संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 37 : यात्रा रामगढ़ (तल्ला) मीराकुटीर // धनञ्जय द्विवेदी

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प्रविष्टि क्र.  37

*यात्रा रामगढ़  (तल्ला) मीराकुटीर*

धनञ्जय द्विवेदी

यात्रा छोटी हो या बड़ी यात्रा होती है ; किन्तु जब यात्रा निश्चित लक्ष्य को लेकर समूह में की जाती है, तो उसका आनंद ही कुछ और होता है | *कहावत है कि जाड़ जाइ रूई राह चले दुई*

निश्चित है कि यात्रा समूह में और मजेदार हो जाती है तथा जब वह समूह एक उम्र के लोगों के साथ हो ऊपर से वह सभी एक दूसरे के दोस्त हों तो कहना ही क्या मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ हम सात लोग एक क्लास के एक साथ निकल पड़े *मीरा कुटीर* ( महादेवी वर्मा साहित्य संग्रहालय) की यात्रा पर |

यात्रा नैनीताल से रामगढ़ की थी कुल दूरी लगभग 28- 30 किलोमीटर की पहाड़ों पर यह छोटी सी एक दिन की यात्रा कितनी मजेदार ,कितनी ज्ञानवर्धक, और कितनी सुहावनी है यह धैर्य पूर्वक पढ़ने पर आप स्वयं जान जायेंगे ,थोड़ा संघर्ष भी है किन्तु संघर्ष तो यात्रा की हिस्सा होती है |

23 तारीख दिन शनिवार को डी. एस.बी कैम्पस नैनीताल में 24 तारीख़ दिन रविवार को रामगढ़ चलने के लिए प्रस्ताव रखा जाता है सात लोगों की टीम चलने को तैयार होती है, गाड़ी की जिम्मेदारी मुझे और अरविन्द सर को सौंप दी जाती है, शनिवार शाम को जब हमने रामू ठाकुर (गाड़ीवाले)से बात की तो उसने कहा मास्टर साहब( रामू मेरे रूम के बगल में रहता है और अरविन्द जी को मास्टर साहब कहता है) इस समय सीजन चल रहा है नैनीताल में 25-31 दिसम्बर तक आपको पूरे दिन के लिए गाडियाँ नहीं मिलेंगी सही भी था क्रिसमस से लेकर न्यू ईयर तक नैनीताल सैलानियों से भरा रहता है ,दिल्ली ,उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, कोलकत्ता ,नागालैंड, हरियाणा आदि स्थानों से लोग न्यूईयर मनाने नैनीताल आते है और नैनीताल के प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद लेते हैं, गाड़ीवानों के कमाई के प्रमुख दिन यही होते हैं तो इस कारण मुझे गाड़ी नहीं मिली |
अब मेरे पास दो रास्ते थे एक हम यात्रा निरस्त कर दें दूसरा हम नैनीताल से भवाली बस से जायें और भवाली से रामगढ़ के लिए टेक्सी करें और बहुत कुछ पैदल चलने के लिए भी तैयार रहें, मेरा मन तो जाने को था ही किन्तु मित्र अरविन्द और आनंद जी को पहला विकल्प अच्छा लगा और यात्रा पर न जाने की मंजूरी देकर भवाली रहनेवाले मित्रों को मैसेज कर दिया | किन्तु उधर से यात्रा पर चलने का अनुरोध आया अनुरोध में एक स्नेह था जिसके आगे हमें झुकना पड़ा और हम सभी बस से जाने को तैयार हो गये | *मुझे आज पता चला कि विनम्र निवेदन में कितनी शक्ति होती है वह भी जब निवेदन करने वाली कोई महिला मित्र हो तो बात ही कुछ और होती है*

