कहानी // छुप कर रोने वाली वो लड़की // नीरजा हेमेन्द्र: प्राची – जनवरी 2018

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नीरजा हेमेन्द्र

जन्म : कुशीनगर, गोरखपुर

शिक्षा : एम.ए., हिन्दी साहित्य, बी.एड.।

संप्रति : सरकारी क्षेत्र में शिक्षिका, लखनऊ (उ. प्र.)

अभिरुचियांः पठन-पाठन, लेखन, अभिनय, रंगमंच, पेन्टिंग, एवं सामाजिक गतिविधियां

प्रकाशन : चार काव्य संग्रह, पांच कथा संग्रह और एक उपन्यास ‘अपने-अपने इन्द्रधनुष’ प्रकाशित। हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन एवं आकाशवाणी व दूरदर्शन से प्रसारण।

सम्पर्क : ‘नीरजालय’, 510/75, न्यू हैदराबाद, लखनऊ-226007 (उत्तर प्रदेश)

कितनी सरलता से अपने जीवन रूपी पुस्तक के एक-एक पृष्ठ वह पलटती जा रही थीं। सम्मोहित-सी बस मैं उन्हें तकती चली जा रही थी। क्या कोई इतना भी सरल हो सकता है कि सारे पन्ने साफगोई से बिना किसी लाग-लपेट के पलटता चला जाये। वह बोलती जा रही थीं, और मैं बस सुनती जा रही थीं. उनकी कहानी उनके ही शब्दों में.....

"घास-फूस कर तरह लम्बी होती जा रही है, काम कुछ नहीं आता। स्कूल जाना और आना। इसके अतिरिक्त भी कभी कुछ कर लिया करो।" बुआ की बातें सुनकर मैंने बेफिक्री से अपना मुँह बिचका दिया और घर के आँगन से बाहर निकल कर दालान में जा कर इस प्रकार खड़ी हो गयी, जैसे कि बुआ की अनर्गल बातों को सुना ही नहीं। इस प्रकार की बातें सुनाना बुआ, दादी और कभी-कभी मम्मी आदि का भी स्वभाव है और सुनना मेरा। किन्तु आज बुआ की बातें सुनकर मेरा मुँह कसैला हो गया। मैं दालान की बाउन्ड्रीवाल के सहारे खड़ी देर तक बाहर देखती रही। खड़े-खड़े थकने लगी तो बाउन्ड्रीवाल पर ठुड्डी टिका कर खड़ी हो गयी। बुआ की बात का प्रतिरोध मुझे अपने अनुसार करना था, मैंने किया। "...निशा... निशा... कहाँ हो...?" माँ की आवाज थी। काफी देर हो चुकी थी मुझे यहाँ खड़े हुए, अतः माँ मुझे ढूँढ रही थीं।

"ये लड़की स्कूल से आकर न जाने कहाँ चली गयी है...? न खाने की चिन्ता न पीने की फ़िक्र...?" माँ बड़बड़ाती हुई दालान की ओर ही आ रही थीं। माँ की आवाज सुनकर भी मैं उसी प्रकार खड़ी रही।

"ये देखो! यहाँ खड़ी है और हम पूरे घर में ढूँढ़ते फिर रहे हैं।" माँ मेरे पास आ चुकी थीं।

"ऐसे क्यों खड़ी हो...? किसी ने कुछ कहा है क्या...?" माँ मेरी ओर देख कर बोलीं। मैं चुप रही।

"मुँह क्यों फुला रखा है...? अवश्य किसी ने कुछ कहा होगा।" मैं चुप खड़ी रही पूर्ववत्।

"कुछ कहोगी... हुआ क्या है...?" माँ ने पुनः पूछा।

"माँ, मैं लम्बी होती जा रही हूँ तो इसमें मेरी क्या ग़लती है? किसी का दिया तो खाती नही हूँ, अपने पापा का खाती हूँ।" मेरी बाल सुलभ बातें सुनकर माँ मुस्करा पड़ीं। वह समझ गयीं कि मुझसे इस प्रकार की बातें गाहे-बगाहे मेरी बुआ ही किया करती हैं। हम दोनों में छत्तीस का आँकड़ा बना ही रहता है। बुआ ब्याह योग्य हो गयी हैं। उनके लिए वर की तलाश की जा रही है, किन्तु बचपना अभी तक गया नहीं है।

"चलो खाना खा लो! बुआ की बात का बुरा नहीं मानते।" माँ मेरा हाथ पकड़कर भीतर ले आयीं।

