संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 16 : हलवा // गुलाम हुसैन

image

प्रविष्टि क्र. 16 :

संस्मरणात्मक कहानी

हलवा

गुलाम हुसैन


दोपहर का समय,घडी की सुइयां अपने न रुकने वाले अंदाज़ में टिक-टिक की धीमी आवाज़ के साथ आगे बढ़ रही थी। घडी की टिक-टिक को दो अदद आँखें एकटक निहार रही थी,तक़रीबन 2:29 मिनट हो रहा था। जैसे ही बड़ी सुई एक मिनट आगे बढ़ी बाहर पों-पों की आवाज़ आने लगी उन दो अदद आँखें जो घड़ी की सुइयों पर टिकी थी उनमें ख़ुशी झलक उठी और बड़ी तेज़ी से किचन की ओर बढ़ गई वो दो आँखें.... किचन में चूल्हे पर कड़ाही को अपने कंपकंपाते हाथों से पलटने लगी। ये क्या....? कढ़ाही तो खाली है, फिर बर्तनों को पलटने लगी फ्रिज़ खोला पर वो मिला नहीं जिसे वो ढूंढ रही है। बाहर खड़ा वो आदमी अपने हाथों से बार बार पों-पों बजाये और घर के दरवाज़े की ओर देखे जा रहा था 65 साल की रज्जो अपने आपको किचन में असहज महसूस करती हुई उस बाहर खड़े आदमी के इशारों को सुन पश्चाताप कर रही थी ...पता नहीं क्यूँ? किसलिए? रज्जो के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वो अपने आप को बहुत कमज़ोर समझ रही हो फिर पों-पों की आवाज़ ने उसका ध्यान खींचा,रज्जो तेज़ी से किचन से निकल कर एक कमरे में गयी जिसकी दीवारें ऐसी थी जैसे किसी बुजुर्ग आदमी के चेहरे पर झुर्रियां समय के बढ़ते पहिये के साथ उनपर उभर आती है कमरे में एक चटाई ज़मीन पर बिछी थी एक पुराना मरियल तकिया... चटाई जिसे देख लगता था कि रज्जो के उम्र से एक दो साल छोटी ही होगी,एक मटका जिसके बगल में एक स्टील की लुटिया रखी है और एक पुराना टिन का बक्सा जो रज्जो अपने विदाई के समय साथ लाई थी। रज्जो उस टिन के बक्से को खोल बक्से में रखी अपनी पर्स निकालने लगी जो साड़ियों के बीच कही दबा था .. साडियां भी ऐसी कि अगर किसी जरूरतमंद को भी दी जाए तो उसे लेने से मना कर दें.। रज्जो ने बक्से से एक छोटा सा पर्स निकाला उस पर्स का चेन टूटा हुआ था पर सेफ्टी पीन से उसे ऐसा सेफ किया गया था कि एक भी सामान उसमें से गिर नहीं सकता था। पर्स से सेफ्टी पिन हटा कर रज्जो उसे अपने हथेलियों पर उल्टा कर हिलाने लगी बड़ी जल्दी थी उसे 10,20,25 पैसों के साथ कुछ दवाइयों के खाली रेपर भी गिरे वो उनमें से 25 पैसे लेकर बाहर की ओर आई। घर से ठीक बाहर लोहे की छोटी सी ग्रिल लगी थी जो घर के बाहर गली की तरफ है रज्जो वहाँ घंटों बैठती और वो पों-पों बजाने वाला आदमी हफ्ते में दो दिन बुधवार और शनिवार को रज्जो के घर के बाहर उसका इंतज़ार करता आइसक्रीम से भरी टोकरी लेकर जिसे वो अपनी साइकिल पर लादे चलता,दरवाज़े से रज्जो को आता देख वो ख़ुशी से गदगद हो गया उसके चेहरे के भाव ऐसे थे जैसे कोई छोटा बच्चा अपने हाथ पैर जोर जोर से पटकता। रज्जो धीरे धीरे 7 सीढ़ियां उतरकर उस ग्रिल के पास आकर बैठ उस आदमी को देखने लगी। वो आदमी अपनी टोकरी से एक आइसक्रीम निकाल कर रज्जो की तरफ बढ़ने लगा तभी रज्जो ने उसे देख मुंह एक तरफ घुमा लिया और पीठ उसके सामने कर दिया। “अरे का हो गवा...? मुंह काहे फेर ली...आदमी ने कहा,”हमका ई सफेद वाला बिल्कुल्ले नीक नहीं लगता... गुलाबी वाला दो”-रज्जो ने मुंह बनाते हुए कहा। वो आदमी हंस पड़ा और अपने सर पर हाथ मारते हुए बोला-अरे बाप रे गलती हो गई अभी लिए आता हूँ,वो आदमी वापस गया और गुलाबी वाली आइसक्रीम निकालकर ले आया रज्जो के चेहरे पर मुस्कान तैर गयी उसने झट से आइसक्रीम ली और ऐसे खाने लगी जैसे उस आइसक्रीम का कितनी सदियों से उसे इंतज़ार था वो आदमी रज्जो को आइसक्रीम खाते देखता तो कभी उसके अगल बगल नज़रें दौड़ाता जैसे वो कुछ खोज रहा हो। मेरा हलवा ??? आदमी ने कहा। रज्जो एकदम से ठिठक गई उसने बिना बोले आइसक्रीम मुंह में दबाये अपने पल्लू से बंधे 25 पैसे को निकाल उसके ओर बढाते हुए बोली- “आज गैस ख़तम हो गया रहा और घर मा कोई था भी नहीं इसलिए बना नहीं पाई’। ये सुन कर वो आदमी हल्की मुस्कान मुस्काते हुए वो पैसा उससे ले लिया और उदास मन से अपनी साइकिल लेकर आगे बढ़ गया । रज्जो जानती थी कि आज के समय में 25 पैसे की आइसक्रीम कौन देता है। हलवा बनता कहा से ?छोटी बहु ने तो आज सूजी के लिए घर में बवाल खड़ा कर दिया था।

