संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 17 - रूपभ्रमर // छत्र पाल वर्मा


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प्रविष्टि क्र. 17 -

रूपभ्रमर

छत्र पाल वर्मा

स्नातक की डिग्री के बाद एक इंटरव्यू के सिलसिले में मुझे बरास्ते आगरा मीटरगेज की रेल से जयपुर जाना पडा़। आगरा चूंकि एक दिन पहले ही पहुँच गया था अतः ताज दर्शन के बाद एक सराय में रात गुजारने की गरज से जा पहुंचा। बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना या अंग्रेजी में ब्लेसिंग्स इन डिसगाइज शायद इसी को कहते होंगे कि मेरे जैसे ही चार और साक्षात्कार देने जयपुर जा रहे उसी सराय में मेरे मित्र बन गए।

सुबह स्नान व नाश्ते के बाद आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन से मीटरगेज की गाड़ी पकड़ी। अब मैं अकेला नहीं था, हम पांच थे, तृतीय श्रेणी के डिब्बे में एक पूरा इलाका ही हमने घेर लिया, हालांकि भीड़ और गर्मी दोनों थीं।

दो स्टेशन बाद ही भीड़ बेहद बढ़ने लगी पर राहत की बात थी कि हम पांच के अलावा जो दो लोग और हम पाँचों के साथी बने उनमें एक साठ-बासठ साल के बुजुर्ग और एक बीस बाईस साल की महिला थी। वे दोनों राजस्थानी थे। सफर अच्छा कटेगा इस तसल्ली के साथ बुरी बात यह थी कि वह महिला लंबा सा घूंघट काढ़े थी जैसा कि अमूमन राजस्थानी महिलाएं किये रहतीं हैं। माफ करें मैं बार , बार उस रूपसी को महिला कह कर बेइज्जती करता जा रहा हूँ, अब नहीं करूँगा।

हां तो ज़नाब रूपसी वाकई में रूप की रानी थी। केशर मिली दूधिया रंगत, उन्नत वक्ष, पतली कमर व सुराहीदार गर्दन, ऊपर से लगती उम्र, अजी उम्र क्या हमउम्र ही कहिये। सोचा बुड्ढे और रूपसी में स्वसुर-बहू या दादा स्वसुर-नतबहू का रिश्ता होगा।

सवारी गाड़ी में बैठे-बैठे पहले तो कोफ़्त हो रही थी पर अब लगने लगा था कि यदि यह गाड़ी आज की बजाय कल या कभी ना पहुंचाए तो भी चलेगा। यह हम लोगों का दोष नहीं था उम्र का था। हम लोग कुंए के मेंढक नहीं थे पर इतनी और ऐसी खूबसूरती शायद पहले-पहल नसीब हुई थी।

गाड़ी सरकते-सरकते दो-तीन स्टेशन आगे बढ़ चुकी थी पर गोरी का घूंघट बिलकुल भी न सरका, बल्कि यों कहिये कुछ नीचे की ओर ही सरका होगा। उत्सुकता कुढ़न में तब्दील होने लगी, पर किया भी क्या जा सकता था, सिवाय इसके कि हम में से एक दो लड़के शौचालय तक जाकर रूपसी के संभावित रूप की, एवं कैसे घूंघट उठे और हम रूप पी सकें, की रूपरेखा तैयार करके वापिस सीट पर आ बैठते। बुढ़ऊ शायद कम बात करना पसंद करते थे अतः ज्यादातर चुप ही रहे, पर क्या यही बात हम लोगों के लिए संभव थी? नहीं न? अर्जुन की तरह हम लोगों को सिर्फ चिड़िया की आँख ही नज़र आ रही थी। शुक्ला यानी कि सबसे बेताब भंवरे ने हिम्मत करके पूंछ ही लिया “काका क्या वे जो आपके साथ हैं आपकी बहूजी हैं ?” काका को काटो तो खून नहीं। गुर्राते से बोले जी नहीं आपकी काकीजी हैं। अब हमारी बारी थी, काटो तो खून निकलता क्या? हम सब के मुंह सूख गए, थूक निगलने लगे, बगलें झाँकने लगे।

