संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 105 : अच्छे लोग // नफे सिंह कादयान

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प्रविष्टि क्र. 105

अच्छे लोग

नफे सिंह कादयान

दोस्तों हमारा पूरा जीवन समस्या और समाधान पर चलता है। जिंदगी के सफर में बहुत सी समस्याएं आती रहती हैं, लोगों के सहयोग से हम उनका समाधान करते रहते हैं। नकारात्मक लोगों की बात न करें तो जीवन की पगडंडियों पर हमें बहुत से अच्छे सकारात्मक सोच वाले लोग मिल जाते हैं। दरअसल मुझे शादी के चार-पांच साल बाद अपना जीवन सारहीन लगने लगा था। पता नहीं क्या हुआ की मैं एकाएक संसार से विरक्त सा हो गया था।

कोई दौलत कमाना चाहता है, कोई शोहरत, मगर अब मुझे ऐसी किसी चीज मैं दिलचस्पी नहीं थी। मैं तो बस ये सोचता था की आखिर हम पृथ्वी पर कर क्या रहे हैं, क्यों आए है यहां पर? पृथ्वी, चांद, तारे कैसे बनें। ब्रहाण्ड कितना बड़ा है? ईश्वर, अल्लाह क्या हैं? अगर ईश्वर ने यहां भेज कर हमसे अपनी पूजा ही करवानी थी तो वह जहां रहता है वहीं अपने सामने बैठा कर हमारी क्लासें क्यों नहीं लगवा ली।

जितना सोचता उतना ही उलझता जाता। बहुत से सवाल बनते फिर उनके जवाब भी कहीं न कहीं मिल ही जाते चाहे वो अपने मन की अथाह गहराइयों से निकल कर ही आये हों। पानीपत में कई साधु, सन्यासी, गुरूओं से मिला, नामदाम भी लिया। ग्यारह वार्ड में रहने वाले अपने एक दोस्त ओम प्रकाश शर्मा जी के साथ महीनों तक पानीपत किले पर स्थित आर्य समाज मंदिर में जाने लगा। वहां चारों वेदों और सत्यार्थ प्रकाश का गहन अध्ययन किया, फिर आचार्य रजनीश की संभोग से समाधि तक, दीये तले अंधेरा जैसी दर्जनों छोटी बड़ी किताबें पढ़ डाली। कबीर साहेब के बीजक का अध्ययन किया मगर अफसोस की जो मैं खोज रहा था वह कहीं नहीं मिला। बहुत से सवालों के हल मिलते मगर फिर भी कुछ न कुछ छूट ही जाता।

आखिरकार मैंने अपने मन के विचारों और उनके संभावित हल को कागज पर लिखने का निर्णय लिया। पास की परचून की दुकान से दस रूपये का रजिस्टर लिया और उसमें शांति शीर्षक से लिखने लगा। मैं उस समय जो भी लिखता था वह किताब छपवाने के लिये नहीं था बल्कि मेरी अपनी मन की शांति के लिये था, और मेरी आने वाली नस्लों के लिये एक सत्य संदेश के रूप में था। दो-तीन साल तक मैं हर रोज एक-दो पहरा लिखता गया। इस प्रकार लगभग दौ सौ पेज की एक पाण्डुलिपि तैयार हो गई। फिर मैं उसे घर के पुराने ट्रंक में डाल कर भूल गया और अपनी दिनचर्या में मग्न हो गया। कुछ साल बाद मैं पानीपत से अपने गांव गगनपुर आ गया।

सालों बाद 2007 ई. में मैं एक रोज घर का राशन लाने अपने गांव से लगते शहर बराड़ा गया हुआ था। वहां एक चाय की दुकान पर चाय पीते हुए आदत अनुसार अखबार पढ़ने लगा तो उसमें हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा दिये गए एक विज्ञापन पर नजर पड़ी। उस विज्ञापन में लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिये अनेक योजनाओं का विवरण था।

