संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 26 : कुद्रेमुख : अ स्‍वीजरलैंड ऑफ इंडिया में रोमांचकारी दो दिन // डॉ. ललित सिंह राजपुरोहित

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प्रविष्टि क्र. 26

कुद्रेमुख : अ स्‍वीजरलैंड ऑफ इंडिया में रोमांचकारी दो दिन

डॉ. ललित सिंह राजपुरोहित

उस दिन सुबह से ही टिप-टिप बूंदा-बांदी हो रही थी। रिफाइनरी में हर शनिवार दोपहर एक बजे सायरन बजता है, उस रोज भी बजा, लंच टाईम हो लगभग हो चुका था, फिर भी कार्यालय में सभी कर्मचारी अपनी-अपनी कुर्सियों से चिपके हुए थे। सभी इंतजार कर रहे थे कि बूंदा-बादी कम हो तो लंच के लिए निकला जाए। कार्यालय से टाऊनशिप नजदीक ही होने के कारण,  लगभग सभी कार्मिक अपने-अपने नीड़ की ओर दौड़ते हैं और जो अकले या यू कहो फोर्सड बैचलर हैं, वे कैंटीन की ओर निकल पड़ते हैं। कैंटीन थोड़ी दूर होने के कारण मैंने भी अपना छाता संभाला और जैसे ही निकलने के लिए उठा, हाथों में कुछ कागजात लिए, ठीक मेरे पीछे साहब खड़े थे। कभी मैं उनके हाथों को देखता तो कभी टिक-टिक करती घड़ी को, पेट में चूहे उछलकूद मचा रहे थे और दिमाग में यह कीड़ा कुलबुला रहा था कि कहीं जल्‍दबाजी में करके देने वाला काम तो नहीं आ गया? मेरे अधिकारी बड़े ही मृदुल स्‍वभाव के हैं, साधारणत: जब कोई काम देना होता है तो वे मुझे अपनी सीट पर ही बुलाते हैं। लब्‍बोलुआब यह कि उन्होंने मुझे एक पत्र देते हुए कहा कि नराकास बेंगलूर, कुद्रेमुख में हिंदी सेमिनार का आयोजन कर रहा है और प्रबंधन ने आपको नामित किया है। यह सुनते ही मेरी तो बांछें ही खिल गई, क्‍योंकि मंगलूर आने के बाद मैंने कुद्रेमुख के बारे में बहुत सुना था तथा वहां जाने की इच्‍छा भी थी।

यह तो थी भूमिका कि किस तरह से मेरा कुद्रेमुख जाना तय हुआ। सेमिनार की तारीख से एक रोज पहले ही मुझे मंगलूर से निकलना था। अतिउत्‍साह में उस रोज आंख जल्‍दी ही खुल गई, प्रात: 08:30  बजे टाऊनशिप से निकला तो थोड़ी दूर पर ऑटो मिल गया। प्राय: इतनी सुबह यहां ऑटो नहीं मिलता है, टाऊनशिप से मैं काईक्‍म्‍बा गांव तक गया और वहां से बस लेकर सुरतकल तक पहुंचा। सुरतकल बस स्‍टाप पर थोड़ा इंतजार करना पड़ा क्‍योंकि कुद्रेमुख के लिए गिनती की ही बसे थी,  जो मंगलूर से चलती है। मेरा यह प्रथम अवसर था, इसलिए भले लोगो से पूछताछ की तो पाया कि सूरतकल से कारकला तक जाया जाए और वहां पहुंचकर कुद्रेमुख के लिए बस मिल जाएंगी। आखिरकार,  मुझे कारवार तक जाने के लिए सुरतकल से बस मिल ही गई। उडूपि हाईवे पर मूडबिद्री तालुका से यह बस रास्‍ता बदलकर सिंगल रोड़ पर चलती है। सर्पिलाकार रोड़ गांवों को पीछे छोड़ती हुई आगे बढ़ रही थी। चारों तरफ हरियाली आंखों को शीतल कर रही थी। मनुष्‍य चाहे कितना भी कंक्रीट के जंगल बना लें परंतु, अंततोगत्‍वा उसका मन रमता तो हरियाली में ही है। पता नहीं क्‍या सूझा कि अपना मोबाईल निकाल कर फेसबुक पर स्‍टेटस डाल दिया और पूरी दुनिया को बता दिया कि हां मैं अब प्रकृति को गोद में जा रहा हूं। स्‍टेटस कुछ यू था  " इस तरह की छोटी यात्राएं मैंने कई राज्‍यों में की हैं, पर यहां का अनुभव अलग है,  क्‍योंकि वहां कि यात्रा के दौरान बस की खिड़की से बाहर सूखा दिखता है तो बस के अंदर धूल और मानव गंध। कर्नाटक जैसी पावन धरा की बात ही अलग है, यहां जब आप यात्रा पर होते हैं तो बस की खिड़की से बाहर हरियाली दिखती है तथा बस के अंदर संस्‍कृति एवं सुंदरता के अनुपम उदाहरण, @ ऑन द वे टू कुद्रेमुख!"

