संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 46 : रेल यात्रा संस्मरण // मेरी पहली मुम्‍बई रेल यात्रा // डॉ० हरिश्‍चन्‍द्र शाक्‍य, डी0लिट्‌0

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प्रविष्टि क्र 46 :

रेल यात्रा संस्मरण

मेरी पहली मुम्‍बई रेल यात्रा


मेरे परम मित्र श्री देवेन्द्र कुमार वर्मा को मुख का कैंसर हो गया था। श्री रवीन्द्र नाथ वर्मा और श्री देवेन्द्र कुमार वर्मा जीवनदान प्रिंटिंग वर्क्स, मैनपुरी के स्वामी थे। दोनों ही लोगों ने मुझे मैनपुरी में स्थापित कराने में और समय-समय पर मेरी काफी मदद की थी। अठारह वर्ष की अल्पायु में मैंने घर की आर्थिक तंगहाली से ऊब कर फिल्म कलाकार बनने का सपना देखा था। एक लम्बी सहयोग राशि देकर मुझे आगरा के एक निर्माता-निर्देशक की एक फिल्म ‘‘जलतरंग’’ में एक प्रमुख भूमिका मिल गयी थी। उक्त फिल्म में मैंने काम भी किया था। निर्माता को दी गयी सहयोग राशि मेरे पिताजी ने अपनी आजीविका का एक मात्र साधन अपना पूरा खेत ही गिरवीं रखकर जुटायी थी। मगर दुर्भाग्य यह रहा कि यह फिल्म कभी पूरी नहीं हो पायी और मुझे अपने कार्य का पारिश्रमिक मिलना तो दूर रहा मुझे अपनी सहयोग राशि तक वापस नहीं मिल पायी। इसके बाद घर की आर्थिक स्थिति इतनी जर्जर हो गयी कि पूरा परिवार दाने-दाने को मुँहताज हो गया और मेहनत मजदूरी करके गुजारा करना पड़ा। अपने गाँव में घर पर ही आठ नौ वर्ष गुजारने के बाद सन् 1989 में मैं पत्रकारिता में रोजी रोटी तलाशने के उद्देश्य से मैनपुरी में आ गया था। कुछ प्रतिष्ठित अखबारों में मैंने अपनी सेवाएँ दीं। इसी दौरान भाई रवीन्द्र नाथ वर्मा व श्री देवेन्द्र कुमार वर्मा से मेरी दोस्ती हो गयी थी। इन लोगों ने मुझे अपने सगे भाई की तरह ही मान लिया था।

सन् 1995 में मैंने अपनी बहिन रतना शाक्य की शादी की तो व्यवस्था का भार मैंने इन दोनों भाइयों पर डाल दिया था। दोनों भाइयों ने पूरी लगन से मुझे अपना सहयोग प्रदान किया। मेरा छोटा भाई अजय शाक्य भी दोनों लोगों से बहुत प्रभावित हुआ। एक फिल्म में काम करने के बावजूद भी मैं अपने सपनों की नगरी मुम्बई में नहीं पहुँच पाया था। मेरे संघर्षों के कई वर्षों बाद मेरा अनुज अजय शाक्य फिल्म निर्देशक व कथा-पटकथा लेखक बनने का सपना लेकर मुम्बई चला गया था और वहीं रहकर संघर्षरत था।

