हास्य-व्यंग्य // मुच्छ नहीं तो कुच्छ नहीं // रामानुज श्रीवास्तव 'अनुज'

मेरे दादा जी बड़ी बड़ी झबरी मूंछें रखते थे। रोज सुबह शाम मूंछों की तेल मालिश करना मूंछों को हिलाना डुलाना ऊपर उठाना कितनी मेहनत मशक्कत का काम है, पर दादा जी को अपनी मूंछों से इतना लगाव था कि पूछिये मत,...मुझे तो यही लगता था कि दादी से भी ज्यादा वे अपनी मूंछों से प्यार करते थे। जब घर से बाहर निकलते थे तब उनका दाहिना हाथ मूँछ सेवा में लग जाता था...कई दफा तो ऐसा हुआ कि वे मूँछ पकड़े रास्ता चलते गये, और गली में धोती छूट गई.. लेकिन उन्होंने मूँछ पकड़े हुये झुकना उचित नहीं समझा। गांव वाले उनकी धोती घर पँहुचाते थे। दादा जी कहते थे.."मुच्छ नहीं तो कुच्छ नहीं। "

वे अपने साथ मूंछों को भी खिलाते पिलाते थे, जब वे दूध पीते थे तो पूरी की पूरी मलाई मूंछ को खिला देते थे..... जब वे कुल्ला करते तो उनकी मूंछें चील के पंखों की तरह ऊपर नीचे होती थी जैसे लम्बी उड़ान भरने वाली हों।

दादा जी की बस एक खराब आदत थी, वे थाली में हमेशा कुछ न कुछ जरूर छोड़ देते थे, फिर दादी भी उसी थाली में खाती थी। जिसे वे दादा जी का प्रसाद मानकर ग्रहण करती थी। एक बार मुझे और मेरी छोटी बहन को दादी कहानी सुना रही थी.... "एक था राजा... एक थी रानी ....रानी के पेट में दर्द हुआ.... राजा रानी के लिए दवा लेने जंगल गये....... जंगल में एक राक्षस मिला...... उसकी बड़ी बड़ी डरावनी मूंछें थी।

न जाने इस तरह की कितनी कहानियाँ मेरी दादी को कंठस्थ थी, हालांकि वे बिल्कुल पढ़ी लिखी नहीं थी,स्कूल का मुँह किस तरफ होता है यह सब उन्हें नहीं मालूम था। मुझे तो शक है कि उस दौर के सब कथाकार दादी से ही पूछकर कथा कहानी लिखते थे। वैसे दादी की कहानियों में देवकी बाबू के चंद्रकांता की तर्ज पर रहस्य रोमांच रहता था। उसे बैताल पचीसी सिंहासन बत्तीसी और शेर लोमड़ी, बन्दर भालू, जलपरी की कथा, तोता मैना के प्रेम के किस्से ऐसे याद थे जैसे आज के पुजेरी पंडित को सत्यनारायण की कथा के बाद दान दक्षिणा का मंत्र याद रहता है। तो बात यहाँ तक पहुंची थी कि राक्षस की बड़ी बड़ी मूंछें थी.... जिसे सुनकर मेरी छोटी बहन दादी को टोककर बोली...

"क्या दादा जी से भयानक उस राक्षस की मूंछ थी। "

चुप कर पगली !! "अपने दादा जी की मूँछ को भयानक बताती है। उनकी मूँछ तो सिर्फ इस घर की नहीं पूरे गाँव की शान है। बता इतनी बड़ी मूँछ किसी की कहीँ देखी है?"

हाँ देखी है..बिल्ली की पूँछ होती है। चुप रहने का संकेत मेरा व्यर्थ गया, और उसने तड़ से जवाब दे दिया। दादी को गुस्सा आ गया ...दादी भी एक चांटा छोटकी के गाल पे जड़ दिया छोटकी भी रोने में माहिर थी उसने भी जोर से गला फाड़कर जो राग अलापा की सोये हुये दादा जी जग गये ....मेरी माँ भी दौड़ी चली आयी। सबने एक स्वर में पूछा.... "क्या हुआ?"

