लघुकथा // दरियादिली // संदीप तोमर

उसने प्रेम विवाह किया था, लेकिन दस सालों में प्रेम और विवाह दोनों अलग हो चुके थे। गृहस्थी नाम की गाड़ी घिसट कर चल रही थी। समाजसेविका पत्नी समाज के फेर में परिवार को भूलती चली गयी।

आज सुबह वह जैसे ही नहाने के लिए बाथरूम में घुसा तो देखा, बाथरूम गंदा पड़ा है। उसने कहा- ‘मीतू डार्लिंग, बाथरूम इतना गंदा है कि नहाने का भी मन न करे। इसे साफ कर दिया करो या फिर कामवाली को एक्स्ट्रा पैसे देकर साफ करा लिया करो।’

‘तुम्हारे पैर टूटे हैं, हाथ नहीं। लेक्चर देने से अच्छा है बैठे-बैठे खुद ही साफ कर लो, समझे।’ पत्नी का कर्कश स्वर मानो उसे खा जाने को बेताब हो।

वह हाथ में टायल साफ करने वाला ब्रश उठा सोचने लगता है- ‘कल शाम विकलांग दिवस पर बड़े समारोह के आयोजन में पत्नी ने स्टेज पर भाषण देते हुए कितनी शान से विकलांग के साथ शादी करके अपनी दरियादिली को सार्वजनिक किया था।’

संपर्क : क् 2/1 जीवन पार्क, उत्तमनगर

नई दिल्ली - 110059

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