कहानी // संतगिरी // सनत कुमार जैन : प्राची – जनवरी 2018

ट्रेन की स्लीपर बोगी में भी भीड़ का आलम ये था कि लोग एक दूसरे के ऊपर लदे हुए थे. ऊपर से भयंकर गर्मी....पसीने की बदबू नथुनों में घुसी जा रही थी. इस भीड़ और गर्मी में ट्रेन की रफ्तार भी कछुए की चाल सी लग रही थी.

ट्रेन रुकती तो थोड़ी हलचल होती, परन्तु समझ में न आता कि भीड़ कम हुई थी या ज्यादा. लोग एक दूसरे की तरफ घूरकर देखते और फिर सामान्य होकर खड़े हो जाते.

इस भीड़ में भी वेंडर्स अपना रास्ता बनाकर निकल जाते. इसी बीच तेज आवाज करते हुए कुछ हिजड़े डिब्बे के अंदर घुस आए. सबका ध्यान उनकी तरफ चला गया.

‘इन लोगों से उलझना बेकार है.’ सभ्य गोरे चिकने से एक व्यक्ति ने कहा. उसकी शक्ल बता रही थी कि उसके पॉकेट में मोटा माल था. ‘इनसे उलझो तो ऐसे ही करते हैं. बेशरम हैं ये. पर हम तो नहीं.’

‘भाई साहब आपका पेट भरा है. जेब भारी है और तिजोरी भी भरी होगी. इसलिए इतनी शान से ऐसी बात कह रहे हैं. कल से सफर कर रहा हूं, किसी तरह खाने के पैसे बचा-बचाकर. इस बेशरम को कैसे दे दूं.’ एक अन्य व्यक्ति ने कहा.

सभ्य व्यक्ति ने कहा, ‘उनकी बद्दुआ मत लो. सबकुछ बिगड़ जाता है.’

‘कल से आज तक मात्र दो बार खाया है. ट्रेन में सफर करते हुए दो दिन हो चुके हैं. बैठने की जगह नहीं मिली है. खुद का घर नहीं है. प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता हूं. यह सब अच्छा है क्या?’

सारे लोग मौन हो गए. मिस्टर सभ्य ने अपनी जेब से एक दस का नोट निकालकर हिजड़े को दे दिया. वह आगे बढ़ गये. तभी दो बच्चे आ गए, अपना नाम और करतब दिखाने. उस ठसाठस भीड़ में भी जगह बन गयी थी. एक ढोलक बजा रहा था और उसकी थाप पर नाच रहा था.

‘चलो आगे बढ़ो. न तो जगह है, न मूड.’ सभ्य व्यक्ति ने लगभग दुत्कारा. उन बच्चों का यह रोज का काम था. वे लगे रहे, जब तक कि उनका तमाशा न खत्म हुआ. फिर वह एक-एक के पास जाकर पैसे मांगने लगे. इसी क्रम में वह मिस्टर सभ्य के पास पहुंचे.

‘छूना नहीं! बिल्कुल छूना नहीं. पैदा करके छोड़ देते हैं समाज के लिए. सारे चोर, डाकू तो इसी ट्रेन में घूम रहे हैं.’ मिस्टर सभ्य ने चिड़चिड़ाहट के साथ कहा.

‘अभी वो छक्का आया था तो चुपचाप दस का नोट निकालकर दे दिया. मुझे एक रुपया देने में दर्द हो रहा है.’ इसके साथ ही उसने उस छक्के की नकल उतारी. अगले ही पल लोगों ने अपनी-अपनी जेब से चिल्लर निकाल कर उस लड़के के हाथ पर रख दी. मिस्टर सभ्य अपनी सीट पर फैलकर बैठ गये और अखबार पढ़ने लगे. पढ़ क्या रहे थे, अपना चेहरा छिपा रहे थे.