अब बताये कौन? मजबूरन मुझे सब सच सच बताना पड़ा.. वैसे भी मुझे झूठ बोलना नहीं आता। सुनकर दादा जी दादी को सुनाकर बोले.....

"तुम्हें सौ मर्तबा मना किया है कि मूँछ वाली कहानियां मत सुनाओ, पर मानती नहीं। " बच्चे हैं वे क्या जाने मूँछ और पूँछ में फर्क...लेकिन तुम मानती नहीं। अरे बच्चों को बिना मूँछ की कहानी सुनाया करो। "

दादी भी ताव खा गई ..आखिर वे कहानीकार थी.... भले ही उनकी कहानी किसी पत्रिका के के पन्नों में न उतरी हो... कहानी की किताब न छपी हो....लोकार्पण विमोचन से भले ही उन्हें कहानीकार का सर्टिफिकेट न मिला हो..लेकिन मेरा दावा है उस टाइम में मेरी दादी से बड़ा कोई कथाकार नहीं था।

वे भी पलटवार करते हुए बोली..." बिना मूँछ की भला कोई कहानी होती है। अरे जिस कहानी में मूँछ न हो उसे मै लफ्फाज़ी कहती हूँ। "

मेरे जीभ में भी खुजली हो रही थी....मुझसे रहा नहीं गया पूछ बैठा...दादी !! "कहानी तो स्त्रीवाचक है....मूँछ कैसे आ गई?"

दादी को इस बार जोर का गुस्सा आ गया, गनीमत रही दादा जी थे, नहीं तो थप्पड़ खाने का अब मेरा नम्बर था...वे मुझे डपटकर बोली......"अबे चोप्प !! कहानी में जब राजा आएगा... राक्षस आयेगा...बाघ आयेगा.... तब मूँछ आयेगी की नहीं...अकेली रानी के बलबूते कहानी कभी बनी है। "

"तुम्हारी दादी ठीक कहती है" दादा जी हम दोनों बच्चों के सर पर हाथ फेर कर बोले। अरे बच्चों कहानी तो कहानी है...."मुच्छ नहीं तो कुच्छ नहीं"...अपना इतिहास उठाकर देख लो.. बिना मूँछ का कोई राजा हुआ है...यहाँ तक की कई राजाओं ने मूँछ की शान की खातिर अपना राज पाट छोड़ दिया। अब महाराणा प्रताप को देख लो...जंगल जंगल घास फूस की रोटी खाते फिरते रहे लेकिन मूँछों को कभी झुकने नहीं दिया। अकबर अपनी मूँछो के कारण ही महान कहलाया है। " अमिताभ बच्चन भी मूंछों की तारीफ करते नहीं अघाते...वो डायलॉग तो सुना होगा सभी ने...मूंछें हो तो नत्थूलाल जैसी। "

दादा जी !! हमारे पिता जी मुच्छ क्यों नहीं रखते, क्या उन्हें घर की शान का ध्यान नहीं है? छोटकी ने सवाल किया।

है !! बरोब्बर है..उनकी मजबूरी है बेटा... मूँछ की चाकरी और सरकार की चाकरी एक साथ नहीँ हो सकती है... इसलिये वे मूँछ नहीं रखते...सरकार तनखा देती है..मूँछ तनखा नहीँ देती

"मूँछ तनखा क्यों नहीं देती ? जब आप इतनी सेवा करते हैं तो तनखा तो देना चहिए, गलत बात हुई न दादा जी। " छोटकी के इस सवाल पर सभी हँस पड़े...कुछ देर पहले जो तल्खी थी हँसी से उड़नछू हो गई। लेकिन छोटकी कहाँ मानने वाली थी..उसने जिद ठान ली " के बताइये मुच्छ तनखा क्यूँ नहीं देती। " तब दादी स्थिति की गम्भीरता को भांपकर बोली..

