प्राची - जनवरी 2018 : संपादकीय : खुश रहो कि हम आजाद हैं! // राकेश भ्रमर

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संपादकीय

राकेश भ्रमर

खुश रहो कि हम आजाद हैं.

अंग्रेजों की गुलामी से हम आजाद नहीं होते तो क्या इतने सुखी होते, इतनी सुख-सुविधाओं का भोग कर सकते, मनमाना जीवन जी सकते और कानून का उल्लंघन कर सकते. कतई नहीं, अंग्रेजों के जमाने में तो बिना गल्ती के भी सबकी खाल उधेड़ दी जाती थी. बिना अपराध के फांसी दे दी जाती थी या काले पानी की सजा दी जाती थी और अण्डमान की जेल में मृत्युपर्यन्त सड़ने के लिए भेज दिया जाता था. आज हमें खुशी है कि हम आजाद हैं और अपराध करके भी कानून को धता बता देते हैं. सामाजिक कानूनों-नियमों का तो इतना उल्लंघन करते हैं कि हम सबके लिए आजीवन कारावास की सजा भी छोटी पड़ जाए, परन्तु हम आजाद हैं और कोई कानून न तो हमें पकड़ सकता है, न सजा दे सकता है. हम मूंछों पर ताव देते हुए खुले सांड़ की तरह घूम रहे हैं और किसी को भी खदेड़-खदेड़ कर रगेद रहे हैं.

हो सकता है, मेरी प्रस्तावना आपकी समझ में न आ रही हो, इसलिए मैं विस्तार से कुछ बातों का उल्लेख करता हूं. तब भी आप नहीं समझे, तो इतना समझ लीजिए कि आप आजाद हैं और अत्यंत सुखी हैं. आपकी खुशियों को कोई ग्रहण नहीं लगा सकता. अगर आप समझ गये तो दुःखी हैं.

सोचिये, अगर हम आजाद नहीं होते, तो क्या सरकारी ज़मीन पर कब्जा कर सकते थे, सरकारी सम्पत्तियों को आंदोलन के नाम पर आग लगा सकते थे. अंग्रेज हमारा पिछवाड़ा छांटकर समतल न कर देते. आज हम आजाद हैं, तो सरकारी काम-काज करें या न करें, तनख्वाह पूरी उठाते हैं. हमारी अक्षमता पर

अधिकारी सवाल नहीं खड़े कर सकता. गबन करो, चाहे घूस लो, सबकी छूट है. पकड़े जाने पर भी जेल नहीं जा सकते. सालों तक मामले को लटका कर रखो. एक दिन अपने आप छूट जाओगे. फिर सालों साल का वेतन सरकार से मय ब्याज के वसूल कर सकते हो. इसके लिए केन्द्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल है, जो कामचोर, निकम्मे और भ्रष्टाचारी कर्मचारियों के लिए एक पांव पर खड़ा रहता है और जायज-नाजायज मामलों में ऐसे कर्मचारियों के पक्ष में आदेश पारित कर सरकार के मंसूबों पर पानी फेरता रहता है.

अगर आपके पास थोड़ा-बहुत पैसा है, और कुछ गुण्डे पालने का शौक रखते हैं, तो कहीं भी, कभी भी सरकारी ज़मीन पर कब्जा कर सकते हैं. वैसे भी सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों को यह पता नहीं होता कि उनके विभाग के पास कहां-कहां और कितनी ज़मीनें हैं. रेलवे की जमीनों पर अवैध कॉलोनियां बसी हुई है और मजाल है कि सरकार वहां बसे हुए लोगों को हटा दे. यहां तक कि दिल्ली की नाक के नीचे फुटपाथों पर लोग झोंपड़ियां ही नहीं दुकानें बनाकर रह रहे हैं और किसी की मजाल है, उनको इंच भर भी इधर से उधर सरका दे.

हमारे देश का लैण्ड माफिया और खनन माफिया सरकार से भी अधिक शक्तिशाली होता है. दरअसल, ये माफिया संगठन सरकार के मंत्रियों, सांसदों और विधायकों द्वारा ही संचालित होते हैं. ये लोग चाहे जहां कब्जा कर लें और चाहे नदी की रेत गायब कर दें या पहाड़ों को तोड़कर मिट्टी में मिला दें. कोई कुछ नहीं कर सकता.

ऐसा नहीं है कि केवल धनी और शक्तिशाली लोग आजादी का सुख भोग रहे हैं, इसका लाभ हर छोटा-बड़ा आदमी अपने-अपने तरीके से उठा रहा है.