तीन-चार स्टेशन के बाद भीड़ कुछ कम हो गयी थी. तभी बोगी में एक मधुर आवाज गूंजी. हरि नाम जप रहा था कोई सुन्दर राग में. साथ ही मंजीरा भी उसका साथ दे रहा था. किसी पुरानी फिल्म की धुन थी.

कुछ समय के लिए सुकून की हवा बह उठी थी. उस अंधे बाबा का स्वर गवाही दे रहा था कि यदि ईश्वर किसी को कुछ कमी देता है तो कहीं बढ़ती भी देता है. वह बड़ी तन्मयता से गा रहा था. लगभग पांच मिनट चला उसका भजन. भजन खत्म होते ही उसने भी मांगना शुरू कर दिया-

‘दे दाता के नाम पर दे. तेरे बच्चे जिएं. तेरा घर-द्वार आबाद रहे.’ लगातार यही बातें उलट-पुलट कर बोल रहा था. जैसे ही कोई उसके हाथ पर कुछ रखता, उसका स्वर बदल जाता- ‘तू जिस काम से जा रहा है, ईश्वर, अल्लाह, राम उसे पूरा करे.’

मि. सभ्य जी की ओर बढ़ा हाथ, पर अखबार के पीछे छिपा चेहरा आगे नहीं आया, बल्कि आवाज आई-

‘कुछ काम करो बाबा! यूं मांगने से कब तक चलेगा. वैसे भी मांगना पाप है.’

‘चल बेटा, मैं तेरे साथ चलता हूं. जहां तू ले चलेगा, मैं तेरे साथ चलूंगा. जो बोलेगा वहीं करूंगा. मैं खुद ही इस मांगने के काम से परेशान हूं. घर में रोटियां नहीं मिलती, और ट्रेन में केवल गालियां मिलती हैं.’ नयन सुख बाबा खुश होकर बोले. मि. सभ्य इस अचानक हुए हमले से घबरा गये. सोचा भी न था कि पास उल्टा पड़ जाएगा. बड़ी मुश्किल से जी ठिकाने आया तो जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाला और उसे देकर कहा-

‘इस कार्ड पर लिखे पते पर आ जाता. मैं काम जरूर दूंगा. ठीक है, समझ गये न!’ ताकीद देकर उसे समझा भी दिया.

‘ईश्वर तेरे बच्चों को सुखी रखे.’ कहते हुए नयन सुख अपने डण्डे के सहारे आगे बढ़ गया. मि. सभ्य अपनी खिसियाहट के छिपाने के लिये ऊपर की बर्थ पर चढ़ गये.

इसके बाद एक चना-मसाला बेचने वाला आया. इतनी भीड़ में उसे जगह देना अखर रहा था. परन्तु लोगों की जीभ में चना-मसाला देखकर पानी भर आया था. उसने भी अपने पैसे कमाए और चलता बना.

‘भाई साहब! जरा रास्ता दीजिए.’ एक महिला बाथरूम जाने के लिए रास्ता मांग रही थी. वह व्यक्ति आखिरी बर्थ के पास बीच में खड़ा था. जब भी कोई बाथरूम जाता, सबसे ज्यादा तकलीफ उसे ही होती थी.

उसने अजीब नजरों से उस महिला को देखा. वह स्कूल मास्टरनी सी लग रही थी. व्यक्ति ने सोचा, ‘इस गर्मी में भी...?’ महिला की आंखों ने कहा, ‘क्या करूं?’ और रास्ता बन गया.

अचानक एक झटके के साथ ट्रेन रुक गयी. कुछ हलचल सी हुई. लोगों ने एक दूसरे की तरफ ‘क्या हुआ’ के भाव से देखा. लोगों आपस में बातें कर रहे थे-

‘अरे यह तो जंगल है.’

‘घनघोर जंगल है.’

‘यहां कैसे रुक गयी?’

‘जरूर चोर-लुटेरे होंगे.’

