संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 107 : रेणु-ग्राम में एक दोपहरी // विनीता ए कुमार

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प्रविष्टि क्र. 107

रेणु-ग्राम में एक दोपहरी

विनीता ए कुमार

नेशनल हाईवे-५७ पर फ़ॉरबीसगंज से अररिया जाने वाली चिकनी सड़क पर सरसराती हुई हमारी स्कूटी चली जा रही थी। कभी नहीं भूलने वाली वो दोपहरी १३ मई २०१७ की थी। सड़क के दोनों तरफ़ लहलहाते खेतों की हरीतिमा आँखों को आप्लावित कर रही थी और आसमान में उमड़ते-घुमड़ते बादल भी बरबस ही ध्यान आकर्षित कर रहे थे। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर गाय या बकरियों के झुण्ड घास और छोटे जंगली पौधे चरते नज़र आ रहे थे। प्रकृति का ये मनोहारी रूप और ग्रामीण परिवेश, कुल मिलाकर ये दोनों ही हमारी यात्रा को सुखद बनाने में अपना योगदान दे रहे थे। इस पर से ठण्डी बौरायी हवा के झोंकों से उड़ती अपनी चुन्नी को बार-बार सम्भालती मैं ख्यालों में खोई थी।

सालों से चाहत थी कि हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार एवम् ‘मील के पत्थर’ श्री फणीश्वर नाथ रेणु जी की जन्मस्थली ‘औराही हिंगना’ के दर्शन कर आऊँ। जबसे मेरी शादी फ़ॉरबीसगंज हुई तबसे रेणु जी के घर जाने का सपना मेरी आँखों में पलने लगा था। आज वो सपना पूरा होने जा रहा था। अपने अंचल के प्रति मेरा स्नेह भी मुझे कहीं न कहीं रेणु जी के व्यक्तित्व से जोड़ता था। रेणु जी का अपने अंचल से प्रेम उनकी रचनाओं में साफ़ झलकता है। हाल ही में उनका उपन्यास ‘मैला आँचल’ पढ़ा जिसमें रेणु जी ने अपने अंचल और वहाँ के लोकजीवन का वर्णन जिस ख़ूबसूरती से किया है वह हिन्दी साहित्य में विरले हीं मिलता है। उन्होंने हिन्दी साहित्य में एक नई धारा का निर्माण किया। इस उपन्यास ने उनके गाँव जाने की मेरी इच्छा और प्रबल कर दी। मैं उस परिवेश को अपनी आँखों से देखना और महसूसना चाहती थी जहाँ एक ज़माने में ऐसे महान लेखक की लेखनी फल-फूल रही थी।

पहले यह तय हुआ कि मैं और मेरे पति कार से रेणु जी के गाँव जायेंगे। घरवाले सोच रहे थे कि वैशाख की तपती दोपहरी में गर्मी के मारे हम दोनों का बुरा हाल न हो जाए। मन ही मन मुझे यह बात खल रही थी कि एयर कंडीशन कार में मैं उनके गाँव की खुली हवा में साँस नहीं ले पाऊँगी। मैंने सोचा कि जब जा रहें हैं तो मन की मुराद पूरी करके ही वापस आना चाहिए। अंततः स्कूटी से जाना तय हुआ। मेरे भाग्य से जाने के पहली वाली रात अच्छी बारिश हो जाने की वजह से गर्मी भी कम हो गई थी और आसमान में बादलों की आवाजाही का क्रम शुरू हो गया।