"जाओ! रसोई में तुम्हारा खाना रखा है, निकाल कर खा लो।" माँ ने रसोई की ओर संकेत करते हुए कहा।

मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया। आँगन में लगे हैण्डपम्प से हाथ धोया। रसोई से अपना भोजन थाली में निकाल कर आँगन में बिछे तख़्त पर बैठ कर भोजन करने लगी। खाने में आज मेरी पसन्द की सब्जी व चावल था। मैं स्वाद लेकर खाना खाने लगी। भोजन समाप्त करने के पश्चात् मैं माँ के पास गयी। माँ छत पर थीं। छत पर गेहूँ सूख रहे थे। माँ बुधई से गेहूँ इकट्ठा करवा कर बोरे में भरवा रही थीं। बुधई इस घर का पुराना नौकर था। मैंने बचपन से उसे यहाँ काम करते देखा है। वह यही रहता है, घर के सदस्य की भाँति। बुधई गेहूँ का बोरा लेकर नीचे उतरने लगा।

"बुधई चाचा! बोरी रखकर रसोई से जूठे बर्तन निकाल कर आँगन में रख देना। तुलसी आ रही होगी बर्तन माँजने।" मैंने बुधई से कहा और माँ के पास चली गयी।

"माँ! बुआ से कह दो मुझे घास-फूस की तरह लम्बी न कहा करें। उनकी बातें सुन कर सभी मुझे ऐसा कहने लगे हैं।"

"कोई नहीं कहेगा मेरी अच्छी बेटी को।" माँ ने कहा।

"अभी परसों सौमित्र ने मुझे लम्बू-लम्बी कह कर चिढ़ाया है।" सौमित्र मेरा छोटा भाई है। मुझसे महज दो वर्ष छोटा।

"कोई नहीं कहेगा, मैं मना कर दूँगी। जाओ कुछ काम कर लो, पढ़ो-लिखो।" माँ ने मुझे समझाते हुए कहा।

पाँच भाई-बहनों में मैं तीसरे नम्बर पर थी। मुझसे बड़ी एक बहन व एक भाई था। बुआ और दादी कहती थीं कि मैं तेतरी थी। तेतरी का अर्थ मुझे नहीं मालूम, किन्तु उनके कहने के ढंग से मैं अनुमान लगाती थी कि तेतरी होना अच्छा नहीं होता होगा। तेतरे बच्चों का भाग्य अच्छा नहीं होता। यदि तीसरे नम्बर पर मैं न होती कोई और होता तो क्या वह भी बुरा होता! या फिर दुनिया के सभी तीसरे नम्बर के बच्चे तेतरे होते हैं और अभागे होते हैं? मैं इस पुरानी मान्यता को नहीं मानती।

दुनिया में क्या-क्या होता है मैं ये भी नहीं जानती। किन्तु यहाँ उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर फैजाबाद में मैं देखती-सुनती आ रही थी कि तीसरे नम्बर की लड़की तेतरी होती है, और उसके लिए लोगों की भावनायें ऐसी ही होती हैं। बुआ, दादी तथा अन्य रिश्तेदार भी कभी-कभी मेरे रंगरूप पर बिना मांगे अपनी राय देते थे- कि मैं अपने भाई बहनों में सबसे साँवली थी. मेरे नाक-नक्श भी उनकी तरह आकर्षक नहीं थे। मैं सोचती कि छोटे शहरों में लोगों के पास समय की कमी नहीं है। वो इसी प्रकार की बातें करके समय व्यतीत करते हैं। माँ कहती हैं कि दीदी की भाँति मेरा रंग साफ भले ही न हो, किन्तु मेरा गेहुँआ रंग बहुत अच्छा है। माँ की बातें सुनकर मैं आत्मविश्वास से भर जाती।

दीदी उस वर्ष बारहवीं कक्षा में थीं। भइया ग्यारहवीं कक्षा में और मैं नौवीं कक्षा में। मुझसे छोटे भाई बहन भी क्रमशः छठीं व पाँचवी कक्षा में थे। फैजाबाद के सरकारी कॉलेज में सभी भाई-बहन पढ़ते थे। उस वर्ष कॉलेज की वार्षिक खेलकूद प्रतियोगिता में बास्केटबॉल व दौड़ की प्रतियोगिता में मैं प्रथम आयी थी। मेरी इस उपलब्धि पर माँ व पापा प्रसन्न थे।

