लघुकथा // स्त्री की जीत // डॉ. संगीता गांधी : प्राची – जनवरी 2018

‘माँ, आप कोर्ट में वही कहेंगी ,जो वकील ने आपको समझाया है.’

‘बेटा ,मैं बहुत टूट चुकी हूँ.’ विवाह के बाद झेले सारे मानसिक, शारीरिक दुखों की वेदना सावित्री के स्वर में फूट पड़ी।

‘माँ, पिताजी को दुनिया भगवान मानती है। उन पर इतना गन्दा इल्जाम! वो ऐसा कर ही नहीं सकते। आपने जो देखा वो आपका भ्रम है.’

सावित्री व्यंग्य से बोलीं- ‘वो क्या कर सकते हैं और क्या नहीं, एक पत्नी होने के नाते मुझसे बेहतर कौन जान सकता है! और हाँ बेटा!’

सावित्री व्यंग्य और निराशा को ओढ़े स्वार्थी बेटे को देख रही थीं।

‘माँ, बस ये याद रखना, हमारा सारा वैभव, ये दौलत, शान सब आपके बयान पर टिका है.’

‘ठीक है बेटा, आज तक जुबान बन्द रखी। आगे भी बन्द रखूंगी.’ सावित्री ने अपनी बाजुओं पर पड़े जख्मों के दागों को घूरते हुए कहा।

‘हेलो आंटी जी.’

‘कौन?’ सावित्री ने फोन पर एक अपरिचित आवाज सुन कर कहा।

‘आंटी, मैं वही लड़की हूँ, जिसके बलात्कार के केस में आपको अभी थोड़ी देर में गवाही देनी है. आंटी जी, आप ही एक चश्मदीद गवाह हैं, जिसने उस रात आपके पति को मेरा बलात्कार करते देखा था।’

‘मैं चुप रहूंगी, नहीं बोलूंगी अपने पति के खिलाफ। हमारी इज्जत, हमारी सारी शान क्यों मिट्टी में मिलाऊँ?’

‘आंटी! पत्नी, इज्जत, शान इन सबसे पहले बस एक बार सोचिएगा... आप सबसे पहले एक स्त्री हैं!’

लड़की की सिसकती आवाज सावित्री को चीर गयी।

‘सावित्री देवी हाजिर हों.’ सावित्री जज के सामने थीं।

‘आपने उस रात क्या देखा?’

सावित्री ने एक नजर सामने खड़े अपराधी पति को देखा! फिर नजर घुमाकर वैभव व दौलत के लालची बेटे को देखा! कोर्ट रूम में मौजूद पति के पक्ष में खड़ी वकीलों की फौज, सत्ता के नुमाइंदों, मीडिया... सभी पर दृष्टि डाली!

फिर उस रात की लड़की की चीखों को स्मरण किया! आंखों में पति की दरिन्दगी का दृश्य साकार किया!

हलक में जमे शब्दों को पिघलाते हुए कहा, ‘जज साहब यही है वो इंसान, जिसने उस रात लड़की का बलात्कार किया था। मैंने देखा था।’

धन, दौलत, इज्जत, शान, पति, बेटे, समाज के आगे एक स्त्री जीत गयी।

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सम्पर्कः डब्लयू जेड- 76 , प्रथम तल, लेन-4,

शिव नगर, नई दिल्ली-110058.

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