संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 106 : रिट्रीट सैरिमोनी (वाघा बॉर्डर) // रेखा जोशी

image

प्रविष्टि क्र. 106

रिट्रीट सैरिमोनी (वाघा बॉर्डर)

रेखा जोशी

दिन धीरे धीरे साँझ में ढल रहा था ,हमारी कार अमृतसर से लाहौर की तरफ बढ़ रही थी , वाघा के नजदीक बी एस एफ के हेडक्वार्टर से थोड़ी दूर आगे ही दो बी एस एफ के जवानों ने हमारी कार को रोका , मेरे पतिदेव गाडी से नीचे उतरे और उन्हें अपना आई कार्ड दिखाया और उनसे आगे जाने की अनुमति ली। कार पार्किंग में ,छोड़ हम भारत पाक सीमा की ओर पैदल ही बढ़ने लगे।

सूरज की तीखी धूप सामने से हमारे चेहरों पर पड़ रही थी ,उधर से लाउड स्पीकर पर जोशीला गाना ,”चक दे ,ओ चक दे इण्डिया ”हम सब की रगों में एक अजब सा जोश भर रहा था। जैसे ही हमने सीमा के प्रांगण में कदम रखा ,तो वहाँ कुछ नन्हीं बच्चियां और कुछ नवयुवतियां उस जोशीले गाने पर थिरक कर अपना राष्ट्रीय प्रेम व्यक्त कर रही थी। एक बी एस एफ के जवान ने हमें उस प्रांगण की सबसे आगे वाली पंक्ति में बिठा दिया ,ठीक मेरी बायीं ओर भारत पाकिस्तान की सीमा दिखाई दे रही थी ,दोनों ओर के फाटक साफ़ नजर आ रहे थे और बीच में था कुछ खाली स्थान जिसे , ”नो मेन’स लेंड” कहते हैं। फाटक के बाएं और दायें ओर बी एस एफ के जवान काले जूतों से ले कर लाल ऊँची पगड़ी तक पूरी यूनिफार्म में तैनात थे।


सीमा के इस ओर भारत का तिरंगा लहरा रहा था और सीमा के दूसरी ओर पाकिस्तान का झंडा था। उस समारोह में शामिल लोग देश प्रेम के गीतों पर जोर जोर से तालियाँ बजा रहे थे , और शायद उतने लोग सीमा पार ढोलक की थाप पर नाच रहे थे। पाकिस्तान के सीमा प्रहरी काली वेशभूषा में तैनात थे ,शाम के साढ़े पांच बज रहे थे ,समारोह की शुरुआत हुई भारत माता की जय से ,गूंज उठा सीमा का प्रांगण ,वन्देमातरम और हिन्दोस्तान की जय के नारों से ,कदम से कदम मिलाते हुए ,बी एस एफ की दो महिला प्रहरी काँधे पे रायफल लिए मार्च करती हुई सीमा के फाटक की ओर बढती चली गयी। एक ध्वनि लोगों को होशियार करती हुई ”आ आ …….अट” के साथ कदम मिलाते हुए दो जवान फाटक पर पाक सीमा की और मुख किये जोर से अपनी दायीं टांग सीधी ऊपर कर सर तक ले जाते हुए फिर उसे जोर से नीचे कर ” अट” की आवाज़ के साथ पैर नीचे को पटक कर सलामी देते हैं।

भारत माता ,वन्देमातरम और हिन्दोस्तान की जय जयकार के जोशीले नारे लगातार हवा में गूंज रहे थे, यह पूरी प्रक्रिया तीन,चार बार दोहराई गयी ,सीमा पार से लगातार ढोलक बजने की आवाज़ आ रही थी।
शंखनाद के साथ श्रीमद भगवत गीता का एक श्लोक ,”यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिरभवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम।। ”की लय पर भारतमाता के जवान प्रहरी कदम मिलाते हुए ,फाटक की ओर बढ़ते हुए उसे खोल दिया गया। रिट्रीट सैरिमोनी में दोनों ओर के सिपाहियों ने ,अपने अपने देश के झंडों को सलामी देते हुए ,ध्वजारोहण की प्रक्रिया शुरू की। दोनों ओर के दर्शकों की तालियों से वातावरण गूंज उठा। राष्ट्र प्रेम की भावना से ओतप्रोत वहाँ बैठा हर भारतीय अपने दिल से जय जयकार के नारे लगा रहा था।

राष्ट्रीय गान के साथ दर्शकों ने खड़े हो कर सम्मानपूर्वक ,बी एस एफ के जवानों के साथ राष्ट्रीय ध्वज का अवरोहण किया। तालियों और नारों के मध्य दो जवानों ने सम्मानपूर्वक तिरंगे की तह को अपनी कलाइयों और हाथों पर रख कर सम्मान के साथ परेड करते हुए उसे वापिस लेते हुए चल पड़े। अन्य दो जवान मार्च करते हुए फाटक की तरफ बड़े और उसे बंद करने की प्रक्रिया शुरू हो गई। सूर्यास्त होने को था ,आसमान में आज़ाद पंछी सीमा के आरपार उड़ रहे थे ,लेकिन इस आधे घंटे की प्रक्रिया ने सीमा के इस पार हम सबके दिलों को राष्ट्रीय प्रेम के भावना से भर दिया और मैं भावविभोर हो नम आँखों से वन्देमातरम का नारा लगते हुए बाहर की ओर चल पड़ी।

रेखा जोशी

0 टिप्पणी "संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 106 : रिट्रीट सैरिमोनी (वाघा बॉर्डर) // रेखा जोशी"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.