सन् 1997 में भाई देवेन्द्र कुमार के गाल में एक छाला पड़ा जो ठीक होने में नहीं आया। ग्वालियर के कैंसर अस्पताल में डाक्टरों ने उन्हें कैंसर घोषित कर दिया। देवेन्द्र जी अपना इलाज मुम्बई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में कराना चाहते थे। देवेन्द्र जी ने मेरे भाई अजय शाक्य के पास मुम्बई जाने का निश्चय किया। रवीन्द्र नाथ वर्मा जी ने मुम्बई जाने वाली लश्कर एक्सप्रेस के चार आरक्षित टिकट मँगवा लिए। तीमारदारों के रूप में साथ जाने के लिए भाभी जी (देवेन्द्र जी की पत्नी), देवेन्द्र जी की बहिन श्रीमती मिथिलेश कुमारी शाक्य और मुझे तैयार किया गया। दिनांक 01-12-97 को श्रीमती मिथिलेश कुमारी शाक्य की मारुति वैन मरीज और दो तीमारदारों को साथ लेकर अपराह्न 3 बजे आगरा को रवाना हो गयी। देवेन्द्र कुमार वर्मा का पुत्र देवानन्द वर्मा भी उनके साथ गया था। दूसरी मारुति वैन रवीन्द्र नाथ जी वर्मा के परम मित्र श्री अनिल कुमार जैन (वर्धमान टूरिस्ट बस सर्विस, मैनपुरी के स्वामी) की जानी थी जिसमें मैं, रवीन्द्र नाथ वर्मा, उनके मित्रगण श्री सत्यनारायण तापड़िया व राम प्रकाश शाक्य जाने थे। मेरे अलावा अन्य सभी लोग वापस लौटने वाले थे। अनिल जैन दिन में किसी आवश्यक कार्य से करहल कस्बे में गये हुए थे और चार बजे अपराह्न लौटने का वादा कर गये थे। वे जब कहरल से लौटे तो रास्ते में सड़क कटी मिली और जाम लगा मिला। जब 5 बजे तक भी उनकी गाड़ी न लौटी रवीन्द्र नाथ वर्मा जी ने आनन फानन में किराये पर एक फियेट गाड़ी किराये पर ली।

हम लोगों को लश्कर एक्सप्रेस से मुम्बई जाना था और लश्कर एक्सप्रेस को आगरा केण्ट रेलवे स्टेशन से रात्रि के 8 बजे मुम्बई को रवाना होना था। तमाम व्यवधानों के बीच हम लोग सायं 6 बजे मैनपुरी से रवाना हो पाये। ड्राइवर ने फियेट गाड़ी हवा की चाल से उड़ानी शुरू कर दी किन्तु दुर्भाग्य ने पीछा नहीं छोड़ा। आगरा पहुँचते-पहुँचते सड़क पर जाम लगा मिल गया। जाम को पार करते-कराते हम लोग आगरा केण्ट रेलवे स्टेशन पर लश्कर एक्सप्रेस के मुम्बई रवाना हो जाने के आधा घण्टा बाद पहुँच पाये। टिकट बेकार न हो जाये इसलिए मेरे स्थान पर देवेन्द्र जी का पुत्र सोनू (देवानन्द वर्मा) उनके साथ चला गया था। मिथिलेश जी की मारुति वैन भी वहाँ नहीं मिली जिससे कुछ पता चल पाता। अन्ततः हम लोग निराश होकर वापस लौट पड़े। आगरा शहर पार कर एक ढाबे पर खाना खाया इसके बाद मैनपुरी लौट आये।

रवीन्द्र वर्मा जी मेरा मुम्बई जाना आवश्यक समझते थे। मैंने तो समझ लिया था कि मुम्बई मेरे भाग्य में अभी देखना लिखा नहीं है। इस बीच अजय का फिर फोन आया। रवीन्द्र वर्मा जी ने मेरे लौट आने का सारा वृतान्त बता दिया। अजय ने फोन पर फिर कहा कि भाई साहब को अवश्य भेज दीजिए। रवीन्द्र वर्मा भी यह चाहते ही थे कि मैं अवश्य जाऊँ। अजय के आह्वान से उन्हें और बल मिल गया। उन्होंने फिर मेरा मुम्बई जाने का कार्यक्रम बना दिया। अबकी बार इतना समय न मिल पाया कि आरक्षित टिकट मँगवाया जा सकता।