दिन व्यतीत होते जा रहे थे। विद्यार्थी जीवन के दिन अच्छे होते ही हैं। मेरे दिन भी अच्छे थे... सुखद थे। इस बीच बुआ का ब्याह हो गया था. दीदी ने स्नातक पूरा किया तो उनका भी ब्याह हो गया। छोटे शहर के शिक्षित व सम्पन्न परिवार में लड़कियों का इतना पढ़ लेना ही ब्याह के लिए पर्याप्त होता है। वह ससुराल चली गयीं और अब तीज त्योहार में ही घर आती हैं।

दीदी जब माँ के घर आती हैं तो उनका खूब स्वागत् सत्कार होता। जीजा इंजीनियर हैं। दीदी के रहन-सहन, पहनावे इत्यादि पर सम्पन्नता दिखाई देती। दीदी आतीं तो मुझे बहुत अच्छा लगता। दीदी के साथ खूब बातें होती। इसी प्रकार हँसते- खेलते समय व्यतीत होता जा रहा था। इस वर्ष मेरा भी स्नातक का अन्तिम वर्ष था। घर में मेरे लिए वर ढूँढ़ने की प्रक्रिया चल रही थी। इधर मेरी परीक्षा समाप्त हुई उधर मेरा भी विवाह तय कर दिया गया था।

माँ-पापा कहते थे कि मेरा भाग्य बहुत अच्छा था। मेरा होने वाला पति बहुत होनहार व अच्छा था। वह मिलिट्री में अच्छे पद पर था। एक दिन वह भी आ गया, जब मेरा विवाह हो गया और माँ का घर छोड़कर मैं ससुराल चली आयी। दीदी के सुखी और सफल वैवाहिक जीवन का उदाहरण मेरे समक्ष था, अतः विदाई के समय मम्मी-पापा से दूर जाने के अतिरिक्त अन्य कोई दुख-विछोह नहीं था। सुख-दुख का मिला-जुला भाव मन में समेटे मैं ससुराल चली आयी।

ससुराल में तीन-चार दिन ही व्यतीत हुए होंगे और मुझे आभास होने लगा कि मेरे पति मुझसे खिंचे-खिंचे से रहते हैं। पति-पत्नी के मध्य का प्रेम और लगाव जो मैंने दीदी व जीजा के बीच देखा था वो हमारे बीच से कहीं गुम था। फिर भी मेरा प्रयत्न यही रहता कि हमारे बीच प्रेम और स्नेह का सम्बन्ध बने। किन्तु मात्र मेरा प्रयत्न ही पर्याप्त नहीं था। मेरे पति की मंशा ही नहीं थी कि हमारे बीच प्रेम-स्नेह तो क्या किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध बने. इस बात की अनुभूति मुझे शीघ्र ही होने लगी।

बिना किसी त्रुटि के मेरे कायरें में कमी निकालना, लड़ने-झगड़ने के अवसर बना लेना मेरे पति का स्वभाव बनता जा रहा था। छः माह बमुश्किल व्यतीत हुए और मैं उसकी हिंसा का शिकार बनने लगी। तीव्र स्वर में उसका डाँटना, अपमान व तिरस्कार करना लगभग प्रतिदिन मुझे सहन करना होता, जो सबके समक्ष होता। रातों को वो मुझे मारता और मैं दबे स्वर में सिसकियाँ भरती, कहीं कोई सुन न ले कि मेरा पति मुझे मार रहा है। मैं उसकी मार सह लेती, किन्तु पति द्वारा पीटे जाने का अपमान कैसे सहन कर पाती? मैं जानती थी कि पति द्वारा पीटे जाने पर पति का नहीं, बल्कि हमारा समाज पत्नी का तिरस्कार करता है... अपमान करता है। यदि पति पत्नी के प्रति क्रूरतम व्यवहार करता है तो यह समाज अभागी पत्नी को दोषी मानता है।

मेरा पति क्यों मुझसे इतनी घृणा करता है...? यह आत्ममंथन मैं मेरी शादी के पश्चात् पहली बार पड़ने वाली दिसंम्बर की उस सर्द रात में छत पर बैठकर करती रही, जब मेरे पति ने मुझे बिना किसी त्रुटि के मारा व कमरे से बाहर करते हुए कहा कि मैं जाकर छत पर बैठूँ। कारण मुझे ही तलाशना था, क्योंकि उससे पूछने का दुस्साहस कर मैं और लात घूसों से पिटना नहीं चाहती थी। अपने पति के रूप में पुरुष का ऐसा क्रूर रूप मैं पहली बार देख रही थी, जो मेरे पापा व जीजा से भिन्न था।

मेरा आत्म-विश्लेषण मुझे बता रहा था कि मैं उसे पसन्द नहीं थी. मेरा रंग दबा हुआ था यानी कि सांवले और गोरे रंग के बीच का रंग... जो सुन्दर तो था, परन्तु अति सुन्दर नहीं और मेरे पति को पत्नी के रूप में अतीव सुन्दरी की चाह थी. मैं उसकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी थी, परन्तु एक कारण मुझे समझ में नहीं आ रहा था, अगर मैं उसकी आशा के अनुरूप सुन्दर नहीं थी, तो उसने मुझसे शादी क्यों की थी?

