समीक्षा // ‘नई मधुशाला’ से छलकती विचार और भाव की मार्मिक ‘हाला’ // अशोक ‘अंजुम’ : प्राची – जनवरी 2018

च्चन जी ने जब अपनी ‘मधुशाला’ से भाव और विचारों की ‘हाला’ छलकायी तो पीने वाले मदहोश हो गए. ऐसी ‘हाला’ कि जितना चखो, नशा और... और बढ़े... बढ़ता ही जाए. तब बच्चन जी की जमीन को लेकर तमाम कवियों ने अपनी ‘मधुशाला’ रच दी. यह अलग बात है कि बच्चन जी की वह जमीन भी उमर खय्याम से ‘ईंट-गारा’ लिए हुए थी किंतु ‘नक्शा’ अपना था, उसकी ‘भव्यता’ और कथ्यगत ऊंचाइयां मौलिक थीं...अनछुई!

‘नई मधुशाला’ के सर्जक श्री सुनील बाजपेई ‘सरल’ जी की ‘नई मधुशाला’ भी इस मायने में वाकई नयी है. अपने उपनाम ‘सरल’ के अनुरूप जीवन-जगत के तमाम दृश्यों को सरलता से ‘हाला’, ‘प्याला’, ‘मधुशाला’ के रूपक में बांधकर श्री सरल जी ने पाठकों के समक्ष परोसा है. इस सर्जन के लिए आप भूमिका में ‘पढ़ने वालों’ का विशेष आभार भी व्यक्त करते हुए कहते हैं-

कोई उसको पढ़े इसलिए

लिखता है लिखने वाला.

लिखना होगा व्यर्थ पूर्णतः

मिले न यदि पढ़ने वाला.

उत्साह बढ़ाते रहे आप,

पढ़कर मेरी रचनाएं.

शुभाशीष आपका पाकर,

लिख पाया मैं मधुशाला.


‘नई मधुशाला’ की प्रस्तावना उद्भट विद्वान, लोकप्रिय कवि डॉक्टर अशोक चक्रधर ने लिखी है और खूब डूबकर मन से लिखी है. वे कहते हैं- ‘नई मधुशाला’ के पाठकवृंद, यहां आपने बच्चन के माध्यम से यह जाना होगा कि प्रतीक कुल मिलाकर तीन हैं- एक हाला, एक प्याला, एक मधुशाला. इन्हीं तीन प्रतीकों में सृष्टि के कितने अंतर्विरोधी तत्वों का संघर्ष, समन्वय, आमना-सामना और आवाजाही मुमकिन है. न्यूनतम में अधिकतम अभिव्यक्ति की संभावना रखने वाले यह प्रतीक कभी न मरने वाले प्रतीक हैं. यह सदा जीवंत रहेंगे, इसीलिए किसी भी रचनाकार के सामने प्रकृति मधुशाला बनकर घूम सकती है और उसकी अनंत पिपासा को शांत कर सकती है. यह पिपासा भी पीने योग्य हो सकती है. बच्चन जी चाहते थे कि ‘न पिलाने से थकूँ और न तू पीने से’ इसीलिए अनंत काल तक यह मधुशाला चलती रहे, चलती रहे और चलती रहे. हमारे श्री सुनील बाजपेई जी की मधुशाला भी ऐसी ही धीरे-धीरे चली है, न वे पीने से थक रहे हैं और न वो आप जैसे पाठकों के रहते पिलाने से.’

श्री सुनील जी की मधुशाला में 10 ब्रांडों की हाला है- यूं कि 10 अध्यायों में बँटी ‘मधुशाला’ के ब्रांड हैं- संबंध, श्रृंगार, भारत, जीवन, संसार, दर्शन, लक्ष्य, नीति, भक्ति और विविध. इस प्रकार अलग-अलग अध्यायों में बांट कर इस ‘नई मधुशाला’ को सजाने-संवारने का उद्देश्य यही रहा है पाठक एक ही भाव भूमि पर रचित मधु छंदों का रस एक साथ ले सकें.

पुस्तक के पहले अध्याय ‘संबंध’ के प्रथम छन्द से ही प्रमाणित हो जाता है कि इस ‘मधुशाला’ में बेशकीमती ‘हाला’ छलकने जा रही है. प्रथम छंद को माता-पिता को समर्पित करते हुए आप कहते हैं-

माता-पिता प्रथम साकी हैं

हर बालक पीने वाला

उनके हाथों पी बचपन में

वह कितनी अद्भूत हाला.

मदिरालय वह कब से छूटा,

फिर न कभी वह प्राप्त हुआ,

अब रोता हूं कभी सोच कर

कहां गई वह मधुशाला.


संबंधों की इस ‘हाला’ में माता-पिता के साथ बेटी, मित्र, शिक्षक आदि अवस्थित हैं.

अध्याय-2 ‘श्रृंगार’ पर केंद्रित है, जिसमें केवल आठ छन्द हैं. इसके अतिरिक्त अध्याय-6 ‘भक्ति’ पर केंद्रित है जिसमें मात्र सात छन्द हैं. ये दोनों ही कृति के सबसे छोटे अध्याय हैं. सर्वाधिक छन्दों वाला अध्याय 7 नीति पर केंद्रित है, जिसमें 58 छन्द संग्रहीत सरल जी ने रचे हैं. जीवन की गहन अनुभूतियां इस खंड में साकार हुई हैं और प्रमाणित किया है कि इस क्षेत्र में सरल जी की पकड़ अधिक मजबूत है. जीवन की सार्थकता के विषय में आपका मानना है-

सार्थक केवल वह ही पल है

जिस पल हाथों में प्याला.

किए बिना जो समय गुजारा

समझो व्यर्थ गंवा डाला.

गुजरा समय न लौटेगा फिर

इसको तुम मत व्यर्थ करो,

हर पल का प्रयोग तुम कर लो

जब तक हो इस मधुशाला.


अध्याय 4 जीवन पर केंद्रित है, जिसमें 42 छंद संग्रहीत हैं. ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’ के भाव को श्री सरस जी यहां कुछ यूं बांधते हैं-

कुछ कहते हैं मदिरा फीकी

कहें अन्य छोटा प्याला.

प्यास अधूरी बुझा किसी की,

रूठ गई साकीबाला.

सब चाहें, सब कुछ वैसा हो

जैसे उनकी इच्छा है,

किंतु न जग में मिले किसी को

कभी मुकम्मल मधुशाला.


पुस्तक के कुछ अध्यायों का कथ्यगत साम्य के चलते आपस में विलय भी किया जा सकता था. श्री सुनील बाजपेई ‘सरल’ जी ने इन 200 से अधिक ‘मधु छंदों’ की रचना में बड़े संयम से काम लिया है, कहीं कोई हड़बड़ी नहीं. कुछ छंद तो अपने कसाब में, रचाव में अद्भुत बन पड़े हैं. बहरहाल इस ‘नई मधुशाला’ की छलकती ‘हाला’ का भरपूर रस लेना है तो पाठकों को भी हड़बड़ी की जगह संयम से काम लेना होगा. अनाड़ियों की तरह ‘गट गट’ पीने की बजाय बूंद-बूंद चखिए और दूर तक, देर तक मस्ती में डूबे रहिए.

नई मधुशाला (मुक्तक काव्य)

कवि : सुनील बाजपेयी ‘सरल’

प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफ अली रोड

नई दिल्ली-110002

संस्करण : 2017, मूल्य : 250

सम्पर्कः सम्पादक : ‘अभिनव प्रयास’

स्ट्रीट-2, चन्द्रविहार कॉलोनी,

(नगला डालचन्द), अलीगढ़-202001

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