घबराहट फैल गयी पूरी ट्रेन में. हर कोई अपने इष्ट को याद करने लगा. सबसे ज्यादा बेचैनी भीतर खड़े लोगों को हो रही थी, जबकि उनके पास खाने-जैसा कुछ नहीं था. सभी नौकरी के लिए शहर जा रहे थे.

तभी बहुत-सी महिलाएं ट्रेन के हरेक डिब्बे के अंदर

धड़ाधड़ घुस आयीं. बाहर खड़े कुछ पुरुषों के हाथों में सब्जी के बोरे और टोकरियां थीं. दरवाजों से ये बोरे और टोकरियां धड़ाधड़ अंदर फेंकी जाने लगीं. उन्हें चिंता नहीं थी कि सब्जियों के बोरे और टोकरियां कहां, किसके ऊपर गिर रही थीं.

सभी यात्री संभल कर खड़े हो गये थे. कुछ सामान को बाथरूम तक पहुंचाने में मदद कर रहे थे. बाथरूम के सामने की जगह भर गयी थी. वे महिलायें बाथरूम के अंदर भी कुछ सामान लेकर जमा चुकी थीं. इसके बाद सीटों के नीचे सामान रखा जाने लगा. कई लोग चिल्ला रहे थे, मना कर रहे थे, पर किसी की न चली. बोरियों के धक्कों ने सभी को पस्त कर दिया था. भूकंप की तरह आया जलजला कुछ ही देर में शांत हो गया और ट्रेन यंत्रवत चल पड़ी. इस बीच न तो कोई टी.टी. आया, न गार्ड और न जी.आर.पी. कोई सुध लेने वाला नहीं था.

ट्रेन चलने से राहत मिली. मि. सभ्य ऊपर की बर्थ से नीचे की बर्थ पर आ गये थे. उनकी नाक पर रूमाल था. यात्री महिलाओं के चेहरों पर घृणा के भाव थे.

आखिर एक महिला ने अपनी घृणा का राज खोला, ‘बाथरूम में सब्जियां रखी हैं. वह 62 नं. वाली महिला आधे रास्ते से वापस आ गयी. बंद है, बंद है, की आवाजें नहीं सुनी तुमने?’ और उस महिला को उबकाई महसूस हुई. मुंह में आये थूक को वह खिड़की के पास जाकर थूक आई. पास खड़ी एक सब्जीवाली ने उसे घूरकर देखा, पर बोली कुछ नहीं.

‘इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारे पैसों का मोल हमें ही नहीं मिलता. कोई बेवकूफ होगा जो इस बोगी को देखकर रिजर्वड बोगी कहेगा. गल्ती से मालगाड़ी का डिब्बा यात्री गाड़ी में लगा दिया गया है. सरकार जनता को बेवकूफ बनाकर पैसा वसूल करती है.’ मि. सभ्य ने अपने बायीं हथेली पर दायें हाथ का मुक्का मारकर क्रोध प्रकट किया. भीड़ से किसी की प्रतिक्रिया नहीं आई. उन्होंने पुनः कहा-

‘भेड़ बकरियों की तरह भर दिया है लोगों को. कुछ कमी थी तो घास-फूस भी रखवा दिया. हद हो गई है. ऐसे दमघोंटू वातावरण में कोई मर न जाए. सामान ही ले जाना है तो पार्सल करो, पार्सल बोगी में रखवाओ, परन्तु कहां है नियम बनाने वाले और उनका पालन करने वाले. इस मालगाड़ी की भेड़ बकरियां और उनका चारा तो हटवाओ. उफ! ये बदबू, पसीना, बंद हवा! हे भगवान मुझे बचा लेना. यूं जानवरों की तरह मरने न देना.’ उनकी पुकार सुनने भगवान तो नहीं आए, परन्तु पास खड़ी महिला उनके पास पहुंच गयी और मि. सभ्य का दर्शन पकड़कर शुरू हो गयी-

