संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 40 : संस्मरणात्मक कहानी // चरित्रहीन // धनञ्जय द्विवेदी

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प्रविष्टि क्र. 40

*संस्मरणात्मक कहानी*

         *चरित्रहीन*

धनञ्जय द्विवेदी

कहानी का शीर्षक पढ़कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मैं क्या लिखने वाला हूँ ; आपका अंदाजा लगाकर सोचना और मेरा लिखना एक ही हो कोई जरूरी नहीं है और यह भी जरूरी नहीं है कि एक न हो , हो सकता है जो आप सोच रहे हों मैं वही लिखनेवाला हूँ ,या वह लिखनेवाला हूँ जो आप नहीं सोच सकते है , यह भी हो सकता है की आपके सोच की उड़ान हमारी कहानी से बहुत ऊपर हो और आपको मेरी कहानी निम्नस्तरीय लगे। खैर जो भी हो आप चाहे मेरी कहानी पढ़ें या पहले यह सोच लें कि मैं क्या लिखनेवाला हूँ फिर पढ़े , चाहे पढ़कर तब सोचें कि मैंने क्या लिखा है लेकिन पढ़ें जरूर आपका सोचकर पढ़ना या पढ़कर सोचना दोनो समाज के लिए हितकर है , उस सरोज के लिए हितकर है।"

नहर पर पहुँचकर तुलसी ने कपड़े धुलने के लिए अभी गट्ठर खोले ही थे कि निब्बर दौड़ता हुआ आता है और हाँफते हुए तुलसी के बगल खड़ा हो जाता हैं -

तुलसी:- तुमसे कितनी बार कहा कि दौड़ते हुए नहर तक मत आया कर एक तो बढ़ती महंगाई में तुझे सही से खाना नसीब नहीं होता है दूसरे तू दौड़ दौड़कर सारी चर्बी गला डालता है कैसा सींक की तरह हो गया है। मुझे तो दादा ने दसवीं पढ़ा दिया था; किन्तु मुझसे तो यह खर्च भी नहीं उठ पता कि तुम्हें कुछ पढ़ा-लिखा दूं साहूकार के ब्याज ने तो कमर तोड़ रखी है, कहता है कि तुम्हारे दादा ने लिया था देना तो पड़ेगा ही। मुझे याद है दादा रात को खाने बैठते थे तो कहते थे कि बेटा मैं ज्यादा तो नहीं कमा पाया लेकिन यह भी नहीं की मरकर तुम्हें कर्ज की बोझ में दबा जाऊंगा तब मैं कहता था दादा ऐसा मत बोलो आप तो अभी हजारों साल और जियोगे और वे हँसकर कहते कितना भोला है तू। दादा के जाने के बाद साहूकार ने रूपये मांगे मैंने पंचायत भी बिठाई लेकिन क्या फायदा हुआ पंचों ने फैसला कर दिया कि साहूकार अपनी बही पर झूठ थोड़े लिखेगा और हम दब गये कर्ज के बोझ से।
निब्बर :- (अब उसका हाँफना बन्द हो गया था) हम वैइसै दउरि कै नाय आयन हैं दादी कहिन है कि जाव पापा से कहि देव घरमा लक्षमी आयी है जल्दी चले आवैं।
तुलसी:-  (कपड़े समेटा हुआ ) एक साहूकार कम था छाती पर मूंग दलने के लिए जो दूसरी भगवान ने भेज दिया घर में लड़की के रूप में लड़की पूर्व जनम की साहूकार होती है जो कर्ज अदा करने आती है , निब्बर ई लाठी उठा और चल।

(घर पर औरतों की भीड़ लगी है छोटा सा आंगन ठसा-ठस भरा हुआ है ,हर औरत के मुंह से एक ही बात निकल रही है। इतनी सुन्दर लड़की तो आज तक मैंने नहीं देखी आखिर किसको पड़ी है यह मेरे खानदान में क्या पूरे गांव में भी इतना सुन्दर कोई नहीं है )