काका यदि साठा थे तो हमलोग भी तो पाठा थे। वाह रे पट्ठे शुक्ला, क्या तरकीब निकाली काका से दोस्ती गांठने की? पठ्ठा हर स्टेशन पर उतरकर खाने के लिए कभी केले तो कभी मूंगफली तो कभी सेव ला-ला कर काका को पेश करता, काका ने भी मजबूरों की तरह से भेंटें स्वीकार करना शुरू कर दीं।

पर हाय री किस्मत, रूपसी ने कुछ न लिया न खाया और न ही घूंघट उठाया। हारे हुए सिपाही की तरह हम सब मायूस हो चले। दोपहर को हम पंचों ने एक बड़े से स्टेशन पर उतर कर हाथ पर रख कर खाना खा लिया, पेट तो भर गया पर भूख न मिटी। हां काका को खाना पेश नहीं किया, क्यों कि कोई फायदा तो था नहीं और फिर खाना केले या मूंगफली के भाव तो आता नहीं था। काका व रूपसी ने भी खाना खा लिया जोकि वे अपने साथ ही लाये थे। खाना भी रूपसी ने घूंघट लिए ही खाया। गर्मी की तासीर ही कुछ ऐसी होती है कि इधर खाना पेट में उतरा कि उधर नींद आँखों पर चढ़ने लगती है।

काका ने रूपसी से कहा “ ऊपरली सीट माटी जायने हु परी” ( ऊपर की सीट पर जा कर सो जाओ) । और रूपसी आज्ञाकारिणी की तरह ऊपर की सीट पर चढ़ गयी, पिंडलियाँ दिखा दीं पर मजाल है कि घूंघट सरक जाए और हम सब कृतार्थ हों। शुक्ला सबसे ज्यादा मायूस था अतः सामने वाली ऊपर की सीट पर जा चढ़ा था। अगले दो तीन स्टेशन हम नीचे की सीट पर बैठने वालों के लिए और भी मायूसी वाले सिद्ध हुए, न मुंह सही, गोरी की गोरी कलाईयाँ और नाज़ुक पैरों के दीदार तो कम से कम हो ही रहे थे अब तो वो भी दुर्लभ हो गए थे और जिराफ जैसी गर्दन उठा कर देख कर तसल्ली कर सकें, अनुभवहीन व कम उम्र होने पर भी हम लोगों से हो नहीं पा रहा था।

शुक्ला ने हम में से एक को ऊपर आने का इशारा किया, आस बंधी, नीचे बैठे बाकी तीनों ने चौथे से जो ऊपर रूप पीने के इरादे से जा रहा था इशारे से ही मानो कहा काम होते ही ऊपर से एक कोई नीचे आ जाना जिससे बाकियों का भी नंबर लगे।

पर यह क्या चौथा ऊपर पहुँच पाता उससे पहले ही शुक्ला नीचे उतरने लगा। बाकी नीचे बैठे तीनों ने सोचा शुक्ला यारों का यार है अतः सब को मौका देना चाह रहा है, कि न जाने कब फिर से घूंघट हम लोगों का दुश्मन बन जाए। बारी बारी पांचों ने रूपसी का रूप पिया।

हालांकि अभी जयपुर आने में लगभग दो घंटे का वक्त था, फिर भी हम सब मित्रों ने अपनी खीझ मिटाने की गरज से फ़ौरन डिब्बा बदल दिया।

रूपसी के साथ चेचक ने बड़ा ही क्रूरतम मजाक किया था। उसका पूरा चेहरा बड़े बड़े चेचक के दागों से भरा पड़ा था। चेचक ने इतने पर ही संतोष नहीं किया था, रूपसी की एक आँख भी ले ली थी।

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छत्र पाल वर्मा

35 - शिवम् टेनेमेंट्स,

आई पी स्कूल के पास,

वल्लभ पार्क, साबरमती

अहमदाबाद 382424

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