जल्दी अपने घरवालों को भेज़ो। मैंने कहा ’’नाज़’’ मेरे घरवाले रिश्ता लेकर नहीं आ सकते, तुम मेरे पापा को नहीं जानती, वो किस तरह के हैं, मैंने किस तरह से उनको मनाया है। तुम्हारे घर पर रिश्ता लेकर ’कमरजहाँ’’ आयेगी, वो तुम्हारे अम्मी-अब्बू से बात करेगी, तुम्हें कोई एतराज़ तो नहीं है। नाज़ बोली ठीक है भेज देना। फिर मैंने कमरजहाँ को फ़ोन लगाया, कमरजहाँ को मैंने सांरी कहानी सुना दी, पहले तो कमरजहाँ ने नाज़ से शादी के लिए मना किया, लेकिन मेरा दीवानपन देखकर उसे मेरी बात माननी ही पड़ी, और वह रिश्ता लेकर नाज़ के घर गयी और उसके अम्मी-अब्बू से बात की कि दोनों एक दूसरे को चाहते हैं और नाज़ भी वहाँ आ गयी उसके अब्बू ने पूछा क्यों नाज़ ये सब बातें ठीक हैं, लेकिन नाज़ ने अब्बू के सामने मना कर दिया, इसमें कमरजहाँ को भी बेइज़्ज़ती उठानी पड़ी, वह अपना सा मुँह लेकर वापस आ गई और मुझे फ़ोन पर सब बता दिया, मुझे गहरा धक्का लगा मुझे यक़ीन नहीं आया ऐसा कैसे हो सकता है मैंने दिल्ली जाने का मन बना लिया और बिना किसी से कहे दिल्ली पहुँच गया, वहाँ पहुँच नाज़ को फ़ोन किया और उसे ताज रेस्टोरेन्ट में मिलने बुलाया कि मैं तुमसे मिलने आया हूँ और बात करना चाहता हूँ, और इसके बाद में उसका इन्तज़ार करने लगा, लेकिन वह नहीं आयी मैं फिर ’’कमरजहाँ’’ के घर गया लेकिन वह भी अपने मामूजान के घर लखनऊ गयी हुई थी, शमाँ की पहले ही शादी हो चुकी थी, मैं वापस कानपुर आ गया और लगातार नाज़ को फ़ोन मिलाता रहा, लेकिन फ़ोन पर वह कभी नहीं होती, हमेशा उसके अब्बू ही फ़ोन उठाते मैं उनकी आवाज़ सुनकर फ़ोन रख देता, एक बार ’’अनम’’ ने फ़ोन उठाया लेकिन उसने यह कहकर मना कर दिया कि फुफ्फो कहीं गयी हुई हैं। मैं उसकी इस बेवफ़ाई की वज़ह समझ नहीं रहा था कि आख़िर ’’नाज़ को क्या हो गया है। पहले तो वह ऐसी नहीं थी, उन दिनों मैं बहुत परेशान सा रहने लगा, मेरी समझ में कुछ न आता, और एक दिन तो ’’क़्यामत’’ आ गयी मैं सुबह उठकर चाय पी रहा था, कि कमरजहाँ का फ़ोन आया वह बोली ’तनज़ीम’ तुम्हें ख़बर तो पड़ गयी होगी, कि ’’नाज़’’ की शादी हो गयी है। ये सुनते ही मेरा दिल धक से रह गया और रिसिवर मेरे हाथ से छूट गया, उधर से हैलो-हैलो की आवाज़ आती रही, मैं अपने कमरे में वला गया और कमरा बन्द कर बहुत रोया और दोपहर को अम्मी की आवाज़ लगाने पर मैं बाहर आया। अम्मी बोली क्या बात है कुछ परेशान हो, बेटा मैंने कहा नहीं अम्मी कुछ नहीं है, मैं घूमने के बहाने एक सुनसान पार्क में जा बैठा, वहाँ मैं और मेरी तन्हाई थी या नाज़ की बेवफ़ाई मैं रात को घर वापस आ गया दूसरे दिन दोपहर को अम्मी ने आवाज़ लगाते हुए बताया कि बेटा देख़ो कौन आया है। वह कमरजहाँ थी, वह कमरे में आकर बोली ’तनज़ीम’ तुम ठीक तो हो न ऊपर वाला जो करता है वो बेहतरी के लिए ही करता है।

