महाशिवरात्रि पर्व पर विशेष : अभीष्ट फल देता है महाशिवरात्रि पर्व // डा. सूर्यकांत मिश्रा

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महाशिवरात्रि पर्व पर विशेष

अभीष्ट फल देता है महाशिवरात्रि पर्व

० देवाधिदेव-महादेव की कृपा से बरसती है दया

हिंदू धर्मावलंबियों के 34 करोड़ देवी-देवताओं में भगवान शिव का स्थान सब में अलग माना जा सकता है। शास्त्र और पुराणों में भी भगवान शंकर को अपने भक्तों पर शीघ्र ही प्रसन्न होकर फल प्रदान करने वाले देव के रूप में मंडित किया गया है। हम अनादि काल से पुराणों के माध्यम से देखते और पढ़ते आ रहे है कि पूरे हिन्दुस्तान में भगवान शंकर के शिवालयों की संख्या अन्य देवी-देवताओं से कहीं अधिक है। पवित्र सरिताओं के किनारे मंदिरों का निर्माण और शिवलिंगों की स्थापना भी इस बात का प्रमाण है कि पुरातन काल से आदि देव भगवान शिव ही मनुष्य जाति की भगवत आराधना के केंद्र बिंदु रहे है। आज भी हम अपने पूर्वजों के अपनाये धार्मिक विचारों को आत्मसात करते हुए उसी पथ पर अग्रसर है। छत्तीसगढ़ के ‘प्रयाग’ के रूप में प्रतिष्ठित राजिम में लगने वाला कुंभ का मेला भी शिव आराधकों को शिवशक्ति और शिव महिमा की अविरल धारा से जोड़ रहा है। छत्तीसगढ़ प्रदेश के कवर्धा जिले में स्थापित ‘भोरमदेव मंदिर’ में अनेकानेक शिवलिंगों की स्थापना नागवंशी राजाओं के काल से शिवार्चन के इतिहास का बखान करता दिखाई पड़ रहा है। प्रदेश की राजधानी रायपुर से लगे ‘महादेव घाट’ का मेला भी हमें नहीं भूलना चाहिये, जो प्रतिवर्ष लाखों श्रद्घालुओं को शिवशक्ति के दर्शन करा रहा है। हम यदि ‘महाशिवरात्रि पर्व’ को शास्त्रों और पुराणों के आधार पर देखे तो यह दिन शिव-पार्वती के विवाह के रूप में उल्लेखित मिलता है। दूसरे शब्दों में शिव तत्व से घनिष्ठ संबंध रखने वाली रात्रि को शिवरात्रि के नाम से संबोधित किया जाता है। शिवपुराण के ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी की रात्रि में आदि देव भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुये।

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि

शिवलिंगगतयोगद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को चंद्रमा सूर्य के सबसे नजदीक होता है अत: इस समय शिव पूजा करने से साधकों को अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। यही वास्तव में शिवरात्रि का रहस्य भी है। महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव के दिव्य अवतरण का मंगल सूचक पर्व कहा जाता है। भोलेशंकर के निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है। सृष्टि के संहारकर्ता माने जाने वाले भगवान त्रिनेत्रधारी शंकर ही हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों से मुक्त करके परम सुख, शांति एवं ऐश्वर्य प्रदान करते है। भारतवर्ष से लेकर विदेशों तक में भगवान भोलेशंकर के भक्त निवासरत है। यही कारण है कि उनके शिवालय पूरे विश्व में स्थापित है। छत्तीसगढ़ के अनेक स्थान तो इन्हीं त्रिनेत्रधारी के नाम से ही जाने जाते हैं। प्रदेश के रायगढ़ जिले के समीप स्थित ‘नागलोक’ में तो नाग देवता का संसार ही बसा हुआ है। कहते है कि यह स्थान नागों के लिए वरदान सिद्घ हुआ है। बरसात का मौसम आते ही बारिश की बूंद के साथ हजारों की संख्या में नाग धरती पर निकल आते हैं। इतना ही नहीं वे बड़े आराम से आमजनों के साथ उनके घरों में रहते हैं, न तो जहरीले नाग किसी को नुकसान पहुंचाते हैं और न ही मनुष्य ही उन्हें मारने की प्रयास करते हैं। कहते हैं आज तक नागलोक नामक नगरी में एक भी व्यक्ति की मौत जहरीले नाग के डसने से नहीं हुयी है। यही कारण है कि नागलोक के सामान्य जन भगवान शंकर के परम भक्त बने हुए है। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर छत्तीसगढ़ प्रदेश के कुछ शिव मंदिरों अथवा नागों पर आधारित स्थानों की चर्चा आज प्रासंगिक जान पड़ रही है।