छोटकी !! मूँछ तो वो चीज देती है जो रुपया पैसा सोना चांदी से नहीं मिलता, आ बैठ एक सच्ची कहानी सुनाती हूँ।

" ये बात उस समय की है जब तेरी छोटी बुआ का व्याह होना था..घर में पैसों की कमी थी.. तब सब लोगों ने तय किया कि मंगल सेठ के यहाँ से कर्ज लिया जाये...लेकिन वह सेठ अपने नियम का बहुत सख्त था बिना कोई अमानत रखे वह अपने बाप को भी पैसे नहीं देता था..घर में सोना चांदी तो था नहीं..कैसे काम हो...तब तेरे दादा जी ने संकल्प लिया था कि आज मैं बिना अमानत रखे ही पैसे लाकर दिखाऊंगा। "

फिर क्या दादी !!...."आगे बोलिये न"

फिर क्या..तेरे दादा दी चल दिये..काली मूंछों में पाव भर तेल लगाकर.... लट्ठे की लकालक मिर्जाई और घुटने तक धोती पहने..हाथ में दो किलो वजन का डंडा उठाये दोनों मूंछें ऊपर की ओर उठी हुई...आसमान से बात करती प्रतीत होती थी। मुझे तो इन्हें देखकर ऐसा लगा था...जैसे कोई शेर आज शिकार में निकला हो।

जल्दी बताइये न दादी आगे क्या हुआ ? "बताती हूँ..बताती हूँ...साँस तो लेने दे। " "तुम रुको..खाँसी आ रही है...आगे मैं बताता हूँ। " दादा जी ने कहा।

जब मैं मंगल सेठ के यहाँ पहुँचा.. वह गद्दी में बैठा...चश्मे की डंडी कान में फँसाये हिसाब किताब देख रहा था। मुझे देखते ही बोला..."आओ मुंशी..बताओ.... कैसे आना हुआ?" मैंने उसे आने की वजह और मजबूरी दोनों बताई........सुनकर सेठ बोला.... मुंशी !! "यह तो तुम्हें भी पता है बिना अमानत जमानत के मै रोकड़ा नहीं देता। "

सेठ का इतना कहना था कि मैं उठ खड़ा हुआ और अपना दाहिना हाथ मूँछ में फेरा ही था कि सेठ दोनों हाथ जोड़कर बोला...

नहीं नहीं मुंशी !! इसकी जरूरत नहीं..ये गजब मत करो.. तुम्हारी मूँछें हम सब की शान हैं, ले जाओ जो भी जरूरत हो.. कच्चा ही लिखे लेता हूँ।

तब तक एक बाल बिना उखाड़े ही हाथ में आ चूका था..मैं वो बाल.सेठ को देते हुये बोला... "लो इसे तो अब रखना ही पड़ेगा ....तुम्हारी बात सहन नहीं कर पाया और अपने आप मेरे हाथ में आ गया। "

सेठ ने चांदी की डिबिया में उस बाल को ससम्मान रखा और बोला...."मुंशी तिजोरी खोले देता हूं......ले लो जो भी जरूरत हो। "

मैंने कहा..." सेठ पाँच सौ रूपये गिनकर कागज लिख लो...मैं तुम्हारी तिजोरी में हाथ नहीं लगाऊंगा। "

इतना सुनना था कि मैं और छोटकी ख़ुशी के मारे दादा जी के गले से लिपट कर उनकी मूँछें सहलाने लगे। अम्मा हम दोनों को डांटते हुई बोली....

"चलो दूर हटो !! दादा जी की मूँछ उखाड़ लोगे क्या??