जब तक कारकला पहुंचा तो दोपहर के 11 बजे चूके थे। वहां पहुंचकर जब पता किया कि यहां से कुद्रेमुख के लिए कितने बजे की बस है तो पता चला सुबह 09:00 बजे की बस निकल गई और अब दोपहर में 01:00 बजे की बस है। कुछ अजनबियों से बातचीत करने से पता चला कि जब से कुद्रेमुख कंपनी ने अपना काम समेटना शुरू किया है, तब से लोगों की आवाजाही सुस्‍त हो गई है इसलिए अब बसें भी उस रुट पर बहुत कम चलती हैं। जैसे-जैसे दिन बढ़ रहा था, गर्मी भी थोड़ी तल्‍ख होती जा रही थी। रह-रह कर मैं अपने माथे का पसीना पोंछ रहा था। विचार आया कि क्‍यों न सेमिनार के संयोजक को अवगत करा दूं कि बस यहां उपलब्‍ध नहीं है,  इसलिए लंच के समय तक मैं शायद नहीं पहुंच पाऊंगा। इसी प्रयोजन से बेंगलूर नराकास के सचिव महोदय को सूचित किया तो उन्होंने दूरभाष पर सलाह दी की आप वहीं लंच कर लें और हो सके तो इसी बहाने कारकला घूम लें।

मेरे हाथ में दो घंटे थे। समय कितना कीमती होता है,  उस दिन यह मेरे समझ में आया। ऑटो वाले से पूछा कि यहां पास में जो भी प्रसिद्ध मंदिर है वहां ले चलो। मेरी टूटी-फूटी कन्‍नड़ को सुनकर वो समझ गया कि यात्री हिंदी भाषी हैं। उसने बताया कि कारकला बस स्‍टॉप से मात्र 4-5 किलो‍मीटर दूर भगवान बाहुबली की प्रतिमा है और उसके नज़दीक ही कुछ मंदिर हैं। वहां पहुंचने पर देखा कि बाहुबली उंची पहाड़ी पर विराजमान हैं, और ऐसा लगा जैसे मन में प्रधानमंत्री मोदी ने प्रवेश कर लिया हो और बोल रहे हो कि "ना तो मैं यहां लाया गया हूं, न मुझे यहां किसी ने बुलाया है। मुझे तो भगवान महावीर ने बुलाया है"। लगभग 100 सीढ़ियां चढ़ने के बावजूद भी मन प्रफुल्लित था। पहाड़ पर आ रही ठंडी हवाएं सुकून दे रही थी। भगवान बाहुबली की 41 फुट ऊंची प्रतिमा देखकर आंखें कौतूहल से फटी की फटी रह गई। शीश नवाया,  अमृतमयी जल और तिलक लिया। मन में हजारों विचार कौंध रहे थे कि उस समय एक ही पत्‍थर से इतनी बड़ी मूर्ति कैसे तैयार की गई होगी। आपको बताता चलूं कि इस प्रतिमा का निर्माण लगभग सन् 1432 में हुआ था। अनुभव हो रहा था कि एक ऐसा स्‍वर्णिम समय भी कभी होगा जब कर्नाटक में जैन विचारधारा का बहुत गहरा प्रभाव रहा होगा। उदाहरण के लिए उल्‍लेख करना चाहूंगा कि मूडबिद्री से कुछ दूर वेणूर में भी 35 फुट ऊँची बाहुबली की प्रतिमा है,  जिसका निर्माण सन् 1604  में हुआ था।

