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खुशबू रोज सुबह सात बजे काम पर पहुँच जाती। जब वह काम पर पहुंचती तो सब सो रहे होते। जाड़ों के दिन थे। दिल्ली में कोहरा और ठण्ड इस साल कुछ अधिक ...

दिनेश दुबे की जलरंग कलाकृति

खुशबू रोज सुबह सात बजे काम पर पहुँच जाती। जब वह काम पर पहुंचती तो सब सो रहे होते। जाड़ों के दिन थे। दिल्ली में कोहरा और ठण्ड इस साल कुछ अधिक था। समाचार में सबसे बड़ी खबर उत्तर भारत में ठण्ड से मरने वालों की होती। खुशबू सुबह-सुबह एक शॉल ओढ़े आमने मालिक के घर पहुंचती। फिर शॉल उतार कर रख देती। उमर कोई ज्यादा नहीं थी। अभी पंद्रह सोलह साल की रही होगी। शरीर से एकदम दुबली-पतली, ऐसे काम वालियों की दिल्ली में खूब जरूरत पड़ती। ख़ास करके जाड़े के दिनों में।

घर में झाड़ू पोंछे का काम करना खुशबू को नहीं आता था और मिस शुक्ला को अपने घर में काम करने वाली की सख्त जरूरत थी। जो उनके घर की अच्छे से सफाई कर सके। ख्याल रख सके।

ख़ास करके जाड़े के दिनों में। जब ठण्ड होती तो उनका और उनकी बेटी का पानी में हाथ डालने का मन नहीं होता। ऐसे में उनके घर का काम करे तो करे कौन ?

एक दिन इसी कड़कती ठण्ड और अपनी लड़की के कारण मिस शुक्ला ने बगल में रहने वाली खुशबू की मम्मी से मिली और उनकी बड़ी बेटी को अपने घर में काम के लिए बोला।

खुशबू की माँ को मिस शुक्ला की बात पर गुस्सा भी आया, किन्तु उनके सामने मज़बूरी भी थी। खुशबू का पिता जुनैद पहले ही उसकी माँ का साथ छोड़ चूका था, जुनैद से खुशबू की माँ को तीन लड़कियां जन्मी थीं। एक खुशबू, दूसरी का नाम हुस्ना, तीसरी का जरीन नाम रखा था। हुस्ना अभी तेरह चौदह उम्र की होगी। तीनों देखने में खूब सुन्दर थीं। गोल चेहरे, लाल-लाल गाल, गुलाबी ओठ और काले काले बाल तीनों ही लड़कियों को माँ का नूर मिला था। गली में और किसी के बच्चे इतने सुन्दर नहीं थे।

जुनैद के छोड़ने के बाद फैजल अकेली हो गयी थी। परिवार में तीन लड़कियां और खुद मियां बीबी पांच लोगों का खर्च अब जुनैद से नहीं हो पा रहा था। चारपाई बीनने का काम था। लोग घरों में अब तखत या बेड बनवाने लगे थे। जिसके कारण इक्का-दुक्का लोग ही खाट बनवाते। जुनैद ने और कोई काम अपनी जिंदगी में सीखा नहीं था। जब उन्होंने देखा की बच्चे बड़े हो रहे हैं और कमाई कम पड़ती जा रही है, तो वे एक दिन काम पर गए और वापस ही नहीं आए। लोग खुशबू की माँ फैजल को समझाते कि ‘आ जायेगा दो चार दिन में।’

किन्तु एक से दो से चार साल बीत गए जुनैद नहीं आया। फैजल की उम्र भी अभी चौबीस पच्चीस रही होगी। शरीर फिर भी ठोस था। बाल लम्बे और घने थे। पैरों में चप्पल नहीं डालती थी जिससे उसके पैरों की एडियाँ मिटटी में सने होने के बाद भी लाल और सफ़ेद दिखते थे। पति के छोड़ जाने के बाद उसने सजना संवरना भी छोड़ दिया था। गली मोहल्ले वालों को काम पर जाते वक्त या आते वक्त जुनैद मिल जाता था। दिल्ली ज्यादा बड़ी नगरी नहीं थी कि कोई बात या व्यक्ति की खबर एक दूसरे को न लगे। जिन लोगों से जुनैद मिला था उनसे पता चला कि उसने दूसरी औरत रख ली है ओ भी बिना निकाह के।