तुलसी :-(पत्नी के पास पंहुचकर) बच्ची को देखते हुए कहता है सचमुच परी है यह तो ,देखते ही सारी चिन्ता दूर हो गयी मेरी बच्ची शायद तुम ही मेरी भाग्य बनकर आयी हो।
पत्नी :- (मुस्कुराकर) हाँ जी सही कहत हौ
तुलसी :- (पत्नी के सिर पर स्नेहिल हाथ फेरकर घर से निकलकर सीधे साहूकार के पास पहुच जाता है) साहु जी कुछ रूपये दे दो घर में लड़की हुई है मैं ब्याज चुका दूंगा
साहु:- लड़का होता तो रूपये यह सोचकर दे देता कि तुम नहीं चुकाओगे को लड़का ही चुका देगा लेकिन लड़की तो परायी दौलत है उसके लिए ब्याज काहे ले रहे हो तुलसी छोड़ दो भगवान के भरोसे जीवित रही तो ठीक नाही तो .......

तुलसी :- ऐसा ना कहें साहु जी मैं अपनी जमीन गिरवी रख देता हूँ तुम्हारे पास कर्ज चुकाकर वापस ले लूंगा।

साहु:- ठीक है ले जाओ लिखा पढ़ी करके पाँच हजार रूपये देता है।
(तुलसी रूपये लेकर घर चला जाता है उसका जीवन कपड़े धोने और बच्चों की परिवरिस तथा साहु के कर्ज का व्याज चुकाने में घिसने लगता है, इधर लड़की जिसका नाम सरोज रखा गया है बड़ी होने लगती हैं तीन साल की होते होते उसके सुन्दरता की चर्चा पूरे गांव में फैल जाती है)

रतन सिंह:- पंडित जी सुना है तुलसिया कै बिटीवा बड़ी सुन्दर है।
पंडित सुखराम:- हाँ सब ईश्वर की देन है मैं कुछ दिन पहले कथा कहने गया था उसके घर सुन्दर के साथ तेज भी बहुत है।

रतन सिंह:- तुमहू पंडित भगवान की देन नाय तुलसी के मेहरारू कै देन है वह कोई बाभन ठाकुर से टकराइगै होई जवानी कै लज्जत पाइगै होई।
पंडित:- बात आप भी ठीक कहते हैं ठाकुर जी वैसे वह तुलसी की लड़की तो नहीं है।

रतन सिंह:- अरे पंडित जी ई नाय पूछेव कि हम काहे आयन है आपके पास,
पंडित:- कहिए क्यों आये हैं आप
रतन :- कालि घरे आय कै कथा सुनाइ दिहेव
पंडित:- जी ठाकुर साहब आपके कथा से ही तो हमारा जीवन चलता है साल में एक बार आपके यहाँ कथा कहने में जितना मिलता है उतना तो पूरे साल गाँव में घूमघूम कर कथा कहने पर भी नहीं मिलता है मैं सुबह ही पंहुच जाऊंगा।
रतन सिंह :- ( घर वापस आकर ) अरें छोटकी (तुलसी की पत्नी) तुम हियां कहा कहव का काम है
छोटकी:-दादा सरोज नाय मानिस जिद करै लागि कि दहिउ भात खाब तौ हम कहेन कि चल ठकुराइन से मागि लाई।
रतन सिंह:- अच्छा सरोजा भी आयी है , कहाँ है तुमतो बिटिया का लुकवाय कै रखे हो।
छोटकी :- नाही दादा ! सरोज ...... वो सरोजवा कहाँ गयी रे ......
सरोज :- (दौड़ती हुई आकर खड़ी हो जाती है) सुन्दर मृग सी चंचल आँखे, चेहरे पर तेज होंठों पर निःश्छल मुस्कान पहने हुए कपड़े पुराने किन्तु साफ- सुथरे किसी भी व्यक्ति को उसकी छबि सहज ही अपनी ओर आकर्षित करती थी।

रतन सिंह:-बहुत सुन्दर बिटिया है|
छोटकी :- हाँ दादा इनके पापा कहत हैं कि बिटिया का पढ़ाइब।