परिस्थितियाँ असह्य होने पर एक रात मैं वहाँ से भाग कर माँ के घर आ गयी। इस सामाजिक व्यवस्था से अनभिज्ञ कि अविवाहित लड़की माता-पिता के घर जब तक चाहे रह सकती है, किन्तु विवाहित लड़की कुछ दिनों का आश्रय भी नहीं पा सकती। जब ससुराल से भाग कर ही आ गयी तो मुझे अहसास हुआ कि वहाँ से शेष औपचारिक रिश्ता भी टूटना तय है। सारे रिश्ते तो वहाँ रहते ही टूट गये थे। बाकी कुछ नहीं बचा था, इसलिए कानूनी रूप से भी मैं उससे अलग हो गयी।

दिन व्यतीत होते जा रहे थे। कुछ माह ही व्यतीत हुए होंगे और मुझे इस बात की अनुभूति होने लगी कि स्त्री होने के कारण इस विवाह ने मेरा बहुत कुछ तोड़ा... छीना... कुचला है। पुरुष होने के कारण मेरे पति का कदाचित् कुछ भी नहीं।

माँ के घर में मैं भाई-भाभी और मेरी अनुभवी दृष्टि यदि ग़लत न हो तो माँ-बाबूजी की आँखों में भी खटकने लगी थी। एैसे कौन से माता-पिता होंगे जिन्हें विवाह के पश्चात् वापस मायके में आकर रहने वाली लड़की अच्छी लगेगी...? विवाह के पश्चात् ससुराल में सुखपूर्वक रहने वाली लड़की ही सभी की लाडली होती है। विवाह पूर्व जो भाई मुझे बहन का सम्मान देता था, वो अब बात-बात पर मुझे अपमानित करने लगा था। उसकी बीवी मुझे ताने देती कि अपनी कमी के कारण मैं ससुराल में खप न सकी। माँ के घर में भी मेरा कोई अपना नहीं था।

एक वर्ष भी व्यतीत न हुआ कि मेरी दशा दरवाजे पर बँधे कुत्ते के समान हो गयी जिसके सामने दोनों समय दो रोटियाँ डाल दी जाती हैं, बल्कि कुत्ते से भी बदतर। उसे तो घर के लोग प्यार से दुलारते-पुचकारते भी हैं। एक माँ ही थीं जो दोनों समय मुझे खाने के लिए पूछती। घर में किसी को मेरी फिक्र न थी कि मैंने भोजन किया या नहीं या कि मैं अस्वस्थ तो नही हूँ। कभी-कभी माँ के घर से मन उचटने लगता तो मैं घर से दो-चार कदम दूर स्थित दूर के रिश्ते की बुआ के घर जाकर बैठ जाती। सारा दिन बुआ के घर मैं बैठी रहती, किन्तु मेरे घर से कोई मुझे ढूँढ़ने या बुलाने न आता. जब तक मन होता बैठी रहती। अपने आप घर आ जाती। बुआ की दो बेटियाँ थीं। जो कॉलेज में शिक्षा ग्रहण कर रही थीं। उनकी दोनों बेटियाँ मुझे बड़ी बहन-सा मान देती। उनसे बातें कर मेरा मन थोड़ा अच्छा महसूस करता।

मुझे फ़िक्र रहती कि कैसे मैं अपना उद्देश्यहीन जीवन व्यतीत करूँगी? अपनी एक विषेशता मुझे ज्ञात थी कि मैं कमजोर नहीं हूँ, न वाह्य रूप से न मन से। कभी-कभी मुझे अपनी इन विशेषताओं के कारण ये भी अनुभूति होती कि मैं इस प्रकार दर-दर ठोकरें खाने के लिए नहीं बनी हूँ। किन्तु शीघ्र अपनी इस सोच पर मैं हँस पड़ती, और सपनों की दुनियाँ से बाहर निकल पड़ती।

