संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 102 : जीवन शिक्षा और श्रीमद्भगवद्गीता // डॉ. लता अग्रवाल

प्रविष्टि क्र. 102

जीवन शिक्षा और श्रीमद गीता

डॉ. लता अग्रवाल


16 दिसंबर को दिल्ली में हुए दामिनी रेप कांड ने न केवल भारत अपितु संपूर्ण विश्व को हतप्रभ कर दिया है। स्वामीविवेकानंद जैसी युवा शक्ति वाले देश में युवाओं द्वारा किया यह कुकृत्य सचमुच चौंका देने वाला है। एक और हम बात करते हैं कि हमारा युवा समाज प्रगति के सौपानों को छू रहा है, विज्ञान और तकनीकी से कदम ताल कर रहा है वहीं दूसरी और ऐसी अनेक घटनाएं आए दिन दोहराई जा रही है। प्रश्न उठता है आखिर क्या हो गया है हमारे युवा समाज को ऐसी कुत्सित मानसिकता .....यह तो हमारी संस्कृति नहीं....? फिर कहाँ कमी रह गई....? अगर गहराई से विचार करें तो काफी हद तक हमारा शिक्षा तंत्र इसके लिए जिम्मदार है।

माना पिछले दशकों में शिक्षा में अनेक बदलाव हुए हैं, प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, अधिक अंक लाने के चलन ने शिक्षा को व्यावसायीकरण से जोड़ दिया है। बदलाव के इस झंझावात में मूल्य परक शिक्षा जो हमारे देश के चहुमुखी विकास का आधार थी उसकी अनदेखी की गई है हमारा शिक्षा तंत्र आज जिस संक्राति काल से गुजर रहा है उसी का दुष्प्रभाव है कि हमारा युवा समाज अनेक विसंगतियों एवं विडंबनाओं का शिकार बनता जा रहा है। हमने शिक्षा को तकनीकी से जोड़ा वहाँ तक तो ठीक है किन्तु हमने मानवीय मूल्य और शिक्षा को दो अलग विषय के रूप में स्थापित कर दिया। जबकि शिक्षा का अर्थ ही मानवीय मूल्य का विकास है। अतः शिक्षा को अर्थोपयोगी बनाने का मुख्य लक्ष्य मान हमने नैतिक मूल्यों को पाठ्यक्रमों में शामिल करने की आवश्यकता ही महसूस नहीं की।

पिछले दिनों श्रीमद्भगवद्गीता के अंशों को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर देश भर में कई विरोधी आवाजें भी उठीं। संभवतः वे श्रीमद्भगवद्गीता को एक हिन्दू धर्मग्रंथ के रूप में देखते हैं। मैं उन्हें बताना चाहती हूँ कि श्रीमद्भगवद्गीता एक विश्वधर्म की पुस्तक है जो किसी लाल मखमल के कपड़े में लपेट भगवान के आले में रख आरती उतारने की वस्तु नहीं बल्कि जीवन में धरण करने की वस्तु है। वह ज्ञानामृत की वह गंगा है जिसमें संपूर्ण विश्व गोते लगाता रहा है। वह पग-पग पर मानव के प्रेरक पथप्रदर्शक का कार्य करती रही है। संभवतः गीता के अलावा विश्व का कोई धर्मग्रंथ नहीं जो स्वयं भगवान के मुखारविंद से कहा गया हो, इसी से इसकी प्रमाणिकता सिद्ध होती है। 18 अध्याय में समाहित इस ग्रंथ में भगवान ने विश्व को यह दर्शाने का प्रयास किया है कि एक श्रेष्ठ जीवन क्या है, उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है। वर्तमान जीवन लोभ, मोह, क्रोध और अहंकार जैसी बीमारियों से जकड़ा है जिसने प्रत्येक व्यक्ति के भीतर न केवल असंतोष का भाव भर दिया है बल्कि इसी असंतोष के रहते वह सुख और शांति भी पाना चाहता है। जो कि असंभव है। किसी चीज की इच्छा करना बुरा नहीं है। मगर उस इच्छा का दास हो जाना ठीक नहीं। लोभ और मोह दोनों ही क्लेश के कारण होते हैं। धृतराष्ट्र और दुर्योधन इसके प्रमाण है जिन्होंने सत्ता प्राप्ति को आत्मप्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। जिसने परिवार में विष बो दिया, उनके इस ईर्ष्या और द्वेष ने उनके विवेक पर पर्दा ड़ाल दिया दूसरी ओर असंतोषी स्वभाव ने दुर्योधन को क्रोधी बना दिया। क्रोध ने दुर्योधन के विवेक को भी हर लिया। परिणाम हम सभी जानते हैं।