4 दिसम्बर 1997 को प्रातः 6 बजे अनिल कुमार जैन मुझे अपनी मारुति वैन से आगरा केण्ट रेलवे स्टेशन पहुँचाने के लिए रवाना हुए। रवीन्द्र वर्मा जी भी साथ थे। मुझे पंजाब मेल गाड़ी पकड़नी थी जो प्रातः 8.30 बजे आगरा पहुँचती थी। हम लोग सही समय पर आगरा केण्ट रेलवे स्टेशन पर पहुँच गये। गाड़ी कुछ लेट हो गयी थी। हल्का-फुल्का नाश्ता कराके रवीन्द्र भाई ने मुझे पंजाब मेल के आरक्षित कोच में सामान्य द्वितीय श्रेणी का टिकट लेकर इस आशय से बैठाल दिया था कि यदि आगे चलकर कोई बर्थ खाली हुई तो कण्डक्टर द्वारा आरक्षण मिल जायेगा। मैं जीवन में पहली बार आरक्षित कोच में बैठकर यात्रा कर रहा था इसलिए मुझे कुछ घबराहट भी थी। इस तरह की यात्रा का कोई अनुभव भी नहीं था। खैर मैं आत्मविश्वास के साथ एक सीट पर बैठ गया। एक व्यक्ति मुरैना जा रहा था उसने मुझे प्लेटफार्म पर ही कहा था कि वह मुझे आरक्षण दिलाने में मदद करवा देगा। वह व्यक्ति भी मेरे साथ ही बैठा था। मेरी वेशभूषा तो अच्छी थी ही इसलिए आस पास बैठी अन्य सवारियाँ सहज ही मुझसे प्रभावित हो गयीं। कण्डक्टर से आरक्षण माँगने हेतु मैं मिला तो उसने बताया कि आज इस पूरी गाड़ी में कोई भी बर्थ खाली नहीं है। मैं यथा स्थान बैठ गया।

गाड़ी आगरा से कुछ आगे निकल चुकी थी। डिब्बे में टिकट चैक करने वाला उड़नदस्ता दल आया। दल के एक व्यक्ति ने मेरी अनारक्षित टिकट देखकर मुझसे 130 रुपये की रसीद कटाने को कहा। मैंने यह कहकर टाल दिया कि कण्डक्टर से मेरी बात हो गयी है। वह उड़नदस्ता दल मुझे किसी तरह छोड़ गया। मैंने मन ही मन अपनी बुद्धि और विवेक को काफी सराहा। डिब्बे में आस-पास बैठी सवारियाँ सगे सम्बन्धियों जैसा व्यवहार कर रही थीं। यदि कोई चाय खरीद कर पीता तो मुझे भी पिलाता। यदि कोई खाने की वस्तु खरीदकर खाता तो मुझे भी खिलाता। गाड़ी में अधिकृत हॉकर बार-बार कुछ न कुछ लेकर आ जाते थें यहाँ चाय ऐसी मिल रही थी जिसमें चीनी और चाय की पोटली साथ मिलती थी जिसे प्याले में डुबोकर घोलना पड़ता था। मुझे इस तरह की चाय पीने का पहले कोई अनुभव नहीं था।

आगरा से चलकर मैं धौलपुर, मुरैना, ग्वालियर आदि के पथरीले क्षेत्रों को देखता हुआ झाँसी पहुँचने ही वाला था कि टिकट चैक करने वाला दूसरा उड़नदस्ता दल आ गया। दल के एक सदस्य ने मेरी अनारक्षित टिकट देखकर 140 रुपये की रसीद कटवाने को कहा। मैंने सोचा कि इससे अच्छा तो मैं पहले ही कटवा लेता। 140 रुपये देकर मैं आरक्षित डिब्बे में बैठने का हकदार हो गया था। झाँसी पहुँच कर वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की याद आ गयी थी और कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियाँ, ‘‘बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी बाली रानी थी’’ स्वतः ही याद आ गयी थीं। वृन्दावन लाल वर्मा का प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास ‘‘झाँसी की रानी’’ भी मेरा पढ़ा हुआ था। झाँसी से आगे बढ़ने पर बीना, बबीना रेलवे स्टेशनें मिलीं। यहीं कहीं साँची रेलवे स्टेशन मिला। साँची एक विश्व प्रसिद्ध बौद्ध स्थली है यह विचार भी मन में आ गया। शाम होते-होते मैं भोपाल पहुँच गया। इन सभी शहरों को मैं पहली बार देख रहा था। मध्य प्रदेश में तो पहले मैंने पैर भी न रखा था।

इतनी लम्बी यात्रा में आस-पास बैठी हुई सवारियों से बिल्कुल पारिवारिक सम्बन्ध से हो गये थे। वे मुझे चाय नाश्ता भी कराते जाते थे। कभी-कभी मैं भी उन्हें कुछ खिला-पिला देता था। यद्यपि सफर में किसी अजनबी द्वारा दी गयी सामग्री खानी नहीं चाहिए किन्तु सामग्री तुरन्त मेरे सामने खरीदी जाती थी इसलिए खा लेने में कोई हर्ज नहीं समझी। एक व्यक्ति ने एक स्टेशन पर बड़ा पाव खरीदे तथा मैंने सैण्डविच। उस व्यक्ति ने बड़ा पाव मुझे भी खिलाये किन्तु मेरी सैण्डविच यह कहकर नहीं खायी कि उसे अच्छी नहीं लगती है।