ठकुराइन:- (अन्दर से चिल्लाकर) अरे सब मटियामेट होइगा सब अपवित्र होइगा अपना महरानी बतियाय बाझी हैं औ बिटिया रसोई छुई लिहिस ,काहे न छुइलेई तुलसी कै बिटिया होई तब तो भेद भाव जाने , (दही लाकर देकर ) जाओ बिटिया का सलीका सिखाव
छोटकी :- चली जाती है।
रतन सिंह:- अच्छा ठीक है रसोई फिर से बनाई लेव।
ठकुराइन:- हां औ तुम चालीस के होइगेव है नैन मटक्का नाय गा, औ छोटकी तो .... भगवान जाने केहकै बिटिया होई ...तुलसी बेचारा....
इसतरह तुलसी का परिवार तमाम उपेक्षाओं से दिन प्रतिदिन घिरता रहा छोटकी हर तरह से सचरित्र होते हुए भी गाँव समाज में चरित्रहीन घोषित हो गयी सरोज गाँव के ही स्कूल में पढ़ने लगी अपनी तेज बुद्धि और अथक मेहनत तथा पिता द्वारा दी गयी शिक्षा से वह दिन प्रतिदिन अपने को संवारती गयी तुलसी बहुत खुश रहने लगा उसे लगने लगा कि उसका दसवीं तक पढ़ना आज सफल हो रहा है,सरोज भी अब समझदार होने लगी थी उसे अपने जाति का भान हो गया था कारण बचपन से पायी हुई उपेक्षा को सुनसुन कर वह जान गयी थी कि किससे कैसे बाते करनी चाहिए कहाँ बैठना चाहिए कैसे रहना चाहिए आदि गुण उसमें सहसा ऐसे आ गये थे जैसे बरसात में तालाब लबालब जल से भर जाता है। अब सरोज स्कूल से कॉलेज में पहुंच गयी थी। उसका सौन्दर्य दिनप्रतिदिन निखरता चला जा रहा था। अब सरोज उपेक्षा की नहीं बल्कि सबके मन को आकर्षित करने वाली हो गयी थी समाज में ऐसा कोई नहीं था जो सरोज से आकर्षित न हो, वासना से ग्रसित कामी लोग उसके सौन्दर्य को देखकर मुग्ध हो रहे थे ,उसे पाने के लिए छल-बल धन का प्रयोग कर रहे थे ,तो शुद्ध सात्विक मानसिकता वाले गुरूजन और उसके परिवारजन उसके बुद्धि ,प्रतिभा, लगन और अभ्यास से मुग्ध थे, देखते-देखते सबको मोहित करती हुई सरोज हाईस्कूल में कॉलेज में प्रथम स्थान के साथ पास हो गयी पिता ने मिठाई बांटी और इसी वर्ष तुलसी का खेत जो गिरवी रखा था ब्याज के बढ़ने के कारण साहु के हाथ बिक गया तुलसी भूमिहीन हो गया उसके लिए यह वर्ष हर्ष और विषाद का संगम बन गया देवी स्वरूप लड़की के उन्नति का और मां स्वरूपा धरती के जाने के हर्ष और शोक में तुलसी यह नहीं जान सका कि वह जी रहा है या मर रहा है वह जिन्दा तो रहा लेकिन आर्थिक स्थिति नाजुक हो गयी वह मजदूर बनकर रह गया ; आज तुलसी को कर्ज देने वाले बहुत थे|)
सरोज:- पिता जी आप चिन्ता न करें मैं हूँ न सब संभाल लूंगी आप देखना जितनी जमीन आपकी गयी है मैं एक दिन उससे अधिक आपके चरणों में समर्पित करूंगी पिताजी.......
तुलसी :- हाँ बेटी तुम ठीक कहती हो ईश्वर तुम्हें इन भेड़ियों से बचायें, इन्हें तो सिर्फ नोचना आता है , शरीर किसका है इनसे नहीं मतलब इन्हें सिर्फ अपनी भूख मिटानी आती है मुझे भी नोचा है इन सामाजिक भेड़ियों नें लेकिन जब तुम्हारे बारे में सोचता हूँ तो रूह काँप जाती हैं ईश्वर रक्षा करें........

