समीक्षा // हास्य-व्यंग्य की रोचक कृति : ‘कट्टा निकाल के’ // आचार्य भगवत दुबे : प्राची – जनवरी 2018

साहित्यिक पत्रिका ‘अभिनव प्रयास’ के यशस्वी संपादक श्री अशोक ‘अंजुम’ जी बहुमुखी प्रतिभा संपन्न रचनाकार हैं. गीत, नवगीत, बालगीत, गजल, दोहे आदि विधाओं के आप सुचर्चित सशक्त हस्ताक्षर हैं. अनेक पाठ्यक्रमों में आपकी रचनाएं सम्मिलित की जा चुकी हैं. आपकी गजलों पर शोधकार्य हो रहा है. अनेक शोधार्थियों ने अपने शोधग्रंथों में आपके सारस्वत अवदान का प्रमुखता से उल्लेख किया है. आपकी रचनाओं का विविध भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. अनेक टी.वी. चैनलों पर आपका काव्यपाठ होता रहता है. अब तक आपकी विभिन्न काव्य-विधाओं की सत्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. कवि सम्मेलनों के आप कुशल संचालक एवं चहेते कवि हैं.

आपके सारस्वत अवदान का आकलन करते हुए देश की प्रतिष्ठित संस्था ‘कादम्बरी’ ने आपको ग्यारह हजार रुपये सम्मान राशि सहित ‘हिन्दी विभूति’ अलंकरण प्रदान किया है. यूं तो आपको सैकड़ों सम्मान प्राप्त हो चुके हैं, किंतु 2018 का एक लाख एक हजार रुपये का ‘नीरज सम्मान’ विशेष उल्लेखनीय है. एक ओर जहां आप अपनी गंभीर छान्दस रचनाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं तो दूसरी ओर हास्य-व्यंग्य के भी आप चर्चित रचनाकार हैं.

भानुमती का पिटारा, खुल्लम खुल्ला, दुग्गी-चौके, छक्के, जाल के अंदर जाल मियां एवं क्या करें कन्ट्रोल नहीं होता आदि हास्य-व्यंग्य की आपके द्वारा सृजित कृतियां पहले ही प्रकाशित एवं प्रशंसित हो चुकी हैं. प्रस्तुत समीक्ष्य कृति ‘कट्टा निकाल के’ अंजुम जी के प्रकाशन क्रम की सत्रहवीं एवं हास्य-व्यंग्य की छठवीं कृति है.

यूं तो प्रारंभ में व्यंग्य को, हिन्दी साहित्य की विधा के रूप में स्वीकार करने में विद्वान आलोचक आनाकानी करते रहे हैं किंतु श्री हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, लतीफ घोंघी, श्रीलाल शुक्ल, के.पी. सक्सेना, मूलाराम जोशी, प्रेम जनमेजय, ज्ञान चतुर्वेदी, डॉ. श्रीराम ठाकुर दादा, ध्रुत तांती जैसे प्रखर प्रतापी व्यंग्यकारों की दमदार रचनाओं ने व्यंग्य विधा में अपना लोहा मनवा ही लिया है.

हिन्दी साहित्य में अभी साठ-सत्तर वर्ष पूर्व से ही व्यंग्य विधा प्रारंभ हुई है, जबकि संस्कृत साहित्य में भवभूति द्वारा रचित उनके ग्रन्थों में व्यंग्य का प्रयोग देखने को मिलता है. संस्कृत के अनेक नाटकों अथवा काव्य-ग्रन्थों में मुदगल या अन्य नाम के पेटू विदूषक पात्र पाये जाते हैं जो नायक के मुंह लगे मित्र होते हैं. जो नायक का मनोरंजन तो करते ही हैं अपितु अपना उपहास करवाकर भी संकट के समय राजा या नायक को उचित परामर्श देकर उनका मार्गदर्शन भी करते हैं. क्योंकि व्यंग्य अप्रिय, अपितु हितकारी हुआ करता है. यह शुगर कोटेड कड़वी गोली के समान पथ्यकार होता है.

आज सर्वत्र भ्रष्टाचार, बेईमानी, कालाबाजारी, मिलावटखोरी, जमाखोरी, गरीबी, बेरोजगारी, रिश्वतखोरी एवं आतंक का माहौल है. बात-बात में छुरे-चाकू चल जाते हैं. गुण्डे चाहे जहां कट्टा अड़ा देते हैं. इसी अराजक स्थिति की ओर इंगित करता श्री अशोक ‘अंजुम’ की हास्य-व्यंग्य कृति का शीर्षक है ‘कट्टा निकाल के’ इसी शीर्षक की पहली ही गजल में अंजुम जी लिखते हैं-

बादाम खा रहा है वो कट्टा निकाल के

सबको डरा रहा है कट्टा निकाल के


संविधान के रखवाले संसद में कैसी-कैसी ओछी हरकतें करते हैं कि इनके कारनामों से लज्जा का अनुभव होता है. श्री अंजुम लिखते हैं-

किन बन्दरों के हाथ में है संविधान उफ्फ!