लगभग सात बजे सायं बैरा भोजन का आर्डर माँगने आया तो मैंने एक थाली का आर्डर दे दिया। काफी देर तक वह भोजन नहीं लाया तो मैंने समझा कि भूल गया है। अन्ततः वह भोजन लाया और मैंने प्रेम से खाया। उस समय 20 रुपये की एक थाली मिली थी। इसके बाद मेरे पास वह व्यक्ति आया जिसका बर्थ पर आरक्षण था। उसने कहा कि भाई साहब यह सीट तो मेरी है। मुझे लगा कि किसी ने मेरे गाल पर तमाचा जड़ दिया है। उस सीट पर सुबह से कोई नहीं आया था इसलिए मैं सोच रहा था कि उस सीट वाला शायद यात्रा करने ही नहीं आया है। यदि ऐसा हुआ तो रात में चैन से सोने को मिल भी सकता है किन्तु दुर्भाग्य। उस व्यक्ति की दो सीटें आरक्षित थी। किन्तु बहुत दूर-दूर थीं। उसने मेरे पास बैठे एक दम्पत्ति से सीट बदल ली। इन लोगों ने मुझे तुरन्त सीट से उठा दिया। सामने की सीट पर बैठे व्यक्ति ने मुझ पर तरस खाकर कहा कि भाई साहब, आप मेरी सीट पर आ जाइए। मैं लेट जाऊँगा, आप भी मेरी सीट पर बैठे चलना। वह दिन में मुझसे काफी प्रभावित हो गया था। वह व्यक्ति लेट गया। मेरे बैठने योग्य जगह उसने छोड़ दी थी। मैं उसकी सीट पर बैठ गया और इसके बाद सभी लोग अपनी-अपनी सीटों पर सो गये। मैं सोच रहा था कि अब आराम से बैठा हुआ मुम्बई पहुँच जाऊँगा और मैं भी बैठे-बैठे ही सो गया।

रात ढलने को थी। गाड़ी अपनी रफ्तार पकड़े जा रही थी। मुझे यह पता ही न चला कि मेरी सीट पर लेटा व्यक्ति कब और किस स्टेशन पर उतर गया। अब सीट खाली पड़ी थी और मैं फिर भी ज्यों का त्यों बैठा हुआ था। दरअसल जो व्यक्ति लेटा हुआ था उसे मुम्बई नहीं जाना था इसलिए वह अपने गन्तव्य पर उतर पड़ा। मनमाड रेलवे स्टेशन पर एक व्यक्ति मेरे पास आया और उसने झकझोर कर मुझे जगाया और बोला, ‘‘ए भाई! उठो यह मेरी सीट है।’’ मैंने उससे कहा, ‘‘भाई साहब, आपकी है तो आप लेट जाइए, मैं इसी तरह बैठा चलूँगा। भोपाल से मैं इसी तरह बैठा चला आ रहा हूँ।’’ उस व्यक्ति को मुझ पर तनिक भी दया नहीं आयी। उसने कहा, ‘‘उठो भाई मेरे पास लेडीज सवारी है।’’ लेडीज सवारी का नाम सुनकर मैं उठने को मजबूर हो गया। उस सीट के सामने बीच वाली बर्थ पर बैठा व्यक्ति जाग गया था। उसने मुझे अपने पास बुलाकर बैठा लिया। वह व्यक्ति भी दिन में अच्छी तरह परिचित हो चुका था। जिस व्यक्ति ने सीट अपनी बताकर मुझे उठा दिया था वह आराम से पैर पसार कर लेट गया। मैंने देखा कि उसके साथ लेडीज सवारी का कहीं नामोनिशान तक नहीं। मैंने सोचा खैर कोई बात नहीं, जब सीट उसकी है तो मैं क्यों व्यर्थ झगडूँ। अगले स्टेशन पर जैसे ही गाड़ी रुकी एक व्यक्ति डिब्बे में चढ़ा। डिब्बे में उस समय बल्ब बुझे हुए थे और अँधेरा था। वह व्यक्ति टार्च से अपना सीट नंबर ढूँढ रहा था। मैंने पूछा क्या नंबर है भाई साहब। उसने मुझे जो नंबर बताया वह तो उसी सीट का था जिस पर से मैं अभी उठा दिया गया था। इसे भाग्य का खेल कहूँ या प्रभु की कृपा कि मुझे अपने अपमान का बदला लेने का तुरन्त अवसर मिल गया। मैंने नये आगन्तुक व्यक्ति से कहा, ‘‘इन महाशय को हटाइए। यह है आपकी सीट।’’ नवागन्तुक व्यक्ति ने सीट पर लेटे व्यक्ति को जगाया और कहा कि सीट उसकी है। उस पर लेटे धूर्त व्यक्ति ने टिकट दिखाने को कहा। नवागन्तुक व्यक्ति ने चुपचाप टिकट दिखा दी। वह लेटा हुआ व्यक्ति चुपचाप उठा और डिब्बे के फर्श पर अखबार बिछाकर लेट गया। मैंने उसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहा, ‘‘भाई साहब नमस्ते!’’ उस व्यक्ति पर घड़ों पानी पड़ गया। मैंने कहा, ‘‘क्यों भाई, यह सीट तो आपकी थी और आपके साथ लेडीज सवारी थी?’’ वह लम्पट व्यक्ति शर्म से मुँह झुकाये सिर्फ इतना कह पाया कि मेरा रिजर्वेशन कन्फर्म नहीं हो पाया।