एक दिन भाई-भाभी से मेरा झगडा़ हो गया। मेरी कहाँ हैसियत थी कि मैं उनसे झगड़ा कर सकूँ? मेरा प्रतिरोध ही मेरी त्रुटि थी। मैं देखती कि मेरे कारण माँ भी भाभी से सहमी रहतीं। कुछ भी बोल न पातीं। भाभी की तीखी बातों से मन बुरी तरह आहत था। मैं बुआ के घर चली गयी। धीरे-धीरे शाम घिरने लगी। मैं उदास चुपचाप बैठी रही। मैं जानती थी कि मुझे बुलाने कोई नहीं आने वाला। रात हो गयी और मैं बुआ के घर सो गयी। मैं तीन दिनों तक बुआ के घर रही। मुझे कोई भी ढूँढ़ने नहीं आया कि मैं कहाँ हूँ? जीवित भी हूँ या कहीं मर खप गयी? इस संसार में कहीं भी मेरा ठिकाना न था। मेरी दशा देख बुआ व उनकी बेटियों ने समझाया कि मैं आगे पढ़ाई जारी कर आत्मनिर्भरता की ओर अपने कदम बढ़ाऊँ। अभी भी सब कुछ ठीक हो सकता है। मुझे लगता कि कहने की बातें और हैं किन्तु यह सब इतना सरल नहीं है। किन्तु विवशता में कठिनाई भी सरल बन गयी। मैंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी प्रारम्भ कर दी। पापा ने पैसों से मेरी सहायता की। मेरी शिक्षा छूटे दो वर्ष हो गये थे। नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षायें कठिन लगतीं। सफलता आकाश कुसुम की भाँति दिखायी देती।

फिर भी मैंने अपने हौसले को डगमगाने नहीं दिया। अपनी योग्यतानुसार नौकरी ढूँढ़ती रहती। मैं लम्बी थी व खेलकूद में रुचि रखती थी। खेलकूद से सम्बन्धित अनेकों पुरस्कार मेरे नाम थे। नौकरी की तलाश करते-करते मेरे मन में यह भावना जागृत हुई कि क्यों न पुलिसकर्मी बन कर समाज की विशेषकर महिलाओं के लिए कुछ करूँ। मैं उसी दिशा में प्रयत्न करने लगी। मैंने कड़ी मेहनत की और यूपीएससी की सिविल सविर्सेज की परीक्षा पास कर ली. मेरा चयन भारतीय पुलिस सेवा में हुआ। मुझे उत्तर प्रदेश कैडर अलॉट हुआ था. एक साल की ट्रेनिंग के बाद मेरी पोस्टिंग मेरे गृह नगर के पड़ोसी जिले में प्रोबेशनर आई.पी.एस. आफिसर के तौर पर हो गयी.

नौकरी पाने के पश्चात् घर व समाज का दृष्टिकोण मेरे प्रति पूर्णतः बदल गया था। विवाह के पश्चात् पति द्वारा मिली प्रताड़ना व मेरे अपनों के उपेक्षापूर्ण व्यवहार ने मुझमें परिवर्तन लाना प्रारम्भ कर दिया था। प्रथम परिवर्तन मैंने अपने बाहरी रूप का किया। अपने लम्बे बालों को जिनका पोषण मैं भाँति-भाँति के जड़ी-ब्यूटीयुक्त तेल व घरेलू नुस्खों दही, नींबू आदि से करती थी, उन्हें कटवा कर लड़कों की भाँति छोटे करवा लिये। ड्यूटी पर मैं वर्दी, जो पैंट शर्ट के रूप में होती हैं वो तो पहनती ही थी। ड्यूटी के पश्चात् भी मैंने पैंट-शर्ट, जीन्स को ही अपना पहनावा बनाया। साड़ी, सलवार-सूट आदि को अपने बार्डरोब से बाहर कर दिया।

परिवर्तन बाहरी स्तर पर ही नहीं, बल्कि अपने भीतर भी किया। महिलाओं पर अत्याचार, उत्पीड़न, शोषण, हिंसा, अन्याय मुझे असह्य थे। इन घटनाओं में दोषी पुरुष पक्ष मेरी दृष्टि से बच नहीं पाता था। उसे उसके अपराध का दण्ड कानून के दायरे के अर्न्तगत मैं अवश्य देती थी। हाँ, कभी-कभी मीडिया मुझ पर पुरुषों के प्रति अतिरेकपूर्ण आचरण का दोषी ठहराता, किन्तु उसका प्रत्युत्तर मैं अपने निष्पक्ष कायरें से देती। अपने लक्ष्य से मैं डिगने वाली न थी।