रज्जो के आदमी को मरे काफी वक़्त गुजर गया था,वो एक सरकारी मुलाज़िम था । घर में कोई रज्जो के आदमी के मरने के बाद सरकारी कागजात या पेंशन के लिए आगे नहीं आया नहीं तो शायद आज रज्जो को पेंशन मिल रही होती । बड़ा बेटा दुर्गेश और छोटा ब्रिजेश दो बेटे थे घर मे, दोनों की शादी हो गयी थी। प्राइवेट अस्पताल में साफ़ सफाई का काम कर के अपने दोनों बच्चों को पाल कर बड़ा किया था रज्जो ने,खुद की ख़ुशी क्या होती है उसे नहीं पता । जितना पैसा पाती अस्पताल से या फिर कोई न्योछावर दे देता तो सारा पैसा बच्चों पर ही खर्च कर डालती। छोटे बेटे की शादी के बाद दोनों बेटों ने बटवारा कर लिया... बटवारा घर का तो पहले ही हो गया था ये बटवारा तो बिलकुल ही अलग था। माँ का बटवारा,माँ किसके हिस्से में गयी ये तो रज्जो को खुद नहीं पता था। एक ही घर में दो हिस्से हुए घर के.. बीच उठी हुयी एक छोटी सी दीवार...ये दीवार ऐसी थी जैसे दो अलग अलग किसान अपने खेत को मेड़ से अलग कर देते है ताकि कोई और उस पर अपना हल न चला सके पर रज्जो ने कभी उस मेड़ का ध्यान नहीं दिया उस छोटी सी दीवार से कभी बड़े बेटे के घर में तो कभी छोटे बेटे के घर में,माँ के लिए कौन सी सरहद होती है जो उसे अपने बच्चों से अलग कर दे अलग करने की प्रथा तो बच्चों ने ही बनाई है बस बोलते कुछ नहीं लेकिन मन ही मन अलग कर देते हैं।

