संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 34 : एक यात्रा त्रिवेणी परिसर की // उर्मिला शुक्ल

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प्रविष्टि क्र. 34

एक यात्रा त्रिवेणी परिसर की

उर्मिला शुक्ल

त्रिवेणी का नाम लेते ही हमारे जेहन में इलाहाबाद की ही तस्वीर उभरती है । इलाहाबाद तीन नदियों का मिलन स्थल और साथ ही साहित्य समागम का स्थल भी । हिन्दी साहित्य के न जाने कितने कवि, कहानीकार और नाटककारों की ये कर्मभूमि रही है । मगर मैं जिस त्रिवेणी की बात कर रही हॅूँ वो छत्तीसगढ़ में है और उल्लेखनीय बात ये है कि नदियों के संगम से उसका दूर-दूर तक कोई रिश्ता ही नहीं है । आप सोच रहे होंगे कि फिर ये कैसी त्रिवेणी है । तो ये त्रिवेणी है साहित्य की । साहित्य की तीन विधाओं से जुड़े छत्तीसगढ़ के तीन रचनाकारों की । ये त्रिवेणी परिसर स्थित है छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव में और इस साहित्यिक त्रिवेणी में शामिल है पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गजानन माधव मुक्तिबोध और डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र । पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी साहित्य जगत में अपने कथात्मक निबंधों के लिए ख्यात हैं तो मुक्तिबोध अपनी कविता के लिए खासकर अँधेरे में कविता के लिए, जिसमें व्यवस्था में व्याप्त अँधेरे में वे उजाले की तस्वीर बनाते नजर आते हैं और डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र अपने तुलसी दर्शन के लिए जिसे उन्होंने सघन शोध के पश्चात प्राप्त किया था । ये त्रिवेणी परिसर इन तीनों के व्यक्तित्व और कृतित्व की एक झाँकी प्रस्तुत करता है ।

हमारे महाविद्यालय के हिन्दी विभाग के छात्रों ने इच्छा जाहिर की थी कि उन्हें कहीं शैक्षणिक भ्रमण पर ले जाया जाय । सो तय ये हुआ कि उन्हें त्रिवेणी परिसर ले जाया जाय । मैं जब कभी भी कक्षा में उनसे ये प्रश्न करती कि मुक्तिबोध का संबंध छत्तीसगढ़ के किस जिले से है या मुकुटधर पान्डेय का जन्म कहाँ हुआ था तो कक्षा में मौन ही छा जाता था । उत्तर बताने के बाद भी अगले साल फिर वही मौन होता ? सो इस भ्रमण का एक उद्देश्य ये भी था कि विद्यार्थी अपने रचनाकारों को कक्षा में बैठकर पढ़ने के साथ-साथ उनसे जुड़े तथ्यों को देख कर समझे, उनके बारे में जानें । तय ये भी हुआ कि हम पहले खैरागढ़ जायेंगे क्योंकि खैरागढ़ बख्शी जी का जन्म स्थान है । फिर लौटते समय त्रिवेणी परिसर होते हुए वापस आयेंगे । सो हम सब एक छोटी बस से खैरागढ़ के लिये रवाना हुए । खैरागढ़ प्राचीन छत्तीसगढ़ के छत्तीसगढ़ों में से एक गढ़ है जिसकी ख्याति प्राचीन काल से लेकर आज तक विद्यमान है ।


रायपुर से लगभग तीन घंटे के सफर के बाद हम खैरागढ़ पहुँचे और सबसे पहले हम इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय गये । ये एक भव्य भवन में स्थित विश्वविद्यालय है । कारण ये पहले यहाँ के राजा का राजमहल हुआ करता था जिसे रानी पद्मवती देवी के विशेष आग्रह पर राजा ने विश्वविद्यालय के लिए दान में दिया था । विश्वविद्यालय परिसर होने के साथ ही ये शिक्षा जगत के लिए अनुकरणीय भी है । आज इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय भारत ही नहीं, एशिया में भी ख्यात हो चुका है । मगर हमारी नजर खैरागढ़ के इस प्राचीन राजमहल में तलाश रही थी ख्यात निबंधकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की स्मृतियाँ । उनका जन्म खैरागढ़ में ही हुआ था और इस राजमहल से उनका पीढ़ियों पुराना रिश्ता था । उनके प्रपितामह यहाँ राजकवि हुआ करते थे । इसी राजमहल परिसर में या उसके बाहर किसी भवन या घर में बख्शी जी का जन्म हुआ होगा । मगर आश्चर्य इस खैरागढ़ नगर में उस स्थान को चिन्हित ही नहीं किया गया है । मुझे याद हो आया कि खैरागढ़ तो बख्शी जी के मन में रचा बसा था, तभी वे इलाहाबाद छोड़कर लौट आये थे, जहाँ वे सरस्वती जैसी पत्रिका के सम्पादक थे । हिन्दी साहित्य में सरस्वती की ख्याति से भला कौन परिचित नहीं है । उन दिनों सरस्वती में छपना रचनाकार होने की पहचान हुआ करती थी । मगर सरस्वती के संपादक होने का गौरव भी उन्हें अपनी जन्मभूमि से अलग नहीं कर पाया और वे वापस लौट आये थे । ये बख्शी जी का खैरागढ़ के प्रति अपार प्रेम ही था जिसके चलते उनका मन कहीं और लगता ही नहीं था और वे उसे छोड़ नहीं पाते थे । यात्री में उन्होंने कहा भी है- '' खैरागढ़ मेरा जन्म स्थान है । जन्म ग्राम पर सभी को ममता होती है । खैरागढ़ पर मेरी ममता है । '' यात्री पृ. 93

