डॉ. केदारनाथ सिंह की रचना-प्रक्रिया // डॉ. मधुर नज्मी : प्राची – जनवरी 2018

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मकालीन काव्य-परिदृश्य के प्रमुख हस्ताक्षर डॉ. केदारनाथ सिंह अपने मूल संवेदनात्मक भाव में एक श्रेष्ठ गीतकार की हैसियत रखते हैं. कविता में उनकी यह ‘हैसियत’ उनकी गीतात्मक तात्त्चिकता के चलते हैं. यही ‘गीतात्मक तात्त्विकता’ डॉ. केदारनाथ सिंह को एक बड़ा कवि बनाती है. कोई भी काव्य-विधा ‘गीतात्मक तात्त्विकता’ को नकारकर, नजरअंदाज करके बड़ी कविता नहीं हो सकती. समूचे साहित्यिक परिदृश्य को दृष्टि में रखकर, यह बात बैलेंस, अदब से कही जा सकती है. डॉ. केदारनाथ सिंह की कविता के प्रतिनिधि समालोचक डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव का यह मानना, "केदारनाथ सिंह शायद हिन्दी काव्य-परिदृश्य में अकेले ऐसे कवि हैं जो एक ही साथ गांव के भी कवि हैं और शहर के भी. अनुभव के ये दोनों छोर कई बार उनकी कविता में एक ही साथ और एक ही समय दिखाई पड़ते हैं. शायद भारतीय अनुभव की यह अपनी एक विशेष बनावट है, जिसे नकार कर सच्ची भारतीय कविता नहीं लिखी जा सकती."

डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव ने डॉ. केदारनाथ सिंह की कविता की तात्त्विकता को कहां तक पहचाना है, यह एक अलहदा सवाल हो सकता है किंतु जहां-जहां डॉ. केदारनाथ सिंह का ग्राम्य-संवेदना, लोक-संवेदना, गीतात्मक संवेदना से, अपनी कविता में जुड़ाव संभव हुआ है, वहां-वहां डॉ. केदारनाथ सिंह अपनी कविता में भरपूर बुलन्द नजर आते हैं. जहां-जहां उनकी कविता में ग्राम्य परिवेश का दामन छूटा है, वहां-वहां उसी अनुपात में कविता पस्त नजर आती है. डॉ. केदारनाथ सिंह बुलन्दी और मस्ती के बेजोड़ कवि हैं. उनकी कविता में समुद्र सी ऊंचाई और हिमालय-सी गहराई का एहसास कविता के मर्मी, सरोकारी एक साथ करते हैं. इसे तरह भी कहा जा सकता है कि ग्राम्य-बोधी संचेतना-संवेदना से हट-कट कर डॉ. केदारनाथ सिंह एक बिखरे और बिफरे कवि लगते हैं. गीत और गीतात्मक संवेदना, ग्राम और ग्रामबोधी संवेदना के परे कविता का कोई अस्तित्व भी होता है, यह एक जिन्दा सवाल है जो बेमानी नहीं है.

स्व. केदारनाथ अग्रवाल और डॉ. केदारनाथ सिंह की कविता अपनी लोकोन्मुखता की बदौलत ही पहचान पा सकी है. केदारनाथ सिंह ने अपनी गीतात्मक तात्त्विकता के नाते ही एक विशिष्ट पहचान बना ली है. यह ‘पहचान’ सिर्फ लोकरंगता और लोक संवेदना से होकर गुजरती है. प्रगतिशील शिविरबद्धता ने केदारनाथ सिंह के कवि को आहत किया है. हां, इतना जरूर हुआ है कि प्रगतिशील शिविर-खेमा ने केदारनाथ सिंह को कंधे पर बैठाकर खूब उछाला है. जिसके वे सही मानी में हकदार हैं. उर्दू की प्रगतिशील कविता के प्रमुख नाम अली सरदार जाफरी, गुलाम रब्बानी ताँबा, कैफी आजमी, साहिर लुधियानवी, जां-निसार ‘अख्तर’ हैं. इनमें से सिर्फ साहिर लुधियानवी, जां-निसार अख्तर ही दो ऐसे शायर हैं जिनकी शाइरी में बाह्य और अन्तः सौन्दर्य है. चाहे अली सरदार जाफरी हों, गुलाम रब्बानी ताबां हों, कैफी आजमी हों, इनकी गजलें और नज्में अन्तः सौन्दर्य के सवाल पर एक चुप्पी भर हैं.