आज यही अनंत आवश्यकताएं, कामनाएं हमारी युवा पीढ़ी में पनप रही है जिन्हें वे कम समय और कम मेहनत से हासिल कर लेना चाहते हैं । क्या सही है क्या गलत....इसका एहसास उन्हें नहीं है, मुझे यह कहते तनिक संकोच नहीं कि उचित अनुचित का ज्ञान दिलाने में हमारी शिक्षा असमर्थ रही है। हमारे ऋषियों ने बहुत चिंतन के बाद यह सूत्र वाक्य बनाया था।‘सा विद्या या विमुक्तये’ विद्या सारे संकटों से मुक्ति दिलाती है।हमने शिक्षा को अर्थ से जोड़कर इसके विस्तृत अभिप्राय को संकुचित कर दिया है। निःसंदेह यह शिक्षा हमें गीता प्रदान करती है जो तीन प्रकार के ज्ञान से अवगत कराते हुए बताती है कि संसार के समस्त प्राणियों में परमात्मा का अंश देखना, उन्हें समान समझना सात्विक गुण है। अलग-अलग प्राणियों को अलग-अलग दृष्टि से देखना राजसी गुण है और केवल व्यक्ति के भौतिक स्वरूप के आधार पर ही उसे सब कुछ मान लेना यह तामसिक गुण है। इन तीनों में सात्विक गुण को श्रेष्ठ, राजसी को मध्यम और तामसिक को अधोगुण की संज्ञा देते हुए सदैव सात्विक गुण और बुद्धि को अपनाने पर बल दिया है। कहना न होगा कि हमारी तकनीकी युगीन शिक्षा युवाओं में केवल तामसिक बुद्धि का प्रचार कर रही है। जहाँ भौतिक सुख सुविधाओं से संपन्न व्यक्ति ही परिपूर्ण समझा जाता है। यहाँ तक कि अर्थविहीन माता-पिता का व्यक्तित्व भी उनकी नजरों में बौना हो जाता है। कहना न होगा आधुनिक शिक्षा ने हमारे मस्तिष्क को शुष्क और नीरस बना दिया है जिसमें भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं।

उनमें बड़ों के प्रति श्रद्धा , परंपराओं और शास्त्रों के प्रति आस्था का अभाव आज चिंतन का विषय है गीता में कहा है। श्रद्धा लभते ज्ञानम्’ श्रद्धा और आस्था के लिए प्रभु कहते हैं ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।’ अर्थात ‘असत्य वस्तु की सत्ता नहीं है और न ही सत् का अभाव है। अर्थात संसार में जितनी भी दुष्प्रवृत्तियाँ हैं, उनका साम्राज्य अधिक दिनों तक नहीं रहता। श्रद्धा और आस्था दोनों तर्कातीत है जो विश्वास और आदर के रिश्तों पर आधारित है चाहे वह गुरू शिष्य के बीच का रिश्ता हो अथवा संसार का कोई अन्य रिश्ता। गीता का आरंभ ही इस पवित्र रिश्ते से हुआ जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण पर श्रद्धा जताई उससे मन में उपजी आस्था ने अर्जुन को अपनी लघुता और क्षमता का अहसास कराया। इसी स्वत्व के ज्ञान ने उसके अन्तःकरण को निर्मल कर दिया परिणाम उसके हृदय के कपाट खुलते चले गए। विनम्रता के भाव ने गुरू और शिष्य के रिश्ते को परिपक्व बना दिया। आज रिश्तों के बीच यह निर्मलता कहीं खो गई है, समर्पण कहीं नजर नहीं आता। उसका स्थान तर्कों ने ले लिया है। हमारी श्रद्धा और आस्था को संजीवनी मिल सके वह साहित्य हमें पाठ्यक्रमों में जोड़ने की आवश्यकता है। हमारी मानसिकता आज इतनी संकरी हो चुकी है कि हम दूसरों से तो सत प्रतिशत चाहते हैं और स्वयं आधा भी समर्पित करने को तैयार नहीं प्रेम की यह परिभाषा तो नहीं....? गुरू -शिष्य हों ,भक्त और भगवान या फिर अभिभावक और संतान अपने आराध्य के प्रति समर्पण का भाव ही उनके रिश्तों की बुनियाद को सुदृढ़ बनाता है। जब अर्जुन के मन में अवसाद की स्थिति ने जन्म लिया तब वह प्रभु की शरण में जा पहुँचा, हे प्रभु! मेरे हाथ से धनुष सरक रहा है , त्वचा में जलन हो रही है। मैं खड़ा नहीं रह पा रहा हूँ। मेरा मन चक्कर खा रहा है। ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा।’ यह अवसादग्रस्त अर्जुन की आत्महिंसा थी। और उसने स्वयं को असहाय महसूस कर भगवान की शरण ली, तब भगवान ने अर्जुन को सही दिशा प्रदान की। समर्पण से मनुष्य के मन की गांठे एक-एक खुलती जाती हैं, तब जाकर उसे भगवान की कृपा प्राप्त होती है। किन्तु आज के मानव ने स्वयं को भीतर तथा बाहर दोनों ओर से इतने आवरणों के बीच ढ़क रखा है कि कभी-कभी वह स्वयं भी अपने असली स्वरूप् को पहचानने में असमर्थ रहता है। किन्तु ईश्वर की शरण में जाने से बचता है। क्योंकि वह समर्पण नहीं चाहता। अहंकार उसके मार्ग का सबसे बड़ा बाधक है।