आइसक्रीम वाला जो हर बुधवार और शनिवार को उसके घर के ठीक सामने आइसक्रीम का ठेला लगा देता और रज्जो हलवा लेकर आती उसे देने के लिए आइसक्रीम के बदले। कौन था वो ? एक अनजाना रिश्ता जो न रज्जो को ठीक से जानता था न उसके परिवार को...पर था एक ऐसा सम्बन्ध जो दुनिया की नज़र में भले ही गलत हो लेकिन उनका नजरिया बिलकुल साफ़ था....आइसक्रीम के बदले हलवा ....बस...कुछ और भी था दोनों के बीच जिसको दोनों में से किसी ने न तो कोई नाम दिया था न कोई रूप ।

रज्जो का पति सुधीर सरकारी मुलाजिम था तहसील में,बड़ा ही नेक आदमी था किसी का काम होता तो बिना पैसे लिए ही करा देता सब उसे बहुत मानते। ये आइसक्रीम वाला विनोद भी उसे वही तहसील के ऑफिस में मिला था। उसके बेटे को फ़ौज में जाने के लिए कुछ कागजात सरकारी ऑफीसर से attested करने थे तो किसी ने उसको सुधीर के पास जाने बोला । कहते है कि सरकारी कर्मचारी तब तक काम नहीं करते जब तक उनके टेबल पर 50 और 100 का नोट न रख दे। लेकिन सुधीर उनमें से बिलकुल नहीं था।

“अच्छा तो फ़ौज में जाना है तुम्हारे बेटे को”सुधीर ने कहा ।

हां साहब अगर आप लोगों की दुआ रहेगी तो चला ही जाएगा- विनोद ने कहा ।

“हमारी दुआ में इतनी ताक़त होती न भाई तो सबको दुआएं दे देता”-हँसते हुए सुधीर ने कहा।

विनोद ने अपने रुमाल से 5 का नोट सुधीर की तरफ बढ़ाते हुए कहा-साहब ई पांच रूपया रख लो और साईन कर दो । सुधीर ने उसे देखा तो विनोद डर गया।

काम क्या करते हो-सुधीर ने पूछा

बड़े संकोच में रहकर जवाब दिया विनोद ने- साहब उ. आइसक्रीम बेचते है।

आइसक्रीम की बात सुन वो उसके पेपर मेज से उठाकर आगे बढ़ने लगा और रास्ते भर उससे सवाल पूछता गया सुधीर। सवाल...... किस कम्पनी की आइसक्रीम देते हो? कौन कौन सी आइसक्रीम देते हो? वो लाल और गुलाबी वाली भी देते हो ? इन सब बातों के बीच विनोद ने सिर्फ हां में ही जवाब दिया उसके पीछे पीछे चलते हुए एक दरवाज़े के पास आकर सुधीर उससे बोला रुक जाओ मैं अभी आता हूं । थोड़े देर इंतज़ार के बाद सुधीर बाहर आया और विनोद से बोला-चलो। फिर वही सवाल दोहराते हुए वो अपने केबिन में गया जहां से वो उठकर आया था और विनोद ने भी फिर से सारे जवाब हां में ही दिया। ये लो अपने कागजात हो गये साईन-सुधीर ने आगे बढाते हुए कहा। विनोद उसे 5 रूपये फिर दिखाए। तो विनोद ने हँसते हुए कहा ये पैसे तुम रख लो लेकिन एक बात..मुझे तुम्हारी आइसक्रीम चाहिए मेरी बीवी को बहुत पसंद है बोलो दे पाओगे?