मैं आराम से सीट पर बैठा हुआ था। मैं सोच रहा था कि संसार में कैसे-कैसे लोग होते हैं। एक वह व्यक्ति है जिसने अपनी धूर्तता से सीट पर से मुझे उठा दिया है और एक यह व्यक्ति है जिसने मुझे अपने पास बैठा लिया है। संसार में सारे लोग तो एक जैसे होते नहीं। भले, बुरे, स्वार्थी, परमार्थी सभी प्रकार के लोग धरती पर पाये जाते हैं। मैं इसी तरह बैठा यात्रा करता रहा और पंजाब मेल गाड़ी निरन्तर मुम्बई की ओर बढ़ती रही।

सबेरा होते-होते गाड़ी मुम्बई के प्रवेश द्वार कल्याण पर पहुँच चुकी थी। मैंने लोगों से पूछा कि दादर स्टेशन कितनी दूर है? लोगों ने बताया कि दादर स्टेशन तो बहुत दूर है बैठे रहिए। मैं एक-एक कर स्टेशनों को गिनने लगा। कल्याण के बाद ठाकुर्णी, डोम्बिबली, दिवा, मुम्बरा, कलवा, थाना, मुलुण्ड, भाण्डुप मार्ग, कन्जूर मार्ग, विक्रोली, घाटकोपर, विद्या विहार, कुर्ला, सायन, माटुंगा आदि रेलवे स्टेशनें और पड़ीं तब कहीं जाकर दादर रेलवे स्टेशन मिली। 24 घंटे गाड़ी में बैठे रहने के बाद 05-12-97 को मैं मुम्बई पहुँच चुका था। दादर स्टेशन पर उतरा तो एक भारी चहल-पहल और लोगों का हुजूम देखने को मिला। जो लोग गाड़ी में से उतरे सिर्फ वही गरम कपड़े पहने हुए थे। मुम्बई के लोग अधिकतर जींस में थे। उनके कपड़े अधिकतर सूती थे। मैंने प्लेटफार्म पर घूमकर अपने अनुज अजय शाक्य को तलाशा पर वह पूरे स्टेशन पर कहीं नहीं मिला। वह मुझे लेने आया तो था किन्तु मुझसे मुलाकात इसलिए नहीं हो सकी कि उसे मैनपुरी से रवीन्द्र वर्मा जी ने फोन पर बता दिया था कि मैं पंजाब मेल की सैकेण्ड क्लास की बॉगी में बैठा हूँ। वे मुझे आगरा में आरक्षित बॉगी में बैठाल गये थे किन्तु वे जानते थे कि मेरे पास आरक्षित टिकट तो है नहीं इसलिए रास्ते में कहीं न कहीं उतार दिया जाऊँगा और फिर सैकेण्ड क्लास के डिब्बे में बैठ जाऊँगा। अजय ने मुझे द्वितीय श्रेणी के डिब्बे में ही तलाशा। जब मैं वहाँ नहीं मिला तो अजय ने सोचा कि मैं चौबीस घंटे का सफर करके आया हूँ इसलिए कहीं सो गया हूँ। मैं जब गाड़ी में से उतरा हुआ नहीं मिला तो वह उसी गाड़ी में मुझे खोजने के आशय से सवार हो गया और मुझे खोजता हुआ विक्टोरिया टर्मिनल स्टेशन पर पहुँचा।