उन्होंने अपनी जिस जन्मभूमि से अगाध प्रेम किया उसी जन्मभूमि में उनके नाम पर ऐसा कुछ भी नहीं है जहाँ उनकी स्मृतियों को सहेजा गया हो । बस उनकी याद के नाम पर प्राचीन विक्टोरिया हाई स्कूल, जहाँ वे पढ़ा करते थे और बाद में वहीं शिक्षक के रूप में अपनी सेवायें दी थीं वहीं उसी स्कूल को उनके नाम से अभिहित करके और उसी परिवार में उनकी मूर्ति लगाकर नगर प्रशासन ने अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान ली है । विद्यार्थियों ने भी ये सवाल किया- '' मैडम ये तो बख्शी जी की जन्मभूमि है फिर यहाँ उनकी जन्म स्थल कहीं नजर नहीं आया । '' उन्हें क्या जवाब देती मैं ?

इस दृष्टिकोण से । खैरागढ़ ने हमें बहुत निराश किया था । गनीमत है कि राजनांदगाँव स्थित त्रिवेणी परिसर में उनसे जुड़ी चीजों को सहेजा गया है । ये त्रिवेणी परिसर उसी दिग्विजय महाविद्यालय परिसर में स्थित है जहाँ कभी बख्शी जी प्राध्यापक हुआ करते थे । राजनांदगाँव में बख्शी जी ने अपने शिक्षकीय जीवन का अधिकांश समय व्यतीत किया था और यहाँ वे मास्टर जी के नाम से ख्यात थे ।

इसी त्रिवेणी परिसर और दिग्विजय महाविद्यालय से जुड़ा एक और नाम है वो नाम है गजानन माधव मुक्तिबोध । बख्शी जी की तरा मुक्तिबोध भी दिग्विजय महाविद्यालय में अध्यापक रहे । राजनांदगाँव और दिग्विजय महाविद्यालय की मुक्तिबोध के जीवन और उनके साहित्य में महत्वपूर्ण भूमिका रही है । त्रिवेणी परिसर में हमने उन चक्करदार सीढ़ियों को भी देखा जिसका जिक्र मुक्तिबोध अपनी कविता में करते हैं । उसी कमरे की खिड़की से परिसर में स्थित वो रानी तालाब भी नजर आता है जिसका जिक्र भी मुक्तिबोध अपनी कविताओं में बार-बार करते हैं । और उसे अपनी 'ब्रह्म राक्षस' कविता का आधार ही बना लेते हैं । आज भी उस तालाब के भीतर गहरे तक उतरती सीढ़ियों को देखा जा सकता है जिसकी अतल गहराई भी मुक्तिबोध का ब्रह्म राक्षस पैठा हुआ है ।

राजनांदगाँव मुक्तिबोध के जीवन का अहम हिस्सा रहा है । दिग्विजय महाविद्यालय में प्राध्यापक होने के बाद ही उनकी जिन्दगी कुछ व्यवस्थित हुई थी । उन्होंने अपनी विख्यात कवितायें ब्रह्म राक्षस ओरांग-ओरांग, अधेरे में की रचना भी यहीं की थी । उनकी इन कविताओं में मानो राजनांदगाँव बोलता है । उनकी कविताओं में बार-बार आते जंगल, बावड़ी और बरगद का वो गझिन पेड़ जिसकी शाखायें जड़ों की गहराई तक उतरती है । आज भी ये सब यहाँ दृश्यमान है । मुक्तिबोध की कविताओं में आयी चक्करदार सीढ़ियाँ, वो शांत गहरा और नीले जल वाला तालाब । आज ये सब राजनांदगाँव के ऐतिहासिक दस्तावेजों में समाहित है । अफसोस राजनांदगाँव में निवास का उनका ये सपना बहुत लम्बा नहीं चल पाया और मुक्तिबोध ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया ।