कारकला से कुद्रेमुख के लिए ठीक एक बजे बस प्रारंभ हुई। दोपहर के 02:00 बजे होंगे कि बस कारकला तालुक के बजगोळी गांव में आकर पसर गई। पता चला ड्राइवर और उसकी मंडली लंच के लिए गई है,  अब आधे घंटे बाद यहां से बस आगे बढेगी। मैं अभी भी सीट पर दुबका हुआ था। सूर्य भगवान भी उत्‍तरायण में जा चूके थे, दोपहर का समय होने के कारण सूर्य भगवान ने बहुत ही विकराल रुप धर रखा रखा था। वहां कहीं भी छांव वाली जगह नहीं दिखाई दी इसलिए चुपचाप सीट पर पड़ा रहा और रोस्‍ट होता रहा। खैर वहां से बस आगे बढ़ी,  बस वहां से एक टर्न लेकर अपना रास्‍ता बदल लेती है, बमुश्किल तीन-चार किलोमीटर चले थे कि पहाड़ की चढा़ई आरंभ हो गई। अब हम कुद्रेमुख के जगंलों तथा घाटों को पार कर रहे थे। हवा में शीतलता घुल गई। मौसम अचानक सुहावना हो गया। बस जो अब तक अकड़ कर चल रही थी वह चढ़ाई में सुस्‍त हो गई। ऊचांई पर चढ़ते समय कान में हवा का सबसे ज्‍यादा दबाव पड़ता है, सो मेरे कान भी अब डब-डब की आवाज़ करने लगे। कुछ ऐसा ही अनुभव हवाई यात्रा में उड़ान भरते समय होता है।

बस में मुसाफिरों से बाते चली पड़ी। बातों ही बातों में पता चला कि कन्नड़ भाषा में कुद्रेमुख का अर्थ होता है 'घोड़े का मुँह' और यह कर्नाटक में स्थित इस पहाड़ी शृंखला का नाम है, जिस पर हमारी बस रेंग रही थी। चिकमंगलूर से लगभग 85 कि.मी. की दूरी पर दक्षिण-पश्चिम में कुद्रेमुख कंपनी की टाऊनशिप स्थित है। समुद्र तल से 6,312 फुट की उँचाई पर स्थित कुद्रेमुख से अरब सागर को देखा जा सकता है। प्राकृतिक संपदा से भरपूर कुद्रेमुख का क्षेत्र कई गुफ़ाओं से युक्‍त है। भूगर्भीय खोजों से पता चला है कि यह पहाडी,  लौह अयस्क संपदा से भरपूर है। इसलिए,  यहां कुद्रेमुख कंपनी ने अपना माइनिंग का काम चालू किया तथा अपना प्‍लांट लगाया पर र्स्‍वोच्‍च न्‍यायालय के आदेशों के चलते उन्‍हे अपने काम को समेटना पड़ा। कुद्रेमुख में बहुत सी गुफ़ाएँ और ट्रैकिंग मार्ग हैं, जो इसे पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनाते हैं। बस में यात्रा करते हुए,  खिड़की से बाहर की ओर सूरज की रोशनी में हरी-भरी ढलानों को यहाँ से देखना वास्तव में बड़ा ही रोमांचकारी लगा।

हमसे से बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि डॉ. उल्लास कारंत, प्रसिद्ध पर्यावरणविद्, जिनके द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन ने इस उष्णकटिबंधीय सदाबहार गीले जंगल को कर्नाटक सरकार ने एक राष्ट्रीय उद्यान के रूप में घोषित करने के लिए मजबूर किया था। यह भारत में पश्चिमी घाट का नम उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनक्षेत्र के अंतर्गत आने वाला दूसरा सबसे बड़ा वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र है। यह उद्यान 632 वर्ग कि.मी. में फैला हुआ है। इस जगह को 'सार्वभौमिक बाघ संरक्षण प्राथमिकता 1' के तहत आरक्षित रखा गया है तथा वर्ष 1987  में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था।