अरे साहब का बात कह दिए- विनोद ने बोला

तुम्हें हर बुधवार और शनिवार को उसे आइसक्रीम देना होगा बोलो दे पाओगे- सुधीर ने बोला।

अरे काहे नाही साहब,आपको शिकायत का मौका नहीं देंगे कभी..छोटे लोग हैं पर अपने जबान के पक्के कह दिया तो मरते दम तक निभाएंगे,लेकिन हमरी भी एक शर्त है पैसा नहीं लेंगे - विनोद ने बोला ।

सुधीर हंस पड़ा और बोला-लेकिन कभी भी मुफ़्त में नहीं देना चाहे जैसी भी बात हो वैसे मेरी बीवी हलवा बहुत अच्छा बनाती है।

विनोद मुस्कुराते हुए अपने कागजात लेकर वहाँ से चल पड़ा और फिर हर बुधवार और शनिवार को रज्जो को हलवा के बदले आइसक्रीम देता रहा। उस किये गए वादे के अनुसार जो सुधीर से विनोद ने किया था..विनोद आज भी उसे निभा रहा रहा है। उसने 10 सालो में आइसक्रीम का धंधा नहीं छोड़ा क्यूंकि उसे रज्जो का हलवा बहुत पसंद था और सुधीर को दिया गया वचन भी निभा रहा था ।

रज्जो चुपचाप कमरे में बैठी रहती है कोई पूछने वाला नहीं न कोई बात करने वाला सुबह से शाम कब हो जाती है उसे पता ही नहीं चलता उस आशियाने में जी रही थी क़ैद होकर..बंटवारे में माँ को दोनों बेटों ने ऐसे बाटा था जैसे घर का सारा पैसा अनाज उसी पर खर्च हो जाता...। हर महीने –महीने दोनों अलग से माँ की दवा लायेंगे...एक महीना माँ बड़े बेटे के घर में तो दूसरे महीने छोटे बेटे के घर में...अगर गलती से छोटे बेटे के जगह बड़े बेटे के घर में रात बितानी होती तो रज्जो के लिए दरवाज़ा उसके घर में घुसने से पहले बंद हो जाता .... होली दिवाली दशहरा के कपडे जैसे बन पाए दोनों मिल बांट कर हो जाएगा ऐसा बटवारा हुआ रज्जो का... आज याद कर रही अभी कुछ साल पहले की बातें जब गाँव की एक ज़मीन को दोनों भाई बेचना चाहते थे उस वक़्त तक रज्जो को किसी चीज़ की कोई कमी नहीं होती थी। दवाइयां समय से पहले आ जाती थी। खाना पहले ही मिल जाता था और जिस सूजी के लिए बहु ने घर में बवाल खड़ा किया था वो एक ड्रम भर कर रख दिया गया था सिर्फ रज्जो का एक अंगूठा नीला होना बाकी था..और फिर सब रिवेर्स गेयर की तरह वापस। और हुआ भी यही....छोटी बहु ने साफ़ साफ़ मना कर दिया कि घर में वैसे ही इतना खर्चा बढ़ गया है और आपके आइसक्रीम के चक्कर में हलवा के लिए हम सूजी नहीं ला पायेंगे..यहाँ दाल चावल रोटी के लिए भरी पड़ रहा और आपको अपने आइसक्रीम की पड़ी है चुपचाप जो मिल रहा है खाओ..नहीं मिलेगा खाना तो आइसक्रीम खाकर जिंदा नहीं रहोगी और घर से भी बाहर जाने की जरुरत नहीं है बिलकुल...पूरे मोहल्ले में नाक कटा दी है...लोग कैसी कैसी बाते करते हैं कि दो दो बहुए हैं पर सास को ऐसे रखते हैं जैसे कोई नौकर...हमने तो कभी आपसे कुछ नहीं कहा..फिर हमें क्यों सुनना पड़ता है..इन बातों से रज्जो को कुछ नहीं फर्क पड़ता... अगर फर्क पड़ता भी तो कहती किससे... अगर किसी से कुछ कहती भी तो घर से निकाला हो जाता इसलिए चुपचाप सुनना ही उसकी मजबूरी थी।

आइसक्रीम वाला इधर कुछ दिनों से बीमार था उठ नहीं पा रहा था...उसने सोमवार को एक डॉ को भी दिखाया था ...जिसने बुधवार को मिलने को कहा था ..उसके कुछ टेस्ट भी हुए थे । आज बुधवार है..उसने सोचा की डॉ. को से मिल लेगा फिर आइसक्रीम ले कर रज्जो के पास जाऊँगा उसने वो पों-पों वाली मशीन अपने साथ ही ले गया डॉ. के पास। रज्जो को भी अजीब लग रहा था। डॉ. के पास गया तो रिपोर्ट देखकर डॉ. ने बड़ी लम्बी सांस भरी और कहा-देखो भाई हिम्मत कर के सुनना ।

आइसक्रीम वाला बोला- क्या हुआ साहब ?