यह विज्ञापन पढ़ने के बाद मुझे अपना शांति वाला रजिस्टर याद आ गया। मन में विचार आया की क्यों न मैं भी अपनी ट्रंक में पड़ी पाण्डुलिपि का टंकण करवा कर अकादमी में पुरस्कार के लिये लगा दूं, इससे मेरी किताब बन जायेगी तो और भी अच्छा रहेगा। मेरी संतानें उसे पढ़ मेरी जिंदगी का कुछ ज्ञान प्राप्त किया करेंगी। दुकानदार अपने काम में व्यस्त था, मैंने चोरी से विज्ञापन की कटिंग हाथ से फाड़ कर जेब में डाल ली।

किसी भी क्षेत्र में अगर आप नये हों, जानकारियों का अभाव हो तो आपको लोग तब तक चूना लगाते हैं जब तक आप उसमें महारत नहीं हासिल कर लेते। जीवन में मेरे साथ कई बार ऐसा हो चुका है। टाइपिंग करवाने का रेट उस समय बीस रूपये पेज था मेरे से तीस लिया गया। प्रिन्ट निकलवाने के उस समय मैंने पांच रूपये दिये थे, अब मैं दो रूपये में प्रिन्ट निकलवा लेता हूं। खैर जैसे-तैसे कर मैंने बीस पच्चीस पुस्तकें बनवा डाली और प्राइवेट बस से अम्बाला पहुंच कर वहां से चंडीगढ़ की बस में बैठ गया। विज्ञापन की कटिंग मेरी जेब में थी जिस पर अकादमी का पता लिखा था। जीरकपुर उतरा और वहां से टैंपू ले पंचकुला के सैक्टर 29 स्थित हरियाणा साहित्य अकादमी के कार्यालय पहुंच गया। उस समय सैक्टर 29 में एक किराये के मकान में अकादमी कार्यालय था। सरकारी कार्यालयों में मैं जब भी कोई काम करवाने गया, वहां स्थित कर्मचारियों के व्यवहार से मेरा मन हमेशा वितृष्णा से भर जाता है इसलिये में इनमें जाने से बचता रहा हूं।

अकादमी कार्यालय जाते हुए भी मन में कुछ संकोच था। कुछ झिझकते हुए मैंने गेट खोला तो वहां दीवार के पास अकादमी के निदेशक देश निर्मोही जी कुछ चहल-कदमी सी कर रहे थे। शायद कुर्सी पर बैठे हुए थक गए हों इसलिये बाहर आए होंगे। मैं तब उन्हें नाम, पद से नहीं जानता था।

‘आओ बंधू।’ वह मुझे असमंजस की स्थिति में देखते हुए हंस कर बोले।

‘नमस्कार जी, मैं अपनी एक पुस्तक पुरस्कार के लिये अकादमी में देना चाहता हूं।’ मैंने जब निर्मोही जी को प्रणाम कर कहा तो वह और अधिक मुस्कुराने लगे।

‘अकादमी आप जैसे लेखकों के लिये ही बनी है, अपनी पुस्तक जरूर लगाओ, उपर चौबारे पर विजेन्द्र बैठा है, जाकर उससे मिल ले।’ निर्मोही जी की बात सुन मेरा हौसला बड़ गया। ऊपर चौबारे पर एक छोटा सा तंग कमरा था जिसमें चारों तरफ किताबें ही किताबें नजर आ रही थी। वहां एक गोरे रंग का युवा व्यक्ति कुर्सी पर बैठा पास खड़े बुजुर्ग से कुछ बात कर रहा था। ‘ये ही शायद विजेन्द्र जी हैं।’ मैंने ऊपर जाते ही दोनों को नमस्कार कर उन्हें वहां आने का मकसद बताया और थैले से निकाल कर अपनी लाई पांच किताबें मेज पर रख दी।

‘कादयान साहेब, लगता है आप ने अभी लिखना शुरू किया है। किताबें बीस, तीस की संख्या में ऐसे प्रकाशित नहीं होती। हम इन्हें पुरस्कार योजना में लगा भी दें तब भी आप को पुरस्कार नहीं मिलेगा। आप ऐसा करो मार्च में आकर इसकी तीन प्रतियां प्रकाशन अनुदान के लिये लगा जाना, आप को दस हजार रूपये मिल जायेंगे? आप उनसे तीन सौ किताबें प्रकाशित करवा लेना, तब आप इसे पुरस्कार के लिये भी लगा सकते हो।’ विजेन्द्र जी मेरी पुस्तक पर लिखा मेरा नाम देखते हुए बोले।