कुद्रेमुख के जंगलों में प्राय: सांभर, शेर, पूंछ मकाक, जंगली सुअर, बाघ, जंगली कुत्ते और तेंदुए बहुयात में पाये जाते हैं। पूरे राष्ट्रीय पार्क में घूमने के लिए, पर्यटकों को उच्च अधिकारियों से पूर्व अनुमति लेनी पड़ती है। कुद्रेमुख राष्ट्रीय पार्क की निकटता में आवास उपलब्ध है, जिसमें वन विश्राम गृह भी शामिल है। जगंलों, पहाड़ों, झरनों, नदियों, वन्‍य प्राणियों को देखते-देखते मन कवि हो चला था। पता ही नहीं चला कब हम घाटों को पार कर कुद्रेमुख आयरन ओर कंपनी की टाऊनशिप में पहुंच गए। चारों तरफ चिरशांति फैली हुई थी। टाऊनशिप के सैकड़ों मकान जो अब जर्जर हो रहे थे। अस्‍थायी बस-स्‍टॉप से मैं पैदल ही चल पड़ा क्‍योंकि वहां ऑटो उपलब्‍ध नहीं था। बस स्‍टाप से कोई एक-दो किलोमीटर दूर सहयाद्री भवन पहुंचा,  यह कुद्रेमुख आयरन ओर कंपनी का का गेस्‍ट हाउस था। इस गेस्‍ट हाऊस को अब लीज पर किसी प्राइवेट पार्टी को दे दिया गया है। वहीं पर सभी प्रशिक्षणार्थियों के रुकने की व्‍यवस्‍था की गई थी। पर एक संकट गहरा गया वह यह कि इस वनक्षेत्र में बीएसएनएल के सिवाए कोई भी नेटवर्क काम नहीं करता है, मेरा मोबाइल प्राणहीन अवस्‍था में था क्‍योंकि नेटवर्क ही उसका प्राण है और वही नहीं तो मोबाईलनुमा शरीर नश्‍वर है, जो किसी काम का नहीं। दिल को समझाया कि केवल मेरे अकेले कि यह गत नहीं बल्कि यहां आने वाले सभी लोग अपना यही दुखड़ा लिए बैठे हैं।

सूरज डूबने से पहले अधिकांश प्रतिभागी पहुंच चुके थे। हमें एक मिनी बस में  'मॉरनिंग ग्‍लोरी'  नामक स्‍पॉट पर ले जाया गया जो प्रकृति एवं मानव इंजीनियरिंग की कला का अदभुत मेल था। लंबे चौड़े इलाके में एक डेम बनाया गया जहां वर्षा का पानी छनकर निचले हिस्‍से की ओर जमा होता। एकदम स्‍वच्‍छ और निर्मल पानी, इतना अद्भुत प्राकृतिक नजारा कि मन वहीं रम गया। उस झील नुमा डेम में पानी का स्‍तर वर्षा काल में लगभग 872 फीट तक पहुंच जाता है जो बिना पंपिग किए मंगूलर तक पहुंचाया जाता है। जब वापस लौटे तो डिनर तैयार था। रात्री भोजन के बाद हम सभी प्रतिभागियों को एक-एक टार्च दी गई और हिदायत दी गई कि यहां बिजली का आना-जाना सामान्‍य बात है। यदि आप गेस्‍ट हाऊस से बाहर जाते हैं तो टार्च साथ जरुर ले जाएं क्‍योंकि जंगली इलाका होने की वजह से सांप अथवा जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है। गेस्‍ट हाऊस के पीछे ही एक छोटी नदी बहती है जिसके पास एक बगीचा बनाया गया। जब हम बगीचे में घूमने गए तो सहसा बेंगलूर का लालबाग याद आ गया। यह बगीचा भी कुछ उसी तरह का था। फाउंटेन की बौछारों से बचते-बचाते हमने बगीचे का भरपूर आंनद लिया। टार्च की रोशनी में मछलियां देखीं। उस रोज पूर्णिमा की रात थी। चांद पूरे शबाब पर था। इतना बड़ा चांद,  इतनी शीतल चांदनी,  मैंने शायद पहली बार देखी थी, अद्भूत नजारा था। आकाश की ओर टकटकी लगाने पर सप्‍तऋषि मंडल को आसानी से पहचाना जा सकता था।

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प्रकृति एवं मानव इंजिनियरिंग की कला का अदभुत मेल 'मॉरनिंग ग्‍लोरी'  स्‍पॉट, कुद्रेमुख।

