एक प्रेरक व्यक्तित्व // विजय केसरी : प्राची – जनवरी 2018

भारत यायावर


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( विजय केसरी )

राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित झारखण्ड के लब्ध प्रतिष्ठित प्रख्यात साहित्यकार भारत यायावर ने हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में जो कार्य किया है, निश्चित तौर पर अन्य साहित्यकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। गद्य और पद्य दोनों में यायावर की सृजनात्मकता अतुलनीय है। इनकी सृजनात्मकता हिन्दी साहित्य की एकनिष्ठ, लम्बी व कठिन साधना का परिणाम है। एक कर्मयोगी की भाँति इन्होंने अपना जीवन हिन्दी साहित्य की सेवा में समर्पित कर दिया। इनकी अब तक मौलिक एवं सम्पादित पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। यायावर का रचना संसार आज हिन्दी साहित्य का धरोहर बन चुका है। इनकी रचनाशीलता ने इन्हें सिर्फ देश भर में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी मजबूती के साथ स्थापित किया है। यह मेरा परम सौभाग्य है कि ऐसे शख्सियत की साधना को नजदीक रहकर देखने और समझने का अवसर मिला। मैं ही नहीं दर्जनों लोग आज हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में जो कुछ गढ़ पा रहे हैं, इनके साथ रहने का प्रभाव है। मेरा यह मानना है कि यायावर अपने जीवन में जो भी ‘कैरियर’ का चुनाव करते, सफल होते और दूर तक जाते। यह विचारणीय है कि उन्होंने हिन्दी साहित्य को ही क्यों चुना ?......बातें अब समझ में आ रही है। इनका कृतित्व ही इनके व्यक्तित्व का आईना बन चुका है।

यायावर जी का कृतित्व जग-जाहिर है। वे देश और देश के बाहर भी पढ़े जा रहे हैं। ऐसा सौभाग्य कम ही लेखकों को मिल पाता है। उनकी कृतियों का कई विश्वविद्यालयों के शोधार्थी शोध में उपयोग कर रहे हैं। देश भर में आयोजित होने वाली साहित्यिक गोष्ठियों में वे बराबर बुलाए जाते रहे हैं। सभी गोष्ठियों में भाग तो नहीं ले पाते हैं, किन्तु जिनमें भाग लेते हैं, वह गोष्ठी यादगार बन जाती है। सैकड़ों की संख्या में हिन्दी के जानकार इनसे मिलने आ जाते हैं, इनसे कई तरह के प्रश्न करते हैं, हिन्दी साहित्य की जानकारियाँ चाहते हैं, उनके तमाम प्रश्नों का उत्तर वे बड़े इत्मीनान के साथ देते हैं। लोग चुपचाप उन्हें सुनते रहते हैं। जब भारत यायावर बोलते हैं तब प्रतीत होता है कि उन्हें हिन्दी साहित्य का कितना विराट अध्ययन है। हिन्दी साहित्य में बीते कई वर्षों में क्या-क्या महत्त्वपूर्ण काम हुए हैं, सब बातें इनकी जुबान पर रहती हैं। स्वास्थ्य की परेशानी के कारण बहुत गोष्ठियों में जा नहीं पाते हैं। जब वे घर में बैठे रहते हैं, तब भी प्रश्न करने वाले, जानकारी लेने वाले इन्हें इत्मीनान से बैठने नहीं देते। फोन की घंटी एक के बाद एक बजती रहती है। वे कभी चिढ़ते नहीं, बल्कि सहज भाव से झट से उत्तर देते हैं और पुनः काम में जुट जाते हैं। ये कभी अपने मोबाइल फोन का स्वीच आफॅ नहीं रखते हैं। रात के बारह बजे से भी अधिक समय तक लोगों के प्रश्नों को सुनते और जवाब देते हैं।

