संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 18 : मौसा जी की जय// मनमोहन भाटिया


मनमोहन भाटिया

प्रविष्टि क्र. 18

मौसा जी की जय

मौसेरी बहन की मुम्बई में शादी के दो दिन पश्चात रमाशंकर औऱ उमाशंकर ने भी परिवार समेत दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। अन्य रिश्तेदारों के संग सभी राजधानी एक्सप्रेस से मुम्बई से दिल्ली के लिए रवाना हुए। कुल चालीस जनों के दल का आरक्षण दो अलग कोच में हुआ। मौसा जी ने बहुत मिन्नत की, शादी में हलवाई लगे हुए हैं, घर का खाना साथ ले जाओ। रेल का खाना बेकार होता है। स्वादिष्ट खाना छोड़ कर बेकार बासी खाना क्यों खाते हो? लेकिन सब ने मना कर दिया कि पहले ही सामान बहुत है, चालीस आदमियों के खाने के डिब्बे कौन संभालेगा।

मौसा जी ने किसी की नहीं सुनी और खाना का एक बड़ा कार्टन भी सामान के साथ रेल में खुद अपनी देख रेख में रखवाया। चार तरह की सब्जी, दाल, चावल, पूरियां, रोटियां, चटनी, आचार और मुरब्बा सभी भरपूर मात्रा में रखवाए।

"रमा उमा खाना देसी घी में बना है। चार दिन तक खराब नहीं होगा। सफर की थकान हो ही जाती है रेल में नहीं खाओगे तब घर जाकर खाना। कल खाना बनाने की छुट्टी।" कह कर मौसा जी ने किसी की नहीं सुनी और सभी जनों को रेल में तसल्ली से बिठा कर रेल के प्लेटफार्म छोड़ने पर ही स्टेशन से बाहर आए।

रेल चल पडी। बच्चे एक स्थान पर एकत्र होकर अंताक्षरी खेलने लगे। महिलाएं एक साथ बैठ गपशप करने लगी। रमाशंकर और उमाशंकर सामान को सीटों के नीचे ढंग से रख रहे थे। सीटें दो कोच में आरक्षित थी लेकिन बैठे एक साथ एक ही कोच में थे। दूसरे कोच में सिर्फ उमाशंकर अपनी पत्नी उर्मिला संग खाली सीट पर पसर कर लेट गए कि टिकट चेकर को टिकट भी दिखानी हैं। टिकट चेकर को सोलह टिकट चेक करवा दी।

"यात्री कहां हैं?"

उमाशंकर ने स्थिति स्पष्ट की - चौबीस सीट दूसरे कोच में हैं और सभी वहीं हैं। रात में सोने के लिए सभी सीटों पर आएंगे तब तक यहां और वहां आना जाना रहेगा।

दूसरे कोच में जहां पूरा परिवार बैठा था, वहां का टिकट चेकर दूसरा था और खड़ूस भी। चौबीस टिकट पर पैंतीस जनों को देख बिगड़ गया।

"आप चौबीस टिकट पर पैंतीस जन सफर नहीं कर सकते। आपको मालूम नहीं है कि बिना टिकट राजधानी एक्सप्रेस में सफर नहीं कर सकते। आप सब को अगले स्टेशन पर उतारता हूं और बिना टिकट सफर के जुर्म में केस दर्ज करवाता हूं।" टिकट चेकर रमाशंकर से रकम ऐंठने के चक्कर में था।

"जनाब पूरे चालीस जन की चालीस टिकट हैं। चौबीस इस कोच में और सोलह दूसरे कोच में। हम एक परिवार के हैं और शादी के बाद दिल्ली वापिस जा रहे हैं। दो महीने पहले टिकट आरक्षण करवाया था। यहां एक साथ बैठे हैं। थोड़ी देर में सभी अपनी सीटों पर चले जायेंगे। आप पूरे टिकट देखिए।" रमाशंकर ने बात स्पष्ट की।

टिकट चेकर दूसरे चक्कर में था वह अगले स्टेशन पर उतार कर केस करने की धमकी देने लगा तब रामशंकर और उमाशंकर का पारा ऊपर चढ़ गया।

"देखिए जनाब दूसरे कोच में वहां के टिकट चेकर को टिकट दिखा दिए है उनको कोई आपत्ति नहीं है तब आपको किस बात की आपत्ति है?"