जो ताकतवर नहीं होता, सरकारी ज़मीन-सम्पत्ति पर कब्जा नहीं कर पाता, वह अपना छोटा-सा घर बनवाते समय सड़क को आगे से दो-चार फीट घेर लेता है. उस पर भी उसका मन नहीं भरता तो गेट के आगे सीढ़ियां निकाल देता है. छज्जे के ऊपर टीन शेड डालकर बरामदा निकाल देता है. घर बड़ा हो जाता है, परन्तु घर के आगे की सड़क इतनी संकरी कि उससे छोटी गाड़ी भी निकालना मुश्किल हो जाता है. परन्तु इससे मकान मालिक को क्या फर्क पड़ता है. वह तो खुश है कि उसने आजादी के ढेर सारे फायदों में मूल का नहीं तो ब्याज का फायदा तो उठा ही लिया.

जो धार्मिक होते हैं, वह किसी भी सड़क के गोल चक्कर या कोने में मंदिर-मस्जिद-मजार बनाकर बैठ जाते हैं. सड़क पर आवागमन अवरुद्ध हो जाता है, लोगों को परेशानी होती है, परन्तु इससे धार्मिक लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता. वह तो मजे से उसके अंदर रहते हैं, जैसे उनके पुरखे उनके लिए वह जगह विरासत में लिखकर गये थे. और आपको पता ही है, धार्मिक जगहों पर आम आदमी तो छोड़िये, पुलिस-प्रशासन, नगरपालिका प्रशासन और सरकार भी कोई दखल नहीं देती. इससे धार्मिक भावनाएं भड़कने का ख़तरा रहता है. भावनाएं न हुई ज्वलनशील पदार्थ हो गया जो तीली दिखाते ही प्रचंड रूप से जलने लगता है. धर्म के आगे किसी की नहीं चलती.

दुकानदारों की तो चांदी ही चांदी होती है. वह दुकान के अंदर सामान कम, बाहर ज़्यादा रखते हैं. आधी सड़क दुकानदार घेर लेता है, उसके बाद एक चौथाई सड़क ठेले-रेहड़ी वाले घेर लेते हैं. जो सड़क बचती है, वह मोटर-गाड़ियों की रेलम-पेल में पिचक जाती है. पैदल चलने वालों के लिए न फुटपाथ बचता है, न सड़क. इसे बताने की जरूरत नहीं कि पैदल यात्री सड़क पर अपना जान जोखिम में डालकर कैसे अपनी मंजिल तक पहुंचता है. हम सभी इसका लाभ उठा चुके हैं.

कुछ लोग तो इतने शातिर होते हैं कि पटना का गांधी मैदान और आगरा का ताजमहल तक नीलाम कर चुके हैं. मुंबई का शिवाजी टर्मिनस स्टेशन पर भी दांव पर लग चुका है. वस्तुतः जिनको आजादी के लाभ ज्ञात हैं, वह उसका पूरा फायदा उठा रहे हैं. अगर आप घोंचू किस्म के इंसान हैं, और आजादी के लाभों को नहीं भोग पा रहे हैं, तो इस लेख को ध्यान से पढ़कर उसके लाभ उठा सकते हैं.

बड़े-बड़े लाभ तो यही हैं कि सरकारी ज़मीनों और सम्पत्तियों को अपने कब्जे में कर लीजिए. किसी पुलिस या कानून की मजाल नहीं कि एक बार कब्जा हो जाने के बाद उसे आपसे छीन सके. भारत के महानगरों में हजारों की संख्या में अवैध बस्तियां सरकारी जमीनों पर बनी हुई है और सरकार लाख प्रयत्नों के बाद भी उन्हें खाली नहीं करवा पाई. कोर्ट कचहरी में मामले जाने पर भी अवैध बस्तियों को खाली नहीं करवाया जा सका. उल्टे मानवता का हवाला देकर अदालतों ने उन बस्तियों को मान्यता दे दी अर्थात वैध घोषित कर दिया. ऐसे मामलों में कुछ मानवाधिकार संगठन भी कानून के आड़े आ जाते हैं. वह मानवता का हवाला देकर सरकार की ज़मीन पर अवैध बस्तियों को मान्यता दिलवा देते हैं.

खैर, जब आपका अपना घर बन जाए, तो कूड़ा फेंकने की चिंता आपको नहीं उठानी है. वैसे भी उसको फेंकने या कहीं पर डालने के लिए जगह ही नहीं बची है. सारी ज़मीन तो लोगों ने घेर ली है. ऐसे में घर का कूड़ा आप थोड़ी-बहुत बची सड़क या पार्क के अन्दर फेंककर आजादी का लाभ उठा सकते हैं. अगर आपको पार्क तक जाने में असुविधा हो तो बड़ी चालाकी से पड़ोसी के घर की छत पर कूड़ा फेंक सकते हैं, उसके घर के आगे भी फेंक सकते हैं. इससे आपको एक और लाभ मिलता है. पड़ोसी के गालीनुमां प्रवचन आपको सदैव सुनने को मिलते रहेंगे, कभी-कभी लाठी से आपकी खोपड़ी का नारियल भी फोड़ा जा सकता है. पर क्या हुआ? आजादी के लाभ तो आप उठा ही रहे हैं. कुछ दिन अस्पताल में लेटकर सुकून से जिन्दा तो रह सकते हैं.