अहंकार जो कई बुराइयों की जड़ है आज हर व्यक्ति इस बीमारी से पीड़ित है। किसी भी बात पर दूसरों की अवहेलना कर स्वयं को साबित करना यही तो अहंकार है। ऐसे लोग या तो किसी की मदद करते ही नहीं या फिर करते हैं तो अपने ही कर्म के अहंकार से पीड़ित रहते हैं। यही अहंकार हमारे सामंजस्य और समत्व के भाव को हरता है हम किसी के साथ तालमेल बैठाने अथवा सहयोग जैसे सुख से वंचित रह जाते हैं । दुर्योधन का अहंकार ही था जो उसे पांडवों को उनका अधिकार देने से रोकता रहा। परिणाम विशाल नरसंहार जो दुर्योधन से सब कुछ छीनकर ले गया।

हम संसार को शास्वत मान बैठे हैं और अपने प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए व्यर्थ के संग्रह में उलझे हुए हैं चाहे वह सांसारिक सामग्री हो या रिश्ते, यही हमारे दुख का कारण और अज्ञानता का परिचायक है। महाभारत के तेरहवें अध्याय में भी कहा गया है कि-‘यह संपूर्ण संसार माया का केन्द्र होने से क्षणभंगुर और नाशवान है। ऐसा समझकर संपूर्ण मायिक पदार्थों के संग का सर्वथा त्याग करना चाहिए।’ यही भाव तो हमें स्व ये ऊपर उठाकर परा की अनुभूति कराता है। हममें संवेदना जाग्रत कर परोपकार की ओर उन्मुख करता है। किन्तु बच्चे समाज में जब बड़ों को संग्रह करते देखते हैं तो उनसे दया, त्याग और अपरिग्रही होने की हमारी कामना ही व्यर्थ है।

जिसका उदाहरण है कि आए दिन सड़कों पर होते हादसों के बीच कितने हाथ मदद के लिए आगे आते हैं....? कारण परोपकार का भाव हमारे जीवन से समाप्त सा होता जा रहा है। बच्चा यह भाव या तो अपने संस्कारों से सीखता है या फिर शिक्षा से, और इसकी प्रेरणा देने वाले पात्रों को हमने अपने पाठ्यक्रमों में स्थान देने की आवश्यकता महसूस नहीं की पिछले दिनों महाराजा श्रीअग्रसेन को भी पाठ्यक्रम से हटाए जाने की नाकाम कोशिश की गई। जबकि इन महापुरूषों से ही हमें संस्कार, संस्कृति, धर्म और इतिहास की प्रेरणा मिलती थी।

