संपादकीय - पूत के पांव // राकेश भ्रमर // प्राची - फरवरी 2018

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"पूत के पांव पालने में’’ यह कहावत आप सबने सुनी होगी. हो सकता है, नई पीढ़ी के लोगों ने न सुनी हो. आज कहावतों और मुहावरों की भाषा का प्रयोग कोई नहीं करता. शब्द भी आधे-अधूरे बोलते-लिखते हैं. समय नहीं है न किसी के पास.

चलिए जिसने भी यह कहावत सुनी है, यह लेख उन्हीं के लिए है. हमारी भाषा में कहावतें और मुहावरे तो असंख्य हैं, परन्तु इनका इतिहास क्या है, इनके रचयिता कौन है, इस संबंध में सभी को या तो अल्प ज्ञान होगा, या बिल्कुल नहीं होगा, क्योंकि किसी भी भाषा में कहावतें और मुहावरे अचानक बन जाते हैं और फिर जनश्रुति के आधार पर उनका प्रचलन बढ़ता जाता है. रचयिता अज्ञात रहता है.

खैर, खुशी की बात है कि उपरोक्त कहावत आप सबने सुनी है. परन्तु इस पर कभी विचार किया है कि इस कहावत को गढ़ते समय रचयिता के मन में क्या विचार रहे होंगे. बाद की पीढ़ी के लोग तो अपने मतलब से या अपने ज्ञान के अनुसार बात का मतलब निकाल लेते हैं, जैसे न्यायालय में वादी और प्रतिवादी अपने-अपने हिसाब से एक ही कानून को अलग-अलग ढंग से परिभाषित करते हैं और उनके तर्क सुनकर न्यायाधीश भी चकरा कर रह जाते हैं कि दोनों ही वकील सही बोल रहे हैं. किसको सजा दें और किसको छोड़ दें.

बात बढ़ती जा रही है, अतः मैं लौटकर अपनी बात पर आता हूं. मैं उस महान विद्वान को ढूंढ़ रहा हूं, जिसने ‘पूत के पांव पालने में’ कहावत गढ़ी थी. मुझे उससे पूछना है- अगर उसे पूत के पांव पालने में दिख गये थे, तो उसके अनुसार यह किसके सुभाग्य का परिचायक था? मां-बाप के या उसके स्वयं के...? फिर उसने इस मामले में पक्षपात क्यों किया? उसे पूत के पांव तो दिख गये, पुत्री के क्यों नहीं दिखे? क्या वह जानता था कि भारतवर्ष में केवल पूत ही पालने में डाले जाते हैं, पुत्रियां नहीं. क्या उसी ने यह परम्परा डाली थी कि पुत्र तो पालने में पलेंगे और पुत्रियां मिट्टी में खेल-कूदकर, घर के काम करते हुए और मां की डांट खाकर बड़ी हो जाएंगी. उनके लिए पूत सपूत होते हैं, कोमलांग होते हैं. वह केवल पालने में ही पल सकते हैं.

खैर, ज़माना बदल गया है. जिस प्रकार हम उपरोक्त कहावत बनानेवाले विद्वान को भूल गये हैं, उसी प्रकार हम इस कहावत को भी भूलते जा रहे हैं. अब पूत के पांव पालने में कहां रहते हैं. वह तो सीधे महंगे नर्सिंग होम्स या अस्पताल से कैश डाउन पेमेन्ट पर आते हैं. डिलीवरी के समय न तो मां को दर्द होता है, न पूत को रोना आता है. घर में आते ही सीधे वह छः गुणा छः फीट के नरम बिस्तर पर हाथ-पांव फैलाकर लेट जाता है. अब इतने बड़े बिस्तर में कम्बल में लिपटे हुए पूत के पांव कौन देखता है. सब उसके आंख, कान, नाक, ओंठ, माथा और भौंहें देखकर किसी ने किसी संबंधी के साथ उसका नाता जोड़ देते हैं. उस समय सभी हंसकर रह जाते हैं, परन्तु यह किसी की समझ में नहीं आता कि एक छोटा बच्चा एक साथ इतने सारे लोगों की परछाई कैसे हो सकता है.

पूत को भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह अपने बाप पर गया है कि दादा, चाचा, फूफा या मामा पर... पूत को बस इतना पता होता है कि अब लोग उसके पांव के बारे में बात नहीं करते, क्योंकि सभी जानते हैं, कि एक बार उसने चलना आरंभ किया तो कहां जाकर रुकेगा, किसी को पता नहीं?