यदि प्रगतिशील शिविर के सांचे और खांचे में रखकर विचार किया जाय तो डॉ. केदारनाथ सिंह, केदारनाथ अग्रवाल ही दो ऐसे प्रगतिशील अति हैं जिनके वहां बाह्य सौन्दर्य के साथ-साथ अन्तः सौन्दर्य की पर्याप्त समन्विति है. नागार्जुन, त्रिलोचन शास्त्री, मलखान सिंह सिसोदिया आदि की कविताएं अपने बाह्य कलेवर के नाते दूर तक साहित्य के सरोकारी को नहीं बांध पाती हैं. राजनीतिक कूटनीति इनकी कविताओं में आकर सिर्फ नारेबाजी तक ही महदूद रह जाती हैं. अपनी कथन-भंगिमा के चलते प्रभावित तो ये तीनों ही कवि करते हैं किंतु इनकी कविताएं पाठक को पकड़कर छोड़ देती हैं. किंतु डॉ. केदारनाथ सिंह और केदारनाथ अग्रवाल की रचना-प्रक्रिया के साथ पूर्णरूपेण ऐसा नहीं है. प्रगतिशील शिविरबद्धता के नाते केदारनाथ सिंह को लोकप्रियता तो जरूर मिल गयी किन्तु प्रगतिशीलता की बलिवेदी पर एक ‘श्रेष्ठ गीतकार’ का उत्सर्ग हो गया. संभवतः अपनी कामयाबी के रहस्य को डॉ. केदारनाथ सिंह खुद भी नहीं समझ पाये हैं.

गीतकार सम्बोधन भी उन्हें रुचता है. गीत के खिलाफ खड्ग-हस्त होते उन्हें कई-कई सेमिनारों-गोष्ठियों में देखा-महसूस किया गया है. गीत के संदर्भ में उनकी बयानबाजी कम सांघातिक नहीं है. जिस ‘गीत की जमीन’ ने उन्हें क्या कुछ नहीं दिया, क्या कुछ नहीं दे रही है, उसी की मुखालिफत कविता के सरोकारियों को दर्द देती है. शिविरबद्धता-खेमेबाजी के चलते डॉ. केदारनाथ सिंह जैसा भी गीत के लिए कहें किन्तु सच्चाई यह है कि गीत सिर्फ गीत, गांव सिर्फ गांव ने उन्हें युगीन पहचान दी है. डॉ. नामवर सिंह, डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव, मैनेजर पाण्डेय, डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल, डॉ. काशीनाथ सिंह जैसे अनेकशः आलोचक केदारनाथ सिंह की कविता पर तो खुलकर बोलते हैं. जब नये रचनाकारों की काव्य-शिल्पना का जिक्र आता है तो मारक खामोशी अख्तियार कर लेते हैं.

हमारे कुछ नये रचनाकारों ने केदारनाथ सिंह से ‘सरपासिंग’ रचा है. आखिर ये लोग नये रचनाकारों के अवदान को नकार कर, जिक्र न कर चाहते क्या हैं? किसी भी रचनाकार की रचना समग्रता में श्रेष्ठ होती ही नहीं. केदारनाथ सिंह ने अपनी अधिसंख्य कविताओं में कचरा ही परोसा है, किन्तु ये सदाशयी समीक्षक समग्रता में केदारनाथ सिंह को प्रशस्ति के पानी से नहला रहे हैं. ईश्वर करे इनकी आंख का मोतियाबिंद कटे और कलम से पाजामें में डोरी डालने की प्रथा का पराभव हो और सच्ची कविता चाहे जहां हो मंजरे-आम पर आये.

प्रगतिशील और जनवादी समीक्षा में भाई-भतीजावाद, समधीवाद का प्रकोप ज्यादा लगता है. इस प्रक्रिया में हमारे उत्साही सच्चे रचनाकारों की रचना-प्रक्रिया पर नश्तर-सा चल जाता है. समीक्षा की आज मानक कसौटियां सोना कम, तांबा ज्यादा परोस रही हैं.

हमारे प्रगतिशील-जनधर्मी समीक्षकों को समूचे कविता परिदृश्य को ध्यान में रखकर समीक्षाएं करनी चाहिये. जिन नये समकालीन रचनाकारों ने कविता में नया शैल्पिक मोड़ दिया है उनके श्रम का भी मूल्यांकन होना चाहिये. यदि नये रचनाकारों की कविता के प्रति हमारे समीक्षकों का रवैया स्वीकार्य नहीं है तो उन्हें उनका मुखापेक्षी भी नहीं होना चाहिये. साधुक रचनाकारों को खुद राह बना लेने की हिम्मत जुटानी होगी.