"मुझे अपनी ड्यूटी करने दो। आप पर पुलिस केस बनेगा। अगले स्टेशन पर पुलिस बुलवाता हूं।"

यह सुन उमाशंकर ने टिकट चेकर की कमीज का कॉलर पकड़ लिया। "अब तो साले तू पुलिस क्या मिलिट्री बुला ले। हम भी तेरी शिकायत करेंगे। रिश्वत मांगने के जुर्म में तेरे को अंदर करवाएंगे। पुलिस तो रेल में होगी उसको हम बुलाते हैं।" कह कर उमाशंकर टिकट चेकर को एक जोर का झापड़ रसीद करने वाला ही था कि रमाशंकर ने उसे रोक लिया।

"ठीक है रमा तू पुलिस लेकर आ। हर रेल में पुलिस होती है। किसी न किसी कोच में अवश्य होगी।"

तू तू मैं मैं सुन कर कोच में सफर कर रहे दूसरे मुसाफिर भी बीच बचाव में आ गए। रमाशंकर पुलिस के दो सिपाही ले कर आया। हंगामा बढ़ता देख और पुलिस के आगे टिकट चेकर शांत हो गया और सब अपनी सीटों पर चले गए।

उमाशंकर की पत्नी उर्मिला जम्हाई लेती हुई सीट पर लेट गई। "कमबख्त ने सारा मूड खराब कर दिया। अच्छी भली गपशप चल रही है। नाशपीटे ने रंग में भंग दाल दिया।"

"तू मूड खराब न कर, सब थोड़ा आराम कर ले। मैं भी ऊपर वाली सीट पर लेट कर सुस्ता लूं। कमबख्त ने दिमाग खराब कर दिया।" कह कर उमाशंकर समेत सभी अपनी सीटों पर आराम करने लगते हैं।

राजधानी एक्सप्रेस के किराए में खाने का मूल्य सम्मिलित होता है अतः किसी ने मौसा जी का खाना नहीं खोला। रेल का खाना खाने के पश्चात सभी सो गए।

रात के सन्नाटे में तेज गति से रेल दौड़ी जा रही थी। बीच बीच मे तेजी से गाड़ी हिलती भी थी।

"अरे सुनो सो गए क्या?" उर्मिला ने लेटे हुए उमाशंकर को आवाज दी।

"सोने दे, क्यों नींद खराब कर रही है?" उमाशंकर ने करवट बदलते हुए जवाब दिया।

"कमाल है रेल में तुम्हें नींद आ जाती है? यहां खटर पटर रेल चल रही है साथ में हिल भी रही है। हिलती रेल में तुम कैसे सो सकते हो? मैं नहीं सो सकती।"

"रेल तो कुछ नहीं कह रही। अलबत्ता तू नहीं सोने देगी।" कह कर उमाशंकर ऊपर की सीट से नीचे उतर कर उर्मिला संग बैठ गया।

"अब तूने जगा दिया, क्या करूं?"

"नाराज हो गए?"

"नाराज हो कर कहां जाऊंगा?"

उनकी बातें सुनकर उमाशंकर की छोटी बहन वृंदा जाग गई। "भाभी नींद नहीं आ रही क्या?'

"तेरा भाई सोने दे तब न।" उर्मिला ने ठिठोली की। ननद भाभी दोनों हंस दी। उनको हंसता देख उमाशंकर बोला "जब दो महिलायें एक हो जाएं तब चुपचाप कंबल से मुंह ढक कर सो जाना चाहिए।

"भैया आप तो नाराज हो गए। नींद नहीं आ रही है, ताश निकालो। रेल में समय व्यतीत करने का सबसे अच्छा साधन ताश है।"

उमाशंकर, उर्मिला और वृंदा की बातें सुन और रिश्तेदार उठ जाते हैं। सबकी शिकायत कि तेज रफ्तार से चलती गाड़ी उससे दुगनी रफ्तार से हिल रही है। हिंडोले जैसा प्रतीत हो रहा है। नींद कैसे आएगी। सब ताश खेलने बैठते हैं।

"तीन पत्ती खेलेंगे।"

"दस रुपये पॉइंट।"

"मंजूर है।" सभी एक साथ बोले।

"रात के बारह बजे ताश खेलने का आनंद ही कुछ अलग है।" उर्मिला ने पत्ते फैटते हुए कहा।

"बिलकुल अलग है भाभी। हिलते हुए खेलना कोई आसान बात नहीं है।" वृंदा ने चाल चलते हुए कहा।

"रमा एक पेग बना। मूड नहीं बन रहा है।" उमाशंकर ने रमाशंकर को व्हिस्की की बोतल खोलने को कहा।