आजकल के पूत भी मां-बाप की गोदी में कम, आया के हाथों में ज्यादा पलते हैं. मां-बाप के पास अपनी नौकरी से ही फुरसत नहीं मिलती है. इसीलिए समझदार होते ही पूत की आंखें मां-बाप पर हमेशा टेढ़ी रहती हैं. वह मां-बाप को केवल तभी सीधे देखता है, जब उसे पैसे की आवश्यकता होती है. जब बड़ा होकर खुद कमाने लगता है, तो मुड़कर भी मां-बाप की तरफ नहीं देखता. कहीं मां-बाप अपना खर्चा न मांग बैठें.

पहले का तो पता नहीं, यानी जब इस कहावत का आविष्कार हुआ होगा कि पूत के पांव अपने मां-बाप को कितना को सुख देते थे और अपने लिये कितना सुख कमाते थे, परन्तु मैंने देखा है कि मेरे जमाने में पूत मां-बाप को कोई सुख नहीं देते हैं. जैसे ही बड़े होते हैं, मां-बाप उसकी शादी कर देते हैं और पूत अपनी सगी पत्नी के साथ सगे मां-बाप से अलग हो जाता है. एक ही घर में या घर के बगल में रहते हुए भी बाप-बेटे अजनबियों के तरह रहते हैं. मां-बाप घर की ज़मीन में पूत के पांव के निशान ढूंढ़ते रह जाते हैं, परन्तु उनकी आंखें पथरा जाती हैं, उसे बचपन वाले वो पांव कहीं नज़र नहीं आते हैं, जिनको देखकर गर्व से कहते थे, ‘पूत के पांव पालने में.’

अब थोड़ी तरक्की हो गयी है. पूत के पांव गांव से निकलकर शहर की ओर जाने लगे हैं. वहां जाकर ऐसे जमते हैं कि फिर लौटकर गांव की तरफ नहीं आते.

जब से इक्कीसवीं सदी आयी है, तब से पूतों के भाग्य कुछ और अधिक चमक गये हैं. उनके पांवों ने दौड़ने और भागने में और अधिक तरक्की कर ली है. इतनी तरक्की कि अब उनके पांव उड़ने लगे हैं. वह तरह-तरह की डिग्रियां लेने के लिए विदेश उड़ जाते हैं. या भारत से डिग्री लेकर नौकरी करने के लिए विदेश चले जाते हैं. वहां अपने पांव पर खड़े होकर खूब धन कमाते हैं, परन्तु उस धन का कोई उपयोग देश में बैठे उसके मां-बाप नहीं कर पाते हैं. बेटा भेजेगा तो करेंगे न्.

पूत किसी को सुख दे या न दे, परन्तु उसके जन्म पर हर मां-बाप गर्व महसूस करते हैं कि वह उनका नाम न सही, वंश का नाम अवश्य रोशन करेगा. परन्तु अक्सर ऐसा होता नहीं है. राहुल के जन्म पर राजीव और सोनिया ने भी गर्व किया होगा, परन्तु राहुल ने कांग्रेस को कहां से कहां पहुंचा दिया, यह क्या किसी से छिपा है. देश के एक और सूपूत हैं- अखिलेश यादव. सत्ता हाथ में आते ही वह औरंगजेब बन गये और पूरे कुनबे को न केवल बांट दिया, बल्कि बाप द्वारा स्थापित पार्टी का सत्यानाश करके उसे सत्ता से ही बाहर कर दिया. अब शायद ही यह पार्टी कभी सत्ता में आ पाए. अगर आई भी तो अपनी बदौलत नहीं आएगी, बल्कि दूसरी पार्टियों की गलती के कारण आएगी.

दो सूपूत लालूप्रसाद यादव ने भी पैदा किये हैं. उनके पांव तो जन्म के पहले से ही पालने के बाहर दिखाई दे रहे थे. दोनों के नाम में तेज है, परन्तु काम में नहीं. दोनों ही पढ़ाई में जीरो हैं, परन्तु बड़बोलेपन में हीरो. हां, उनके पांव पालने में चाहे जो भी कहते रहे हों, परन्तु उनके मुंह में पड़े चांदी के चम्मच उनके भाग्य का ढिंढोरा पीटकर अवश्य रो रहे थे कि एक दिन यह दोनों देश को चाहे न सही, अपने प्रदेश को गंगा-कोसी की बाढ़ में जरूर बहा देंगे.