यायावर जी के संदर्भ में इतनी बातें इसलिए दर्ज कर पाया हूँ कि लम्बे समय से इनसे जुड़ा रहा हूँ। काफी समय इनके साथ गुजारने का सौभाग्य मुझे मिलता रहा है। इन बातों की कड़ी में एक बात का जिक्र और करना उचित समझता हूँ कि जब व्यंग्य कथाकार पंकज मित्र का हजारीबाग आकाशवाणी से राँची स्थानान्तरण हो गया था, तब उनकी विदाई पर ‘विदाई समारोह’ का आयोजन किया गया था। इस समारोह में डॉ. भारत यायावर बतौर मुख्य अतिथि उपस्थिति थे। चूँकि पंकज मित्र की व्यंग्य कथा शैली ऐसी रही है कि व्यंग्य के माध्यम से बड़ी से बड़ी बात कह देने और चुटकी काटना कभी न भूलते। वे जिन पर भी व्यंग्य करते, वे मानसिक तौर पर आहत हो ही जाते, तो दूसरी ओर लोग पढ़ते और मजे ले-लेकर उपहास करते। पंकज मित्र के इस स्टाईल की रचनाशीलता के लिए लोग उन्हें भला-बुरा कहते रहते। कई लोगों ने उन्हें दुष्ट तक की उपाधि से अलंकृत कर दिया था।

भारत यायावर ने उस समारोह में पंकज मित्र की इस लेखकीय दुष्टता पर जिस अंदाज में अपनी बातें रखीं, वह अपने आप में बेमिसाल है। उस सभा में लोग पिन साईलेन्स यायावर की बातें सुनते रहे थे। लगभग चालीस मिनटों तक इस सभा में यायावर बोले थे। कोई ‘दुष्ट’ पर इतनी सारगर्भित बातें रख सकता है? दुष्ट को ही आधार बनाकर पंकज मित्र सहित कई लेखकों को भी उन्होंने उदाहरण स्वरूप रखा था। एक लेखक को कैसा होना चाहिए? अपनी लेखनी के माध्यम से वे क्या कर सकते हैं? पूर्व में लेखकों ने इस लेखनी के माध्यम से क्या कुछ नहीं किया। लेखकों का एक बड़ा वर्ग ब्रिटिश हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी थी। वे लेखकगण अंग्रेजों के लिए दुष्ट जरूर थे लेकिन अपनी मातृभूमि के सच्चे सपूत भी थे।

यायावर के उपरोक्त वक्तव्य की चर्चा आज भी होती है। इससे प्रतीत होता है कि वे एक सफल रचनाकार के साथ प्रखर वक्ता भी हैं।

यायावर जी बहुप्रतिभा के भी धनी है। वह हिन्दी साहित्य के साथ अंग्रेजी साहित्य में कौन-कौन से महत्वपूर्ण काम हो रहे हैं, इस पर भी बारीकी से नजर रखते हैं, अध्ययन करते हैं और स्वयं को अपडेट करते रहते हैं। बंगला साहित्य के प्रति भी उनका गहरा लगाव है। इसके अलावा अन्य भाषाओं में क्या रचा जा रहा है, सब पर ध्यान रखते हैं। विज्ञान और राजनीति के क्षेत्र में क्रमशः नित हो रहे नूतन आविष्कार और परिवर्तन पर बेबाक टिप्पणी दर्ज करना नहीं भूलते। समाज में हो रहे नैतिक मूल्यों के क्षरण से वे काफी दुःखी भी हो उठते हैं और कहते हैं कि ‘सभी भाषाओं में लिखने वाले लेखकों का दायित्व बनता है कि समाज में हो रहे नैतिक मूल्यों के क्षरण के विरुद्ध आवाज उठायें तथा समाज में पुनः नैतिकता कैसे स्थापित हो, इस पर जोरदार बातें रखें। यह कार्य लेखक वर्ग ही कर सकता है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब भी भारतीय समाज में विघटन व संकट का दौर आया था, तब-तब लेखक वर्ग आगे बढ़ा और अपनी लेखनी से उसे दुरुस्त किया। आज की बदली परिस्थिति उसी मांग को दोहराती हैं।