छत्तीसगढ़ का ‘खजुराहो’-भोरमदेव : छत्तीसगढ़ प्रदेश के कबीरधाम जिले के अंतर्गत 11वीं शताब्दी में बनाये गये मंदिर भोरमदेव का इतिहास भी शैव काल से जुड़ा हुआ है। मंदिर की आकर्षक वास्तुकला सैलानियों को आकर्षित करने में कामयाब हो रही है। कबीरधाम जिला मुयालय से लगभग 21 किमी की दूरी पर स्थित यह मंदिर साकरी नदी के किनारे नागवंशीय राजाओं द्वारा बनवाया गया था। इतिहास बताता है कि मंदिर के निर्माणकर्ता किंग रामचंद्र नागवंश से संबंध रखते थे। नागवंशी राजा की शादी हैहयवंशी राजकुमारी अंबिका से हुयी थी। पुरातत्व और इतिहास से प्रत्यक्ष संबंध रखने वालों के लिए भोरमदेव का मंदिर वरदान सिद्घ हो सकता है। मंदिर परिसर में स्थापित शिवलिंग और जलहरि अनेक रूपों और अनेक दिशाओं में होने से यह भगवान शिव की चारों दिशा में कृपा को बरसाता प्रतीत होता है। शिवधाम के रूप में अलग पहचान बना चुके भोरमदेव मंदिर की ख्याति विश्व स्तरीय हो चली है।

त्रिधाम शिव मंदिर- जांजगीर चांपा : जांजगीर चांपा स्थित ‘त्रिधाम शिव मंदिर’ प्रागैतिहासिक काल का मंदिर माना जाता है। भारतवर्ष के स्वर्ण युग काल के ऐतिहासिक चित्रण से परिपूर्ण यह मंदिर शिव भक्तों का आकर्षक का केंद्र रहा है। सृष्टि के संहारक भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर में शिव भक्तों के आकर्षण का केंद्र रहा है। सृष्टि के संहारक भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर में महाशिवरात्रि के अवसर पर लाखों श्रद्घालु दर्शन के लिए पहुंचते रहे हैं। धर्म और संस्कृति के अलावा यह मंदिर वास्तुकाल का अनोखा संग्रहालय भी माना जा सकता है। मंदिर की सुंदरता और भव्यता के साथ शिव उपासकों द्वारा विभिन्न अवसरों पर मंदिर परिसर में जन्मदिवस से लेकर वैवाहिक कार्यक्रमों तक को पूर्णता दी जा रही है। पुरातत्व की दृष्टि से भी इस मंदिर का महत्व अपने आप में सिद्घ होता रहा है। कलात्मक निर्माण के साथ आकर्षक सजावट होने से आयोजनों पर चार चांद लग रहे हैं। त्रिधाम शिव मंदिर समिति प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि पर इस मंदिर में भव्य मेले का आयेाजन करती आ रही है। यही कारण है कि शिव भक्त यहां खिंचे चले आ रहे हैं।

रूद्र शिव के लिए प्रसिद्घ है ग्राम ताला : रायपुर-बिलासपुर राजमार्ग पर स्थित ग्राम ‘ताला’ राजधानी से 85 किमी की दूरी पर है। यह स्थान अद्भुत मूर्तियों के संग्रह के लिए जाना जाता है। देवरानी-जेठानी के प्रसिद्घ मंदिर के साथ ढाई मीटर ऊंची और एक मीटर चौड़ी जीव-जंतुओं के मुखाकृति से सुशोभित आकर्षक शिव मूर्ति को ‘रूद्र शिव’ का नाम दिया गया है। इस मूर्ति का निर्माण विभिन्न जीव-जंतुओं के शरीर से मिलकर हुआ है। महाकाल ‘रूद्र शिव’ की यह मूर्ति भारतीय कला में अपने ढंग की एकमात्र ज्ञात प्रतिमा है। भारी भरकम ‘रूद्र शिव’ की यह प्रतिमा जीव-जंतुओं की मुखाकृति से बनी होने के कारण रौद्र रूप लिये दिखाई पड़ती है। कहते है विशालकाय शिवजी की यह मूर्ति गिरगिट, मछली, केकड़ा, मयूर, कछुआ, सिंह और मानव मुखों की मौलिक रूपाति का अनोखा संग्रह कही जा सकती है। मूर्ति के सिर पर मंडलाकार चक्र में लिपटे दो नाग भगवान शंकर की पगड़ी के सदृश्य नजर आते हैं। नाग का निर्माण नीचे की ओर मुंह करके बैठे गिरगिट से हुआ है। इसी गिरगिट के पिछले दो पैरों ने भौंहों का आकार लिया है। अगले दो पैरों से नाक के छेद का दृश्य निर्मित होता दिख रहा है। छोटे आकार की मछलियों से मूंछें एवं निचली होंठ बन पाया है। कान की जगह बैठे हुए मयूर स्थापित है, जो आकर्षक कानों का निर्माण करते दिखाई पड़ रहे है। कंधा मगर के मुंह से बना हुआ है। भुजायें हाथी के सूंड के सामान है। हाथों की उंगलियां सांप के मुंह के आकार की है। दोनों वक्ष और उदर पर मानव मुखाकृति बनी हुई है। दोनों घुटने पर सिंह की मुखाकृति है। प्रतिमा के दोनों कंधों के ऊपर दो नाग रक्षक की तरह फन फैलाये नजर आते हैं। प्रतिमा के आभूषणों में हार, वक्षबंध, कंकण और कटिबंध नाग के कुंडलित भाग से अलंकृत है। सामान्य रूप से इस प्रतिमा में शैवमत, तंत्र और योग के सिद्घांतों का प्रभाव और समन्वय दिखाई पड़ता है।