अगर आप सरकारी सेवा में हैं, तो सरकारी पैसे का गबन करना बहुत आसान है, घूस लेना तो कर्मचारियों और अधिकारियों का नैतिक कर्त्तव्य है. सीबीआई और सतर्कता विभाग बस दिखावे भर के लिये होते हैं. इससे आपके नैतिक कर्त्तव्य पर कोई असर नहीं पड़ता, हां, कुछ देर या दिन के लिए बाधा अवश्य आ जाती है, परन्तु फिर सब सामान्य हो जाता है.

छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब, मजदूर-किसान सभी आजादी के लाभ उठाते हैं और सुखी रहते हैं. आजादी के बड़े-बड़े फायदे हैं, तो छोटे फायदे भी हैं, जैसे-आप राह चलते कहीं भी थूक सकते हैं. सड़क के किनारे खड़े होकर या बैठकर लघु या दीर्घ शंका कर सकते हैं. यह शंकायें आप अति विशिष्ट इलाके में भी कर सकते हैं. मसलन- दिल्ली के बोट क्लब और जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम के किनारे ऐसी शंकायें बैठी या बहती दिखाई दे जाती हैं. दूसरी जगहों पर भी पाई जाती होंगी, परन्तु वहां मैंने निरीक्षण नहीं किया. बोट क्लब और जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम के पास तो यह सब मैंने अपनी आंखों से देखा है.

इसके अतिरिक्त पान और गुटका खाकर तो किसी भी इमारत के कोनों, सीढ़ियों पर थूकना तो हम सब के लिए बहुत आम बात है. यह केवल आम आदमी ही नहीं करता, इस अति स्तुत्य कार्य में विशिष्ट व्यक्ति भी शामिल रहते हैं. सबसे अधिक लाल रंग की पच्चीकारी अदालती इमारतों के कोनों और सीढ़ियों में पाई जाती है, जिससे साफ पता चलता है कि यह महत्त्वपूर्ण कार्य अधिवक्तागण करते हैं या फिर उनके विशिष्ट क्लायंट, जो उनके लिए पान की पुड़िया और गुटका पहले लेकर आते हैं, पैसे का चढ़ावा बाद में चढ़ाते हैं.

आजादी के सुख इतने अच्छे होते हैं कि हम पुलिस की आंखों के सामने ही सिगनल तोड़कर निकल जाते हैं. गलत साइड से कार ओवरटेक करने में हमें महारत हासिल है. जहां आवश्यक भी नहीं होता, वहां भी हम गाड़ी का हार्न बजाते हैं. जहां नो पार्किंग का बोर्ड होता है, वहां गाड़ी पार्क करना हम अपना धर्म समझते हैं. यही नहीं, सड़क पर जहां दूसरी तरफ जाने का निशान नहीं होता, वही से दौड़कर सड़क पार करके हम गुजरती हुई गाड़ियों को देखकर मुस्कराते हैं. जहां सड़क पार करने के लिए ओवरब्रिज या भूतिगत पैदल पारपथ बने होते हैं, वहां भी हम उनका प्रयोग नहीं करते. सड़क से ही दूसरी तरफ जाते हैं. यह ओवरब्रिज या भूमिगत पारपथ बेघर लोगों के सोने या फिर नशेड़ियों और जुआंबाजों के सुप्रयोग में आती हैं.

यह केवल भारत देश में ही संभव है कि हम कानून को तोड़कर भी सजा से बच जाते हैं. दहेज विरोधी कानून के होते हुए भी हम सीना ठोंककर दहेज लेने में अपनी शान समझते हैं. बाल विवाह करना या कराना अपराध होते हुए भी बाल विवाह धूमधाम और बाजे-गाजे के साथ होते हैं. किसी पुलिस वाले की मजाल नहीं कि ऐसे अपराधियों को पकड़कर जेल में बंद कर दे. हमारे देश के पुलिस वाले भी आजादी का लाभ उठाते हैं. उनका मानना है कि अगर देश के नागरिक आजादी के सुख भोग रहे हैं तो उन्हें पैसे का सुख भोगने दो. अतएव जहां भी कोई अपराध होता है, पुलिस की पांचों उगलियां घी में लिपट जाती हैं. संगीन अपराधों को सोच-समझकर निबटाती है, परन्तु मामूली अपराध तो वह पलक झपकते ही निबटा देती है. इसमें आरोपी और पीड़ित दोनों को ही जल्द आजादी का लाभ मिल जाता है, वरना उन्हें सारे दिन थाने में बैठने या फिर रात में हवालात के अंदर मच्छरों से कटवाने का अंदेशा सताता रहता है.

इतने सारे आजादी के लाभ अगर इस देश में उपलब्ध हैं, तो क्या हम इनसे सुखी नहीं होंगे. बाहर निकलिए और आजादी के लाभ उठाइए. घर में बैठकर अपने को कुंठित मत करिये!

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