पति के छोड़ के जाने के बाद फैजल के एक रिश्तेदार अक्सर उनके घर आया करते थे। बच्चे अभी छोटे ही थे। फैजल को एक मजबूत कंधे की जरुरत थी जो उन्हें और उनकी तीन बेटियों को सहारा दे सके। हर्षुल अंसारी धीरे-धीरे करीब आते गए। पति को छोड़े अभी चार साल ही बीते थे कि फैज़ल पेट से हो गई। मोहल्ले वाले उसको उल्टा सीधा भी बोलते थे। फैजल अधिकतर बातों को सह लेती बह कहती। वह अक्सर बड़बडाया करती थी कि “जिसका पति नहीं हुआ उसका गली वाले क्या होंगे ?”

अंसारी साहब की कबाड़ी की दुकान थी। दिल्ली क्षेत्रफल की दृष्टि से बड़ा शहर भले ही न हो किन्तु जनसँख्या की दृष्टि से बड़ा जरुर था। उस समय अंसारी साहब का कबाड़ी का काम जोरों से चल रहा था। लोग अधिक मात्र में शराब पीते खाली बोतलें पच्चीस पैसे में बिक जाती थी। लोहा और प्लास्टिक का सामान पूरा दिल्ली इस्तेमाल करता था। एक बार सामान ख़राब होता तो लोग भंगार में बेच देते। रखने की जगह भी नहीं होती। घर में जितनी जगह होती उससे ज्यादा लोग भरे होते। किरायेदारों की स्थिति तो और भी दयनीय थी। किरायेदारों के यहाँ तो ऐसी स्थिति थी कि एक कमरा होता। उसमें रहने वाले पांच या छः सदस्य होते। गर्मियों में तो अक्सर लोग छतों पर सोते। जड़ों में कमरे में एक तखत होती। तखत को चार पांच ईंटों के ऊपर रखते थे। जिससे नीचे भी सो सकें और ऊपर भी।

दिल्ली में धीरे धीरे कूलर, टीवी, फ्रिज, पंखे आदि का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा था। चीजें ख़राब होती भंगार की दुकान में चली जाती। अंसारी साहब माल गलियों और मोहल्लों से कम रेट पर खरीदते और ऊँचे दाम पर बड़े व्यापारियों को बेच देते। मुनाफा दुगना-तिगुना का होता।

जैसे-जैसे समय बदलता गया। अंसारी साहब का शराब पीना भी बढ़ता जा रहा था। उनका काम भी बढ़ता गया। किन्तु फैजल अब ढलने लगी थी। चार लड़कियां थी। जिन्हें पालने का भार अंसारी साहब पर ही था। फैजल को भी रौशनी दिखाई देती थी। उसकी लड़कियां बड़ी हो रहीं थी। सब स्कूल भी जाने लगी थी। बड़ी वाली आठवीं पास कर ली थी। देर से स्कूल में नाम लिखाने के कारण, वह क्लास में सबसे बड़ी दिखती। बच्चे उसे चिढ़ाते थे जिसकी शिकायत वह माँ से हमेशा करती थी।

एक दिन अंसारी साहब नशे में चूर होकर आये और फैजल के साथ जोर जबरदस्ती करने लगे। छुट्टी का दिन था, उस दिन लड़कियां भी घर पर ही थीं। फैजल ने मना किया तो उन्होंने दूसरा दरवाजा देख लिया। उनके घर आना ही छोड़ दिया। फैजल अब अकेली थी, उसकी मज़बूरी और जिम्मेदारी भी बढ़ती जा थी। चार लड़कियों के जनने के बाद उसको कमर में अक्सर दर्द रहता था। वह ज्यादा चल फिर भी नहीं सकती थी। फिर भी वह बच्चों का ख्याल रखती। अंसारी साहब के छोड़ जाने के बाद उसका भुनभुनाना बढ़ता ही गया। वक्त से पहले ही वह बूढी होने लगी थी। अब तो वह अक्सर कहा करती थी “जिसका पति नहीं उसके गली वाले कैसे हो सकते हैं।”