धीरे-धीरे मैं निडर, न्यायप्रिय पुलिस आफिसर के रूप में विख्यात होने लगी। मेरी तस्वीरें अख़बारों में छपने लगीं। लम्बा कद, खाकी वर्दी, ब्वायकट बालों पर तिरछी कैप, सम्मानजनक पद, मैं पदोन्नत होकर एस.एस.पी. हो चुकी थी, के आत्मविश्वास से भरा मेरा चेहरा... कितनी आकर्षक व स्टाईलिस्ट लगती थी मैं तस्वीरों में। कभी-कभी तो मैं स्वंय पर ही मुग्ध होने लगती।

मैंने एक अलग तरह के आफिसर की छवि बना ली थी. मैं अक्सर रात में अकेले ही बिना किसी सुरक्षा के निकल जाती. गश्त करते पुलिस जवानों को देखती कि वह ठीक से अपना काम कर रहे हैं या नहीं. थानों में पहुंचकर वहां की व्यवस्था देखती. मेरी मुश्तैदी से थानों के दारोगा आदि भी चुस्त हो गये थे. मैं अक्सर मोटर सायकिल से यह काम करती, ताकि कोई पहचान न पाये.

जब मैं वर्दी पहनकर, आँखों में सनग्लासेज पहनकर, मोटरसायकिल से शहर का जायजा लेने निकलती, सभी मुझे देखते। लोगों की आँखों में पुलिस के प्रति सम्मान व कहीं न कहीं डर मुझे दिखाई देता। मैं इस बात से बखूबी परिचित थी कि मेरा सम्पूर्ण व्यक्तित्व लोगों की आँखों में इस प्रकार के भाव उत्पन्न करता है। मैं उन विगत कड़वी स्मृतियों को विस्मृत कर चुकी थी, जिसमें मेरे सामान्य रंगरूप के कारण मुझे तिरस्कृत होना पड़ा था।

माँ के घर से सम्बन्धों में घुली कड़वाहट मेरी प्रतिष्ठा ने

धो दी थी। हाँ, इसे मैं प्रतिष्ठा ही कहूँगी। क्योंकि मैं तो अब भी वही थी। छोटे-से शहर की सीधी-सादी लड़की।

भाभी के मायके में वाद-विवाद से शुरू होकर मारपीट तक बढ़ चुके मामले में थाने में बन्द उनके घरवालों को मैंने एक फोन द्वारा बाहर निकलवाया तथा उनके आपराधिक साक्ष्यों को हटवाया। यह ग़लत कार्य मैंने अपने विचारों के विरुद्ध जाकर उस भाभी के लिए किया, जो वहाँ रहने पर मुझसे बात नहीं करती थी।

चुनौतियाँ न हों तो जीने में आनन्द ही क्या रह जाता है? नौकरी के नियमों के अन्तर्गत अनेक शहरों में मेरा स्थानान्तरण होता रहता। प्रत्येक नयी जगह मुझे मेरे पद अनुरूप बड़ा बंगला मिलता। जिसमें रहने वाली मैं अकेली होती, साथ में होते कुछ सरकारी मुलाजिम। इस नौकरी में रह कर मैंने ये अनुभव किया कि पद-प्रतिष्ठा वाली इस नौकरी में यदा-कदा कुछ तनाव के क्षण भी आते हैं। उन तनाव के क्षणों में हमें किसी सच्चे मित्र की आवश्यकता पड़ती है, जो हमें समझे व उन कठिन घड़ियों में हमें सही मार्ग दिखाये।

मेरे कार्यालय में कार्य करने वाली मेरी सहकर्मी वान्या ठाकुर से मेरी मित्रता बढ़ रही थी। वान्या मेरी बातों को, मेरी भावनाओं को समझती थी। दिन-प्रतिदिन घनिष्ठ होती जा रही मेरी मित्रता मुझे उसके समीप ला रही थी। यदि किसी कारण से वान्या नहीं आती या विलम्ब से आती तो मैं व्याकुल हो उठती। उसके आने तक मेरी दृष्टि उसे ही ढूँढ़ती। वान्या बहुत खूबसूरत थी। दपदप करता गौर वर्ण, गहरी नीली झील-सी आँखें, पुलिसकर्मियों-सा सुदृढ़ व्यक्तित्व। देखने में किसी अभिनेत्री की भाँति प्रतीत होती. वान्या सचमुच बहुत खूबसूरत थी। वान्या मेरी साथी, सहयोगी, सहचरी सब कुछ थी। वान्या की खुशी में मेरी खुशी, वान्या के दुःख में मेरा दुःख निहित था। वान्या के होने से मेरे जीवन में वसंत था, वान्या के न होने से पतझड़। वान्या भी मेरी ही भाँति सरकारी बंगले में रहती थी। उस बंगले से उसे बुलाकर अपने बंगले में मैंने रख लिया। वो मेरे साथ रहने लगी। वान्या मेरी भावनाओं को समझती।