सरोज :- पिता जी ?
तुलसी :- जाओ बेटी आराम करो
सरोज :- चली जाती है। जाते हुए कहती है सुबह साहु से मिलती हूँ
तुलसी:- नहीं बेटी नहीं

रमेश:- (गाँव के पंडित जी का लड़का उन्नत भाल, लम्बी भुजाएँ,घुंघराले बाल, बड़ी- बड़ी कोरदार आँखें ,चौड़ा वक्षस्थल हर तरह से एक आकर्षक सत्रह वर्षीय किशोर बालक सरोज से एक कक्षा आगे और सरोज का प्रेमी हलांकि इसने सरोज को अभी यह नहीं बताया है वह उसे प्रेम करता है)
पिता जी साहु नें तुलसी चाचा के साथ गलत किया है ,तुलसी चाचा मूल से कई गुना ब्याज साहु को दे चुके थे और ब्याज तो दे ही रहे थे तो साहु ने उनका खेत क्यों ले लिया ?

पंडित :- रमेश तुम नहीं समझते हो साहु ने तुलसी का खेत लेकर सरोज को उसके पास आने पर मजबूर किया है।
रमेश :- मतलब?
पंडित :- कुछ नहीं, जाओ पढ़ाई करो, तुलसिया के अधिक शुभचिन्तक मत बनो, जो बोयेगा वही काटेगा, बेटी को कलेक्टर बनाएगा....

अगले दिन रमेश सुबह-सुबह खेत को जा रहा था कि उसे सरोज साहु के घर के तरफ जाती हुई दिखाई दी रमेश के हृदय की धड़कन बढ़ गयी उसे पिता की कही बात याद आने लगी "साहु ने सरोज को पाने के लिए तुलसी का खेत लिया है "यद्यपि रमेश सरोज को प्यार करता था लेकिन वह कभी भी सरोज से इससे पहले बातचीत नहीं की थी लेकिन आज उसका पुरूषत्व जाग उठा उसने जोर से आवाज लगाई सरोज .. ओ सरोज ....!
सरोज:- अरे ! पंडित जी आप ? आप बोलते भी हैं ?
रमेश :- सरोज मजाक छोड़ो , यह बताओ कहाँ जा रही हो तुम
सरोज:- साहु के घर
रमेश:- (एकदम पागलों के भाँति) नहीं सरोज नहीं तुम वहाँ नहीं जाओगी वह सत्तर साल का बूढ़ा खूसट यही चाहता ही है कि ....... नहीं मैं तुम्हें वहाँ नहीं जाने दूंगा, मैं नहीं चाहता कि कोई तुम्हें .....

सरोज:- पंडित जी आपको क्या हो गया ? साहु क्या चाहता है? आप क्या नहीं चाहते कि मुझे कोई ? और एक प्रश्न और आप किस अधिकार से मुझे वहाँ नहीं जानें देंगे?
(यद्यपि आखिरी प्रश्न सरोज ने इसलिए पूछा था क्योंकि रमेश की बातों से उसे लगा कि रमेश उसकी स्वतंत्रता में दखल देना चाहता है)

रमेश:- क्योंकि मैं तुमसे...... जाने दो उससे क्या बस तुम वहाँ न जाओं मेरा निवेदन है।