खैर उस दिन खुशबू काम पर गयी उसे थोडा बुखार भी था। काम से उसे बारह सौ रुपये ही मिलते थे। जिसके कारण वह दो घरों में काम करने लगी। शुक्ल जी के घर झाड़ू, पोंछा, बर्तन और कपड़े के बारह सौ रुपए मिलते थे। उस दिन जब वह काम पर पहुंची तो देखा कि शुक्ला जी के लड़के की शादी होनी है, घर में रिश्तेदार आये हैं। उस दिन खुशबू पूरी तरह पहले ही टूट रही थी। झाड़ू पोंछे के बाद खुशबू को खूब सारे बर्तन धोने पड़े थे। ठंडे पानी में उसकी तबीयत और ख़राब हो रही थी। सुबह से काम करते उसे ग्यारह बज गए, रोज दस बजे वह घर छोड़ देती थी। किन्तु आज उस शुक्ला जी के रिश्तेदारों के कपड़े भी धोने पड़े थे। जब वह कपड़े धोने जाने वाली ही थी कि उनकी लड़की ने आवाज लगायी “खुशबू इधर आ”

खुशबू काम छोड़ के तुरंत गयी “देखियो यहाँ चाय गिर गयी है पोंछे से इसे साफ़ कर दे जरा।” खुशबू ने नोक झोक किये बिना पोंछा लिया और एक बार पोंछे को घुमा लायी।

शुक्ल जी की लड़की रानी ने फिर आवाज दी “खुशबू यहाँ आ” खुशबू गयी तो उसने बोला “ये कैसा पोंछा लगाया है चिपचिपा रहा है एक बार और थोडा ढंग से लगा दे।” खुशबू दुखी हो गयी थी एक तो जाड़े में तबीयत ख़राब दूसरा ठन्डे पानी में काम करना उसे पहाड़ जैसा लग रहा था। जैसे ही वह काम से फ्री हुई तुरंत घर गयी और माँ को तबीयत ख़राब होने की सूचना दी। माँ ने जरीन को आवाज लगायी और उसको हरे पत्ते की बुखार शरीर दर्द की गोली लाने को कहा। हरे पत्ते की गोली से सभी परिचित थे। जरीन तुरंत गयी और किराना स्टोर से हरे पत्ते की गोली ले आई। फैजल ने गरम पानी के साथ खुशबू को दावा दे दी। खुशबू रजाई में जाकर सो गयी।

अंसारी के छोड़ जाने के बाद खुशबू की बहनों ने स्कूल जाना छोड़ दिया था। वे सभी घर की परिस्थिति को समझ चुके थे। अब वह खाने को लेकर जिद नहीं करती थीं। अब खुशबू की बहनें पड़ोस के एक अंकल की कम्पनी से एक्सपोर्ट के कपड़े लाती और दिन रात उसके धागे काटती थीं और अगले दिन सुबह ले जाकर कम्पनी में जमा कर देती। फिर वहां से दूसरे नए कपड़े धागा काटने के लिए ले आती। माँ और तीन बहनों ने मिलकर महीने के आठ-आठ सौ रुपए कमाने लगीं। धागे काटने से बहनों में कम्पटीशन का भाव भी बन गया। वे एक दूसरे से ज्यादा पैसे कमाने के लिए, एक-दूसरे से अधिक काम भी करती। रोज घर का काम जल्दी करके कपड़ों के धागे काटने में भिड़ जाती थी।

खुशबू सोयी हुयी थी। जहाँ वह दूसरे घर काम पर जाती थी, वहां की मालकिन उसके घर आ पहुंची थी। उसने खुशबू को आवाज लगायी। खुशबू तो सोयी रही किन्तु उसकी माँ फैजल नीचे उतर कर आई और उसकी तबीयत ख़राब होने का समाचार देने लगी। इतने में उस महिला ने बोला “रोज-रोज लेट हो जाती है। किसी दिन समय पर काम पर नहीं आती। अब तबीयत ख़राब का बहाना लगा रही हो।” खुशबू की माँ फैजल उसकी शकल देखने लगी।