मैं दादर स्टेशन के प्लेट फार्म पर घूमता हुआ अजय को तलाश रहा था। अजय को कहीं भी न पाकर मुझे कुछ खीज तो आ ही रही थी साथ ही साथ इतने बड़े महानगर में अकेले रह जाने का भय भी सता रहा था। प्लेट फार्म पर मैं खड़ा हुआ था तभी एक युवक और एक युवती का जोड़ा मेरे सामने आया। युवक के हाथ में अंग्रेजी भाषा का एक उपन्यास था। लड़की आधुनिक परिधानों से सुसज्जित थी जो अति खूबसूरत फिल्मी तारिका सी लग रही थी। लड़की बदन में ऐसे तंग वस्त्र पहने थी जिनमें शरीर के उभार स्पष्ट नजर आ रहे थे। टाँगों में वह पेटीकोट जैसा ऐसा वस्त्र पहने थी जो आगे कटा हुआ था और जिसमें से उसकी गोरी मांसल पिण्डलियों का कुछ भाग दिख जाता था। ऐसा वस्त्र मैंने सबसे पहले फिल्मों में फिल्मी तारिकाओं को पहने देखा था। लड़के ने उपन्यास लड़की को थमा दिया और इसके बाद तमाम भीड़ के सामने ही लड़की का चुम्बन ले लिया। लड़की ने भी लड़के का चुम्बन ले लिया। यह दृश्य देख मेरे बदन में सनसनी सी दौड़ गयी। यहाँ यह ध्यातव्य है कि युवक और युवती का यह जोड़ा शादीशुदा नहीं था। मुम्बई की संस्कृति का प्रथम दर्शन मुझे हो गया था। ऐसा दृश्य यदि मेरे इलाके में देखने को मिलता तो सचमुच गजब हो जाता। यहाँ कोई उन लोगों को देखते हुए भी नहीं देख रहा था।