रविवार सुबह 10 :00 हम नैनीताल (तल्लीताल) के बस अड्डे पर पहुंच कर बस करते हैं और घुमावदार पहाड़ियों के सुन्दर नजारे को देखते हुए भवाली पहुंचते हैं फिर वहाँ से एक छोटी गाड़ी वाले से बात करते हैं वह *मीरा कुटीर* तक छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है और कहता है कि आप लोगों को उधर से बस मिल जायेगी मैं उसकी बात अपने मित्र से करवाता हूँ वह गाड़ी ले जाकर उनके घर पर रोकता है, उनके घर पहुँचकर हम लोग चाय के लिए रूकते हैं काफी निवेदन पर भी ड्राइवर घर पर नहीं जाता है कहता है यही इन्तजार कर रहा हूँ, हम सभी को घर बहुत प्यारा लगता है , घर पर काली गाय, बिल्ली, और कुत्ते को देखकर मन प्रसन्न हो जाता है,बिल्ली और कुत्ते में आपसी प्रेम देखकर तो हम निःशब्द हो जाते हैं ,हम सभी पानी पीते हैं ड्राइंग रूम में जब चाय पीने के लिए जाते हैं तो वहाँ की सजावट ,बड़े ही ढंग से रखी हुई एक-एक चीजें अपनी ओर आकर्षित करती हैं,फिर माँ के हाथ की गर्म पकौड़ियाँ और उसके साथ में बनाई गयी चटनी के स्वाद का वर्णन तो अवर्णनीय हैं ,आंटी अंकल तो मम्मी पापा के प्रतिरूप स्नेह के सागर थे, हम यहाँ अधिक नहीं रुक पाये क्योंकि घड़ी की सुई टिक- टिक करती बहुत ही तेजी के साथ चल रही थी अविलम्ब हमें रामगढ़ पहुंचना था हम सभी चल दिए और कुछ ही समय में हम *गागरेश्वर* पहुंच गये वहाँ से बर्फ से ढकी हुई हिमालय की चोटियों पर सुबह की सुनहली किरणें अपनी आभा बिखेरती हुई दिखाई दीं ,कितना सुन्दर दृश्य था जी करता था दूर दिख रहीं इन चोटियों पर उड़कर पहुंच जाऊं और इन श्वेत सुनहरे बर्फ को बांहों में समेट लूं, लेकिन मैं गया नहीं क्यों कि जा नहीं सकता था या फिर गाड़ी में बैठी हुई सुन्दर परियों को छोड़ना नहीं चाह रहा था आप जो समझें |

गाड़ी चलती रही हम पहाड़ पर सीढ़ीनुमा बने खेतों को निहारते गये और यहाँ के जीवन की कठिनता की कल्पना करते गये और कितनी जल्दी मंजिल पर पहुंच गये पता नहीं चला ,ड्राइवर ने गाड़ी रोकी और कहा कि आप पहुंच गये, हम सभी उतरे, किराया लेकर वह चला गया वहाँ पहुंच कर पता चला कि संग्रहालय तो रविवार को बंद रहता है ,वहाँ हमें कोई भी नहीं दिख रहा था हम बाहर से ही फोटो सूट कर नीचे उतर आये |

सच है आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है,हम पास पड़ोस में खोज करने लगे और एक माता जी को खोजने में कामयाब रहे, माता जी को नमस्कार कर हमने उनसे बात की तो उन्होंने बताया की संग्रहालय का कर्मचारी ऊपर उस मकान में रहता है आप जाकर उससे मिलें आप लोग दूर से आये हुए लगते हैं वह जरूर दिखा देगा ,खैर हम लोग बहुत दूर से नहीं गये थे किन्तु बाहर के होने के कारण भाषा और बोली से दूर के लगते थे, भवाली के दो मित्र स्थानीय लगते थे और उनके पिता क्षेत्र के सम्मानित आदमी थे तो परिचय बताने पर महिला ने कहा कि मैं उन्हें जानती हूँ, हम कर्मचारी के घर पहुंच गये सबसे पहले मैं ही पहुंचा वहाँ उनकी पत्नी मिली उनसे मेरी बातचीत हुई. उन्होंने पहले तो कहा कि आज तो छुट्टी है फिर निवेदन करने पर उन्होंने अपने छोटे बच्चे *पंकज बिष्ट* को चाभी देकर दिखाने को कहा पंकज छः में पढ़ता था और खुशदिल बच्चा थी शीघ्र ही हम लोगों मे ऐसे घुल मिल गया जैसे वर्षों की पहचान हो ,आखिर हम लोग संग्रहालय में प्रवेश कर गये, *यहाँ फिर एक बात स्पष्ट हुई, महापुरुषों की कर्म स्थली में उनके गुणों का वास होता है, महादेवी जी के उदारता और विशाल हृदय की छाया यहाँ के लोगों में आज भी है जिस कारण छुट्टी के दिन भी हमें संग्रहालय देखने का अवसर मिला*