सरोज :- निवेदन पंडित कबसे निवेदन करने लगे उन्हें तो सिर्फ नियम और कर्मकांड बताकर मनुष्य को रूढ़िवादिता की बेड़ी में जकड़ना आता है बस और मेरी समझ से आप भी वही कर रहे हैं, आपके प्रथम मधुर सम्भाषण से मैं तिप्त हुई पंडितजी अब बस ही करें हम छोटी जातियों पर अपना अधिकार समझना यह भूल है आपकी अब हम स्वतंत्र है स्वयं कुछ सोचने और करने की क्षमता रखते हैं वे दिन उड़ गए जब नया भोजन करने के लिए भी पंडितों से शुभ मुहूर्त पूछकर निवाला मुंह में डाला जाता था।
रमेश :- (अवाक सुनता रहा फिर बोला) जाओ लेकिन जब कभी हमारी जरूरत हो हमारे पास आ जाना पंडित सबके लिए उदार और सहृदयी होते हैं, तुम तो .....खैर जाओ ईश्वर भला करें
सरोज साहु के घर के तरफ चल देती है किन्तु रमेश की बातें उसके कानों में अभी भी गूंज रही हैं वह विचारमग्न है कैसा आकर्षक व्यक्तित्व है रमेश का कोई भी अनायास उसके व्यक्तित्व का मुरीद हो जाये लेकिन जातिगत प्रभाव नहीं गया ऐसे कैसे किसी को रोक सकता है कहीं जाने से ? कहीं ऐसा तो नहीं कि रमेश ....... नहीं मैं यह कैसे सोचूं वह पंडित है लेकिन यदि यह सच है तब तो मैंने बहुत गलत किया .........साहु के घर पहुंचकर दरवाजे पर दस्तक देती है......

साहु:- अन्दर से कौन ?
सरोज :- मैं सरोज
साहु:- (तुरंत उठकर दरवाजा खोलता है ) आइए कबसे तुम्हारी राह देख रहे थे

सरोज:- साहु जी आपसे एक विनती करने आयी हूँ आप पिताजी की जमीन वापस कर दें मैं वादा करती हूँ की समय पर आपका ब्याज चुकाती रहूंगी और मूल धन भी कुछ समय पश्चात् अदा कर दूंगी, मुझे विश्वास है कि आप मेरी बात समझेंगे आप वृद्ध और सहृदय हैं।
साहु:- हाँ सरोज तुम ठीक ही कहती हो हम वृद्ध के साथ साथ सहृदय भी हैं तभी तो जबसे तुम तीन साल की हो और मेरी पत्नी मर गयी तबसे तुम्हारे लिए अपने दिल में जगह बना कर रखे हैं बस एक बार तुम मेरे हृदय की सम्राज्ञी बन जाओ फिर तुम्हारे पिता के खेत क्या जो तुम कहोगी वह सब कर देंगे।
सरोज :- पांव पटकर नीच जलील मेरे पिता से बड़े होकर भी ऐसी सोच रखते हों रख लो मेरी जमीन मैं अद़ालत जाऊँगी।

गुस्साई सरोज लौटकर घर आती है आज वह किसी ये कुछ बात नहीं करती है पिता के बहुत पूछने पर भी इतना ही कहती है की साहु नहीं माना और सीधे अपने बिस्तर पर लेट जाती है उसे साहु और रमेश की बातें याद आती हैं। उसे रमेश से झगड़कर साहु के घर जाने का बहुत पश्चाताप होता है। सरोज को बार बार रमेश की वह बात याद आती है क्योंकि मैं तुमसे .......... हाँ रमेश क्या तुम मुझसे क्या आखिर कह क्यों नहीं दिया था की मैं तुमसे प्यार करता हूँ ,मैं आऊंगी तुम्हारे पास तुमने कहा था ना पंडितों का हृदय उदार होता है "तुम तो ...
.." मैं क्षमा मांगूंगी तो मान जाओगे न?
निब्बर :- बहनी पापा कै तबीयत बहुत खराब है।
सरोज :- क्या हुआ ?
निब्बर :- हमका लागत है कि खेत कै चिन्ता है
सरोज :- आह् !

