लघुकथा // जोगिनिया // अविनाश कुमार झा

image

मां बाप ने नाम क्या रखा होगा, क्या पता पर सब उसे "जोगिनिया" ही कहते थे। काफी उम्रदराज थी और जब भी टोला में आती तो बच्चे उससे डरकर अपने घरों में छिप जाते। महिलाएं कहती थी, वो डायन है, उनके बच्चों को खा जाएगी। वो आंखें चमकाते आती और दूर से ही तेज आवाज में चिचियाते आती। शायद वह स्वयं चाहती थी कि लोग उसके आने की खबर से वाकिफ हो जायें। चेहरे पर झुर्रियां पड़ गयी थी पर आंखों में गहरा काजल लगाती थी। बाल अधपके से थे जो बेतरतीब ढंक से बंधे होते थे। इस उम्र में भी चलती बड़ी तेज थी। कोई बच्चा घर के बाहर में मिल जाता तो विचित्र से भाव भंगिमा बनाती और डरावनी सी शक्ल बना कर उसे डराने की कोशिश करती । यदि वह डर कर रोने लगता तो जोर से अट्टहास के साथ हंसने लगती। जैसे अपने डरावना पन का इंजाय कर रही हो।

  उसे मैं देखता मुझे वो औरतें याद आ जाती जो हमने " तारापीठ मंदिर" के आस पास देखा था। काली काली साड़ियों में लिपटी वो औरतें तंत्र मंत्र सिद्धि में लगी रहती थी। वहाँ भी अम्मा ने उनको देखकर यही कहा था कि ये लोग तांत्रिक हैं और श्मशान में रात में " जोग टोंग" करते रहते हैं।


वो बच्चों के लिए" हथबंधनी, फूलबंधना, कमरबंद( डांरा) बनाकर देने आती थी। आस पास के दो तीन गांव में वही थी जो ये सब बनाकर घर घर पहुंचाती थी। अम्मा भी जल्दी से उसे कुछ दे- दाकर भगाने की कोशिश में रहती पर उसकी आंखें मुझे खोजती रहती। " कहां है बबुआ"? मैं किवाड़ के पीछे छुपा हुआ दरारों से देखता रहता पर उसके सामने आने की हिम्मत नहीं होती। चाची कहती थी न कि उसके सामने मत जाना। वो चुड़ैल है ,डायन है ,सुग्गा(तोता) बनाकर ले जाएगी और पिंजरे बंद कर रखेगी,मार देगी।


बच्चे मौत को नहीं जानते पर समझते हैं कि कोई यह डरावनी चीज होती है। बच्चों को नहीं पता होता है कि कौन आदमी अच्छा है, बुरा है ,सही है पागल है, हाफ माइंड है। वह तो समभाव रखता है, उसे तो परिवार या समाज सिखाता है कि कोई व्यक्ति कैसा है? तो "जोगनी" पंद्रह दिन में एक बार टोला में आती और खाने पीने का जुगाड़ कर चली जाती जिसके घर में जरूरत होती तो संदेशा भेज कर बुला लेते। हम सोचते रहते कि कहाँ रहती होगी वो? शिबुआ की मम्मी कहती थी कि नदी किनारे श्मशान में रात में नाच करने जाती है, उधर ही गांव के छोर पर अपनी झोंपड़ी भी बनायी है।


एक दिन मैं दालान पर संगतुरियों के साथ "पिठ्ठो "खेल रहा था कि वो चुपके से आकर मेरे पीछे खड़ी हो गयी और गौर से मुझे देखने लगी। खेलते खेलते जब हमारी नजर उसपर पड़ी तो सारे बच्चे चिल्लाते भाग गये। मैं " ठक्कमुर्गी"(किंकर्तव्यविमूढ) की तरह उसे देखता रह गया। वो एकटक मेरी तरफ देखती रही। उसकी आंखों में मुझे प्यार और वात्सल्य दिख रहा था जो अम्मा की आंखों में देखता रहता हूँ। उसने अचानक मुझे पकड़कर गोद में भर लिया, उसके अचानक इस व्यवहार से मैं डर के चिल्लाने लगा । तबतक चाची और बड़का भैया दोनों तेजी से दौड़े और मुझे उससे अलग किया। भैया ने तड़ातड़ कई थप्पड़ उसे जड़ दिए और धक्का दे दिया। वो गिर पड़ी। अम्मा रोते हुए बाहर निकली!" बाप रे बाप! बब्बू को खा जाएगी ये डायन! जाओ जल्दी से चंदू ओझा को बुलाकर लाओ"! आज यदि कुछ भी अगर मेरे बाबू को हुआ न तो इस जोगिनिया को जिंदा जलवा देंगे। "!
" कुच्छो न होगा मलकिनी!" बबुआ जुग जुग जीएगा। आप ऐसा काहे बोलती हैं। मैं राक्षस थोड़े न हूँ जो आदमी को खा जाऊंगी। बबुआ को देखकर अच्छा लगता है। मेरी सुमिरतिया का बाबू भी बिल्कुल बाबू जैसन है!" " हम तो बबुआ के लिए फूल वाला डारां लेकर आये थे। "अपने नाक खून अंचरा से साफ करती हुई वो बोली। भैया ने जोर से मार दिया था उसे। तबतक भीड़ भी काफी हो चुकी थी । वो धीरे धीरे उठी और अपना देह हाथ झाड़ती चल दी और बड़बड़ाती रही" बबुआ को कुच्छो नहीं होगा.... कुच्छो नहीं होगा!


मैं अपनी अम्मा के पीछे छिपा उसे जाते देखता रहा कि वह क्या सही में मुझे" सुग्गा" बनाने आई थी? क्या उसने कुछ " जोग टोंग " मुझ पे कर दिया है और रात में सोते सोते " सुग्गा" बनकर उड़ जाऊंगा? मैंने अपने देह में सिहरन सा महसूस किया । मैं और जोर से अम्मा से चिपक गया।

-----------

-----------

0 टिप्पणी "लघुकथा // जोगिनिया // अविनाश कुमार झा"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.