रहने दे बहू !!.... मत डांट....ये बच्चे हैं... इनके ख़ुशी मनाने के तरीके हम बड़ों से अलग हैं। बड़ी तकदीर से ऐसे शरारती बच्चे मिलते है। "

उसी साल हमारे इस खुशहाल परिवार में दुःख का पहाड़ टूट पड़ा....माघ का महीना चल रहा था.. दादा जी को तीन चार दिन का बुखार आया और.....दादा जी को साथ ले गया... पूरे इलाके में खबर फ़ैल गयी कि...मुंशी रामऔतार नहीं रहे.....जो भी सुनता दौड़ा चला आता था...मेरी घर की तरफ.... मूँछ गिराये हुये।

उनकी अंतिम यात्रा में इतनी भीड़ हो गई थी के पूरे गाँव में मेला जैसा लग गया था। हर आँख से आँसू.... गिरी हुई मूँछों को नहलाते हुये धरती को गीला कर रहे थे। मुझे अच्छी तरह से याद है कि एक सौ एक बड़ी मूँछ वाले लोगों ने अपना अपना डंडा तीन बार आसमान की ओर उठाकर धरती में उल्टा टिका दिये थे और सब....अपनी मूँछें नीचे गिरा लिये थे। यह दादा जी के सम्मान में एक सौ एक मूंछों की सलामी थी।

दादी भी ज्यादा दिन इस दुःख नहीं झेल पाई....साल बीतते बीतते वे भी इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गईं। तो ये सब पुरानी यादें हैं.. आज साथ में दादा दादी अम्मा बाबू जी कोई नहीं हैं ...सब अपना रोल निभाकर अज्ञात में विलीन हो चुके है छोटकी भी बड़की हो गई मै तो पैदायशी बड़ा हूँ.... मेरा बचपन तो दादा जी के साथ चला गया.... जवानी ठीक से आई नहीं...कम्बख्त बुढ़ापा आ गया.. तब से वैसा ही हूँ....साथ में पुरानी यादें है.... जिन्हें विरासत की तरह दिल में सहेजे किसी तरह जी रहा हूँ।

कभी कभी मन में बहुत दुख होता है जब अख़बार में चोरी ,डकैती, राहजनी, ठगी , बलात्कार की खबरें पढ़ता सुनता हूँ। अपने भीतर से सवाल उठता है ऐसा क्यूँ हो रहा है, आदमी आदमी को क्यूँ खाये जा रहा है। तब भीतर से जवाब भी आता है..... "भई !! आदमी बिना मूँछ का है..इसलिये सब हो रहा...मूँछ वाला आदमी अनाज खाता है किसी दूसरे आदमी को नहीं खाता...दूध पीता है...गाय को नहीं खाता। मूँछ वाला दुराचरण हरगिज नहीं कर सकता है।

इसलिए सरकार से मेरी अपील है कि एक ऐसा कानून बनाये जिसके तहत बड़ी बड़ी मूछें रखना अनिवार्य हो, .......न रखने पर कम से कम तीन साल जेल में बिताना अनिवार्य हो। कोर्ट अदालत, जंगल, पुलिस, अस्पताल, बैंक, डाकखाना, रेल हवाई हर मोहकमे में मूँछ रखना अनिवार्य हो। साथ ही देश के आम नागरिकों खासकर पुरुष नौजवानों से भी विनम्र निवेदन है कि आप सब मूँछ बढाये....मूँछ की जितनी हो सके सेवा करें.....और किसी भी बिना मूँछ वाले उम्मीदवार का कतई समर्थन न करे...उसे वोट न करें। घर के बाहर नेम प्लेट के बाज़ू में एक और प्लेट लगायें... जिसमें बड़े बड़े काले अक्षरों में लिखा हो। ."मुच्छ नहीं तो कुच्छ नहीं" _____________________

.......//समाप्त//

1 टिप्पणी "हास्य-व्यंग्य // मुच्छ नहीं तो कुच्छ नहीं // रामानुज श्रीवास्तव 'अनुज'"

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