उसकी माँ बेबस थी उसने बोला “नहीं बहना आज ही तो उसने छुट्टी की है अभी बच्ची है। उसकी तबीयत ख़राब हो रक्खी है। अभी-अभी मैंने उसको दवा दी है। तुम भी तो आखिर एक औरत ही हो एक लड़की का दर्द तो तुम समझ ही सकती हो।” फैजल की बात का कोई असर उस पर नहीं पड़ रहा था। फैजल बोल रही थी किन्तु वह नहीं मानी बोलने लगी “आज मेरे घर कैसे काम होगा।” कभी तबीयत ख़राब... तो कभी कुछ..., कभी शादी में जाना है? कभी कुछ कभी कुछ रोज का ही ड्रामा है।

फैजल गिडगिडाने सी लगी थी “आरी नहीं बहना कल जैसे ही ठीक हो जायेगी, मैं भेज दूंगी।” फैजल के बोलने से उसके मुंह में पानी आ गया था उसने ठुक को अन्दर लिया। मालकिन जिद्द पर अड़ गयी थी वह आज किसी भी हालत में काम करवाना चाहती थी उसकी बातों से ऐसा लग रहा था “कल तो भेज दोगी पर आज का कैसे होगा” उसने बोला।

फैजल बोली “आज का अब मई क्या बताऊँ बहना। आज....आज आप देख लो कल तो वह आ जायेगी।” उस औरत ने ऊपर खड़ी उसकी छोटी बहन को देखा तो बोली “आज छोटी वाली को भेज दो”

फैजल भौचक रह गयी। उसके पैरों में जैसे झनझनाहट हो गयी हो, ऐसा लगा उससे जैसे किसी ने उसकी जान मांग ली हो। किन्तु उसके पास कोई और चारा भी नहीं था या तो वह खुद काम पर जाए। जो उससे होगा नहीं, उसके कमर में दर्द जो था। उसने बोला “ नहीं बहना वह तो बहुत छोटी है अभी।”

उस औरत ने यह भी बोल दिया कि “इतनी ही बड़ी तो खुशबू भी थी जब वह आती थी।” गली वाली महिलाएं सब बातें सुन रहीं थी।

फैजल ने बात को ज्यादा बढ़ने से अच्छा समझा हुस्ना से एक बार पूछना। उसने हुस्ना से पूछा तो उसने मना कर दिया। फैजल खुशबू का काम भी नहीं छूटने देना चाहती थी। खुशबू को यहाँ उसी काम के तेरह सौ मिलते थे जबकि शुक्ला जी के यहाँ बारह सौ।

खुशबू के काम छोड़ने तक ही बात सीमित नहीं थी इससे भी ज्यादा उन पर खाने की मुसीबत आने वाली थी। फैजल बड़ी लड़की की शादी के सपने भी देखने लगी थी। उसने हुस्ना को किसी तरह मनाया वह काम पर चली गयी।

हुस्ना का किसी और के घर काम करने का आज पहला दिन था। खुशबू से जब उसकी हल्की सी भी नोक-झोक होती तो, वह उसे काम को लेकर ताना जरूर कस देती थी किन्तु आज वह खुद उस काम को करने जा रही थी। इससे उसके मन के भीतर खुद पर घृणा भी आ रही थी।

हुस्ना जब उस महिला के घर पहुंची तो इतना बड़ा घर देखकर चौक गयी। ऊपर से उसे दो माले का काम करना होगा। यह सुनकर वह बदहवास सी हो गयी थी। मालकिन ने झाड़ू और पोंछा बाल्टी के साथ दे दिया। मालकिन ने अपनी कर्कश आवाज में डाटते हुए कैसे काम करना है, एक बार काम को समझा दिया।

