संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 27 : संस्मरण -: मिथक तोड़ दिया // कार्तिकेय त्रिपाठी ' राम '

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प्रविष्टि क्र. 27

संस्मरण -: मिथक तोड़ दिया

कार्तिकेय त्रिपाठी ' राम '


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आज से लगभग  16 वर्ष पहले मैं अपनी कुछ मौलिक कविताएं लेकर इन्दौर के आकाशवाणी केन्द्र प्रसारण  के लिए गया । यहां मुझे प्रसारण के संदर्भ में बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी एक अधिकारी से मिलवाया गया । कक्ष में प्रवेश व सामान्य अभिवादन के बाद हमने अपनी कविताओं का लिफाफा उन्हें सौंप दिया । उन्होंने शुरुआती कुछ कविताओं को सरसरी निगाह से  पढ़ते हुए मुझसे पूछा - " क्या किया है ?

हमने सीधा - सा जवाब दिया - ' एम.काँम. बी.एड.।'

ओफ ! .. एक ठंडी - सी श्वांस लेकर वे बोले - " तुम्हारी ये कविताएं रेडियो पर प्रसारण के योग्य नहीँ  हैं ।" यह कहकर उन्होंने कविताओं का लिफाफा मेरे हाथों में थमा दिया ।

हम उनके हाव - भाव देखकर समझ चुके थे कि उनके लिए संभवतः कविता लेखन की योग्यता कम से कम हिन्दी साहित्य में एम.ए./ पी.एच.डी. जरूरी है ,  और हमारी योग्यता उनके कविता के लिए चयनित किए गए मापदंड पर खरी नहीं उतर रही है ।

इसके बावजूद हमने हार नहीं मानी , और लगभग आठ माह बाद वे ही कविताएं (मात्र एक और कविता जोड़कर ) लिफाफे में डाल कर डाक से आकाशवाणी केन्द्र पर भेज दीं । हाँ , इस बार सिर्फ अपना नाम , पता और मौलिकता का प्रमाण पत्र तो लिखा पर अपनी शैक्षणिक योग्यता का उल्लेख नहीं किया ।

....और लगभग दो माह के अंतराल के बाद  मुझे आकाशवाणी केन्द्र से पत्र प्राप्त हुआ , कविताओं की रेकार्डिंग के लिए । 4 दिसम्बर 2001 को आकाशवाणी भवन में हमारी सात कविताओं को रेकार्ड किया गया ,  रेकार्डिंग कक्ष से बाहर निकलने के कुछ मिनटों बाद ही हमें उक्त रेकार्डिंग का पारिश्रमिक चेक भी प्रदान कर दिया गया । 6 दिसम्बर 2001 को हमारी कविताओं का प्रसारण आकाशवाणी केन्द्र से प्रसारित किया गया , जो उस मिथक को तोड़ने में सफल रहा कि काव्य लेखन के लिए हिन्दी साहित्य में डिग्री जरूरी नहीं होती ।

हमारी मंद - मंद मुस्कान इस घटना की साक्षी बन चुकी थी जिसने यह साबित कर दिया कि आत्मचिंतन व लेखन में आत्मविश्वास , दक्षता और धैर्य का सामंजस्य हो तो उसके सामने किसी डिग्री के कोई मायने नहीं होते । .... इति शुभम...।

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.✍ कार्तिकेय त्रिपाठी ' राम '

117 सी स्पेशल गांधीनगर, इन्दौर 453112

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