डॉ ने कहा- तुम्हें lung कैंसर है..और ये काफी critical condition में है तुम्हें पता नहीं चला क्या?

तो क्या मैं ठीक नहीं हो पाऊंगा-आइसक्रीम वाले ने कहा।

सिर्फ एक महीना...अगर ये एक महीना भी जी लिए तो समझ लेना की तुमने अपने जीवन का 5 साल जी लिया डॉ. ने कहा।

आइसक्रीम वाले की आँखें यूँ भर आई जैसे उससे कितनी बड़ी गलती हो गयी... वह वहां से चल दिया। रास्ते भर डॉ. की ये बात उसे खयालों में सुनाई दे रही थी। वो खुद से सवाल किये जा रहा था। रज्जो को आइसक्रीम कौन खिलायेगा..? मर कैसे सकता हूँ मैं ..? मैंने तो वादा किया था ...? ..और तो और रज्जो के हाथ का हलवा कैसे खाऊंगा...अब किसके लिए वो बनाएगी हलवा ....। नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता..वो डॉ. तो पैसे कमाने के लिए ऐसे ही बोल रहा होगा। ये सब सोचते सोचते उसकी आँखों से आंसू अपने आप निकल पड़े। वो दौड़ पड़ा तेज़ी से और और रज्जो के घर सामने पहुच कर पों-पों बजाने लगा आज उसकी साइकिल नहीं थी और न ही आइसक्रीम का बड़ा डब्बा उसकी आँखों में आंसू थे साथ ही रज्जो को जी भर देखने का इंतज़ार भी था। रज्जो ने दरवाज़ा खोला और सीढियों से उतारते हुए नीचे आई। अरे आज आइसक्रीम नहीं लाये-रज्जो ने पूछा। उसने दूसरी ओर मुह घुमा लिया और अन्दर ही अन्दर बच्चों की तरह फूट पड़ने को जी हुआ उसका .... अपने आपको सँभालते हुए ... बोला.. “वो आज साइकिल ख़राब हो गयी थी तो नहीं ला पाया सोचा की आकर बता दूँ कई दिनों से आया नहीं था न”....आइसक्रीम वाले ने कहा। हां मैं भी कई दिनों से यही सोच रही थी-रज्जो ने सांस भरते हुए कहा। एक बात कहूं ....उसने कहा .. हां कहो .. रज्जो बोली ... मैं पूरे महीने आऊंगा एक दिन भी नागा नहीं करूँगा-आइसक्रीम वाले ने कहा। पर मैं रोज़ रोज़ हलवा नहीं खिला सकती तुम्हें- रज्जो ने कहा । कोई बात नहीं मैं फिर भी आऊंगा-आइसक्रीम वाले ने कहा। रज्जो कुछ बोलती इसके पहले ही वो चला गया।