डर है यही कि ये इसे रख न दें फाड़ के


आज नेताओं में छिछोरापन उनकी योग्यता समझी जाने लगी है अतः कवि व्यंजक शैली में कहता है-

तू विरोधियों को गाली दे!

गंदी से गंदी वाली दे!

हर पल कुछ घात निराली दे!

फिर दांत फाड़ दे ताली दे!

फिर गा मेरा भारत महान

क्या राष्ट्रधर्म?, क्या संविधान?


मिलावटखोरी, जमाखोरी, रिश्वतखोरी, लूट-खसोट एवं भ्रष्टाचार करने वालों को सम्बोधित करते हुए कवि अंजुम कहते हैं-

करो मिलावट, रिश्वत खाओ

हथकंडों से सब कुछ पाओ

दो नम्बर का जो कुछ आये

कुछ हिस्सा ऊपर पहुंचाओ

किसकी हिम्मत तुमको टोके?

हुई व्यवस्था ढिल्लम ढुल्ला!

लोकतंत्र में डर काहे का

करो तमाशे खुल्लम खुल्ला!!


जब भी कोई त्योहार आता है, प्रशासन एवं पुलिस की नाक में दम हो जाता है, क्योंकि दारूखोरी के उन्माद में बिना लड़ाई-झगड़े के कोई त्योहार बीतता ही नहीं है. फिर होली तो मानो हुड़दंग का ही त्योहार बन गया है. इसी अराजक स्थिति की ओर इंगित करते हुए कवि अंजुम कहते हैं-

अगर झगड़े नहीं फिर कैसे होली?

अगर लफड़े नहीं फिर कैसी होली?

जो घर में भाइयों ने, भाइयों के-

गले पकड़े नहीं फिर कैसी होली?


दारूखोरों को संबोधित करते हुए आप ब्याज निन्दा और ब्याज स्तुति के माध्यम से अपने कथन को धारदार बनाते हुए कहते हैं-

दारू पी भई दारू पी! फिर कर तू हा-हा ही-ही!!

दारू पी भई दारू पी.

चोरी कर या डाका डाल, जुटा मगर दारू को माल.

पीकर फिर सड़कों पर झूम, औंधे मुंह नाली को चूम.

श्वान करें तुझ पर छी-छी!!

दारू पी भई दारू पी.


स्व. मैथिलीशरण गुप्त की एक चर्चित एवं प्रेरक रचना है ‘नर हो न निराश करो मन को’ की पैरोडी बनाते हुए अंजुम ने पतियों को सम्बोधित करते हुए पूरी तरह हास्य प्रधान प्रस्तुति दी है-

पति हो न निराश करो हमको.

कुछ काम करो, कुछ काम करो

अब ज्यादा न आराम करो!

नखरे ज्यादा दिखलाओ मत,

हम से बेलन उठवाओ मत,

अरे कुछ तो याद करो यम को!

पति हो न निराश करो हमको!


कवि श्री अशोक ‘अंजुम’ ने व्यवस्था की विद्रूपताओं पर अपने रसीले, चुटीले एवं नुकीले व्यंग्य बाण छोड़े हैं. आप बड़े मंचीय कवि भी हैं, अतः उन्हें मंच पर जमने के लटके-झटके आते हैं. प्रस्तुत समीक्ष्य कृति में अंजुम के बहुदेशीय एवं बहुउद्देशीय लेखन के प्रमाण हमें प्राप्त होते हैं.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कृति ‘कट्टा निकाल के’ हास्य-व्यंग्य की रोचक कृति है जिसे कवि सम्मेलन के श्रोता एवं पाठक अधिक पसंद करेंगे.

सतत सृजनसन्नध्द ऊर्जावान कवि को मेरा हार्दिक आशीर्वाद.

कृति : ‘कट्टा निकाल के’

कवि : अशोक ‘अंजुम’

प्रकाशक : संवेदना प्रकाशन

नगला डालचन्द, चन्द्रविहार कॉलोनी, अलीगढ़ (उ.प्र.)

मूल्य : 150/-

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समीक्षक का पता : महामंत्री ‘कादम्बरी’

पिसनहारी मढ़िया के पास

जबलपुर- 482003 (म.प्र.)

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