‘जी ठीक है, मैं मार्च में ही आ जाता हूं।’ ये कहकर मैं वहां से निकलने लगा तो वहां खड़ा बुजुर्ग मुझे लेखकों के लिये सूचना-पत्र पुस्तक देकर बोला-‘इसमें अनुदान योजना के फार्म हैं। अच्छी प्रकार से भरकर तीन प्रतियां पाण्डुलिपि की ले आना और हां अकादमी कार्यालय अगले महीने पंचकुला के सैक्टर-14 पी-16 में इलाहाबाद बैंक के पास पहुंच जायेगा, आप को नये पते पर आना है।’

‘जी, बहुत आभार आप लोगों का।’ हाथ जोड़ कहकर मैं वहां से अपने गांव चला आया। जिस बुजुर्ग ने मुझे फार्म दिये थे वह वहां कार्यरत कर्मचारी चंद्रभान था। बाद में मैं अकादमी में अनेक बार जाने के कारण लगभग वहां सभी कर्मचारियों के नाम जान गया था। मैं जब मार्च 2008 में अपनी पाण्डुलिपि अनुदान के लिये लगवाने गया तो अकादमी का सही पता भूल गया। सैक्टर 14 पी 16 के बजाये सैक्टर 16याद रह गया। मैं जिरकपुर से टैम्पू कर सैक्टर 16 पहुंच एक चौक पर उतर गया और पैदल ही अकादमी कार्यालय खोजने लगा। दो-तीन बैकों के पास भी पहुंच कर देखा मगर कार्यालय वहां होता तो मिलता।

पंचकुला, चंडीगढ़ जैसे आधुनिक ढंग से बसाये गए शहर मेरे जैसे गांव वालों के लिये एक बड़ी परेशानी पैदा करते है। हमें यहां सभी मकान चौक-चौराहे एक जैसे ही नजर आते हैं। सैक्टर 16 में अकादमी खोजता हुआ मैं घूम-घूम कर पजल हो गया। मन तो कर रहा था की वापिस घर चल दूं। मैं मजदूर वर्ग का प्राणी हूं, आखिर क्या बन जाऊंगा लेखक कहलवा कर, पर ईश्वर ने शायद इस बुद्धिजीवियों वाले क्षेत्र में भी मुझे स्थापित करने का इरादा कर लिया था।

वहां मैने कई लोगों से अकादमी कार्यालय का पता पूछा पर लोग कोर्ट, तहसील, थानों के पते तो आसानी से बता देते हैं अकादमी से उन्हें क्या काम। थक हार कर एक दुकान पर चाय पीने बैठा तो याद आया कि अकादमी द्वारा दिये गए विज्ञापन की कटिंग जेब में ही है तो क्यों न वहां फोन करके पता पूछ लूं। उस समय मोबाइल तो केवल साधन- सम्पन्न लोगों के पास ही होते थे मेरे जैसे फटीचर के पास तो क्या होना था। पास के टेलिफोन बूथ से अकादमी में फोन किया तो विजेन्द्र जी की मीठी आवाज सुनाई दी।

‘कादयान साहेब सैक्टर 16 में नहीं 14 में आ जाओ इलाहाबाद बैंक के पास। बेल कालोनी पूछ लेना वहां अकादमी का बोर्ड सड़क पर ही लगा है।’

पूछने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी, अब की बार टैम्पू वाले ने मुझे बोर्ड के पास ही उतार दिया और मैं आसानी से अकादमी में पहुंच गया। वहां जाकर सबसे पहले मैंने नीलम जी के पास अकादमी की पत्रिका हरिगंधा का वार्षिक चंदा जमा करवाया ताकि मुझे अच्छे साहित्यकारों की रचनाएं पढ़ने को मिलें और साथ ही अकादमी की योजनाओं की भी जानकारी मिलती रहे। 2009 में मेरी उस शांति नामक पाण्डुलिपि को दस हजार रूपये का अनुदान मिल गया और पुस्तक प्रकाशित हो गई।