"उमा भाई पता नहीं किस सूटकेस में रखी है। सूखे खेलो, मुझसे सारे बोरी बिस्तर रात के समय मत खुलवाओ।"

रमाशंकर की बात सुन कर उमाशंकर ने पैक किया। "पेग मिलता तब बेकार पत्तों के साथ भी ब्लाइंड खेल जाता। तुम खेलो।" कह कर उमाशंकर ऊपर की सीट पर जाकर कंबल ओढ़ सो गया। बाकी जन दो घंटे तक ताश खेलते रहे। उर्मिला जीत गई।

"भाभी पक्की जुआरण हो। सबकी जेब खाली करवा ली।" वृंदा सबसे अधिक हारी थी।

"तेरे भाई ने सिखाया है। शादी से पहले तो ताश मेरे लिए काला अक्षर भैंस बराबर था।" उर्मिला ने जम्हाई ली औऱ कंबल ओढ़ लिया।

धीरे-धीरे सबको नींद आ गई। सुबह की चाय पर सबकी नींद खुली। भरतपुर पार करने के बाद रेल रुक गई। रेल भरतपुर और मथुरा के बीच रुकी हुई थी। गाड़ी क्यों रुकी किसी को नहीं मालूम था।

"पता करो गाड़ी क्यों रुक गई है?" उर्मिला ने उमाशंकर को कहा।

"भई सुबह का समय है। चलती गाड़ी में हिलते हुए हल्का होने में बहुत दिक्कत होती है इसलिए मुसाफिरों को जंगलपानी करवाने के लिए गाड़ी रुकी है।" उमाशंकर के इतना कहते सभी ने ठहाका लगाया।

"ग्लास या मग दूं, किसने जाना है?" उर्मिला ने चुटकी ली।

उर्मिला के कहते ही रेल धीमी गति से आगे बढ़ने लगी।

"यार यह राजधानी एक्सप्रेस है या पैसेंजर। इससे तेज तो मालगाड़ी चलती है।" निराश हो कर रमाशंकर ने कहा।

"भैया गाड़ी शर्तिया लेट होगी।" वृंदा ने जले पर नमक लगाया।

"बहन शुभ-शुभ बोल।" उमाशंकर ने कहा।

रेल धीमी गति से मथुरा स्टेशन पहुंची। गाड़ी सिर्फ दो मिनट नाश्ता चढ़ाने के लिए रुकती है लेकिन आधे घंटे रुकी रही। सबका नाश्ता हो गया। मुसाफिरों ने प्लेटफार्म पर मथुरा के पेड़ों की जम कर खरीदारी की। स्टेशन पर उपलब्ध सभी पेड़े बिक गए। गाड़ी फिर धीमी गति से बढ़ी।

"आज तो पेड़ों के लिए गाड़ी रुकी थी।" उर्मिला ने कहा।

"भाभी पांच किलो तो तुमने भी खरीदे हैं।" वृंदा ने कह कर उर्मिला को कोहनी मारी।

"सब के लिए एक-एक डिब्बा लिया है। याद करेंगे।"

उर्मिला के शब्द "याद करेंगे" सत्य हो गए। मथुरा के पेड़े तो नहीं बल्कि यह सफर सभी को न भूलने वाला सफर हो गया। रेल बैलगाड़ी की रफ्तार से चल रही थी। मुसाफिरों का सब्र टूटता जा रहा था। मथुरा से आगे छत्ता स्टेशन पर रुक गई। अब स्थिति साफ हो गई कि आगे दिल्ली से चेन्नई जाने वाली गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया है। दो कोच दूसरी पटरी पर गिर गए हैं। सुबह के समय हुई रेल दुर्घटना के कारण रेलों का आवागमन बाधित हो गया है और सभी रेलें जहां तहां रुकी पड़ी हैं। जान-माल का जबरदस्त नुकसान हुआ है। युद्धस्तर पर बचाव कार्य हो रहा है।

अब रेल कब चलेगी इसका उत्तर किसी को नहीं मालूम था। मथुरा से दिल्ली का सफर राजधानी एक्सप्रेस डेढ़ घंटे में तय करती है लेकिन आज कब पहुंचेगी, किसी को नहीं मालूम। मुसाफिरों का सब्र का बांध टूटने लगा। दो घंटे बाद रेल की बत्तियां बंद कर दी गई और एयरकंडीशनर भी बंद हो गए। अब मुसाफिरों ने चिल्लाना शुरू कर दिया।