हुस्ना ने बे-मन से काम करना शुरू किया। धीरे-धीरे उसने पूरे घर में झाड़ू की। फिर पोंछा किया उसे एक बज गए इतने ही काम में। उस पर मालकिन की बातें यहाँ झाड़ू मार, खिडकियों को पोंछ, टीवी फ्रिज पोंछ। बेड पर कपड़ा मार। वह परेशान हो गयी थी। उसे खुशबू याद आने लगी थी। झाड़ू पोंछा करने के बाद मालकिन ने जो कपड़े सुबह से भीगे हुए थे उसे साफ़ करने को कहा। हुस्न को मालकिन के घर जाने का पुख्ता कारण इस बात से लगा। इतने कपड़े देख वह अचंभित हो रही थी।

एक टब में दो चद्दरें और उतने ही दूसरे टब में कपड़े देख उसे चक्कर आने लगे। पर करना उसी को था। वह जानती थी, यहां से वह भाग भी नहीं सकती। यदि ऐसा संभव होता तो वह कब की छूमन्तर हो चुकी होती। उसने पहले कपड़ों को धोना जरूरी समझा। कपड़े धोते-धोते उसकी हालत खस्ता हो गयी थी। उसने चद्दरों को धोना शुरू किया। मालकिन उनपर खूब ब्रश मारने को कहती ताकि चद्दरें नयी दिखें। उसने किसी तरह पूरे काम को किया। जब वह घर को चली दो बज चुके थे और भूख भी लग गयी थी।

घर पहुंचने पर उसकी आँखें छलछला गयी थी। उसने देखा खुशबू के बुखार में पहले से आराम था। वह जगी हुई थी किन्तु ठण्ड ज्यादा होने से अभी रजाई में ही बैठी थी। हुस्ना का चेहरा पूरी तरह किलसा हुआ भी था। अपनी बड़ी बहन खुशबू के लिए उसके दिल में बहुत सारा प्यार भी उमड़ आया था। अन्दर ही अन्दर वह खुशबू के बारे में सोचने लगी थी। वह अब खुशबू को किसी के घर काम करने नहीं देने जाना चाहती थी। उसने घर जाकर माँ को पूरी हकीकत बताई। माँ भी अपनी नजरों में गिरा महसूस करने लगी थी।

खुशबू अगले दिन भी काम पर नहीं गयी। वह दिन तेरह दिसंबर था। सुबह कोई दस बजे होंगे कि टीवी पर खबर आने लगी कि संसद पर आतंकी हमला हुआ है। पूरी दिल्ली में हाई एलर्ट जारी कर दिया गया। सब व्यक्ति काम से घर को लौटने लगे थे। सड़कों पर भारी संख्या में पुलिस तैनात कर दी गयी थी। सब मॉल, दूकाने, चौराहे और गली खाली हो रहे थे। इस दिन स्कूलों की छुट्टियाँ घोषित हो गयी थी। आतंकियों के ठिकानों पर पूरी दिल्ली में छापे मारी होने लगी। कई मुसलमानों को शक के घेरे में गिरफ्तार भी किया गया। टीवी पर खलबली मची हुई थी। भारत में आतंकियों का अब तक का सबसे बड़ा हमला था। शाम होते-होते स्थिति पर थोड़ा काबू पा लिया गया था। आने-जाने वाली सभी गाड़ियों की चेकिंग चल रही थी। जो मुसलमान होता उसे जरूर उसका पता, उसका पहचान पत्र चेक किया जाता।

खुशबू अगले दिन जब शुक्ला जी के घर काम पर पहुंची तो सब टीवी पर जमे हुए थे। एक दिन की छुट्टी के बाद वह समझती थी कि उसे काम डबल करना होगा।

वह अपने काम पर लगने वाली थी कि मिस शुक्ला ने कल न आने का कारण पूछा। उसने बुखार होने की खबर दी। मिस शुक्ला ने बोला “बुखार ही था या कुछ और ?” उनके पूछने का मतलब था कही और काम तो नहीं ढूंढ लिया। खुशबू ने जवाब दिया “नहीं आंटी बुखार था।”