१३ मई को दिन के १२:३० बजे हमने प्रस्थान किया। घर के सभी सदस्यों ने मुझे मुस्कुराते हुए विदा किया इस बात की मुझे बड़ी ख़ुशी हुई। ये तो बाद में पता चला कि पूरा मोहल्ला जानता था कि उस दिन गाँव की एक बहु जो गुजरात में रहती है वो रेणुजी के गाँव जा रही है। वापस आने के बाद कई लोगों ने बड़े हर्ष के साथ रेणु-ग्राम का मेरा अनुभव पूछा था। लोगों का ऐसा स्नेह भी मुझे रोमांचित कर गया। बिस्किट का एक पैकेट और पानी की एक बोतल लेकर हम निकल पड़े थे। फ़ॉरबीसगंज के सदर बाज़ार से होते हम गाँव के बाहर मुख्य सड़क एन-एच ५७ पर पहुँच गए थे। यहाँ से हमें अररिया की तरफ जाने वाली सड़क पर लगभग १४ किलोमीटर का रास्ता तय करना था। फिर हाईवे से दाहिनी तरफ़ सर्विस लेन में उतरना था। सड़क पर बहुत कम ट्राफ़िक थी। मौसम भी सुहाना हो गया था। थोड़ी-थोड़ी देर में बारिश की ठण्डी बुँदे फाहे जैसी गिरती, फिर गायब हो जातीं। सड़क के दोनों ओर जहाँ तक नज़रें जाती वहाँ तक हरे-भरे खेत दिखते। बीच-बीच में आम और महुआ के पेड़ भी दिखे। मेरी आँखों के सामने ‘मैला आंचल’ के कुछ दृश्य आये जिसमे ‘भारत माता ग्राम वासिनी के धूल भरे मैले से आँचल’ का वर्णन है।

हाईवे से उतरकर अब हम पतली सड़क पर आ गए थे। लगभग दस मिनट के बाद सड़क से लगे हुए ‘रेणुग्राम’ के कत्थई रंग के वृहद् द्वार के समक्ष हमने स्कूटी रोकी। हम औराही पहुँच गए थे। वहाँ थोड़ी देर रूककर हमने द्वार की कुछ तस्वीरें लीं। पास ही चाय की एक गुमटी थी जहाँ कुछ स्थानीय निवासी खड़े थे। वो कौतुहल वश हमें देख रहे थे। हमने उन लोगों से रेणु जी के घर का रास्ता पूछा। हमारे आने का आशय जानकर उनके चेहरे पर सहज मुस्कान दौड़ गई। रास्ता समझने के बाद हमने उनका शुक्रिया अदा किया। वो फिर मुस्कुरा पड़े।

अब हम पगडंडियों जैसी संकरी किन्तु पक्की सड़क पर बढ़ते जा रहे थे। जैसे-जैसे हम गाँव के भीतर जा रहे थे वैसे-वैसे ग्रामीणों की दृष्टि में छिपा प्रश्नवाचक भाव और गहरा होता जा रहा था। गाँव के भीतरी सड़क पर गलत मोड़ ले लेने की वजह से हम फिर से गाँव के बाहर जाने वाली सड़क पर आ गए। रेणुजी के निवास तक पहुँचने के लिए हमने कई बार ग्रामीण बच्चों और महिलाओं से पूछताछ की। मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था जब बकरियाँ चराते निरक्षर दिख रहे बच्चे और घास छिलती या गोबर का गोइठा(उपले) थापती औरतें भी रेणुजी के व्यक्तित्व से भली-भांति परिचित थीं। सबको रेणुजी के घर का पता मालूम था। उन सबने हमारा मार्गदर्शन अपने-अपने तरीके से किया। उस वक्त मेरे मन में ऐसा ख्याल आया कि यदि यहाँ के गाय-बकरियों से भी पूछा जाय तो वो भी शायद हमें रेणुजी के घर तक जरुर पहुंचा दें। ये ख़याल याद करके मैं आज भी मुस्कुरा देती हूँ। एक और बात जो सुखद आश्चर्य का कारण बनी वो थी गाँव की साफ़-सफाई। इतनी साफ़ सुथरी सड़कें, कहीं कोई गन्दगी या प्लास्टिक का नामो-निशान नहीं। कहीं जल-जमाव या गन्दा नाला नहीं दिख रहा था। ऐसा महसूस हो रहा था कि हम मोदी जी की ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के सफलतम हिस्से में विचरण कर रहे हैं।