अगली सुबह, चारों तरफ धुंध और हल्‍की ठंड। अलसुबह योगाभ्‍यास का एक सत्र रखा गया था,  उसके बाद सीधे सेमिनार। प्रथम दिन के उद्बोधन में मुझे डॉ. सिद्धलिंग पटण शेट्टी जी का उद्बोधन बेहद पसंद आया। शाम होते होते सेमिनार कई दौर से गुजरा। संध्‍या के समय हम सभी मित्रों ने जंगल में घूमने की योजना बनाई थी। जैसे ही प्रथम दिन का सत्र समाप्‍त हुआ,  हम अपनी योजना को अमलीजामा पहनाने निकल पड़े तभी पीछे से सेमिनार के संयोजक ने आवाज लगाई आप लोग जंगल नहीं जा सकते हैं, क्‍योंकि वहां पहाड़ी पर एक जंगली हाथी देखा गया है। संध्‍या के समय वनभ्रमण जोखिम भरा हो सकता है। हम में से कुछ मित्रों ने चेतावनी को सुनते ही पांव वापस खींच लिए पर यह सुनकर तो मेरा मन और भी उत्‍साहित हो गया कि वनभ्रमण रोमांचकारी होगा। कुछ और उत्‍साही मित्र भी मेरी हां में हां मिलाने लगे और अतंतोग्‍त्‍वा हम निकल पड़े वनभ्रमण की ओर।

हम ऊंची घासों और कई पेड़ों वाले उस पहाड़ी पर तकरीबन एक घंटा बिता चुके थे और हमारे साथ-साथ था एक जंगली हाथी भी, जिसे हम देख नहीं पाए थे। हम तीन-चार लोग थे, रास्ते में मिलते हुए मजदूर हमें बताते जाते, "वो नदी के पास ही है। ध्यान से जाना।" ये मजदूर अपने घरों को लौट रहे थे, उनकी चेतावनी से राहत तो नहीं ही मिल रही थी अलबत्‍ता भय एवं उत्‍सुकता और बढ़ जाती। हम जंगल में थोड़ा और दूर निकल गए, आवाज़ें आती रहीं। एक अकेला हाथी अच्छी ख़बर नहीं होती है। बहुत संभव है कि वो ‘मस्त’ वाली स्थिति में हो और हाथियों के नाराज़ झुंड ने उसे झुंड से निकाल दिया हो। वो ऐसा क्षण था जब हमें हाथियों से जुड़ी सारी बुरी ख़बरें याद आ रही थीं। याद आया कि जब हाथी मस्त वाली स्थिति में होता है तो उसके टेस्टोस्टेरोन स्तर सामान्य से साठ गुना अधिक बढ़ जाते हैं और इस ऊर्जा को वो लड़ने में ख़र्च करता है। हममें से शायद ही कोई इस मस्त हाथी से लड़ना चाहता था इसलिए हमने पहाड़ी पर बने एक मंदिर में शरण ली। जब कभी पेड़ों के बीच कुछ हलचल होती, हम सोचते, ये हमारे जंगल वाले दोस्त हैं या फिर हाथी। इन कुछ घंटों में हम कुद्रेमुख के सुंदर जंगलों के नज़ारे का आनंद भी उठा नहीं पाए। आखिरकार डरे सहमे बिना हाथी देखे ही पहाड़ी से लौट आए।

उसी रोज रात्रि के भोजन के बाद हिंदी में यक्ष गान का आयोजन रखा गया था। इस यक्षगान की कहानी महिषासुर पर आधारित थी। यक्षगान अभी तक कर्नाटक तक ही सीमित है, इस महान कला को सीमाओं में बांधना उचित नहीं और सीमाओं को तोड़ने के लिए यह आवश्‍यक है कि यक्षगान का आयोजन हिंदी और अन्‍य भाषाओं में किया जाएं ताकि इसे संम्‍पूर्ण भारत में एक पहचान मिले, हालांकि इस तरह के प्रयास आरंभ हो चुके हैं। मनोहारी और नृत्‍यमयी यक्षगान का हिंदी में प्रस्तुतीकरण बहुत ही प्रभावी लगा। यक्षगान को लगभग सभी पात्रों ने बखूबी निभाया। एक बात जो आत्‍मसात हुई कि हम सभी के मन में भी एक‍ महिषासुर बैठा है जिसे अभिमान से संबोधित किया जाता है।