अजय को खोजता हुआ मैं स्टेशन पर बने पुल पर चढ़ गया। पुल पार करके मैं पश्चिम रेलवे के दादर स्टेशन पर आ गया था। दादर दरअसल वह स्टेशन है जहाँ मध्य रेलवे और पश्चिम रेलवे दोनों के रूट इकट्ठे हो जाते हैं और इसके बाद पुनः फिर अलग हो जाते हैं। मध्य रेलवे विक्टोरिया टर्मिनल को चली जाती है और पश्चिम रेलवे चर्चगेट रेलवे स्टेशन को चली जाती है। अन्ततः मैं पुल के माध्यम से ही मुम्बई मार्केट में निकल गया। दादर स्टेशन के निकट ही एक जगह पूजा में चढ़ाने हेतु नाना प्रकार के फूल बिक रहे थे। यहाँ बाजार में मैं कोई पी0सी0ओ0 तलाश रहा था जिसके माध्यम से अजय को फोन कर सकूँ किन्तु मुझे कोई भी दुकान खुली न मिलती। मैं चलते-चलते बाजार में काफी दूर चला गया। मुझे यह मालूम था कि यहीं कहीं रंजीत स्टूडियो है। अजानकारी में मुँह उठाये आखिर कहाँ तक चलता रहता। मन में खीजता हुआ मैं पुनः दादर स्टेशन की ओर ही लौट आया। अब तक यहाँ मुझे एक पी0सी0ओ0 की दुकान खुली मिल गयी। यहाँ आकर मैंने अजय को फोन किया तो वह न जाने कहाँ मिल गया। बात दरअसल यह थी कि अजय ने रवीन्द्र वर्मा जी को मुझे देने हेतु जब फोन नंबर नोट कराये तब रवीन्द्र जी ने सही तरह न सुन पाने के कारण सही नोट नहीं कर पाये थे। वही गलत फोन नंबर लिये मैं मुम्बई को रवाना हो गया था। मैंने अजय के द्वारा प्रेषित दोनों फोन नंबर डायल किये तो पता चला कि दोनों ही रोंग नम्बर हैं। मेरे मन में आया कि अब क्या करूँ। मैं सोच रहा था कि मैं कैसा उल्लू बन गया हूँ इस मुम्बई नाम की माया नगरी में। मुम्बई जहाँ रहने का मैंने कभी सपना देखा था आज वह मुझको बिल्कुल अजनबी लग रही थी। अन्ततः मुझे याद आया कि मेरी डायरी में अजय के द्वारा बहुत पहले दिया गया एक फोन नंबर लिखा हुआ है। वह फोन नंबर दहिसर निवासी प्रमोद पांचाल का था। मैंने गागर में ऊँट ढूँढ़ने की तरह से प्रमोद पांचाल का फोन मिलाया। प्रमोद पांचाल को पप्पू भी कहते थे। प्रमोद पांचाल से मेरी पहले भी बातचीत होती थी इसलिए वे मुझे जानते थे। प्रमोद जी ने बताया कि अजय आपको लेने गये थे किन्तु आप नहीं मिले इसलिए वे इसी गाड़ी में बैठकर विक्टोरिया टर्मिनल स्टेशन चले गये। वहाँ से उनका फोन आया था कि भाई साहब मुम्बई में आ चुके हैं और उनके पास फोन नंबर गलत नोट हैं। वे आपको फोन मिला सकते हैं जब मैं अजय को नहीं मिला तो अजय ने मैनपुरी से पूछताछ करके पता कर लिया था कि मेरे पास गलत फोन नंबर हैं। मैंने प्रमोद पांचाल से कहा कि भाई साहब मैं दादर रेलवे स्टेशन पर खड़ा हूँ आप मुझे ले जाइये। प्रमोद ने मुझे बताया कि आप मुझसे बहुत दूर खड़े है। वहाँ से मैं आपको नहीं ले पाऊँगा। जहाँ आप खड़े हैं वहाँ से चौदहवां रेलवे स्टेशन दहिसर है। आप पश्चिम रेलवे वाले दादर स्टेशन पर आ जाइए और बिरार पकड़ लीजिए। मैंने समझा कि बिरार किसी एक्सप्रेस का नाम है। टिकट खरीद कर मैं प्लेट फार्म पर पहुँचा तो एक व्यक्ति को पूछा कि बिरार गाड़ी कौन सी है तो उस व्यक्ति ने बताया कि यह खड़ी तो है। दरअसल चर्चगेट से बिरार तक चलने वाली लोकल ट्रेनों को बिरार कहते हैं। मैं गाड़ी में बैठ गया। दादर के बाद माटुंगा रोड, माहीम जंक्शन, बान्द्रा, खार, सान्ताक्रूज, विले पार्ले, अन्धेरी, जोगेश्वरी, मलाड़, कान्दीवली, वोरीबली स्टेशनें पड़ीं तब कहीं दहिसर रेलवे स्टेशन आयी।

मैं दहिसर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर उतरा और प्रमोद पांचाल का इन्तजार करने लगा। काफी देर तक इन्तजार करने के बाद भी जब प्रमोद पांचाल नहीं आये तो मुझे कुछ चिन्ता होने लगी। हुआ दरअसल यह था कि प्रमोद जी ने मुझे बताया था कि आप स्टेशन पर ईस्ट की ओर उतरना। मैं उनकी यह बात भूल गया और वेस्ट की ओर उतर पड़ा। मुम्बई में ईस्ट वेस्ट का चक्कर ससुरा बहुत खराब है जो नये आदमी को भूल भुलैया में डाल के ही मानता है। प्रमोद पांचाल मुझे ईस्ट पर तलाशते रहे और मैं वेस्ट पर उनका इन्तजार करता रहा। जब काफी देर हो गयी तो मैं वेस्ट की ओर एक पी0सी0ओ0 पर गया और टेलीफोन से प्रमोद जी के घर पर बात की। वहाँ किसी ने बताया कि पप्पू भाई (प्रमोद का उपनाम) तो आपको लेने स्टेशन पर गया हुआ है। मैंने वहाँ बताया कि मैं स्टेशन के पास ही एक पी0सी0ओ0 पर खड़ा हूँ। प्रमोद ने स्टेशन पर आकर ईस्ट की ओर के सारे पी0सी0ओ0 छान मारे पर मैं न मिला। वे फिर घर लौट गये। मैंने फिर फोन से बात की तो प्रमोद ने पूछा कि आप कैसे रंग के कपड़े पहने हुए हैं? तो मैंने उन्हें बताया कि पूरी स्टेशन पर गरम शूट (कोट पेंट) सिर्फ मैं पहने हूँ। प्रमोद ने ईस्ट की ओर फिर गरम शूट पहने व्यक्ति को तलाशा पर वहाँ कोई न मिला।