मक्के के लहलहाते खेतों और गाय-भैसों के झुंडों से स्वयं को निकालते हुए अंततः हम रेणुजी के निवास के सामने पहुँच गए थे। मुख्य-द्वार के दाहिने ओर लगे अनार की झाड़ी फूलों और फलों से लदी हुई थी। कच्चे कैंपस में कई तरह के पौधे गर्व से सीना ताने यूँ खड़े थे जैसे रेणुजी के बागीचे में उनकी उपस्थिति कितने सौभाग्य की बात थी। मेरे मन में भी कुछ ऐसे ही भाव आ रहे थे। आए भी क्यूँ ना, मेरा वर्षों पुराना स्वप्न जो पूरा हुआ था आज! वहाँ पहुँचते हीं आस-पास खेलते-कूदते बच्चे मुस्कुराते हुए हमारे करीब आ गए। रेणुजी के पोते ने हमारा स्वागत किया। घर के आगे वाले हिस्से में बड़ा-सा बरामदा था जहाँ कई कुर्सियाँ और बड़े-बड़े टेबल लगे थे। हम वहीं पड़ी कुर्सियों पर बैठ गए। थोड़ी देर की प्रतीक्षा के बाद रेणुजी के द्वितीय पुत्र श्री अपराजित राय जिन्हें स्थानीय लोग ‘अप्पुजी’ के नाम से जानते हैं, बाहर आए। अभिवादन तथा परिचय के बाद हमने रेणुजी के बारे में बातचीत आरम्भ की।

अपराजित राय उर्फ़ अप्पुजी ने हमें रेणुजी के जीवन और लेखन सम्बंधित अनेक जानकारियों से अवगत कराया जिसकी चर्चा दूसरे लेख में होगी। करीब एक घंटे की परिचर्चा के बाद अपराजित जी हमें घर के अन्दर ले गए। वहाँ परिवार के अन्य सदस्यों से मुलाक़ात हुई। अब हम उस कमरे के सामने थे जिसमें पूरी-पूरी रात डिबरी की मद्धिम रौशनी में रेणुजी की कलम लगातार चलती रहती थी। कमरा क्या एक कच्ची कोठरी थी जिसे अभी तक उसी रूप में रखा गया है जैसा वो रेणुजी के समय हुआ करता था। रेणुजी को नमन करते हुए मैंने उस कमरे में कदम रखा। भीतर प्रवेश करते ही न जाने क्यूँ मेरे रोंगटे खड़े हो गए। दो मिनट शांत खड़े रहकर मैंने मन ही मन रेणुजी की पवित्र आत्मा को श्रद्धांजलि दी। कमरे में हर तरफ रेणुजी की तस्वीरें और उनकी पुरानी चीजें रखी हुईं थीं। मैं उनकी हर एक तस्वीर भाव विभोर-सी निहार रही थी।

मुझे अपनी आँखों पर भी यकीन नहीं हो रहा था कि मैं उस महान साहित्यकार की ज़मीन पर खड़ी हूँ जिनका नाम हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा गया है। मेरी यात्रा सफल हुई।

परिचय

नाम : विनीता ए कुमार

जन्म : 28 मार्च 1982, सीतामढ़ी, बिहार

शिक्षा : स्नातक प्रतिष्ठा(जन्तुविज्ञान)

स्नातकोत्तर (हिन्दी) अध्ययनरत

लेखन की विधाएँ : कविता, लघुकथा, संस्मरण, समीक्षा

सम्प्रति               :   स्वतन्त्र लेखन

उप्लाब्धियाँ       : काव्य-संग्रह “इन्द्रधनुष” (ईपुस्तक)                             नई दिल्ली से प्रकाशित, दूरदर्शन                             अहमदाबाद से साहित्यिक परिचर्चा                           में सहभागिता का प्रसारण, ऑल                             इण्डिया रेडियो अहमदाबाद से काव्य                           पाठ का नियमित प्रसारण, अनेक                             साहित्यिक पत्रिकाओं तथा समाचार                           पत्र में रचनाओं का प्रकाशन

निवास               :   अहमदाबाद, गुजरात

ईमेल : vinnik28@gmail.com

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