नाज़ का और तुम्हारा कोई जोड़ ही न था तनज़ीम, नाज़ को जितना मैं जानती हूँ उसकी हर चीज़ के बारे में उतना तुम नहीं जानते तनज़ीम नाज़ बचपन से मेरे साथ रही है, हम दोनों शुरू से आज तक एक ही कॉलिज में पढ़े हैं, मैं उसकी हर चीज़ से वाकिफ़ हूँ, नाज़ को हमेशा से एक अमीर लड़के की तलाश थी जिसके पास गाड़ी हो, बंगला हो ख़ूब पैसा हो चाहे वो उसे प्यार करे या न करे।

नाज़ हमेशा से ये चाहती थी कि मैं अपनी गाड़ी मैं बैठी हुई हूँ, सामने कोई मेरी फ्ऱेंड खड़ी हो उसे अपनी गाड़ी में लिफ़्ट दूँ और नाज़ को उस वक़्त तो बेहद बुरा महसूस होता था, जब किसी पार्टी फंक्शन में जाने के लिए पूरे घरवालों को एक टैक्सी के इन्तज़ार में खड़ा होना पड़ता था एक स्कूटर था पूरी फैमिली उस पर तो जा नहीं सकती थी और ऐसे में कार कि ख़्वाहिश दिल में उभरती मगर वह एक पानी की लहर की तरह उठकर रह जाती, कितनी बार उसने पापा से इस ख़्वाहिश का इज़हार किया था, लेकिन वे भी बेचारे क्या करते इतना पैसा नहीं था कि वो उसके लिए कार ख़रीद लें,

तुमसे उसे इश्क़ तो नहीं था मगर फिर भी उसका दिल तुम्हारे लिए अजीब अन्दाज़ में धड़कता था और ये सब बिना वजह तो नहीं था, इसी दौरान उसके भाई की शादी थी इस शादी में काफ़ी मेहमान आये थे, जिनमें उसकी बहन का देवर ’’फ़ैसल’’ भी आया हुआ था, वो काफ़ी अमीर था उसके पास अपना गाड़ी बंगला सब कुछ था, भाई की शादी में जब उससे बातचीत हुई और ये पता चला कि वह इसको चाहता है तो ’नाज़’ ने तुम्हें अपने दिल से निकाल दिया और तुम्हें भूल गयी, गाड़ी बंगले के आगे उसने तुम्हारे सच्चे प्यार की भी कोई कीमत न समझी, कमरजहाँ की ये सब बातें सुनने के बाद मुझे मुहब्बत के नाम से नफ़रत हो गयी, और मेरी ज़िन्दगी में तूफ़ान आ गया और मैंने शराब को अपना साथी बना लिया ताकि मुझे उस बेवफ़ा नाज़ की याद न आये, मग़र इस कमबख़्त शराब में भी मुझे उस की याद से गाफ़िल न होने दिया मुझे उस शराब की बोतल में भी ’नाज़’ का चेहरा दिखायी देता, और मेरे दिन-रात शराब ख़ाने में ही बीतने लगे मेरी पढ़ाई भी ख़त्म हो गयी, घरवालों ने भी मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया, मगर इस शराब ने भी मुझे उस बेवफ़ा नाज़ को भुलाने में मदद नहीं की, अब तो शायद मौत ही उसकी याद को भुलाएगी, इमरान अब मेरा आख़िरी वक़्त चल रहा है। इमरान बोला, नहीं दोस्त तुम्हें कुछ नहीं होगा, तुम ठीक हो जाओगे नहीं इमरान अब मैं नहीं बचूँगा, क्योंकि डॉक्टर ने मुझे बता दिया है कि मैं कुछ दिन का मेहमान हूँ। इमरान रोने लगा, इमरान, तनज़ीम तुमने मुझे कुछ नहीं बताया, ये तुमने ठीक नहीं किया, ये सब बातें छुपाकर तुमने मुझसे बहुत नाइन्साफ़ी की है, मुझे सारी उम्र यही अफ़सोस रहेगा कि मैं अपने दोस्त के किसी काम न आ सका, ’इमरान’ की यह बातें सुनने से पहले ही तनज़ीम बेहोश हो चुका था इमरान ने उसके चहरे को देखा तो घबरा गया और उसके मुँह से चीख निकल गयी, इमरान तनज़ीम की नब्ज़ टटोलने लगा, नब्ज़ चलते देख इमरान को सुकून आया और तनज़ीम को गोद में उठा लिया और गाड़ी का इन्तज़ाम कर अस्पताल पहुँच गया और तनज़ीम के घर फ़ोन कर दिया, थोड़ी देर में तनज़ीम का पूरा घर अस्पताल में था, फिर इमरान ने कमरजहाँ को दिल्ली फ़ोन लगाया, तनज़ीम की हालत से वाक़िफ़ करा दिया।