गीता हमें पाडंवों के माध्यम से यह बताती है, जीवन की पाठशाला में सुख और दुःख वह शिक्षक है जो हमें जीवन का अमिट ज्ञान प्रदान करते हैं। दुख, सुख की अपेक्षा गहन और विस्तृत ज्ञान देता है। क्योंकि व्यक्ति अपने दुख से मिले अनुभवों से बहुत कुछ सीखता है। सुख तो कपूर की भांति उड़ जाता है। इस दृष्टि से दुख एक उत्तम शिक्षक है। किन्तु वास्तविक जीवन में सभी दुख से घबराते हैं। मिला हुआ सुख जाने कब छिन जाए इस भय से व्यक्ति सुख का उपभोग भी नहीं कर पाता परिणाम सुख करीब होकर भी हम उससे लाभान्वित नहीं हो पाते यदि कहूँ तो अतिश्योक्ति न होगी कि आज का यथार्थ यही है कि हमें अपना छोटा सा दुख भी पहाड़ लगता है और दूसरों का बड़ा दुख भी हमें साहस देता है। गीता हमें समझाती है कि सुख आने पर अहा! और दुख आने पर ओह! किस लिए....? दोनों ही जीवन के अभिन्न अंग हैं। अभाव केवल बुद्धि का है।

वसुधैव कुटुम्बकम के भाव को जीवित रखते हुए संपूर्ण सृष्टि को भाई चारे के भाव से देखना यह गीता का उद्देश्य है। जिसके अभाव में भाई-भतीजावाद का जन्म हुआ जो आज देश को लील रहा है । गीता हमें साक्षात् प्रमाण प्रस्तुत करती है कि क्यों अर्जुन पहले तो युद्ध के लिए तैयार था तभी युद्ध भूमि पर आया था। किन्तु वहाँ आने पर उसका अवसाद की स्थिति में जाना। युद्ध के लिए इंकार कर देना। यह सब क्यों हुआ? अर्जुन तो वीर था...., महान धर्नुधारी था। युद्ध से उसे भय नहीं...। फिर क्यों उसने युद्ध करने से मना कर दिया ? यह अर्जुन का दृष्टि भेद था। जैसे ही उसने देखा युद्ध करने से उसके ही परिवार के लोग आहत हो रहे हैं। तो उसने युद्ध से इंकार कर दिया। इसी दृष्टि भेद को दूर करने हेतु भगवान ने उसे गीता का ज्ञान दिया। यही अर्जुन तो आज हम बनें हुए हैं यह जीवन एक कुरूक्षेत्र है जिसमें अच्छाई और बुराई का सतत् युद्ध चलता रहता है। हमें आवश्यकता है मार्गदर्शन की, एक ऐसे श्रीकृष्ण की जो हमें विपत्ति के क्षणों में सही मार्ग प्रशस्त करे। मूल्य शिक्षा ही वह पथप्रदर्शक है जो हमें इस संकट से उभार सकती है, और गीता वे एक श्रेष्ठ जीवन के वो सभी गुण मौजूद हैं वही हमें समत्व, समदृष्टि प्रदान कर सकती है।

गीमा हमें आचार-विचार-व्यवहार औश्र वाणी पर संयम रखने का संदेश प्रदान करती है। जिस तरह बिना ब्रेक की गाड़ी के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता कि वह कब दुर्घटनाग्रस्त हो जाए....?क्योंकि ब्रेक उस गाड़ी को संयमित करता है और दुर्घटनाग्रस्त होने से रोकता है। यही स्थिति मानव की भी है संयम उसे जीवन में बुरे रास्तों पर चलने से रोकता है। यदि उसमें संयम नहीं है तो उसका जीवन सदैव खतरों से घिरा रहेगा ना जाने कब असंयम का हथियार उस पर वार कर दे, और उसके जीवन की गाड़ी दुर्घटना ग्रस्त हो जाए। असंयम अधर्म है। तो संयम यदि धर्म है यह अनुशासन का पर्याय है। पांडव इसके पर्याय हैं। अतः जीवन में यदि दूरगामी सुखद परिणाम पाना है तो हमें पांडवों के चरित्र को आचरण में धारण करना होगा तभी भगवान (श्रीकृष्ण) की कृपा प्राप्त हो सकती है। वास्तविकता तो यह है कि हम आचरण तो दुर्योधन का सा अपनाए हुए हैं और शिकायत करते हैं कि ईश्वर की कृपा ही नहीं बरसती।

‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदत्वन’ के सूत्र को हम भूल बैठे हैं और बगैर कर्म के फल की आकांक्षा किए हुए है जो संभव नहीं। यही अतृप्ति का भाव हममें अवसाद के लक्षण को जन्म देता है। हम या तो कर्म करना ही नहीं चाहते या फिर क्षणिक प्रयास से बड़ी उपलब्धि हासिल करना चाहते हैं। जीवन में आया एक छोटा सा संकट हमें विचलित कर देता है और हम कोई भी हिंसक कदम उठा लेते हैं। जो शक्ति देश को एक सुनहरा भविष्य प्रदान कर सकती थी आज वह अवसाद और अपराध की अँधेरी गलियों में सिमटकर रह जाती हैं। क्योंकि वर्तमान अर्थप्रधान शिक्षा बच्चों में विपरीत परिस्थितियों का सामना करने का हौसला पैदा करने में असमर्थ रही है। गीता व्यक्ति को कर्मयोगी पथ पर निरंतर आरूढ़कर उसे बताती है कि -‘कर्म करने पर तेरा अधिकार है फल पर नहीं।’ हम कर्म ऐसा करें जिसमें कोई बंधन हमें जकड़ न सके।

गीता हमें जाति और धर्म के विवाद से परे रखते हुए बताती है -‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः’ अर्थात भगवान ने गुण और कर्म के आधार पर संसार का विभाजन किया है। उन्हीं भगवान ने प्रकृति को दैवीय स्वरूप मान उसकी रक्षा का संदेश भी दिया है जो आज की महती समस्या है। इतना ही नहीं भगवान श्रीकृष्ण संभवतः संसार के पहले पर्यावरण विद् के रूप में जाने और माने जाते हैं जिन्होंने गोवर्धन पूजन के माध्यम से यह संदेश दिया कि हमें अपने जीवन रक्षक संसाधनों का सम्मान करना चाहिए। वहीं कालिया नाग दहन के माध्यम से उन्होंने यमुना को प्रदूषण से मुक्त कर जल संवर्धन और संरक्षण का संकेत आज से 5000 वर्ष पूर्व ही दे दिया था । जिन्हें आज समझने और अपनाने की महती आवश्यकता है।

संक्षेप में कहें तो गीता हममें निर्भयता, अन्तःकरण में शुद्धि, आत्मज्ञान की दृढ़ स्थिति, परोपकार, बड़ों के प्रति आदर श्रद्धा , ईश्वर, वेद-शास्त्रों में आस्था, परंपराओं के प्रति विश्वास, स्वाध्याय, अहिंसा, मन, वाणी और कर्म से किसी को कष्ट न देना, सदा सत्य का आचरण करना, क्रोध पर संयम, अहंकार का त्याग, प्राणियों के प्रति दया, स्वभाव में मृदुता, का भाव जाग्रत करती है। गीता मनुष्य के लिए व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों को जीने के लिए बेहतर गाइड की तरह है। किन्तु उसे आचार-व्यवहार में लाना तो मनुष्य के ही हाथ में है, बिना उसे धारण किए व्यक्ति का कल्याण संभव नहीं। जरा विचार करें रावण महाज्ञानी पराक्रमी ब्राह्मण था जिसने वेदों का भाष्य लिखा फिर भी उसकी गणना असुरों में की गई। दुर्योधन, कंस, शकुनि समाज के पथ प्रदर्शक नहीं बन सके क्योंकि इनमें सात्विकता का विकास नहीं हो पाया था। अतः शिक्षा या समाज में नैतिकता लाना है तो जीवन में मूल्यों की स्थापना करनी होगी तभी एक संपूर्ण और शांतिपूर्ण समाज का स्वप्न साकार होगा। मैं मिल्टन के विचार से पूर्णतः सहमत हूँ कि ‘जीवन मूल्य ओस की बूँद के सदृश्य नहीं है जो मौसम के अनुसार दिखाई दे।’ संस्कारों में इसकी जड़ें रोपित है और इसे पीढ़ियों तक सहेजना है तो मूल्य शिक्षा ही एक मात्र माध्यम है जो इसकी जड़ों को सिंचिंत कर इसे पल्लवित कर सकती है। जिस समाज का कोई नैतिक मूल्य नहीं वहाँ न सेक्युलर बचेगा न सामाजिक व्यवस्था और न ही लोकतंत्र सुरक्षित रह पाएगा।



लेखिका परिचय

नाम- डॉ लता अग्रवाल

शिक्षा - एम ए अर्थशास्त्र. एम ए हिन्दी, एम एड. पी एच डी हिन्दी.