खरौद का शिव मंदिर : बिलासपुर जिले के शिवरीनारायण में तीन नदियों महानदी, शिवनाथ नदी और जोंक नदी का त्रिवेणीय संगम है। जहां का जल अत्यंत स्वच्छ और मीठा है। इसी शिवरीनारायण से महज 3 किमी की दूरी पर खरौद में स्थित शिव मंदिर शैव मठों के कारण शिवकांक्षी कहलाता है। कहते है इस स्थान पर भगवान शिव के विराट स्वरूप की पूजा दुल्हा देव के रूप में की जाती है। सिरपुर के चंद्रवंशी राजाओं द्वारा बनवाये गये इस मंदिर में एक टूटे फूटे पत्थर पर इंद्रबल तथा ईशान देव नामक शासकों का नाम खुदा देखा जा सकता है। लगभग 13 सौ साल पुराने खरौद के मंदिर में गर्भगृह के अंदर एक अनोखा शिवलिंग है। जिसमें कहते हैं लगभग सवा लाख छिद्र है। ऐसा कहा जाता है कि लंका पर विजय पाने के बाद लक्ष्मण को असाध्या रोग हो जाने से उनके द्वारा सवा लाख शिवलिंग बनाकर भगवान शंकर की पूजा अर्चना की गयी थी, जिससे उनका रोग ठीक हो गया था। खरौद के इसी शिव मंदिर में प्रतिवर्ष फरवरी माह में महाशिवरात्रि का मेला लगता है। ऐसी मान्यता भी है कि शिवलिंग के सवा लाख छिद्रों में सवा लाख चांवल के दाने चढ़ाने पर हर मनोकामना पूर्ण होती है।

सिरपुर का चतुर्मुख शिवलिंग : नगरी सिहावा के पास से एक किसान के खेत से निकलने वाली पुण्य सरिता महानदी के तट पर स्थित सिरपुर सांस्कृतिक दृष्टि कोण से समृद्घ रहा है। यह स्थान वास्तुकला से भी ओतप्रोत है। पूर्व के समय में इसी सिरपुर क्षेत्र को श्रीपुर के नाम से जाना जाता था। महाशिवगुप्त बालार्जुन के 57 वर्षीय सुदीर्घ शासन काल में अनेक मंदिरों का निर्माण कराया गया। सिरपुर में ही काले पत्थरों से निर्मित चतुर्मुख शिवलिंग अपनी विशिष्टता लिये आकर्षक का केंद्र बना हुआ है। कहते है चतुर्मुख शिवलिंग का मुख अत्यंत ही आकर्षक श्रृंगार लिये नृत्य मुद्रा में दिखायी पड़ रहा है। चतुर्मुख शिवलिंग के इस रूप वाली प्रतिमा के गले में जूट से बनी माला उलझे रूप में दिखाई पड़ रही है। इसी मूर्ति का एक रूप कंशी नामक उस राक्षस के वध के रूप में भी है जिसे श्री कृष्ण ने मारा था। सिरपुर के चतुर्मुख शिव प्रतिमा को अद्वितीय प्रतिमा माना जा सकता है। सिरपुर में ही शिव मंदिरों का नयनाभिराम समूह जो क्रमश: एक से तीन चरणों में प्रदर्शित है। साहस ही आगंतुकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हो रहा है। बालेश्वर महादेव मंदिर का आकर्षण और कलात्मक निर्माण भी दर्शनीय है।

डा. सूर्यकांत मिश्रा

न्यू खंडेलवाल कालोनी

प्रिंसेस प्लेटिनम, हाऊस नंबर-5

वार्ड क्रमांक-19, राजनांदगांव (छ.ग.)

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