‘केदारनाथ सिंह प्रतिनिधि कवितायें’ संज्ञक काव्यकृति में संपादक डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव अपनी संपादकीय में कहते हैं, "केदार कविता यात्रा के हर प्रथान बिंदु पर कोई कठिन चट्टान तोड़ते हैं जो सुन्दर हो जाती है, कोई और कठिन चट्टान तोड़ते हैं जो और सुन्दर होती चली जाती है. ऊर्जा और कला का यह सार्थक संगठन केदार की एक खासियत है जिसे पाठक अलग से पहचान सकते हैं." दोस्त के नाते डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव और साथी के नाते डॉ. नामवर सिंह डॉ. केदारनाथ सिंह के ‘चट्टान तोड़ने’ जैसे दर्द को तो महसूस करते हैं, किन्तु जिन्होंने कविता का पहाड़ काटा है, उनके श्रम का क्या इन्होंने कभी मूल्यांकन किया. मूल्यांकन तो छोड़िये उनका नाम लेना तक उन्होंने अपराध माना है. लोक-संवेदना, गांव-गंवई की मर्मस्पर्शी अनुभूतियों ने केदारनाथ सिंह को बड़ा कवि बनाया है, शहरी परिवेश ने उन्हें जोड़-गांठ करने वाले एक समीक्षक का रूप दिया है.

डॉ. केदारनाथ सिंह का समीक्षक एक विश्वविद्यालीय अध्यापक मात्र है. कविता सर्जना है और समीक्षा उप-सर्जना- कविता न हो तो समीक्षा सिर्फ चिमटे से अंगारा छूने की प्रक्रिया मात्र है. साहित्य के सरोकारियों को डॉ. केदारनाथ सिंह का दर्द इन शब्दों में सृजनाकृति पाता है, "इतने बड़े शहर में/रहता है एक कवि/वह रहता है जैसे कुएं में रहती है चुप्पी/जैसे चुप्पी में रहते हैं शब्द/जैसे शब्द में रहते हैं डैनों की फड़फड़ाहट/वह रहता है इस इतने बड़े शहर में/और कभी कुछ नहीं कहता."

महानगरीय कवि की व्यथा का यह एक नमूना है जिसे केदारनाथ सिंह आत्मिक स्तर पर अनुभूत करते हैं. शहर की दुनिया अपनी विराटता में बौनी होती है. ‘शब्द’ शीर्षक कविता में डॉ. केदारनाथ सिंह कहते हैं, "ठण्ड से नहीं मरते शब्द/वे मर जाते हैं साहस की कमी से/कई बार मौसम की नमी से/मर जाते हैं शब्द.’’ "मुझे एक बार खूब लाल पक्षी जैसा शब्द/मिल गया था गांव के कछार में/मैं उसे ले आया घर/पर ज्यों ही पहुंचा वह चौखट के पास/उसने मुझे कए बार एक अजब-सी कातर दृष्टि से देखा/और तोड़ दिया दम/." (गांव के कछार का मोह)गांव की संवेदना जब तक केदारनाथ सिंह में रहेगी वे बड़े कवि बने रहें.

‘मांझी का पुल’, ‘रास्ता’, ‘मैंने गंगा को देखा’, ‘नदी’, ‘बिना नाम की नदी’, ‘नीम’, ‘बोझे’, ‘दाने’, ‘आवाज’, ‘पानी में घिरे हुए लोग’, ‘बुनाई का गीत’, ‘जब वर्षा शुरू होती है’ आदि कविताओं में लोक-संवेदना, गीतात्मक तात्त्विकता, शरीरी कम आध्यात्मिक रूमानी तात्त्विकता अपने पूरे फार्म में रंगिमा बुनती है. ‘शब्द’ की गुणवत्ता पर विचार करते हुए डॉ. केदारनाथ सिंह ने कहा है, "शब्द मेरे लिए पदार्थ हैं. शब्दों के इसी पदार्थमयता को मैं कविता में खोजता हूं. शब्द जो कहता है वह एक ठोस चीज है और वह ठोस चीज किस तरह से शब्द के ज्यादा से ज्यादा करीब लाई जा सके कविता में यही मेरी कोशिश रही है.....आज की पूरी कविता के लिए शब्द सिर्फ शब्दकोश का ‘शब्द’ नहीं वो भाषा वाचक नहीं, स्वयं पदार्थ है. इसी पदार्थमयता को पकड़ने की कोशिश मेरी कवितायें हैं."