त्रिवेणी परिसर मुक्तिबोध के जीवन और उनकी रचनाओं में आये प्रतीकों और बिम्बों का जीवंत उदाहरण है । यहाँ उनकी रचनाओं के अतिरिक्त उनके निजी जीवन से जुड़ी चीजें भी संरक्षित की गई हैं जिसमें उनके विवाह की टोपी भी शामिल है । जरूर इस टोपी को संरक्षित करने में उनकी पत्नी शांता बाई का ही हाथ होगा । शांता बाई सही अर्थों में उनकी सहधर्मिणी रही हैं । इस त्रिवेणी परिसर में यूँ तो तीनों विभूतियों की यादें संरक्षित की गई है मगर यहाँ की दरोदीवार में, यहाँ की हवाओं और रानी तालाब के गहराईयों में मुक्तिबोध ही उभरतें हैं । कमरे की खिड़की से मैंने बाहर देखा, वहाँ से तालाब का सुनील जल नजर आ रहा था, वो तालाब जहाँ गहरे जल में धँसा ब्रह्म राक्षस अपने शरीर को मल-मल कर धो रहा है- ''बावड़ी की उन घनी गहराइयों में शून्य । ब्रह्म राक्षस एक पैठा है । ............. ब्रह्म राक्षस धिस रहा है देह । हाथ के पंजे बराबर । बाँह, छाती, मुँछ छपाछप । खूब करते साफ । फिर भी मैल फिर भी मैल । '' इस त्रिवेणी में शामिल पदुमलाल पुन्नलाल बख्शी और मुक्तिबोध की तो ये जन्मभूमि नहीं है । राजनांदगाँव कर्मभूमि है । मगर इसी त्रिवेणी की तीसरी कड़ी डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र की जन्मभूमि है । राजनांदगाँव संभ्रांत परिवार में जन्में डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र इन्होंने महाकाव्य नाटक निबंध और समीक्षाओं के साथ-साथ 'तुलसी दर्शन' नामक एक शोध ग्रंथ लिखा था, जिस पर इन्हें नागपुर विश्वविद्यालय ने डी.लिट. की उपाधि प्रदान की थी । मिश्र लम्बे समय तक रायगढ़ नरेश के दीवान भी रहे । इस दौरान इन्होंने रायगढ़ में अनेक साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन करवाया जिसमें देश के जाने माने रचनाकारों ने अपनी भागीदारी निभाई । इस परिसर में डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र की साहित्यिक कृतियों के साथ ही उनके जीवन से जुड़ी चीजों को भी सहेज कर रखा गया है । डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र को पुरातात्विक चीजों को संग्रहीत करने का भी शौक था । अपने जीवन काल में उन्होंने कई तरह के शंखों का संग्रह किया था, जिसमें पाँच करोड़ वर्ष पुराने शंख भी शामिल थे । इसके अतिरिक्त उनके पास करोड़ों वर्ष पुरानी अन्य चीजों का भी संग्रह था । जैसे सुपारी, लौंग, इलाइची और कत्था । इन्हें पुरातात्विक और दुर्लभ वस्तुओं से संग्रह का शौक हमेश ही रहा । डॉ. मिश्र जी की बहुत सी चीजों को यहाँ संग्रहित किया गया है ।

कभी-कभी सरकारें अच्छा काम कर जाती हैं । ये त्रिवेणी परिसर भी सरकार के अच्छे कार्य का उदाहरण है । संग्रहित वस्तुओं के कक्ष से नीचे उतरकर हम परिसर स्थित रानी तालाब को देखने गये । प्राचीन परिपाटी में बने उस तालाब का नीला जल और उसमें से उठती मदुल तरंगे उसकी गहराई का आभास दे रही थीं । तालाब के इर्द गिर्द आज भी कनेर और डहर के फूल लगे हुए हैं जिनका वर्णन मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं में किया है । हम देर तक तालाब के तीर पर खड़े मुक्तिबोध की कविताओं को याद करते रहे । फिर उन्हीं यादों में डूबे हुए हम लौट चले थे अपने गन्तव्य की ओर ।

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A -21

स्टील सिटी

रायपुर छत्तीसगढ़

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