संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 21 : संस्मरण आलेख - रिश्तों की उलझन // डॉ0 सुरंगमा यादव

एन के भोगल की कलाकृति

प्रविष्टि क्र. 21

संस्मरण आलेख-

रिश्तों की उलझन

डॉ. सुरंगमा यादव

मिसेज वर्मा किसी कालेज में अध्यापिका हैं। पिछले दिनों उनसे मुलाकात हुई। इधर-उधर की बात होते-होते बात बच्चों तक आ पहुँची। उनके दो बेटे हैं। बड़ा दस साल का और छोटा सात का। उनकी समस्या है कि बच्चे कहना नहीं मानते। किसी काम को कहने पर टालते रहते हैं। पढ़ाई भी ठीक से नहीं करते। जब वो घर पर नहीं होती हैं तो सारा-सारा दिन टी0 वी0 और कम्प्यूटर चलाते रहते हैं। बच्चों के अंदर बराबरी का भाव आ गया है। अगर वे अपने लिए कुछ खरीदती हैं तो बच्चे कहते हैं आप अपने लिए तो ले लेती हैं, हमें भी हमारी पसंद की चीज दिलाइए। अगर हम अपने आस-पास देखें तो पायेंगे कि यह समस्या अधिकतर कामकाजी महिलाओं के साथ आ रही है। जिसका कारण है बच्चों को पर्याप्त समय न दे पाना। उनके साथ उस धैर्य से पेश न आना जो एक माँ में ही हो सकता है। बच्चा अगर माँ से कुछ कहना चाहता है तो व्यस्तता के कारण उनके पास समय नहीं होता कि धैर्य से उसकी बात सुने। अगर सुबह का समय है तो कह दिया जाता है, अभी स्कूल को देर हो जायेगी या बस छूट जायेगी। बाद में बताना। एक मध्यम वर्गीय माँ जब शाम को जब थकी हारी घर लौटती है तो उसे चिंता होती है बच्चे के होमवर्क की उसके टेस्ट की तैयारी की। ऐसे में शाम को भी इतमीनान नहीं होता है। जब बच्चा ज्यादा जिद करता है तो कहा जाता है, जल्दी कहो जो कहना है। ऐसे में जिस भावना से बच्चा अपनी बात या समस्या कहना चाहता है वह समाप्त हो जाती है। इस अनसुनी में कभी -कभी छोटी समस्या बड़ी बन जाती है। बच्चे का माँ से कुछ ज्यादा ही लगाव होता है। बच्चा चाहता है माँ उसके साथ बैठे, उसकी ढेर सारी बातें सुने स्कूल की ,दोस्तों की। साथ में खेले, कहानियाँ सुनाए ।लेकिन घर का काम निबटाने तथा अगले दिन की तैयारी करने के बाद माँ जब बच्चे के पास पहुँचती है तब तक वह सो चुका होता है। धीरे-धीरे बच्चे के अन्दर प्रतिद्वन्द्विता का भाव आ जाता है । वह सोचता है जब हमारी बात नहीं सुनी जाती तो हम क्यों सुनें। ऐसा नहीं है कि माता-पिता बच्चे से प्यार नहीं करते। ये प्यार ही तो है कि वे बच्चे को महंगे मोबाइल, लैपटाप, कम्प्यूटर जैसी चीजें छोटी उम्र में ही दे देते हैं। इन्हीं से वे उनका खालीपन भरना चाहते हैं।

इसमें बच्चे या माता-पिता दोनों में से किसी का दोष नहीं है।हमारी जीवन-शैली ही ऐसी हो गयी है। परिवार छोटा होने के कारण रिश्ते बहुत सीमित रह गये है। अधिकतर परिवारों में एक या दो बच्चे होते हैं। इसलिए रिश्तों के कई रूप केवल तर्कशक्ति की किताबों में सिमट कर रह गये हैं। रिश्ते जितने सीमित होते जा रहे हैं उतने ही संकुचित भी। आज बच्चे माता-पिता के साथ बहुत थोड़े समय ही रह पाते हैं। कैरियर बनाने की चिंता में बच्चे और माता-पिता दोनों ही जूझ रहे हैं। बारहवीं पास करते-करते बच्चे को पढ़ने के लिए कहीं न कहीं बाहर भेज दिया जाता है। ये उम्र ऐसी होती है जब बच्चे को माता-पिता के निर्देशन,उनके लाड़-प्यार की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है। ये समय होता है जीवन मूल्य निर्धारित करने का तथा चरित्र को दृढ़ता प्रदान करने का। ऐसी नाजुक अवस्था में कैरियर बनाने के लिए बाहर भेज दिया जाता है। उनमें कुछ तो बन जाते हैं और कुछ दुर्भाग्यवश भटक भी जाते हैं। एक बार बाहर जाने के बाद बच्चा मेहमान की तरह घर आता है। संबंध काफी कुछ औपचारिक रह जाते हैं। जॉब भी जल्दी लग जाती है। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक ही नहीं जीवन की अन्य महत्वपूर्ण बातों में भी आ जाती है। विवाह जैसे अहम फैसले में बच्चे माता-पिता की राय लेना भी उचित नहीं समझते। वे अपनी लाइफ अपने तरीके से जीने का हवाला देते हैं। माता-पिता न चाहते हुए भी इसलिए रिश्ता स्वीकार कर लेते हैं जिससे संवादहीनता की स्थिति न आये। तमाम रीति-रिवाजों के साथ संपन्न विवाह में दो परिवार भावनात्मक रूप से एक -दूसरे से जुड़ जाते हैं। विवाह के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों में दूल्हा-दुल्हन के लिए कितना मार्गदर्शन,आशीर्वाद,स्नेह और न जाने कितनी भावनाएं भरी होती हैं। जो उन्हें आपसी तालमेल और जिम्मेदारियों का अहसास कराती हैं। लव मैरिज में रिश्ता केवल लड़के -लड़की तक ही सीमित रहता है। आज की इस तेज रफ्तार जिंदगी में ये रिश्ते जितनी जल्दी जुड़ते हैं उतनी ही जल्दी टूटते भी नजर आते हैं।