प्रकाशन - शिक्षा. एवं साहित्य की विभिन्न विधाओं में अनेक पुस्तकों का प्रकाशन. लगभग 400 पेपर्स. कहानी . कविता. लेख प्रकाशित आकाशवाणी में पिछले 9 वर्षों से सतत कविता, कहानियॉं का प्रसारण . दूरदर्शन पर संचालन. एवं कविताओं का प्रसारण ,पिछले 22 वर्षों से निजी महाविद्यालय में प्राध्यापक एवं प्राचार्य ।

सम्मान -

1. राष्ट्रीय बाल कहानी प्रतियोगिता में चयनित बाल कहानी ‘गुड टच बेड टच ‘ को स्वतंत्रता सेनानी ओंकारलाल शास्त्री पुरस्कार सलिला संस्था सलुम्बर द्वारा |

2. शब्द्निष्ठा सम्मान राष्ट्रीय लघुकथा प्रतियोगिता में चयनित लघुकथा ‘ममता का भेद’ पर को अजमेर द्वारा

3. पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी शिलांग (मेघालय) द्वारा साहित्यक अवदान पर “महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान “

4. उद्गार मंच द्वारा लघु कथा “साँझ बेला” को सर्वश्रेष्ठ कथा पुरस्कार |

5. वनिका पब्लिकेशन (गागर में सागर) मंच द्वारा लघुकथा “अधूरा सच” को सर्वश्रेष्ठ कथा का पुरस्कार

6. उद्गार मंच द्वारा कविता “एक पाति प्रधानमंत्री के नाम ” को उत्कृष्ट कविता पुरस्कार |

7. प्रतिलिपि द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में कहानी “ हादसा” को द्वितीय पुरस्कार |

8. लघुकथा “मैं ही कृष्ण हूँ” को वनिका पब्लिकेशन एवं नव लेखन मंच द्वारा श्रेष्ठ लघुकथा

9. मध्यप्रदेश लेखिका संघ भोपाल द्वारा कृति ‘पयोधि होजाने का अर्थ’ को श्रीमती सुषमा तिवारी सम्मान |

10. विश्व मैत्री मंच द्वारा गुजरात यूनिवर्सिटी अहमदाबाद में , कृति तू पार्थ बन’ को ‘राधा अवधेश स्मृति सम्मान |

11. छत्तीसगढ़ साहित्य मंडल रायपुर द्वारा साहित्यिक अवदान हेतु ‘ प्रेमचंद साहित्य सम्मान

12. " साहित्य रत्न" मॉरीशस हिंदी साहित्य अकादमी ।

13. "श्रीमती सुशीला देवी भार्गव सम्मान " हरप्रसाद शोध संस्थान आगरा।

14. " कमलेश्वर स्मृति सम्मान" कथा बिंब मुम्बई।

15. "श्रीमती सुमन चतुर्वेदी श्रेष्ठ साधना पुरस्कार  " अखिल भारतीय भाषा परिषद भोपाल।

16. "श्रीमती मथुरा देवी सम्मान " सन्त बलि शोध संस्थान उज्जैन।

17. "तुलसी सम्मान " तुलसी मांस संस्थान भोपाल।

18. "डा उमा गौतम सम्मान" बालकल्याण शोध संस्थान भोपाल।

19. "कौशल्या गांधी पुरस्कार  " समीर पत्रिका भोपाल।

20. "विवेकानंद सम्मान" विपिन जोशी मंच इटारसी।

21. " शिक्षा रश्मि सम्मान" ग्रोवर मंच होशंगाबाद ।

22. "प्रतिभा सम्मान " अग्रवाल महा सभा भोपाल।

23. "माहेश्वरी सम्मान " कला मंदिर परिषद भोपाल।

24. "सारस्वत सम्मान " समानांतर साहित्य संस्थान आगरा।

25. "स्वर्ण पदक " राष्ट्रिय समता मंच दिल्ली।

26. " मनस्वी सम्मान" हिंदी साहित्य सभा आगरा।

27. अन्य कई सम्मान एवं प्रशस्ति पत्र।

निवास - 73 यश बिला भवानी धाम फेस  - 1 , नरेला शन्करी . भोपाल - 462041

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