तुलसी अस्पताल में भर्ती हो जाता है सरोज उसकी तीमारदारी में लग जाती है साहु का पत्र आता है कि तुम मान जाओ नहीं पूरी जिन्दगी तो एक .......... के लिए ही मान जाओ सरोज पत्र को फाड़कर फेंक देती है वह रमेश के घर उससे मिलने जाती है आज रमेश के घर जाते समय उसे उल्लास भी है और संदेह भी वह रमेश तो चाहने लगी है इसलिए रमेश से मिलने के लिए उतावली है लेकिन जैसे ही उसको अपने द्वारा रमेश के लिए कहे गये कटु वचन याद आते हैं वह सोचती है कही ऐसा तो नहीं कि रमेश नाराज हो गया हो फिर भी वह जाती है , पंडित जी से मिलकर रमेश को पूछती है और पता चलता है कि रमेश को उसी दिन पंडित जीने शहर पढ़ने के लिए भेज दिया है, वह अपने मन में गहरी पीड़ा लेकर लौटती है, और संघर्ष करते हुए जीने का निश्चय करती है ; परन्तु उसे साहु की की शर्त माननी पड़ती है फिर तो समाज के वह लोग जिसके घर की रसोई छूने पर सरोज को की मां को गाली मिली थी आज सरोज की मनुहार करने लगे उससे बड़े बड़े वादे करने लगें सरोज अब वह सरोज नहीं रह गयी थी परिस्थितियाँ ,प्यार मनुहार,दुलार आदि के कारण वह टूट चुकी थी और गाँव में बहुतों की अंकशायी बन चुकी थी

लगभग आठ वर्ष बाद रमेश गाँव वापस आता है रमेश के गाँव वापस आने पर पंडित जी को बहुत खुशी है कारण रमेश अब जे आर एफ की परीक्षा पास करके शोध कर रहा है कविता कहानी करना उसका शौक है, अच्छे साहित्यकारों में उसकी पैठ है, समाज में लोग उसे इज्जत से देखते हैं ,अब रमेश पिता के नाम से नहीं पिता रमेश के नाम से जानने लगे हैं।
रमेश:- पिताजी सरोज क्या कर रही है अब ? मैं उससे मिलना चाहता हूँ।
सुखराम:- बेटा उससे मिलने को तो छोड़ो किसी के सामने उसका नाम मत लो।
रमेश:- क्यों ऐसी कौन सी बात है।
सुखराम बेटा अब वह चरित्रहीन हो गयी है गाँव का कोई भलामानस ऐसा नहीं है जिसके साथ उसका नैनमटक्का न हो।
रमेश :- भलामानस?
सुखराम:- हाँ भलामानस ही ...

पिता की बात सुनकर रमेश का हृदय फट जाता है वह अपने चचेरे भाई से कहता है कि वह सरोज से मिलना चाहता है लेकिन वह भी यही कहता है कि रमेश क्या बकता है वह चरित्रहीन है उससे मिलोगे बात करोगे तुम कहाँ तुम कहाँ वह,
रमेश :- लेकिन उसने तुम्हारे साथ तो कुछ नहीं
सुनील:- रोककर अरे भाई मैंने भी एक बार.....
रमेश तब तो मुझे तुमसे भी बात नहीं करनी चाहिए तुम भी चरित्रहीन हो
सुनील :- मैं पुरूष हूँ
इस तरह रमेश सरोज से न मिलकर गाँव के कई व्यक्तियों से यह कहता है कि वह सरोज से मिलना चाहता है और सब यही कहते हैं कि तुम चरित्रवान हो वह चरित्रहीन है तुम्हारा उससे मिलना बात करना ठीक नहीं, साथ ही तुम्हें उससे मिलने के लिए दिल्ली जाना पड़ेगा यह सुनकर रमेश गाँव से पुनः शहर को जाने के लिए तैयार हो जाता है

सुखराम:- बेटा अचानक क्या हो गया कि अभी आये चार दिन भी नहीं रहे और फिर चल दिए?

रमेश:- पिताजी मैं चरित्रवान हूँ, और यहाँ सब चरित्रहीन है मैं चरित्रहीनों के बीच में कैसे रहूंगा ,कैसे उनसे बात करूंगा मुझे तो यहां एक मात्र सरोज चरित्रशीला लगती है मैं जा रहा हूँ उसके खोज में तुम चरित्रहीनों से दूर…

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