अगले दिन, आधे दिन तक सेमिनार रहा, इस दौरान मेरे गुरुवर डॉ. जे पी नौटियाल जी ने अपना पर्चा पढ़ा और कई उदाहरणों से यह सिद्ध करके बताया कि विश्‍व में हिंदी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। फिर हमें बस द्वारा होरनादु ले जाया गया। होरानादु कर्नाटक के समस्त पश्चिमी घाट के बीच बसे चिकमंगलूर का प्रमुख टूरिस्ट स्पॉट है। यह चिकमंगलूर शहर से 100 किमी. की दूरी पर है। यहां पर माता अन्नपूर्णेश्वरी का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर का पुनर्निर्माण और पुनर्नामकरण कर आदि-शक्त्यमका श्री अन्नपूर्णेश्वरी कर दिया गया है। नदी के किनारे किनारे बनी सड़क पर हमारी बस चल रही थी। रास्‍ते में चाय और कॉफी का बागान थे। नारियल और सुपारी के पेड़ कतारबद्ध खड़े होकर हमारा अभिनंदन कर रहे थे। बस में माहौल खुशनुमा था। दो ग्रुप बंट गया एक महिलाओं का और एक पुरुषों का, बस में अंताक्षरी आंरभ हो गई। ऐसी अंताक्षरी मैंने पहली बार देखी जिसमें चार-चार भाषाओं में गाने गाएं जा सकते थे। तेलुगु, तमिल, कन्‍नड़ और हिंदी में गाने स्‍वीकार्य थे। जीत तो महिला समूह की हुई, सौभाग्‍यवश मैं पुरुष समूह का नेतृत्‍व कर रहा था।

खूबसूरत वादियों और घने जंगलों के बीच बने इस मंदिर की राह में अनेक खूबसूरत प्राकृतिक दृश्य नजर आते हैं, जो मन को आनंदित कर जाते हैं, लगभग दोपहर एक बजे के बाद हम मंदिर पहुंचे। कर्नाटक के इस पश्चिम घाट में पक्षियों की कई प्रजातियां भी नजर आती हैं। होरनादू से कुछ ही दूरी पर मनोहर मानिकवधारा वाटरफाल स्थित है। इन सबके साथ ही पर्यटक इस पहाड़ी पर बारह साल में एक बार खिलने वाले फूल 'कुरिंजी' देख सकते हैं। यहां स्थित माता की प्रतिमा काफी अलग है। उनके चार हाथों में शंख, चक्र, श्री चक्र और गायत्री मंत्र हैं। इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां आने वाले हर भक्त को भोजन कराने के साथ मंदिर परिसर में ही सोने के लिए जगह दी जाती है। मंदिर में प्रसाद स्‍वरुप हम सभी दोपहर का भोजन लेकर श्रृंगेरी की ओर आगे बढ़े।