प्रमोद पांचाल के साथ अबकी बार उनके साथ कार्य करने वाला केरल का एक लड़का भी आया था। कुछ सोच-समझ कर प्रमोद पांचाल ने उस केरलीय लड़के को वेस्ट की ओर भेजा और कहा, ‘‘जा तू भाई साहब को वेस्ट की ओर तलाश!’’ मैं गरम शूट पहने हुए गरमी महसूस कर रहा था क्योंकि मुम्बई में सर्दी थी ही नहीं। मैं एक बार फिर टिकट घर की ओर आया तो उसी केरलीय लड़के ने मुझे आके पूछा, ‘‘आप अचय का पाई है (आप अजय का भाई है)! मैं उसकी बात का कोई आशय समझ नहीं पाया क्योंकि उसके उच्चारण में काफी भिन्नता थी। जब उसने पुनः वही बात दोहराई तो मैं समझ गया कि वह कह कर रहा है कि आप अजय का भाई है। उसने कहा, ‘‘चलो पप्पू भाई आपको कब का तलाश रहा है।’’ मैंने पूछा, ‘‘कहाँ है?’’ उसने कहा वो उधर, चलिए मेरे साथ।’’ उसने मेरे हाथ से सूटकेस भी ले लिया। सूटकेस मैंने उसे दे तो दिया पर मन तमाम शंकाओं से ही भरा रहा। उस लड़के पर मैं पूरा विश्वास नहीं कर पाया। लड़का दौड़ता हुआ रेलवे लाइन पार करने लगा तो मुझे लग रहा था कि वह कहीं मेरा सूटकेस लेकर न भाग जाये। जब वह मुझे ईस्ट की ओर लेकर पहुँचा तो एक खड़ी हुई मोटर साइकिल के पास पहुँचकर उसने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘अरे! पप्पू भाई कहाँ गया!’’ अब मुझे लगने लगा कि यह लड़का मुझे चकमा दे सकता है। मैंने कहा, ‘‘ला भाई सूटकेस मुझे दे दे।’’ तब तक प्रमोद पांचाल भी आ गये। वह मुझे तलाशने ही गये हुए थे। आते ही उन्होंने मजाक भरे लहजे में कहा, ‘‘अरे भाई बड़ा तंग किया आपने।’’ उन्होंने मुझे मोटर साइकिल पर बैठाया और अपने घर पर ले गये। थोड़ी देर में अजय का फोन फिर आ गया। प्रमोद जी ने अजय को तसल्ली बँधायी कि भाई साहब घर पर आ गये हैं। प्रमोद ने मेरा हाथ मुँह धुलवा कर मुझे चाय नाश्ता करवा दिया था तभी अजय स्कूटर लेकर आ गया और मुझे शिवालय बिल्डिंग में जहाँ वह रहता था ले गया। वहाँ देवेन्द्र वर्मा जी, उनकी पत्नी व उनके बेटे से मुलाकात हुई। देवेन्द्र वर्मा जी ने मेरे अकेले मुम्बई पहुँच जाने पर बड़ा आश्चर्य व्यक्त किया। यह रेल यात्रा मुझे कभी भुलाये नहीं भूलती।

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- डॉ० हरिश्‍चन्‍द्र शाक्‍य, डी0लिट्‌0

शाक्य प्रकाशन, घंटाघर चौक

क्लब घर, मैनपुरी-205001 (उ.प्र.) भारत

स्थाई पता- ग्राम कैरावली पोस्ट तालिबपुर

जिला मैनपुरी-205261(उ.प्र.) भारत


ईमेल- harishchandrashakya11@gmail.com

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