"अरे अंधेरे कोच में बिना एयर कंडीशनर के भुन जाएंगे। राजधानी एक्सप्रेस में सफर कर रहे है कोई मालगाड़ी में नहीं कि अंधेरे में बैठे रहेंगे।"

कोई दूसरा चारा नहीं था। गाड़ी कब बढ़ेगी इसका उत्तर रेल विभाग के पास भी नहीं था। एकल मुसाफिर जिनके पास सामान कम था उन्होंने रेल छोड़ दी और पैदल हाईवे की ओर चल पड़े कि आती जाती रोडवेज की बस पकड़ कर दिल्ली दो-तीन घंटे में पहुंच जाएंगे। यहां मालूम नहीं कितना समय लग जाए। आधे घंटे में बहुत सारे मुसाफिर गाड़ी छोड़ कर हाईवे की ओर रवाना हुए। हाईवे रेलवे स्टेशन से थोड़ी दूर पर था। गाड़ी रुकने औऱ मुसाफिरों का हाईवे पर जाने की खबर सुनते ही रिक्शे और तांगे स्टेशन पर लग गए। छोटे परिवार वाले मुसाफिरों ने भी गाड़ी छोड़ हाईवे की ओर रवानगी की।

"भाई रमा हम भी चले क्या?"

"उमा भाई हमारी समस्या अलग है। हम चालीस जने हैं। औरतें और बच्चे हैं। साथ में गहने, रकम और जोखिम का सामान भी है। हमें तो पूरी बस चाहिए। उचित यही है कि हम शांति से गाड़ी चलने की प्रतीक्षा करें।"

"रमा अंदर कोच में बैठ नहीं सकते हैं। ऐसा करते हैं कि जोखिम वाला सामान हम यहां प्लेटफॉर्म पर अपने साथ रखते हैं। बाहर गर्मी अवश्य है लेकिन दूसरा उपाय भी नहीं है।"

उमाशंकर की बात मान कर सभी अपना कीमती सामान के साथ प्लेटफार्म पर बैठ गए। एक छोटे से रेलवे स्टेशन पर मुश्किल से दो-तीन बेंच थे। एक बेंच के पास फर्श पर चादर बिछा कर सब गपशप करने लगे। बच्चों को खुला मैदान खेलने और धमा चौकड़ी के लिए मिल गया।

उमाशंकर और रमाशंकर को देख कर गाड़ी में सफर कर रहे दूसरे परिवार भी प्लेटफार्म पर उतर गए। वीरान प्लेटफार्म क्रीड़ा स्थल बन गया। रेलवे पटरी पर पड़े पत्थर उठा कर पिट्ठू बना लिया और अपनी गेंदे निकाल कर पिट्ठू खेलने लगे। बड़े ताश खेलने में व्यस्त हो गए।

राजधानी एक्सप्रेस में मथुरा पर नाश्ता देने के बाद खाने का कोई प्रबंध होता है क्योंकि साढ़े नौ बजे दिल्ली पहुंच जाती है। रेलवे स्टेशन पर चाय के स्टाल पर धड़ाधड़ बिक्री होने लगी। चाय और पकोड़े बिकने लगे और सारा स्टॉक समाप्त हो गया।

"मजा नहीं आया पकोड़ों में, पता नहीं कौन से तेल में बनाये हैं। इससे बढ़िया तो अपनी गली के नुक्कड़ वाला बनाता है।" वृंदा बोली

"तेरे को उसके पकोड़े पसंद हैं। मुझे तो रति भर पसंद नहीं उस मुये के पकोड़े।" उर्मिला ने मुंह बनाते हुए कहा।

"फिर भी खाती जरूर हो।" वृंदा खिलखिलाई।

"तेरा साथ देने के लिए खा लेती हूं। बस यहां देख, सड़ी हुई चाय भी पी ली। कोई स्वाद न था। निरी शक्कर पानी में घोल रख्खी थी।"

उर्मिला और वृंदा की नोंक झौंक देख कर उमाशंकर ने कहा। "अरे भूख लगी है तब मौसा जी का खाना निकालो, वह कब काम आएगा। पूरा कार्टन भर के खाना दिया है।"

"अरे भाई लोगों वो तो हम भूल ही गए। लगता है मौसा जी को पहले ही अहसास हो गया था कि सफर में खाने की सख्त जरूरत पड़ेगी।" उर्मिला ने उत्साहित हो कर उमाशंकर से कहा। "खड़े हुए बातें करोगे या खाने का कार्टन भी निकलवाओगे।"

