पूजा मदान की कविताएँ

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पीड़ा

तुम कोई एक नहीं

तुम्हारे जैसी लाखों-करोड़ों हैं

जिन्होंने अपने सपनों को

उपलों की धुआँधार राख में

बीच चौराहों पर

जलते-भूनते देखा है ||

देखा है...

बड़े-बड़े बाजारों में

चीजों के साथ-साथ

खुद को भी ऊँचे दामों पर

बिकते हुए देखा है |

देखा है...

इंसानों की इस बस्ती में

हैवानरूपी भगवानों से

असंख्य बार खुद को

खून में लथपथ

रोते-बिलखते देखा है |

इतना ही नहीं

देखा है तुमने...

बीच सड़क पर

जहर उगलती शीशी से

चेहरे के साथ-साथ

अपने अरमानों को भी

पल भर में मोम की तरह

दर्द भरी जलन से

पिघलते हुए देखा है |

देखा है बार-बार

और हर बार

साल दर साल

शरीर बनने से पहले ही तुमने

खुद को भ्रूण अवस्था में

बेरहमी की मौत

मरते हुए देखा है||


मुक्ति

मुक्त होना चाहती हूँ मैं

उस आदर्शवादी सभ्य समाज से

जहाँ ‘पुरुष सत्ता’ की बेड़ियाँ

टंगी हुई है सदियों से

हर उस घर, हर उस द्वार

और हर उस आँगन की खूंटी पर

जकड़ने को मुझे,

लील डालने को मेरे उन

संघर्षशील कदमों को

जो तलाश रहे हैं सदियों से

अपने लिए एक जमीन,

एक ऐसी बस्ती

जहाँ जीने, बसने

और खुलकर साँस लेने में

‘पुरुष सत्ता’ का

जहरीलापन न हो ||


रक्तरूपी सफेद रंग

सफेद रंग सफेद नहीं रहा

आज वह प्रतीक है रक्त में नहाई हुई

उस विषैली राजनीति का

जिसने उजाड़े हैं अपनी शान्ति की आड़ में

लाखों-करोड़ों बस्तीनुमा जंगल |

सिंहासन पर बैठकर

खुद को बेदाग रखकर

और अपने तख्तोताज के झूठे अहंकार में

खेले हैं राजनीति के ऐसे-ऐसे ‘दुर्योधनी खेल’|

बिछाए हैं बड़े-बड़े विकासरूपी जाल

हमसे हमारी ही जमीनें छिनकर

खड़ी की है आलीशान कोठियां

और उन कोठियों में बार-बार

रक्त से लाल किया गया है हमें

रौंदा गया है हमारी ढाई गज की ओढ़नी को

अपनी घिनौनी, धोखेबाजी सभ्यता से

इतना ही नहीं...

सदियों से जंग लग चुके

लोहे के तारों से

सिला गया है हमारे फटे होठों को

ताकि हम ‘सफेद’ को ‘काला’

बोलने की जिद न कर दें ||


आज का प्रेम

कितना कमजोर कायर है

आज का कलयुगी प्रेम

जो अपने राक्षसी अहम से

साक्षात्कार करवाता है बार-बार

आज का प्रेम, प्रेम नहीं

अपितु वह सड़ा हुआ कपड़ा है

जिसे कोई स्त्री अपनी माहवारी में लगाती है

और वह कपड़ा उसके भीतर ही भीतर

रक्त में जहर घोलकर उसके

प्राण ले लेता है ||

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