...यायावर जी ने उक्त टिप्पणी के माध्यम से अपनी ओर से सारी बातें कह डालीं। अब तक यायावर जी ने अपने रचना-कर्म के माध्यम से जिन प्रेरणादायी मूल्यों को स्थापित किया है, वे उन्हीं मूल्यों को अपने जीवन में भी उतारते है। उनकी कथनी और करनी में मैं कोई अंतर नहीं देखता हूँ। महात्मा गांधाी को वे अपना आदर्श मानते हैं। अपने जीवन और कर्म में सत्य को पूरी तरह स्थापित भी करते हैं। वे अपने मित्रों को टेलीफोन पर बात करते हुए अपने स्थान का गलत हवाला देते हुए सुनते हैं तो तुरन्त टोक दिया करते हैं और ऐसा न करने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं, सत्य थोड़े समय के लिए कष्ट जरूर पहुँचाता है, किन्तु विश्वास की हर कसौटी पर खरा उतरता है। लोग छोटी-छोटी बातों के लिए भी झूठ बोलने में परहेज नहीं करते है। बाद में यही झूठ उनके जीवन का हिस्सा बन जाता है। वे कब सच बोल रहे हैं, कब झूठ बोल रहे हैं, उन्हें ही ठीक से पता नहीं होता। इसलिए जरूरी है कि लोग सच बोलें, झूठ से पूरी तरह बचे। सत्य के आचरण से जीवन में ईमानदारी आएगी और हम सब नैतिक रूप से मजबूत हो सकेंगे। समाज को बदलने से पहले स्वयं में बदलाव लाएँ। लोगों को सिर्फ सच को सच कहना और झूठ को झूठ कहना चाहिए। समाज में पुनः नैतिकता स्थापित हो जाएगी। नैतिकता किसी दुकान व बाजार की चीज नहीं है, बल्कि हमारे जीवन का कर्म और व्यवहार है।

हमने देखा है कि यायावर जी का जीवन ईमानदारी की कश्ती पर आगे बढ़ता चला जा रहा है। बेईमानी से एक भी पैसा उन्होंने अर्जित करने का कोई प्रयास नहीं किया। ऐसा नहीं कि उन्हें अवसर नहीं मिले होंगे। इस ओर उन्होंने देखा तक नहीं। जिन मूल्यों को उन्होंने अपनी रचनाओं में स्थापित किया, सदा उस पर चलते रहे। इस कारण वे अपने परिवार, कुटुम्ब और मित्रों की आलोचना के केन्द्र में भी रहते हैं।

कुछ वर्ष पूर्व वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गये थे। बीमारी की हालत में भी पढ़ाने के लिए जाया करते थे। अभी हाल के दिनों में भी बीमार पड़े थे, परन्तु समय पर विश्वविद्यालय पहुँच ही जाया करते थे। विश्वविद्यालय जाकर सिर्फ हाजिरी बनाकर लौटने वाले प्राध्यापक भारत यायावर नहीं हैं, बल्कि पूरी गम्भीरता से पढ़ाकर ही घर लौटते थे। जब वे अस्पताल में भर्ती रहे थे, तब अध्यापन नहीं कर पाये थे। उनका इस संदर्भ में स्पष्ट कहना है कि विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए मेरी नियुक्ति हुई है। इसके लिए विश्वविद्यालय उचित पारिश्रमिक भी देता है, तो विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करना मेरा दायित्व है. अगर मैं इस कार्य को ठीक से नहीं करता हूँ तो विद्यार्थियों को धोखा देने से पहले स्वयं को धोखा देता हूँ। सबों को इस धोखे से बचने की जरूरत है। अपने कार्य और जबावदेही के प्रति ईमानदार रहने से ही समाज में नैतिक मूल्य स्थापित हो सकेगें।

डॉ. भारत यायावर का जन्म 29 नवम्बर, 1954 ई. में हजारीबाग के ग्राम कदमा में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम कदमा से शुरू कर संत कोलम्बा महाविद्यालय से स्नातक और राँची विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। वर्तमान में वे विनोबा भावे विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विभाग में अध्यापन कार्य कर रहे हैं। अध्यापन करते हुए इन्होंने ‘नामवर सिंह का आलोचना कर्म’ पर शोध कार्य पूरा कर पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आपके निर्देशन में कई शोधार्थी हिन्दी साहित्य में शोध-कार्य कर रहे हैं।

