लघुकथा // आदर // डॉ. एस के पाण्डेय

आशीष नाइक की जलरंग कलाकृति

आदर
बाबूजी के घर शर्माजी पहली बार दवा करने आए हुए थे । बाबू जी के बच्चों ने श्यामू ग्वाला को आवाज लगाई- बाबा ! ओ बाबा ! आओ दवा ले लो ।

  श्यामू लाठी के सहारे आया और उसके आने पर बच्चों ने चारपाई की ओर इशारा करके कहा बैठिये बाबा । श्यामू बैठ गया और शर्माजी ने आकर श्यामू से प्रणाम किया । श्यामू बोला कि मैं ग्वाला हूँ । आप मुझसे प्रणाम न करें । ‘मैं ग्वाला हूँ’ इतना सुनते ही शर्मा जी हतप्रभ सा हो गए ।

  शर्माजी दवा देकर तो चले गए । लेकिन उनके समझ में यह नहीं आया कि बाबू जी के  बच्चे एक ग्वाले का इतना आदर क्यों कर रहे हैं ?

-डॉ. एस के पाण्डेय,
समशापुर, उ. प्र. ।
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