अजीत कुमार की कहानी - सफ़र

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अप्रैल का महीना था, मेरे सब दोस्त गोवा जाने की प्लैनिंग कर रहे थे। मैंने गोवा के बारे में बहुत सुना था पर कभी गया नहीं था, इसीलिये दोस्तों के ज़िद करने पर मैंने जाने के लिए हाँ कर दिया। अगले दिन 12 बजे की ट्रैन थी और सबने ये फैसला किया कि कल 11 बजे सब बस स्टॉप वाले कॉफी शॉप पे मिलेंगे और वही से साथ में जायेंगे। सब अपने अपने घर चले गए। मैं घर गया और खाने के बाद समान पैक करके सोने की कोशिश करने लगा पर नींद थी कि आने को तैयार नहीं थी, बार बार मैं गोवा के बारे में सोचे जा रहा था, गोवा ऐसा होगा, गोवा वैसा होगा।

मुझे कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला,

सुबह मुझे जब अलार्म ने जगाया तो मैं जल्दी जल्दी तैयार हो कर बस स्टॉप को निकल गया। पर मैं उत्सुकता में जल्दी पहुंच गया था, मैंने घड़ी देखा अभी 9 बज रहे थे। मैं उन लोगों का इंतज़ार करने लगा। तभी मेरी नज़र बस स्टॉप पे बैठी एक लड़की पे पड़ी, चेहरा जाना पहचाना था।

मैं उसके पास पहुंचा और हिचकिचाते हुए बोला ''पूजा''।

वो हलकी सी मुस्कुराहट के साथ बोली ''आखिरकार सर की नज़र मुझपर पड़ी तो, मैं कबसे तुम्हें देख रही हूँ किसका इंतज़ार कर रहे हो गर्लफ्रेंड का ?

अरे नहीं अपने दोस्तों का , लेकिन तुमने मुझे पहचाना कैसे, मैं तो पहली नज़र में तुमको पहचान ही नहीं पाया ?

पूजा बोली ''अक्सर फेसबुक पर तुम्हारी फोटो देखती थी''।

अच्छा मैंने तो तुमको फेसबूक पर बहुत ढूंढा पर मिली नहीं किस नाम से हो, और मुझे रिक्वेस्ट क्यों नहीं की।

रिक्वेस्ट क्यों नहीं की! एक बार चेक करो रिक्वेस्ट किये हुए दो साल हो गया पर अभी तक रिक्वेस्ट पेंडिंग है।

मैंने माफ़ी मांगते हुए कहा ''मैं फेसबुक ज्यादा नहीं चलाता''। अब बहाना मत बनाओ, और क्या कर रहे हो आज कल। क्या करूँगा यही एक सॉफ्टवेयर कम्पनी में जॉब करता हूँ, तुम क्या कर रही हो।

पूजा बोली कि वो पटना के एक सरकारी स्कूल में टीचर है।

''और तुम दिल्ली में कैसे'' मैंने कहा। सब यहीं पूछोगे या कॉफी भी पिलाओगे और मुझे खींचकर कॉफी शॉप में ले गयी, वो ऐसी ही थी बिल्कुल बिन्दास। पूजा मेरी स्कूल के समय की सबसे अच्छी दोस्त थी और आज लगभग 6 साल बाद हम मिले थे।

हम जा कर कार्नर की सीट पर बैठ गए उसने दो कप कॉफी आर्डर किया। मैंने कॉफी पीते हुए पूछा कि दिल्ली में कैसे आना हुआ तो उसने बताया कि भैया के पास आयी थी। तुम्हारे भैया दिल्ली में रहते हैं, कहाँ ? यही शास्त्रीनगर में वो मुस्कुराकर बोली। कमाल है मैं भी वही रहता हूँ, चलो अच्छा हुआ अब तुमसे मिलना जुलना लगा रहेगा। वो हंसते हुए बोली ''पर मैं तो आज वापस जा रही हूँ ''।

''पर क्यों'' मैंने पूछा। अरे मेरी भाभी गर्भवती थी इसलिए आयी थी अब बच्चा हो गया तो जा रही हूँ।

अच्छा .....तो क्या हुआ लड़का या लड़की।

वो बोली ''लड़की, पता है वो बहुत प्यारी है मैंने उसका नाम परी रखा है''।

“अच्छा तो अब कब आओगी।“

“पता नहीं।“

फिर मैं बोला ''और तुम्हारे बच्चे कैसे है''।

“ ओ मिस्टर पहले शादी तो होने दो फिर बच्चे के बारे में पूछना।“

“ ये किसने कहा कि शादी के बिना बच्चा नहीं हो सकता” बोलकर मैं हंसने लगा।

“छी: तुम नहीं सुधरने वाले। “

“इसमें छी: वाली क्या बात है मैं तो सच बोल रहे हूँ बच्चे के लिए शादी की क्या ज़रूरत?” मैं फिर हंसने लगा।

वो बोली ''तुम्हारी बीबी को ही होगा बिना शादी के बच्चा''।

मैंने कहा ''पर बिना शादी के मेरी बीबी कैसे होगी।

वो अपना सर पकड़ते हुए बोली ''हे भगवान मैं ये कैसे भूल गई कि मेरे सामने एक महान वक्ता बैठे है जिनसे जीतना नामुमकिन है, ओके अब मुझे जाना होगा मेरी बस का टाइम हो गया।

मैंने कॉफी के पैसे दिए और उसके साथ हो लिया।

पूजा ने पूछा ''वैसे तुम कहाँ जा रहे हो''। ''गोवा'' मैंने कहा। अच्छा है घूमो। इस वक़्त मेरे मन में बस एक ही बात चल रही थी कि पूजा का नंबर ले लूँ। तभी वो बोली अपना मोबाइल देना।

"मेरा मोबाइल क्यों ?"

"दो ना। "

मैंने अपना मोबाइल उसको दे दिया। पूजा मेरा मोबाइल वापस देते हुए बोली इसमें अपना नंबर सेव कर दिया है और जाकर बस में बैठ गई । मैं बाहर के स्टॉल से एक पानी की बोतल लाया और पूजा को देते हुए बोला ''अच्छा फिर मिलेंगे''।

वो मुस्कुराने लगी।

बस आगे बढ़ने लगी थी मैं उतरने लगा तभी पूजा की आवाज़ आई ''ओये हीरो मेरे नम्बर पे मिस-कॉल तो कर दे''। उसका बोलने का पुराना अन्दाज़ सुनकर बहुत अच्छा लगा। मैंने उसको कॉल किया और बोला कि यही मेरा नंबर है सेव कर लो, और मैंने कॉल कट कर दिया, और अपने दोस्तों का इंतज़ार करने लगा।

- अजीत कुमार

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