1974 में यायावर की पहली कविता ‘जय भारत’ नामक पत्र में प्रकाशित हुई। तब से लेकर अब तक देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती आ रही है। इनकी लम्बी कविता ‘झेलते हुए’ तब प्रकाशित हुई जब कविताओं के पठन को उबाऊ समझा जाने लगा था, किन्तु यायावर की कविताओं ने पाठकों को झेलने और समस्याओं से लड़ने की एक नयी दृष्टि दी। कविताओं ने जीवन में हो रहे उथल-पुथल से साक्षात्कार करवाया और एक नया प्रतिमान गढ़ा। संघर्ष के दौर से गुजर रहे लोगों में नई चेतना जलाने एवं पैदा करने में कविता ‘झेलते हुए’ सफल हुई। देश भर में इसकी व्यापक चर्चा हुई। इसके बाद इन्होंने एक-एक कर ‘मैं हूँ यहाँ हूँ’, ‘बेचैनी’ एवं ‘हाल बेहाल’ नामक कविता-संग्रह हिन्दी साहित्यानुरागियों को दिए। इनके हर संग्रह में नूतनता का पुट मिलता है जो इन्हें सबों से अलग एक नई पहचान देने में सफल होता है। समाज में हो रहे बदलाव, युवाओं में बढ़ता असंतोष, शासन-प्रशासन के क्षेत्र में आई नैतिक मूल्यों में गिरावट एवं सामाजिक परिवर्तन में संघर्षरत लोगों को स्वर देने में यायावर की कविताएँ बहुत हद तक सफल हो पायी। देश के सैकड़ों लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों का मानना है कि इनकी कविताओं में जो भाव दिखता है वह समाज का हाल-ए-बयां है। यायावर की प्रस्तुति में सत्य का पुट भी प्रस्फुटित होता है। ये खुद भी कविताओं से अपने को अलग नहीं कर पाते।

यायावर खुद एक लम्बे संघर्ष के दौर से गुजरे हैं, जहाँ भीषण गरीबी और बेरोजगारी भी है। इन्होंने सिर्फ कविताओं में गरीबी और बेरोजगारी को परास्त नहीं किया, बल्कि वास्तविक जीवन में भी उसे परास्त किया और सत्य का दामन भी उसी मजबूजी से पकड़े रहे। यही उन्हें सबों से अलग करता है।

डॉ. भारत यायावर प्रारंभ से ही कुछ खोज रहे थे। देश भर की पुस्तकालयों और न जाने कहाँ-कहाँ की खाक छानते। वे बस खोजे जा रहे थे। उनकी खोज क्या थी? वे ही जानते थे। बस खोजते चले जा रहे थे। दिन-रात बस खोज में ही लगे रहे थे। इनकी लम्बी खोज का नतीजा तब सामने आया जब हिन्दी के महान लेखक महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं फणीश्वरनाथ रेणु की दुर्लभ रचनाओं को संकलित कर इन दोनों लेखकों की लगभग पच्चीस पुस्तकें ‘रेणु रचनावली’ और ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावली’ नाम से उनके सम्पादन में प्रकाशित हुईं। दोनों रचनावली में लगभग बारह हजार पृष्ठ हैं। पुस्तक रूप में आने से पूर्व रचनावली की सामग्री सैकड़ों पुस्तकालयों एवं दुर्लभ स्थानों पर बिखरी पड़ी थी। सबों का एक साथ संकलन, अध्ययन और संपादन करना निश्चित तौर पर गहन अन्वेषण का नतीजा था जिसे डॉ. भारत यायावर ने बीस वर्षों में पूरा किया था। इन दोनों रचनावलियों को जिसने भी पढ़ा डॉ. भारत यायावर की खोज एवं सम्पादन के कायल हुए बिना न रहा।

लम्बी खोज का प्रतिकूल प्रभाव डॉ. भारत यायावर के स्वास्थ्य पर पड़ा था। लंबे समय तक वे बीमार रहे थे और अस्पताल में पड़े रहे थे। पूरी तरह ठीक भी न हो पाये थे कि वाहन से दुर्घटनाग्रस्त हो गये थे। लंबे समय तक पुनः अस्पताल में भर्ती रहे और जीवन एवं मृत्यु से संघर्ष करते रहे थे। इस संघर्ष में उन्होंने मौत को परास्त जरूर किया, किन्तु शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो चुके थे। दुर्घटना का असर मस्तिष्क पर बहुत गहरा हुआ था। इन सबके बावजूद जैसे-जैसे स्वस्थ्य होने लगे हिन्दी साहित्य की साधाना में संलग्न होते गये।

इन दो रचनावली के पश्चात् इन्होंने ‘कवि केदारनाथ सिंह’, ‘आलोचना के रचना पुरुष : नामवर सिंह’, ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी का महत्व’, ‘नामवर की प्रारम्भिक रचनाएँ’, ‘राधाकृष्ण : एक अप्रतिहत रचनाकार’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों का संपादन किया। 1979 में ‘जिजीविषा के स्वर’ एवं ‘एक ही परिवेश’ नामक कविता-पुस्तकों का इन्होंने संपादन और प्रकाशन भी किया। यायावर ने ‘नवतारा’, ‘प्रगतिशील समाज’ एवं ‘विपक्ष’ नामक साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया।