अपनी कविता में जिस पदार्थमयता का जिक्र डॉ. केदारनाथ सिंह करते हैं, वह उनकी गीतात्मकता और रूमानी लहजा है. जिस रूमान की ‘गीतात्मकता’ हमारे प्रगतिशील समीक्षक वैचारिक स्तर पर खारिज करते हैं, वही डॉ. केदारनाथ सिंह की कविता की मूल जमीन है. लट्ठमार भाषा कविता की भाषा हो ही नहीं सकती. अपनी सरल, तरल और मर्मस्पर्शी भाषा की बदौलत डॉ. केदारनाथ सिंह की कवि सत्ता है. एक मधुरिम शब्द अपनी सत्ता में गीतिम रसवत्ता लिए होता है. एक रसगर शब्द एक पूरा गीत होता है. ‘पदार्थमयता’ शब्द का कैनवस नितान्त छोटा है. दरअसल कविता के भाव जो एक कवि की संकल्पना में उगते हैं वे नितान्त लघु रूप में होते हैं. कवि उन्हें खींचतान कर नाहक लम्बा करता है. कविता लम्बी होते ही अपनी संप्रेषणीयता में चुक जाती है.

अपनी दुरूहता, गद्यात्मकता, अतिवादिता के कारण अज्ञेय के जीवन काल ही में ‘नयी कविता’ अपना दम तोड़ती नजर आ रही थी. लम्बी कविता को आक्टोपसी विचारधारा ने प्रेत की तरह कब्जा कर लिया था किन्तु ग्राम-संवेदना, लोक-संवेदना और गीतात्मक आभा से मंडित-समन्वित रचनाकारों ने समकालीन हिन्दी कविता के रूप में ‘नयी कविता’ को पुनर्जीवित किया. इन रचनाकारों की रचनाओं में बकौल डॉ. वेद प्रकाश ‘अमिताभ’ प्रकृति राग का बाहुल्य है. डॉ. रघुवीर सहाय मानते हैं, "किसी भी तरह की कविता में संगीत होता है. आधुनिक कविता में भी संगीत है. वे लोग जो दावा करते हैं कि आधुनिक कविता में संगीत नहीं है, न संगीत जानते हैं न कविता. बिना संगीत के कविता हो ही नहीं सकती. संगीत उसका एक अनिवार्य अंग है." जिस सांगीतिक आधार का जिक्र रघुवीर सहाय कविता के लिए करते हैं, वह गीत की कोख में जन्मा है. गीत से परे संगीत की कोई स्थिति नहीं होती.

गीत-संगीत की शक्ति को स्वीकारते तो सभी हैं, किन्तु सेमिनारों, साहित्यिक संगोष्ठियों और दूरदर्शन के सदाशयी अवसरों पर ‘गीत-गजल’ नाम आते ही खड्ग-हस्त हो जाते हैं. डॉ. केदारनाथ सिंह के वक्तव्यों के अनेक उदाहरण हैं. चाहे जिन वैदेशिक मानदण्डों को मीटर मानकर डॉ. केदारनाथ सिंह की कविता-धर्मिता को रेखांकित-रूपांकित किया जाय, हमारे प्रगतिशील समीक्षक चाहे जो जो हथियार कविता के लिए अख्तियार करें, किन्तु गीति-तत्व और लोकोन्मुखता ही केदारनाथ सिंह की कविता का, कामयाबी का राज है. ‘महानगर में कवि’ शीर्षक कविता का उदाहरण पहले आया है. अब डॉ. केदारनाथ सिंह की एक और कविता का उदाहरण बतौर नमूना प्रस्तुत है-

"दिल्ली में रहता हूं और दिल्ली में भी/अपने तरीके से गांव बसा लेता हूं/यह मुश्किल काम है/जो मुझे जिन्दा रहने के लिए/करना पड़ता है. गांव में यकीनन ग्रामवासी हूं/गांव के अनुभव दिल्ली ने मेरे भीतर नये सिरे से जगाये हैं/मुमकिन है दिल्ली में न होता तो कविता में इस तरह गांव भी न होता..... तो यह वास्तविकता है कि हमारे जीवन की जड़ें अधिकतर गांव में हैं."

‘नीम’ और ‘नदी’ शीर्षक दोनों ही कविताओं का परिवेश कविता में बोलता-बतियाता लगता है, "खेत जग पड़े थे/पत्तों से फूट रही थी/चैत के शुरू की हल्की-हल्की लाली/सोचा मौसम बढ़िया है/चलो तोड़ लायें नीम के दो-चार हरे-हरे छरके."

"अगर धीरे चलो/वह तुम्हें छू लेगी/दौड़ो तो छूट जायेगी नदी/अगर ले लो साथ/वह चलती चली जायेगी कहीं भी."

अपनी कविता के कलेवर में केदारनाथ सिंह कालजयी कवि होने का मर्तबा रखते हैं.

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सम्पर्कः

‘काव्यमुखी साहित्य अकादमी’, हफीज कॉलोनी, आदर्श नगर, गोहना-मोहम्मदाबाद, जिला-मऊ (उ.प्र.)

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