लघुकथा // मुआवजा // राकेश भ्रमर : प्राची – जनवरी 2018

इस बार बेमौसम की बरसात और ओलों की मार ने रबी की फसल को चौपट कर दिया था. छोटे-बड़े सभी किसान दुःखी और परेशान थे. सरकार ने मुआवजे की घोषणा की थी, परन्तु गरीब किसान खुश नहीं थे. पहले भी इस तरह के मुआवजे की घोषणाएं हुई थीं, परन्तु किसी को मुआवजा नहीं मिला था. इस बार भी ऐसा ही होगा.

बर्बाद फसलों का मुआयना करने के लिए गांव में लेखपाल के साथ कुछ अधिकारी आए थे. बद्री की पांच बीघे की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गयी थी. लेखपाल ने सूची में उसका नाम भी लिख लिया था, परन्तु जब मुआवजा आया तो उसका नाम कहीं नहीं था, बल्कि कुछ ऐसे लोगों के नाम थे, जिनकी खेती को बहुत कम नुकसान हुआ था.

‘परधानजी!’ उसने सकुचाते हुए ग्राम प्रधान से पूछा, ‘मेरा मुआवजा नहीं आया?’ उसने इस बार बेटी की शादी तय कर रखी थी.

‘बद्री! मुआवजा उनको मिलता है, जो सरकार को वोट देते हैं. याद है, पिछली बार तुमने सरकार को वोट नहीं दिया था.’

बद्री की समझ में कुछ नहीं आया. फिर भी पूछा, ‘नहीं परधानजी! मैंने तो सरकार को वोट दिया था.’

‘दिया होगा, परन्तु तुमने मुझे वोट नहीं दिया था.’ प्रधानजी ने कुटिलता से मुस्कराते हुए कहा.

बद्री की समझ में सबकुछ आ गया. पिछले प्रधानी के चुनाव में उसने प्रधान के प्रतिद्वंद्वी को वोट दिया था और वह हार गया था.

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