अन्दर कमरे में सब चाय पी रहे थे। एक चाय बच गयी थी, वह फेंकनी पड़ती मिस शुक्ल ने वह चाय खुशबू को पीने को दे दी। खुशबू चुप-चाप चाय पीने लगी। अन्दर बैठे लोगों में किसी ने बोला “सारे कटुए एक जैसे होते हैं।” एक बार तो वह यह बात सुनकर डर गयी। किन्तु जब देखी की अन्दर से इस प्रकार की कई बाते आ रही हैं तो वह सहमी-सहमी काम करने लगी। अपना काम पूरा किया और दूसरे काम के लिए दूसरे घर चली गयी। उसने वहां का काम भी बारह बजे तक निपटा कर घर पहुंची।

उसकी बहनें खाना निकाल लायीं। हुस्ना के भीतर खुशबू के लिए अब और प्यार उमड़ आया था। सब खाना खाने लगे क्योंकि उन्हें फिर से धागे काटने का काम करना था। हुस्ना, जरीन और सबसे छोटी शबनम सब घर पर काम करते। खाने के बीच में हुस्ना ने बोला “दी दी तुम भी हमारे साथ यही काम क्यों नहीं करती।”

खुशबू जानती थी उसके काम को छोड़ देने के बाद किसी की शादी नहीं हो पाएगी। उसने बोला ठीक है सोचूंगी। उसने तिस में यह भी बोल दिया “तुम जितने पैसे वहां से कमाती हो हम सब मिलकर उससे ज्यादा कमा सकते हैं।” जरीन ने बात को आगे बढ़ाते हुए यह भी बोल दिया “हाँ दी दी पाली की फैक्टरी से यदि हम कपड़े लायें तो हमें दो रूपये एक पीस के मिलेंगे यहाँ तो केवल डेढ़ रूपये ही मिलते हैं।” खुशबू खाना खा चुकी थी।

वह अपने चारपाई पर जा कर बैठी और आराम करने लगी। बैठते ही चारपाई के भीतर से चर्र्रर्र्र की आवाज आई थी। वह समझ गयी थी आज शब्बो चारपाई पर खूब कूदी है। उसने नीचे झुक कर देखा तो बीच की लोहे की रॉड अलग हो चुकी थी। वह रॉड पहले से भी कमजोर और हल्की थी।

अगले दिन जब वह शुक्ला जी के यहाँ काम पर पहुंची तो उसने उनके यहाँ पड़ी एक लोहे की रॉड देखी थी। उसने मिस शुक्ल से बोला “आंटी यह रॉड मुझे दे दीजिये मेरी चारपाई का लोहा टूट गया है। मैं उसे ठीक करवा लूंगी।” यह बात कहते हुए खुशबू यह भी सोच रही थी पता नहीं देंगे या नहीं देंगे।

तब तक शुक्ला जी बाहर आए नाश्ते की थाली उनके हाथ में थी। क्रोध से बोलने लगे “चारपाई ठीक करवा लूंगी की बच्ची जानती भी है यह क्या है ?” खुशबू की चिंता और गहरी हो गयी।

शुक्ला जी की बात जारी थी - “इस रॉड से सत्तरह को मारा था मैंने और कुलदीप ने मिलकर चौरासी के दंगों में। हमने मार के सारे सरदारों को यह टायर गोदाम देखा है, जिसमें अब कूड़ा फेंकते हैं... और जो कई सालों से बंद है, उसी में गाड़ दिया था।”

खुशबू बदहवास हो गयी। उसे लगा पता नहीं क्या मांग लिया। वह अपने घर आ गयी और काम छोड़ दिया. दिन रात उसे रॉड दिखाई देता. अब वह अपनी बहनों के साथ काम करने लगी। कई दिनों तक उसकी माँ फैजल पैसे के लिए दौड़ती रही तब जाकर थोड़ा-थोड़ा पैसा मिला। बाकी पैसा डूब गया।

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सत्य प्रकाश

पी एच. डी. हिन्दी शोधार्थी

गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय

ई मेल- satyaprakashrla@gmail.com

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नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,820,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,307,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1907,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,644,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,685,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,54,साहित्यिक गतिविधियाँ,183,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: कहानी // रॉड // सत्य प्रकाश
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