पहली पुस्तक प्रकाशित होने के बाद मुझ में लेखकीय जीवाणु पैदा हो गया। उस पुस्तक के प्रकाशन से उत्साहित हो मैं वैज्ञानिक विषय पर चैतन्य पदार्थ शीर्षक से एक और पाण्डुलिपि लिखने लगा। अब की बार मेरी सोच के केन्द्र में थे पदार्थ में आदि से निरंतर चलने वाले परिवर्तन, मानव जन्य दहन क्रियाएं और उनके प्रभाव, जैव उत्पति, ग्रह नक्षत्रो की निर्माण प्रक्रिया और पृथ्वी की आंतरिक संरचना।

मैं बहुत सोच विचार कर लिखता गया और तीन साल में एक सौ अस्सी पेज की एक और किताब बन गई। उसे प्रकाशन के लिये अनुदान तो मिला ही साथ ही वह श्रेष्ठ कृति योजना में भी चयनित हो गई। चैतन्य पदार्थ पुस्तक ने मुझे मान सम्मान के साथ हरियाणा की बसों में आजीवन फ्री यात्रा पास भी दिलवा दिया जो मेरे जैसे मजदूर प्राणी के लिये बहुत बड़ा आर्थिक सहारा बना हुआ है।

दोस्तों मैं अब हरियाणा साहित्य अकादमी का स्थापित लेखक बन चुका हूं। 2009 से अब तक (2016) मेरी कई किताबें, कहानियां, गज़ल, कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं। दो बार राज्य स्तर पर और एक बार राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हो चुका हूं। मैंने एक बात अपने जीवन में सीखी है कि अगर हम हौसला बनाये रखें तो साथ देने के लिये अच्छे लोग हर जगह मिल जाते हैं। कोई भी इच्छित लक्ष पाने के लिये असफलता से हार माने बिना निरंतर प्रयास करते रहने से सफलता मिल ही जाती है

अगर साहित्य अकादमी नहीं होती तो मैं लेखक भी न होता क्योंकि मेरे पास अपने साहित्य को प्रकाशित करने के लिये न पैसे थे और न ही कोई अन्य तरीका मुझे आता था।

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मेरा लेखकीय परिचय-

नाम- नफे सिंह कादयान,

पता- गांव गगनपूर .-अम्बाला,

डा. खा. - बराड़ा-133201 (हरि.)

जन्म- 25 मार्च 1965

व्यवसाय- कृषक।

Email-nkadhian@gmail.com. Mob.-9991809577

सम्मान-

1-हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा व्यवस्था कहानी के लिये सम्मान- वर्ष 2009

2-बी.डी.एस साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा श्रेष्ठ लेखन के लिये ड.. भीमराव अम्बेदकर राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड वर्ष-2013

3-हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा चैतन्य पदार्थ पुस्तक के लिये श्रेष्ठ कृति पुरस्कार-वर्ष 2017

रचनायें- पुस्तकें- वर्ष 2017 तक

1 शांति-( पृ.स.170 वर्ष-2009 )मानव विज्ञान ,

2 चैतन्य पदार्थ-( पृ.स.180 वर्ष-2013 )पदार्थ संरचना,

3 जन शासन-(पृ.स.217 वर्ष-2013 )राजनैतिक

4 कंजर-(पृ.स..145 वर्ष-2017 )उपन्यास

5 मयखान -(पृ.स..80 वर्ष-2016 )

6 व्यवस्था परिवर्तन-(पृ.स..212) जनहित सामाजिक।

अप्रकाशित टंकित पाण्डुलिपियां।

1-हम हैं राही प्यार के-(पृ.स..182 ) कहानी संग्रह,

2-भविष्य के गर्भ में- इंजीनियरिंग। लेखन प्रक्रिया में।

3-आभासी दुनिया-(पृ.स. 250 ) उपन्यास।

कहानियां, आलेख, संस्मरण, गजल़, कविता, पत्र- दैनिक ट्रिब्यून, सत्य दर्शन, हिमप्रस्थ, हरिगंधा, कथायात्रा, शुभ तारीका, हरियाणा साहित्य अकादमी की व अन्य पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित।

मेरे जीवन का मूलमंत्र-मस्त रहो, खुश रहो। जो खा लिया अपना, रह गया बेगाना।

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