मेरे पति ने दूसरा विवाह कर लिया था. यह बात मुझे तब ज्ञात हुई जब एक दिन थाने में उसकी दूसरी पत्नी की ओर से उसके विरुद्ध उत्पीड़न व हिंसा का मामला दर्ज कराया गया। यद्यपि ऐसे केस स्थानीय स्तर पर सुलझा लिए जाते हैं, किन्तु यह केस मैंने अपने हाथों में लिया। मेरा पूर्व पति भी अपने महकमें में पदोन्नत होकर उच्च पद पर आ गया था। मामला उच्च पद से भी सम्बन्धित हो गया था।

विगत् दिनों की स्मृतियाँ किसी चलचित्र की भाँति मेरे समक्ष आने लगी थीं। तब मैं डरती थी, किसी से अपनी पीड़ा नहीं बता पाती थी कि मेरे माता-पिता व मेरा समाज इसके लिए कहीं मुझे दोषी न ठहरा दे? किन्तु अब उस अबला को मुझे पूरा न्याय दिलाना था।

मैंने उसे पूरा न्याय दिलाया। मुझसे अच्छा भला कौन जानता था उस अपराधी को?

मीडिया ने खूब स्थान दिया इस मामले को। एक प्रकार से कहें तो खूब उछाला। वो पत्रकार बन्धु जिन्हें खोजी पत्रकार कहा जाता है, उन्होंने मेरे उन समाज सेवा के कार्यों को ढूँढ़ने में उतना समय व्यय न किया जिनको मैं बिना किसी तारीफ व तमगे के करती हूँ। अपने इर्द-गिर्द अनेक विवश व पैसे, पद से ताकतवर लोगों द्वारा उत्पीड़ित महिलाओं को पुलिस संरक्षण बिना किसी दबाव के प्रदान करती हूँ। अपने स्तर से उन महिलाओं को जीविकोपार्जन का ज़रिया भी उपलब्ध कराने में सहायता करती हूँ। मेरे इस कार्य को खोजी पत्रकार कभी भी न खोज पायें। उन्होंने यह खोजने में परिश्रम अवश्य लगा दिया कि मैं उस मुजरिम की पूर्व पत्नी रही हूँ, तथा इस केस पर उसका प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने मेरे अतीत को भी ख़बरों की सुर्ख़ियाँ बना डाला।

जैसा कि जीवन के लम्बे अनुभव से यह बात मैं जानती थी कि अच्छे और बुरे लोग सभी जगह रहते हैं। मीडिया के एक बड़े वर्ग ने मेरी इमानदारी व परिश्रम की प्रशंसा भी की।"

यहां तक आकर निशा की आत्मकथा को विराम मिला. हम दोनों कुछ पलों तक एक दूसरे को देखते बैठे रहे. निशा ने एक गिलास पानी पिया. उसकी आंखों की चमक मुझे अभिभूत किये थी. मैंने सांसों को काबू में करते हुए अगला सवाल किया-

"क्या उस महिला को न्याय मिला?"

"हाँ! बिलकुल, मीडिया की अनर्गल बातों व उनके प्रभाव की परवाह न करते हुए मैंने उस आदमी के विरुद्ध उस महिला को प्रताड़ित करने के सत्य व अकाट्य साक्ष्य प्रस्तुत करवाये। वो व्यक्ति आज जेल की सलाखों के पीछे है।" उन्होंने मुस्कराते हुए कहा।

"उन मुश्किल दिनों में वान्या का संबल मेरे साथ बना रहा। अखबारों की तस्वीरों में, टी.वी. प्रत्येक स्थान पर, प्रत्येक दृश्य में वान्या मेरे साथ खड़ी दिखती। मात्र उन स्थानों पर ही नहीं, वान्या मेरे जीवन के प्रत्येक फ्रेम में है।