‘दो पैसा कमाकर इंसानों को जानवर समझने वाले बाबू, पैंट-शर्ट नहीं पहनता जानवर, परन्तु अपने भाई-बन्धुओं को पहचानता है. उनके दुख-दर्द को समझता है. जानवर दूसरों के लिए भले कुछ न कर पाये, परन्तु परेशानी पैदा नहीं करता. शांत ही रहता है. हम सब्जी वाले न तो सवारी का सामान चोरी करते हैं, न ही किसी को परेशान करते हैं. हम तो खुद कहते हैं कि सरकार हम सब्जीवालों के लिए ट्रेन चलाये, पर कहां चलाती है सरकार. रोज थाली में हरी सब्जी चाहिये, परन्तु करेंगे कुछ नहीं. बाबू, हम रोज धक्का खाते हैं, गाली खाते हैं, परेशान होकर ट्रेन में जाते हैं, क्या हमें अच्छा लगता है? इतनी मेहनत और जिल्लत के बाद क्या है हमारे पास? यही फटी साड़ी है, जो सब्जी बेचते वक्त भी पहनते हैं और किसी के शादी-ब्याह में भी पहनते हैं. हमारे बच्चे हमारी इतनी मेहनत के बाद भी सरकारी स्कूल में ही पढ़ते हैं. वो भी पांच-सात क्लास के बाद छोड़ देते हैं, क्योंकि कक्षा से ज्यादा जरूरी है रोटी. कितने ही लोग हम पर बुरी नजर डालते हैं, छेड़खानी करते हैं. कभी इधर, कभी उधर छूते हैं और हम गाली देकर, हंसकर, लड़कर टाल देते हैं. हमारा मतलब बस आप लोगों तक सब्जी पहुंचाना होता है.’

मि. सभ्य आंखें फाड़कर चुपचाप सुन रहे थे. इस बार न तो उन्होंने अखबार में मुंह छिपाया, न खिसियाए. ध्यानपूर्वक उस सब्जीवाली की बात सुन रहे थे.

‘और बाबू साहब! हम लोग अगर ऐसे सब्जी ले जाते हैं तो ही आप लोग खा पाते हैं. आपको तो अपनी सीट से प्रेम है, परन्तु क्या पूरी की पूरी बोगी ही रिजर्व करवा ली है. जो मुफ्त का है, उसके लिये भी आपके पेट में दर्द होता है.....’ कुछ पल रुककर.....

‘और हमें देखो, इतनी परेशानियों के बावजूद अपना ये काम नहीं छोड़ते हैं. मैं आपको एक चीज बता दूं, जो आपने नहीं सोची है. आप यह नहीं जानते, अगर हम ट्रेन से सब्जी लेकर जाते हैं, तो ताजी हरी सब्जी आपकी थाली तक सस्ते दामों में पहुंचती है. ट्रक से ले जाने में उसकी कीमत बढ़ जाती है. मंडी से दुकान तक आते-आते उसकी कीमत दस गुना बढ़ जाती है, परन्तु हम सस्ते दामों में बेचकर शाम को गांव लौट आते हैं. आपको हमारा त्याग नहीं दिखता. पेट भर अनाज के लिए दुनिया भर की जिल्लत झेलते हैं और इसके बाद भी ट्रेन ड्राइवर, गार्ड, जीआरपी, स्टेशन मास्टर सभी को पैसा देते हैं, उनको पालते हैं. है कि नहीं बाबू ये संतगिरी?

शायद दूर कहीं पानी गिरा था. लगा कि ठसाठस भरी ट्रेन में भी ठण्डी हवा के झोंके इतरा गये थे.

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संपर्क : सन्मति इलेक्ट्रीकल्स, सन्मति गली,

दुर्गा चौक के पास, जगदलपुर,

जिला-बस्तर-494001 (छत्तीसगढ़)

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