आलोचना के क्षेत्र में भी भारत यायावर ने कई नये प्रतिमान गढ़े हैं, जो मील के पत्थर साबित हो रहे हैं। ‘नामवर होने का अर्थ’ नामक जीवनी बहुत लोकप्रिय हुई। उनकी आलोचना की पुस्तकें हैं- ‘विरासत’, ‘नामवर का आलोचना कर्म’, ‘रेणु का है अंदाजे-बयां और’, ‘फणीश्वर नाथ रेणु व्यक्तित्व एवं कृतित्व’, ‘फणीश्वरनाथ रेणु : कथा का नया स्वर’, ‘पुरखों के कोठार से’ आदि। इसके अलावा संस्मरण, रेखाचित्र की पुस्तक है- ‘सच पर मर मिटने की जिद’। हिन्दी के जानने वाले लोगों की पहली पसंद है, उपरोक्त पुस्तकों का पढ़ना। न जाने कितनी पुस्तकें भारत यायावर के मन-मस्तिष्क के गर्भ में छुपी है। एक साधक के रूप में वे अपनी साधना में लीन हैं।

भारत यायावर की सृजनात्मकता से प्रभावित होकर प्रख्यात साहित्यकार श्याम बिहारी श्यामल ने उनकी लेखकीय शैली पर प्रकाश डालते हुए टिप्पणी की है कि भारत यायावर जिस विषय प्रभाग पर कलम चला रहे हों, एक लेखक इकाई की संवेदनशीलता सर्वत्र आद्योपांत विद्यमान है। सम्पादक की निर्ममता भी, तो आलोचक की खांटी वस्तुपरकता भी, इन सबके संग-साथ ही एक कवि की धड़कती हुई हार्दिक कमनीयता तो सर्वत्र रंजित है ही। इतने यतन-योगों ने इनके रचना संसार को विशिष्ट बना दिया है, जिसे पढ़ चुकने के बाद भी बार-बार भाषा का आनन्द लेने के लिए दुहराया जा सकेगा।

लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार, कवि व संपादक रमणिका गुप्ता ने अपनी सद्यः प्रकाशित आत्मकथा ‘आपहुदरी’ में डॉ. भारत यायावर के संदर्भ में लिखा है कि ‘भारत यायावर उम्र में मुझसे काफी छोटे हैं। साहित्यिक लेखन की प्रेरणा मैंने उनसे ही ली थी। आज भी साहित्य संबंधी कोई जानकारी की जरूरत पड़ती है तो उन्हें ही याद करती हूँ। वे हिन्दी साहित्य के बड़े विद्वान हैं, मैं उन्हें अपनी साहित्यिक गुरु मानती हूँ। ...लोकप्रिय कथाकार रतन वर्मा ने ‘प्राची’ में प्रकाशित अपनी आत्मकथा में दर्ज किया है कि ‘डॉ. भारत यायावर के कारण मैं आज साहित्य में हूँ। उन्होंने मुझमें क्या प्रतिभा देखी कि मुझे साहित्यकार बनाकर ही दम लिया। वे देश के एक महान साहित्यकार हैं। वे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पढ़े जाते हैं।’

भारत यायावर को 1988 में ‘नागार्जुन पुरस्कार’, 1993 में ‘बेनीपुरी पुरस्कार’, 1996 में ‘राधााकृष्ण पुरस्कार’, 1997 में ‘पुश्किन पुरस्कार’ मास्को, 2009 में ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान’ आदि पुरस्कारों से अलंकृत किया गया है।

अनवरत साहित्य में रमे हुए यायावर का व्यक्तित्व ज्ञान एवं शिक्षा के क्षेत्र में प्रेरणा का स्रोत है। वे साहित्य के अनन्य साधक और आराधक हैं। सहयोगिता और परोपकार उनके व्यक्तित्व का अंग है। ईमानदार और सत्यनिष्ठ यायावर का हृदय संवेदना से भरा है। आत्मीय और खुला हुआ उनका जीवन हममें मिठास घोलता है। उनकी सादगी और हँसमुख स्वभाव प्यारा लगता है। उनकी सहजता हमें मोहती है।

सम्पर्कः पंच मंदिर चौक,

हजारीबाग-825301 (झारखण्ड)

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