शृंगेरी पहुंचते-पहुंचते दिन ढल चुका था। आसमान बादलों से घिर गया था और हवा में भी नमी थी। इतना पुराना मंदिर देखकर बहुत ही कोतूहल हुआ। विरूर स्टेशन से 10 किमी दूर तुंगभद्रा नदी के वामतट पर छोटा-सा ग्राम शृंगेरी, कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले का एक तालुका है। आदि शंकराचार्य ने यहाँ कुछ दिन वास किया था और शृंगेरी तथा शारदा मठों की स्थापना की थी। शृंगेरी मठ प्रथम मठ है। यह आदि वेदान्त से संबंधित है। यह शहर तुंग नदी के तट पर स्थित है, जिसे संभवत: आठवीं शताब्दी में बसाया गया था। ये मठ गुरु-शिष्य परम्परा के निर्वहन का प्रमुख केंद्र हैं। शृंगेरी का नाम यहाँ से 12 किमी दूर स्थित शृंगगिरि पर्वत के नाम पर ही पड़ा, जिसका अपभ्रंश 'शृंगेरी' है। यह शृंगी ऋषि का जन्मस्थल माना जाता है। शृंगेरी में एक छोटी पहाड़ी पर शृंगी ऋषि के पिता विभांडक का आश्रम भी बताया जाता है, हमारे पास समयाभाव होने के कारण हम वहां नहीं जा सके। यहां के मुख्य आकर्षण विद्याशंकर मंदिर और शारदा मंदिर हैं। विद्याशंकर मंदिर का निर्माण होयसल वंश ने शुरू करवाया था और बाद में विजयनगर साम्राज्य के संस्थापकों ने इसे पूरा करवाया। विद्याशंकर मंदिर की खास बात यहां बने 12 राशि स्तंभ हैं जिन्हें इस प्रकार बनाया गया था कि सूरज की किरणें महीनों के हिसाब से इन पर पड़े। शारदा मंदिर अपेक्षाकृत नया मंदिर है। इसका निर्माण 20वीं शताब्दी के आरंभ में किया गया था। विद्या और ज्ञान की देवी सरस्वती को समर्पित इस मंदिर का निर्माण लकड़ी से किया गया था। बाद में क्षतिग्रस्त होने पर द्रविड़ियन शैली में इसका पुनर्निमाण किया गया। नदी के पास ही तुंगभद्रा नदी बहती है, नदी में मछलियां पकड़ना मना है। यही कारण है कि आप यहां बड़ी-बड़ी हजारों मछलियां देख सकते हैं। मुझे सभी मछलियां एक ही ज्‍यादातर प्रजाति की मिली। सभी मछलियों का रंग भूरा या बैंगनी था, सबसे रोचक बात यह कि मछलियों को ब्रेड एवं बिस्किट खाते मैंने पहली बार देखा था। इतना शांत और रमणीय जगह थी कि दिल वहां से वापस लौटने को ही नहीं कर रहा था ।

वहां थोड़ी खरीददारी की। फोटोग्राफी भी की। बस वापस प्रस्‍थान करने के लिए बार बार होर्न बजा रही थी। बिखरे हुए लोगों को वापस एक जगह खींच के लाना उतना ही दूविधाभरा काम है जितना दड़बे से बाहर भागी मुर्गियों को फिर से पकड़ कर लाना। अंधेरा होने वाला था। कई लोगों को आज ही वापस अपने-अपने घरों को लोटना था इसलिए बस को वहां से जल्‍दी ही रवाना कर दिया गया। अभी शृंगेरी से 10 किलोमीटर ही दूर चले थे कि पता चला कि एक यात्री पीछे ही छूट गया है। बीच रास्‍ते उसका इंतजार किया गया। वापस लौटते वक्‍त फिर से अंत्‍याक्षरी का दौर आरंभ हो गया, महिलाओं के समूह ने अंत्‍याक्षरी का बहुत आनंद लिया। एक चेहरा बस में ऐसा भी था जिसके सुमधुर कंठ से उपजे रागमयी हिंदी और तेलुगु गानों के शब्‍द अब भी मेरे मनोमस्तिष्‍क में गुंजाएमान है।

रात 09:00 बजे हम वापस कुद्रेमुख, सहयाद्री भवन लौटे। इसी बीच हमने टाऊनशिप और प्‍लांट को देखा। अब कुद्रेमुख के प्‍लांट को स्‍क्रेप किया जा रहा था। मन कटोच रहा था कि कितनी तमन्‍नाओं से इस प्‍लांट और इस परियोजना का बनाया होगा। जिन्होंने बनाया होगा उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि इतनी जल्‍दी उनके द्वारा बसायी गई उद्योग आधारित जीवनशैली एक दिन विलुप्‍त हो जाएगी। कुछ लोग रात को ही अपने अपने गंतव्‍य की ओर निकल लिए। मैंने सुबह ही निकलना बेहतर समझा। अल-सुबह मैंने भी अपनी बस पकड़ी और जिस रूट से आया था उसी रूट होते हुए अपने घर पहुंचा। यह यात्रा मेरे लिए चिरस्‍मरणीय रहेगी।

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(डॉ. ललित सिंह राजपुरोहित)
अधिकारी (राभा), एमआरपीएल
पोस्‍ट कुत्‍तेतूर,  वाया काटिपल्‍ला
मंगलूरु 575 030, कर्नाटक
lalitcallingyou@gmail.com

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