अगले दिन डॉक्टरी इलाज के बाद जब तनज़ीम को होश आया तो उसके सामने उसका पूरा घर खड़ा था, साथ में कमरजहाँ और शमाँ भी थीं, सबकी आँखें नम थी, तनज़ीम की अम्मी रोते हुए बोलीं, बेटा तुमने अपनी यह क्या हालत बना ली। कमरजहाँ तनज़ीम के पास आयी, और बोली, तनज़ीम नाज़ भी हमारे साथ आई है। और तुमसे अकेले में मिलना चाहती है। मौक़े की नजा़कत को देख सब कमरे से बाहर चले गये। थोड़ी देर बाद नाज़ कमरे में आ गयी और रोते हुए तनज़ीम का हाथ पकड़ बोली, तनज़ीम मुझे माफ़ कर दो वैसे मेरा गुनाह ऐसा है कि मुझे ख़ुदा भी माफ़ नहीं करेगा। तनज़ीम में भटक गयी थी और तुम्हारे सच्चे प्यार को ठुकरा बैठी शादी के बाद मैं एक पल भी ख़ुश नहीं रह पायी हूँ, शादी के बाद मुझे पता चला कि मेरे शौहर फ़ैसल की ज़िन्दगी में कई लड़कियाँ हैं। उसके पास मेरे लिए टाईम ही नहीं है। तनज़ीम तुम्हें खोकर मैंने बड़ी भूल की है, ख़ुदा के वास्ते तुम मुझे माफ़ कर दो दरवाज़ा खोल ’कमरजहाँ’ कमरे में आ जाती है, और तनज़ीम से कहती है, तनज़ीम इसे माफ़ कर दो, इसे अपनी ग़लती का अहसास है। तनज़ीम अपना हाथ उठाता है और नाज़ के सिर पर रख देता है, और एक लम्बी हिचकी लेता है। उसके मुँह से ख़ून आ जाता है, नाज़ और कमरजहाँ दोनों चीख़ पड़ती हैं।

उनकी आवाज़ सुनकर बाहर खड़े सब लोग अन्दर आ जाते हैं लेकिन तनज़ीम की रूह उसका साथ छोड़ चुकी थी वह सब को रोता बिलखता छोड़ इस दुनिया से जा चुका था।

मौ0 ताहिर ख़ाँ

4/959 शौकत मंज़िल,

सिविल लाईन, दोदपुर,

अलीगढ़।

Email:- tahirkhan0718@gmail.com

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