बेरोजगारी – हर सरकार का सर दर्द // यशवंत कोठारी

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देश भर में बेरोजगारी पर बहस हो रही है। संसद से लेकर सड़क तक हंगामा बरपा है। बेरोजगार युवाओं की लम्बी लम्बी कतारें कहीं भी देखी जा सकती है। सरकार एक पद का विज्ञापन करती है तो हजारों आवेदन आते हैं। लोग बेरोजगारों को पकोड़े बेचने तक की सलाह दे रहे हैं। कुछ लोग कह रहे है कि रोजगार मांगने वाले नहीं रोजगार देने वाले बनो। लेकिन क्या यह सब इतना आसान है ?

भारत एक युवा देश है। चालीस प्रतिशत आबादी के युवा हैं, जिन्हें रोज़गार चाहिए। स्टेट को आइडियल रोज़गार प्रदाता माना गया है, लेकिन कोई भी राज्य शत प्रतिशत लोगों को नौकरी नहीं दे सकता , वो रोजगार के साधन बढा सकता है, यहीं पर केंद्र व् राज्य सरकारें गलत हो जाती हैं। वे रोजगार की योजनाओं को चल ने में असफल हो जाती हैं। जो थोड़े बहुत पद सरकार निकालती है उन पर भी नियुक्तियां टाइम पर नहीं हो पातीं । कई बार तो सालों गुजर जाते हैं, बेरोजगारों पर फार्म की फीस, इंटरव्यू में आना-जाना , और एक कभी ख़त्म नहीं होने वाला इंतजार। स्पष्ट लिखें तो नौकरी के लिए रिश्वत का जुगाड़ भी करना पड़ता है। और कई बार रिश्वत डूब जाती है। ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं है।

स्टार्टअप और बैंकों से लोन लेकर काम शुरू करना आसन नहीं हैं और जो काम शुरू किया चल जायगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। हो सकता है कोई बड़ी कम्पनी आपके काम को खा जाये। और आप सड़क पर आ जायें।

एक विचार यह भी हो सकता है की बढ़ती जनसंख्या की तुलना में रोज़गार नहीं है और एक विकल्प ये है कि जनसंख्या नियंत्रण पर ध्यान दिया जाये। लेकिन कोई सरकार इस मुद्दे पर बात करने की हिम्मत नहीं करती। केरल में जीरो जनसंख्या वृद्धि है लेकिन रोज़गार की स्थिति ठीक नहीं है, कुछ युवाओं का यह कहना भी विचारणीय है कि रोज़गार में युवतियां बाजी मार ले जाती हैं और पुरुष रोज़गार से वंचित रह जाते हैं ।

तेज़ी से बेरोज़गारी बढ़ने का एक कारण शिक्षा के नाम पर तेज़ी से खोली गयी शिक्षा की दुकानें भी हैं। ये दुकानें बाज़ार के हिसाब से लोग नहीं बना रही हैं। ये केवल पैसे लेकर डिग्री दे रही हैं। जाओ बाज़ार में काम ढूंढो। बाज़ार में काम का आदमी मिलता नहीं। रोज़गार देने वाला कम पैसे देगा। हायर एंड फायर की बात करता है। पक्की नौकरी या धंधा तो सरकार भी नहीं दे रहीं फिर निजी संस्था कहाँ से देगी। कोढ़ में खाज़, मानव संसाधनों को लेने के लिए टेंडर प्रक्रिया । काम को आउट सौर्स कर देना। मशीन के साथ मानव को ठेके पर लिया जा रहा है। कम्पनी उनका दोहरा शोषण कर रही है। मेडिकल नहीं, पी-ऍफ़ नहीं, आधा वेतन।

सरकार की एक और बड़ी गलती ये है कि वो साठ साल के ऊपर के लोगों को रख रही है। पैंसठ सत्तर साल तक के लोग सरकार,संस्थाओं में जमे रहते हैं और इस कारण नयी पीढ़ी को रोज़गार नहीं मिलता है। नयी पीढ़ी में निराशा व् अवसाद व्याप्त है जो अक्सर आंदोलनों में दीखता है।

सरकारों को अपने नैतिक दायित्व को समझना चाहिये । खाली दिमाग शैतान का घर वाली कहावत चरितार्थ हो रही हैं। युवाओं को काम धंधा नहीं मिलने के कारण उनकी शादी-विवाह में भी अड़चनें आ रही हैं। इस कारण उनमें दोहरी निराशा व्याप्त हो रही है। पहले सरकारी स्कूल कालेज में पढ़ कर लड़का सरकारी नौकरी पा जाता था और नौकरी के साथ ही छोकरी भी मिल जाती थी। अब सरकारी नौकरी तो भूल ही जाओ, तमाम तरह की बंदिशों ,आरक्षणों व् रिश्वतों के बाद हज़ार में से एक बंदा अगर नौकरी पा भी जाता है तो बाकी ९९९ बन्दे क्या करें? कहाँ जायें? नौकरी की एक अंतहीन तलाश में आज का युवा हैरान परेशान है। युवा देश का युवा परेशां, तो देश परेशान।

आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है? नए रोजगारों का नियमित सृजन किया जाना चाहिए। पालिसी मेकर्स को यह बात समझनी चाहिए कि बिन रोज़गार सब सून। विदेशों में जनसंख्या के हिसाब से रोज़गार बनते हैं। भारत में अभी ऐसा होने में काफी समय लग जायगा। बेरोज़गारी के साथ ही कमतर रोज़गार भी एक बड़ी समस्या है। अंडर एम्प्लॉयमेंट से निपटना संभव नहीं है। हर रोज़गार शुदा व्यक्ति अपने आपको अंडर एम्प्लोयेड बता सकता है। यहाँ तक की केबिनेट मंत्री भी खुद को ऐसा ही मानता है।

रोज़गार की अपनी मजबूरियां हैं। लोकसेवा आयोग वर्षों तक भरती नहीं निकालते। निकालते तो प्रक्रिया पूरी नहीं होती, हो जाती है तो सरकार नियुक्ति नहीं देती। कुल मिला कर बेरोज़गारी से कोई सरकार जीत नहीं सकती। हर सरकार को इस लड़ाई में मुंह की खानी पड़ती हैं। युवाओं का कोई सुनहरा भविष्य किसी भी सरकार के पास नहीं हैं।

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यशवंत कोठारी ,८६,,लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी बा हर जयपुर -३०२०००२

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