रिश्तों का एक अन्य रूप सास- बहू का है। एक लड़की जब बेटी के रूप में होती है तो अपने माता-पिता,भाई-बहन आदि के प्रति कितनी संवेदनशील होती है,वही लड़की जब बहू बनती है तो इतनी संवेदनाहीन कैसे हो जाती है। वो केवल पति से ही अपना संबंध क्यों मानती है। वो पति जो आज उसका हुआ है बरसों पहले माता-पिता की गोदी में आया उन्होंने तमाम परेशानियाँ उठाकर पाला-पोसा,पढ़ाया-लिखाया। उसी को माता-पिता से अलग करने के लिए वह शीत युद्ध छेड़ देती है। बहुत जगह इसके विपरीत भी देखने को मिलता है। बहू बहुत समझदार होती है। सबको साथ लेकर चलना चाहती है। फिर भी ससुराल में उसे वो सम्मान नहीं मिलता जो मिलना चाहिए। उसे दोयम दर्जे का समझा जाता है। उसकी उपेक्षा की जाती है। हमारे समाज की मानसिकता में स्त्री-पुरुष में भेद की जड़े बहुत गहरी हैं। जो स्त्री इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाती है उसे जीवन भर संघर्ष ही करना पड़ता है। हमारे धर्मशास्त्र भी यही कहते हैं कि स्त्री को सदैव अपने पति की सेवा करनी चाहिए। चाहे वह कैसा भी हो। पत्नी को महत्व देने वाले ,उसका सम्मान करने वाले आज भी कम हैं। ऐसा करने में उन्हें समाज के सामने झिझक महसूस होती है। यदि कोई करना भी चाहे तो जोरू का गुलाम कहकर उसका अहम जाग्रत करने का प्रयास किया जाता है।

रिश्तों और भावनाओं से जुड़ी एक और चीज है,वो है हमारा घर। पहले एक ही घर में लोग पीढ़ी दर पीढ़ी रहते चले आते थे। इसे पुश्तैनी घर या मकान कहा जाता था। आज व्यक्ति अपने जीवन की कमाई का एक बड़ा हिस्सा मकान बनवाने में लगा देता है। लेकिन उसमें रहता कौन है? वही जिसने उसे बनवाया है। एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी को वह आउट डेटेड या पुराने मॉडल का लगने लगता है। इसके अतिरिक्त दूर-दूर बड़े शहरों में या विदेशों में नौकरी करने के कारण बच्चे वहीं बस जाते हैं। कुछ बच्चे तो घर वालों से दूरी बनाने के लिए भी ऐसा करते हैं।

आज कम समय में अधिक से अधिक पाने की होड़ लगी है। बड़े-बड़े पैकेज के चक्कर में बच्चों की मानसिकता ऐसी होती जा रही है कि हर चीज को पैसों से तोलने लगते हैं। जब बेटे को माँ या पिता के बीमार होने की खबर मिलती है और उसे बुलाया जाता है तो वह तपाक से कह देता है कि इलाज तो डॉक्टर करेगा मेरा क्या काम है। या फिर कुछ पैसे भेज कर छुटकारा पा लेता है। जब उनकी देखभाल करने की बारी आती है तो वृद्धाश्रम भेजने में तनिक भी संकोच नहीं करते। वो यह भूल जाते हैं कि वृद्धावस्था और दुःख तकलीफ में औलाद का माता-पिता के निकट होना आधी परेशानी दूर कर देता है।

भाग दौड़ भरी जिंदगी, अधिक से अधिक कमाई, स्टेट्स, गाड़ी, बंगला, हाई-फाई दिखाने का जुनून, महानगरों या विदेशों में बसने का शौक कई ऐसे कारण हैं जो रिश्तों की मधुरता को, उनकी ताजगी को समाप्त कर रहे हैं ।

जीवन के ये खट्टे-मीठे अनुभव यादों के रूप में जीवन पर्यन्त साथ रहते हैं।


डॉ0 सुरंगमा यादव

असि0 प्रो0 हिन्दी विभाग

महामाया राजकीय महाविद्यालय

महोना, लखनऊ

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