मैं साक्षात्कार ले रही थी, उस महिला का जो अपनी लगन और दृढ़ता के दम पर समाज में अपने लिए सम्मानजनक स्थान बना कर निर्भीकता का प्रतीक बन चुकी हैं। महिला अधिकारों की संरक्षक, अपराधियों को उनके मुकाम तक पहुँचाने वाली आई. पी. एस. आफिसर निशा नागपाल के प्रेरक व्यक्तित्व ने आज मुझे उनका साक्षात्कार लेने पर विवश कर दिया है। उन्होंने अपने जीवन रूपी पुस्तक का प्रत्येक पृष्ठ बेबाकी से मेरे समक्ष खोल कर रख दिया। बिलकुल बेबाकी से कुछ भी गोपनीय नहीं रखा। बचपन से लेकर आज तक का प्रत्येक पृष्ठ में समक्ष खुला था।

यह साक्षात्कार लेकर मैं उन पर उपकार नहीं कर रही। बल्कि उन महिलाओें को प्रकाश दिखाने का प्रयत्न कर रही हूँ जो निराशा के अन्धकार में अपनी विषेशतायें नहीं देख पातीं। निशा नागपाल ने अपने पूरे जीवन की पुस्तक को मेरे समक्ष खोल कर रख दिया था। उसी सच्चाई और निर्भीकता के साथ जैसे उन्होंने अब तब अपना जीवन जिया है। जीवन का कोई भी अंश शेष न था। बचपन और युवावस्था के संघषरें से लेकर नौकरी में अपने परिश्रम के द्वारा उच्च पद पर आने तक के सभी पृष्ठ बिना किसी लाग-लपेट के अपने व्यक्तित्व के अनुरूप बेबाक ढंग से उन्होंने मेरे समक्ष खोले थे। किन्तु कुछ पृष्ठ ऐसे थे जो अब भी बन्द थे अथवा कह सकते हैं मैंने उन्हें सामने लाने का प्रयत्न ही नहीं किया क्योंकि मुझे वो कुछ व्यक्तिगत लग रहे थे। उनके आस-पास रहने वाले लोगों द्वारा कभी दबे तो कभी मुखर स्वर में अफवाहों के रूप में उसकी चर्चा की जाती है। जब सभी प्रश्नों के उत्तर उन्होंने बेबाकी से दिये हैं तो इसका भी उत्तर जानने की मेरी जिज्ञासा स्वाभाविक है। मैंने पूछने का निश्चय कर लिया।

"मैं आपसे एक व्यक्तिगत् प्रश्न पूछना चाहूँगी। यह प्रश्न आपकी कार्य कुशलता, योग्यता और कर्मठता पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाता, किन्तु आपसे इसका उत्तर जानना चाहूँगी। यदि आप पूछने की आज्ञा दें तो?" मैंने निशा नागपाल की ओर देखते हुए कहा।

"जी पूछिये, क्या जानना चाहती हैं आप...? ’’ मुस्कराते हुए उन्होंने कहा।

"आपके और वान्या के बीच सम्बन्धों को लेकर लोग बातें करते हैं।" मेरे प्रश्न को सुनकर एस.एस.पी. निशा नागपाल सामान्य रहीं। चेहरे पर मुस्कान भी पूर्ववत थी।

"मैं आपके इस प्रश्न का उत्तर अवश्य दूँगी। किन्तु इसलिए नहीं कि लोग कह रहे हैं और मुझे उनको एक्सप्लेनेशन देना है। मैं लोगों की सुनती तो आपके समक्ष नहीं बैठी होती। मैंने हमेशा अपने मन की सुनी और वही किया। वान्या का मेरे जीवन में विशेष स्थान है। वो मेरे लिए मेरे साथ रहती है। उसके बिना मेरा जीवन अपूर्ण है। हर रिश्ता ग़लत नहीं होता। ये लोगों की मन-मस्तिष्क की उपज है। इसके लिए मुझे किसी से कुछ नहीं कहना है।" निशा ने बेबाकी से इस उलझे प्रश्न का भी उत्तर दिया।

"साक्षात्कार के अन्तिम चरण में एक प्रश्न और पूछना चाहूँगी।"

"जी! पूछिये...क्या जानना चाहती है।"

"आप अपनी सफलता का श्रेय किसको देना चाहेंगी?"

"विषम परिस्थितयों को। विषम परिस्थितियों ने ही मुझे साहस दिया। मेरा पथ निर्धारण करने में मेरी सहायता की।" निशा नागपाल अत्यन्त आत्मविश्वास के साथ मेरे प्रश्नों के उत्तर दे रही थीं।

मेरे समक्ष आकर्षक व्यक्तित्व की सफल अधिकारी अपने कार्यालय कक्ष की कुर्सी पर बैठी थी। मैं अपलक उन्हें देख रही थी। एक संपूर्ण व सशक्त व्यक्तित्व से मिल कर अचम्भित थी।

मेरा साक्षात्कार पूर्ण था।

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