सन् 1936 ई० में महादेवी वर्मा जी ने ग्रीष्म कालीन प्रवास के लिए *रामगढ़*के *उमागढ़*गाँव के *देवीधार*में अपना भवन बनवाया था और उसका नाम *मीरा कुटीर* रखा 1965 तक वह गर्मियों में राम गढ़ ही रहती थी,
महादेवी जी ने यहीं पर रहकर दीपशिखा, श्रृंखला की कड़ियाँ,अतीत के चलचित्र, कुछ रेखा चित्र आदि रचनाएँ की थी,
सुमित्रा ननंदन पंत की प्रकृत सम्बन्धी रचनाएँ धर्मवीर भारती के यात्रा संस्मरण,इलाचन्द्र जोशी का उपन्यास ऋतुचक्र जासी कालजयी रचनाएँ यहीं मीरा कुटीर से निकली हैं |

वर्मा जी के भवन मीरा कुटीर का *महादेवी साहित्य संग्रहालय* के नाम से उद्घाटन 6 अप्रैल सन् 1996ई० तद्नुसार शनिवार २४ गते चैत्र श्री सम्वत् २०५३ को हमारे तेजस्वी चिन्तक कथाकार *श्री निर्मल वर्मा* तथा कवि विचारक अशोक वाजपेयी द्वारा सम्पन्न हुआ, इस समय *प्रवीण कुमार* जिला अधिकारी नैनीताल अध्यक्ष थे तथा *लक्ष्मण सिंह* 'बटरोही' अध्यक्ष हिन्दी विभाग कुमाऊं विश्वविद्यालय परिसर नैनीताल सचिव थे |
इसी दिन 6अप्रैल 1996 ई० को स्वर्गीय महादेवी वर्मा सन्1907-1987 ई० की मूर्ति का अनावरण *मंजुला टोलिया द्वारा किया गया था|

आज भी महादेवी जी की लेखन कार्य की मेज, पानी गर्म करने की अंगीठी, सुराही रखने का स्टेंड, कपड़े टांगने के स्टेंड, जरूरी कागजों की संदूक, प्रयोग में लाये लाये जाने वाले बर्तन आदि बहुत सी सुरक्षित रखी उनकी वस्तुएँ बरबस अपनी ओर ध्यान आकर्षित करती हैं तथा महादेवी जी के वैभव और कर्मशीलता को दिखाती हैं | आपके घर के बगल प्राइमरी पाठशाला भी है जिसमें ये बच्चों को पढ़ाती थी इतना ही नहीं हर साल दो चार लड़ियों को आप इलाहाबाद लाकर पढ़ाती थी जो कालांतर में अध्यापिका बनी है, घर के अनपढ़ नौकर को भी एम. ए तक शिक्षा दिलाती हैं|
महादेवी जी द्वारा प्रवास के लिए चुनी गया उमागढ़ गाँव प्राकृतिक सौन्दर्य से पूर्ण है यहाँ से हिमालय की बर्फीली चोटियां स्पष्ट दिखायी पड़ती हैं हिमालय के प्रति महादेवी जो को बड़ी आसक्ति थी *पथ के साथी* संग्रह में आपने स्वयं कहा है कि- *हिमालय के प्रति मेरी आसक्ति जन्मजात है उसके पर्वतीय अंचलो में भी मौन हिमानी और मुखर निर्झरों, निर्जन वन और कलरव भरे आकाश वाला रामगढ़ मुझे विशेष रूप से आकर्षित करता है*
यहीं पर शैलेश मटियानी पुस्तकालय भी है

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