रमाशंकर ने खाने का कार्टन निकाला। सभी ने खाना आरम्भ किया। मौसा जी ने तीन दिन का खाना पैक कर दिया था। छोले, आलू-गोभी की सब्जी, पनीर, साग, पुलाव के साथ मूंग दाल का हलवा, चटनी, आचार और मुरब्बा भी रखा हुआ था। रमाशंकर के परिवार के चालीस सदस्यों के छक कर खाने के पश्चात भी भरपूर मात्रा में बचे खाने को गाड़ी में सफर कर रहे दूसरे मुसाफिरों ने भी खाया। शुद्ध देसी घी में निर्मित लजीज खाने की सभी मुसाफिरों ने जम कर तारीफ की। संकट की घड़ी में जहां भारतीय रेल ने हाथ खड़े कर दिए, उस संकट की घड़ी में मौसा जी का खाना संकट मोचन बना। मौसा जी ने भी सो सवा सो बंदों का खाना दिया था। मुसाफिरों के साथ स्टेशन मास्टर ने भी जम कर भोजन का स्वाद लिया।

"भाई साहब आपके मौसा जी दूरदर्शी हैं जो खाना आपको दिया। पहले समय में मुसाफिर घर से भोजन साथ लेकर चलते थे। दो-तीन दिन का खाना साथ रखते थे। रेल गाड़ी लेट हो जाए तब खाना-पीना साथ होना चाहिए। हमसे पूछो गाड़ियों में जो खाना परोसा जाता है साफ और बढ़िया नहीं होता। पता नहीं किस घी तेल में बनाया जाता है। भगवान जाने लेकिन मौसा जी ने शुद्ध देसी घी में खाना बनवाया है। सुगन्ध बता रही है।" खाना खाने के बाद देसी घी से लबालब हाथ मूछों पर फेरते हुए कहा।

सभी मुसाफिर मौसा जी के खाने की तारीफ करते जा रहे थे। दोपहर के समय तेज धूप से बचने का साधन सिर्फ स्टेशन मास्टर का कमरा था या फिर पेड़ की छांव। स्टेशन मास्टर उमाशंकर के परिवार को अपने कमरे में ले गया। रमाशंकर ने ताश निकाली।

"भाई साहब दो हाथ हो जाएं, दस रुपये पॉइंट।"

जुए के नाम से स्टेशन मास्टर घबरा गया। "जनाब आप फँसवाओगे। ताश खेल लो लेकिन रुपये के साथ नहीं। किसी ने शिकायत कर दी तो आफत हो जाएगी। ड्यूटी पर जुआ नहीं।"

"कौन बताएगा जनाब। यहां सभी अपने हैं।" उमाशंकर ने स्टेशन मास्टर को भी खेल में बिठा लिया। मौसा जी के खाने का कमाल था कि मूंछों पर ताव देते स्टेशन मास्टर खेलने लगे।

मास्टर जी खेल के मझे खिलाड़ी थे। उन्होंने उर्मिला और वृंदा जैसी पक्की खिलाड़ियों को मात दे दी। स्टेशन मास्टर ने सब को चित करते हुए दो हज़ार रुपये अपनी अंटी में कर लिए।

शाम के पांच बजे स्टेशन मास्टर के पास संदेश आया कि रेल की पटरी साफ हो गई है। एक्सीडेंट वाली ट्रेन को हटा लिया गया है। आधे घंटे में रेल यातायात शुरू कर दिया जाएगा।

रेल का एयर कंडीशनर चालू कर दिया। मुसाफिर गाड़ी में बैठ गए।

"मौसा जी को हमारा नमस्कार अवश्य कहना।" स्टेशन मास्टर ने गाड़ी में चढ़ते उमाशंकर को कहा।

"जरूर जनाब।"

उमाशंकर और रमाशंकर सोच रहे थे कि जिस खाने पर उनको ऐतराज था कि जब गाड़ी में खाना मिलता है तो साथ उठाने के क्या जरूरत है। लेकिन मौसा जी जिद पर अड़ गए थे कि खाना जरूर देंगे और बहुत प्यार से खाना कार्टन में पैक करवा के गाड़ी में रखवाया था। संकट में उनका खाना सभी के काम आया।

कोच के सभी मुसाफिरों ने जयकारा लगाया। "मौसा जी की जय।"

राजधानी एक्सप्रेस धीरे धीरे आगे बढ़ने लगी। उमाशंकर और रमाशंकर के होंठों पर मुस्कान थी।

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मनमोहन भाटिया

सेक्टर 13, रोहिणी

दिल्ली 110085

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