आह पकौड़ा वाह पकौड़ा // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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जाड़े के दिनों में भजिए और पकौड़े खाना बड़ी तृप्ति देता है। साथ में एक कप गरम गरम चाय भी हो तो सोने में सुहागा ! सर्दी से लड़ने का चाय-पकौड़ा एक कारगर स्वादिष्ट हथियार है। सब्जियां तो बेचारी निरीह होती हैं। चाहे जिसका पकौड़ा बना डालिए – पालक, प्याज, गोभी, आलू। यहाँ तक कि ब्रेड, पनीर और मशरूम तक के पकौड़े बन जाते हैं। मैं तो खैर शाकाहारी ठहरा, मांसाहारी तो मछलियों तक को नहीं छोड़ते। उनका भी पकौड़ा बना डालते हैं। ज़हर ज़हर को मारता है। इसी कथन का अनुसरण करते हुए गर्मियों में भी लोग गरम गरम पकौड़े और गरम गरम चाय पीने से बाज़ नहीं आते। भरे जाड़ों में वह पार्टी ही क्या जिसमें आइसक्रीम न परोसी जाए ! पकौड़ा सदा बहार है।

पकौड़े की शायद इसी सर्वकालिक उपस्थिति को देखते हुए, मोदी जी ने अपना “पकौड़ार्थशास्त्र”, अंग्रेज़ी में कहें तो PakodaNomics, देश के समक्ष प्रस्तुत कर डाला। पर जाड़े बीत चुके थे और गर्मियां आई नहीं थीं सो लोगों को उनका यह पकौड़ा-पाठ पसंद नहीं आया। भरी गर्मियों या कड़क जाड़ों में पकौड़े का अपना अलग ही स्वाद होता है। बसंत ऋतु में पकौड़ा ? ना बाबा ना ! पकौड़ा-प्रोटेस्ट शुरू हो गया।

क्या गलत कह दिया ? प्रधान मंत्री ने अपने एक साक्षात्कार में सिर्फ यही तो कहा था कि अगर कोई पकौड़ेवाला दिन भर में २०० रूपए कमा लेता है तो क्या यह रोज़गार नहीं है ? न जाने कितने लोग गैर- औपचारिक क्षेत्र में अर्थ व्यवस्था को साधे हुए हैं। पकौड़ा बेचना उसका ही तो एक उदाहरण है ! बेरोजगारी से तो अच्छा है लोग पकौड़ा ही बेचें। पकौड़ा बनाना और बेंचना कोई शर्म की बात तो है नहीं।

लेकिन यार लोग ले उड़े। मोदी जी शर्म शर्म। मोदी जी का पकौड़ा-बयान एक अनवरत पकौड़ा-चर्चा में तब्दील हो गया। विरोधी पक्ष अपना विरोध दर्ज करने लगे। चुटकियाँ लेने लगे। किसी ने कहा, ऐसा सुझाव कोई चाय वाला ही दे सकता है। पहले चाय बेचते थे, अब पकौड़ा बेंच रहे हैं। लेकिन अफ़सोस, पकौड़े का खरीदार कोई नहीं है।

पकौड़ा-प्रोटेस्ट करते करते, जगह जगह पकौड़ा-स्टाल खोल दिए गए, पकौड़ा-बार बन गईं, पकौड़ा ट्रेनिंग सेंटर्स स्थापित कर दिए गए। कोई ग्राहक, कोई सीखने वाला नहीं मिला। पकौड़ा टेक्नोलोजी विकसित करने की बात की जाने लगी, कोई जानकार नहीं मिला। ठांय ठांय फिस्स। विरोध करने वालों की धर पकड़ की जाने लगी। पर लोग घबराए नहीं। पकौड़ा-प्रोटेस्ट चालू है।

देखते देखते पकौड़ा-पर्सनेलिटी वाले लोगों ने पकौड़ा-पार्टी बना डाली और सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट को पकौड़ा-बजट घोषित कर दिया। पकौड़े को आकर्षक बनाने के लिए पकौड़े को सेक्सी बताया गया, लेकिन उसकी तरफ कोई आकृष्ट नहीं हुआ।

अकादमिक क्षेत्र में साहित्यकारों में बहस छिड़ गई। पकौड़ों की वियुत्पत्ति ढूँढी जाने लगी। कहा गया, जो सबसे पहले पकाया गया होगा, वह पकौड़ा ही होगा। पकौड़ा के सैक्सी हो जाने पर प्रश्न पूछे जाने लगे। पकौड़ा स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग। भाषा वैज्ञानिकों ने बताया, पकौड़ा है तो पुल्लिंग, पकौडी स्त्रीलिंग – सीधी सी बात है। कढी में पकौडी डाली जाती है, पकौड़ा कोई नहीं डलता। कुछ लोगों को पकौड़ियाँ पसंद नहीं होतीं, वे बिना पकौड़ियों के ही कढी चट कर जाते हैं।

कौन पूछता था बेचारे पकौड़े को। अनुसूचित जाति या हद से हद पिछड़ी जाति में वह सम्मिलित होने लायक पदार्थ था। लेकिन जैसे अनसूचित जाति, और पिछड़ी जाति के दिन फिरे पकौड़े के भी दिन फिर गए। दिन हरेक के एक से नहीं रहते। पकौड़े को लाइम-लाईट में लाने का श्रेय निस्संदेह मोदी जी को ही जाता है। पकौड़ा उनका शुक्रगुज़ार है।

आह पकौड़ा, वाह पकौड़ा !


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-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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