उसके बाद आइसक्रीम वाला हर रोज़ आइसक्रीम लेकर आता रहा और और अपना पों-पों बजाता रहा कुछ देर तक रज्जो को देखता फिर चला जाता। छोटी बहू को बिलकुल भी पसंद नहीं आ रहा था ये सब वो बस मौके की तलाश में थी कि कब रज्जो को फटकार लगाए। कई दिन बीत गए रज्जो रोज़ ग्रिल के पास बैठ उस आइसक्रीम वाले का इंतज़ार करती लेकिन वो नहीं दिखता उस दिन रज्जो ने छोटी बहु से कहा आज हलवा बनाने का जी कर रहा... बहू ने अपना दिमाग चलाया और बोली ठीक है बना लो ... रज्जो आज बड़े दिनों बाद हलवा बना रही थी और इंतज़ार कर रही थी कि कब पों-पों बजेगा। आज घडी भी रुक गयी थी। वो हलवा बनाने के बाद ग्रिल के पास आकर बैठ गई। घंटों बीत गए आइसक्रीम वाला नहीं आया। वो उठकर जाने लगी तभी एक लड़का आया और बोला- आप रज्जो काकी है। रज्जो रुकी और बोली- तुम कौन हो? जी मैं पास वाले गाँव का ही हूँ वो जो आपको आइसक्रीम देने आते थे न...रज्जो के चेहरे पर मुस्कान तैर गई—हां हां...क्या हुआ बताओ..? वो बहुत बीमार हैं बचेंगे नहीं शायद... मुझे उन्होंने ये आइसक्रीम आपको देने को कहा था... ये लीजिये ..लड़के ने कहा.. । इतना सुनते ही रज्जो बदहवास सी हो गयी..लड़के के हाथ से आइसक्रीम ले ली और हलवा को देखने लगी उसकी आँखों में आंसू तैर गये पर निकल नहीं पाए वो सोच रही थी की करे तो क्या करे....लड़का अपनी बात कहकर वापस लौट रहा था और रज्जो जाने कहा खोयी थी ... उसने हलवे की तरफ देखा और तेज़ी से सीढियों से होते हुए कमरे से बाहर उस लड़के के पीछे जाने लगी जाने लगी। तभी छोटी बहू ने दरवाज़ा बंद कर दिया और उसे उल्टा सीधा बोलने लगी यहाँ तक की आइसक्रीम वाले से उसका गलत रिश्ता भी जोड़ने लगी...तभी ... चटाक की जोर से आवाज़ आई... आज रज्जो ने तमाचा मारा--- छोटी बहू को.....,”रिश्ता क्या होता है?तुम सब क्या जानो.....? अब जाने दो हटो मेरे रास्ते से। ” रज्जो का ये रूप देखकर छोटी बहू सन्न रह गयी और कुछ नहीं बोल पाई। रज्जो दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल पड़ी उस आइसक्रीम वाले के पास हाथ में अखबार में लपेटा हलवा लेकर.... दौड़ती जा रही थी.. रोती जा रही थी...उसके हाथ में आइसक्रीम बंद डब्बे से बूंद बूंद टपकती जा रही थी .... अपने आप से बाते करती...”अगर आज ये हलवा नहीं दिया तो जीवन भर उधार के बोझ से दब जाएगी तू रज्जो..उसने तो अपनी हर बात पूरी की सुधीर का दिया हुआ वचन निभाने के लिए। मुझे जल्दी जाना होगा। नंगे पाँव दौड़ी जा रही थी रज्जो। पहुंच गयी पहुंच गयी हांफते हुए कहा रज्जो ने अपने आप से। लेकिन ये क्या...वो आइसक्रीम वाला दुनिया छोड़ के जा चुका था ..उसकी अर्थी उठने को तैयार थी कोई नहीं था उसके आगे पीछे 6,7 लोग आइसक्रीम वाले को उठा कर अर्थी पर रख रहे थे रज्जो उसके पास पहुंची..और बैठ गई...ए देखो हलवा लायी हूँ तुम्हारे लिए आइसक्रीम वाले... अब बिना खाए मत जाना....आंसू नहीं थे रज्जो की आँख में...लोग उसे हटाने लगे और जैसे ही अर्थी उठाई आइसक्रीम वाले के कपड़ों की जेब में रखा 25 पैसा रज्जो के अखबार में रखे हलवे पर गिर गया। रज्जो की आँखों से आंसू निकल पड़े।

गुलाम हुसैन

दिल्ली -92

-----------

-----------

1 टिप्पणी "संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 16 : हलवा // गुलाम हुसैन"

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.