श्रीदेवी : विशेष संस्मरण : आप तो हमारे घरों में मुहावरे बनकर जीती रहीं हैं // विनीत कुमार

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आप तो हमारे घरों में मुहावरे बनकर जीती रहीं हैं :

बॉलीबुड नायिकाओं को शायद इस बात का अंदाजा हो या नहीं, पता नहीं लेकिन वो एक सामान्य मिडिल क्लास फैमिली में मुहावरे बनकर भी रोज याद की जाती हैं. एक ऐसा मुहावरा जो अक्सर द्विअर्थी और भाव एक कि तुम ऐसा नहीं हो सकती.

वो हमारा स्कूली जीवन था. घर में दीदी लोग मुझसे बड़ी है और उस वक्त तो और खर-पतवार( मां की भाषा में ) की तरह बढ़ रहीं थीं. मेरी मां ऊपर से सख्त किन्तु भीतर से आजाद ख्याल की महिला रही हैं. दीदी लोगों की अच्छी आदतों और मनमानी आदतों के लिए श्रीदेवी का नाम मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल करतीं.

कहीं बाहर जाते समय दीदी पूरा झमकाकर( अच्छे से तैयार होकर ) निकलने को होती कि यूं मां से पूछ लेती- ठीक लग रही हूं न मां ? मां पहले से जबाव लिए होती- दू घंटा लगाके तैयार हुई तो अब क्या एकदम से श्रीदेवी का कान काट लोगी ?

मुहल्ले की चाचियां एक-दूसरे के घर की शिकायत करते हुए जोड़ देती- बेटी को पढ़ावे लिखावे के चाही तो खुल्ला छूट दिए हुए हैं, अच्छा बड़ा होकर श्रीदेवी बनेगी.

मोहल्ले की कुछ लड़कियां खुद को सेलेब टाइप ट्रीट करतीं. कुछ लेने घर आती और मां कुछ खाने, थोडी देर रूकने कहती तो मना करने लग जाती. तब मां एकदम से कहती- काहे यहां से जाके तुमको हवा-हवाई पर डांस करना है..रूको थोड़ी देर.

बिसेसर के वाइफ का उमर साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है लेकिन श्रीदेवी जैसी जस की तस है.

बिटुआ के मौगी( पत्नी ) शुरू-शुरू में तो एकदम श्रीदेवी जैसन संस्कार लेके घर घुसी. कनझटके( उपर-उपर ) नजर भी पड़ता तो चाची-चाची करके परनाम-पाती करती. हमको क्या पता कि बाद में नागिन का रोल सीख लेगी. हमको तो अब नजर मिलावे में भी हाथ-गोड़ सुन्न होने लगता है.

एक ही नायिका के नाम को लेकर दर्जनों मुहावरे बनते और उन सबमें वो अलग-अलग सिनेमाई चरित्र में जीतीं हैं. औरत जात के जादे उठल्लू( अपमान ) करके नहीं चाहिए. उ जो ठान ली तो अपना देह-धच्चर( ऑरा ) ऐसा कर लेती है कि तब मर्दाना सबका बोखार छोडा देती है. देखे नहीं इंग्लिश- विग्लिंश में श्रीदेवी को.

वक्त बदला. मां श्रीदेवी पर से शिफ्ट होकर काजोल पर आ गयी. इधर जब बोर हो जाया करती तो कहती- ए खुशी, करके दिखाओ तो जिरी सोनाक्षी सिन्हा वाला हुडहुड दबंग पर डांस. नय मन लग रहा है. लेकिन

बदलते वक्त के बीच तब भी कोई ढंग से बनारसी साडी पहनकर मां की नजरों से गुजर जाए तो- प्रीतम के वाइफ को एकदम श्रीदेवी जैसा साडी पहने का लूर( समझ ) है. मां अब भी छोटी बच्ची की आंख में काजल लगाने की सलाह देती है तो साथ जोड़ देती है- बउआ के आंख एकदम श्रीदेवी वाला है, बस अक्किल-बुद्धि सुस्मिता सेन वाला दीहो दीनानाथ.

मुहावरे में बेपनाह जीती रहीं श्रीदेवी अब हमारे बीच नहीं रहीं लेकिन उनके काम के बीच से निकले मुहावरे हिन्दुस्तान के घरों में जिंदा रहें..

विनीत कुमार

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के फ़ेसबुक पेज https://www.facebook.com/vineetdu से साभार.

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2 टिप्पणियाँ "श्रीदेवी : विशेष संस्मरण : आप तो हमारे घरों में मुहावरे बनकर जीती रहीं हैं // विनीत कुमार"

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