पूत के पांव मुसीबत में मां-बाप के काम नहीं आते, क्योंकि पूत कभी अपने पांव पर नहीं चलता, वह केवल खड़ा होता है और जब वह अपने पांव पर खड़ा होता है, तो अपनी आनेवाली सात पीढ़ियों के लिए खड़ा होता है. अपने देश में तो लोग यही कहते हैं कि मनुष्य के जीवन में सभी कुछ सात जन्मों के लिए होता है. पत्नी सात जन्म तक पति का साथ देती है, तो पुरुष सात पीढ़ियों के लिए धन कमाकर रखता है. तो भला पूत की कमाई में मां-बाप का कौन-सा हिस्सा है. वह तो पूत की अगली सात पीढ़ियों के लिए है. मां-बाप बेकार में खांव-खांव करते रहते हैं कि पूत उनका ध्यान नहीं रखता. बुढ़ापे में उनकी लाठी तोड़ दी. अरे भाई, ऐसी परम्परा तो आपने ही बनाई है. इसमें पूत का क्या दोष? पूत के पांव क्या सदा पालने में ही रहेंगे, निकलकर कहीं और नहीं जायेंगे.

आजकल तो हमारे पूतों के पांव जन्म लेने के तुरन्त बाद ही पालने के बाहर चले जाते हैं. बचपन में, जबतक मां-बाप का उन पर संरक्षण रहता है, वह पार्क और सड़क पर खेलने के लिए घर के बाहर जाते रहते हैं, किशोर और युवा होते ही वह मां-बाप के संरक्षण से स्वयं को आजाद कर लेते हैं. वह स्वच्छंद हो जाते हैं. कॉलेज जाने के बहाने वह लड़कियों के कदमों के साथ कदमताल करने के लिए शहर की गलियों, नए खुले मॉल्स, मल्टीप्लेक्स आदि में भटकने लगते हैं. कुछ कपूत टाइप के पूत होते हैं जो पढ़ते भी होंगे, परन्तु यह कपूत जब पढ़-लिख कर बड़ी-बड़ी डिग्रियां प्राप्त कर लेते हैं, तो दूसरे शहर या विदेश में नौकरी करने के लिए भाग जाते हैं. वहां उनका भाग्य तो जाग जाता है, परन्तु गांव-घर, देश में पीछे छूट गये मां-बाप का जीवन अंधेरे में डूब जाता है.

अब ऐसे पूत के पांव जिसने भी पालने में देखे होंगे, वह क्या जवाब देगा?

हमारे पुरखों ने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि आंख मूंदकर ही सही, पुत्री के पांव भी पालने में देख लेते. वह बेचारी पांव ही नहीं, सिर के बल मां-बाप की सेवा के लिए खड़ी रहती है. शादी हो जाने के बाद भी मां-बाप को जुखाम-सर्दी भी हो जाए तो भागकर मायके आ जाती है. मां-बाप की सेवा करती है और बिना कोई मेवा लिए ससुराल लौट जाती है. उसका पति तो सास-ससुर का इतना भक्त होता है कि ज्यादा तबीयत खराब होने पर उन्हें अपने घर में ले जाकर उनकी सेवा करता है. दूसरी तरफ सगा पूत उसी समय विदेश में किसी गोरी मेम के साथ क्लब या होटल में शैम्पेन की पिचकारी छोड़ रहा होता है. शैम्पेन की बूंदों के सामने उसे अपने मां-बाप की आंख के आंसू नहीं नजर आते. वह भूलकर भी देश में मां-बाप से बात नहीं करता. किसी प्रकार अगर बात कर लेता है तो यह नहीं कहता- आप विदेश आ जाओ. यहां अच्छा इलाज करवा देंगे.

बड़ी विडम्बना है- बेटा लाख बुरा हो, तो भी कोई बाप उसे खट्टा नहीं कहता. उसके पांव पालने में और पांव के बाहर उसे सुन्दर ही दिखते हैं. बेटी लाख गुणी हो, मरते दम तक मां-बाप की सेवा करती हो, फिर भी वह पराया धन ही होती है. यह केवल भारत वर्ष की महिमा है- यहां हम मानते कुछ हैं, करते कुछ और हैं और दिखाते कुछ और हैं. कन्या को देवी मानते हैं, परन्तु उसकी भ्रूण हत्या करने में हमें कोई पाप नहीं लगता. बेटी को लक्ष्मी मानते हैं, परन्तु उसे पराया धन कहते हैं. जबकि दूसरे व्यक्ति का धन हड़पने में हम देर नहीं लगाते हैं. निगाह के नीचे से हम दूसरे का रुपया-पैसा ही नहीं, ज़मीन जायदाद भी हड़प जाते हैं. किसी को कानों-कान खबर नहीं होती. भाई-भाई का माल हड़पने में एक इंच भी शरम नहीं करता. बहन को बाप की सम्पत्ति में हिस्सा तो दूर उसे दहेज का हिस्सा भी नहीं देना चाहता. उसका बस चले तो बहन की ससुराल से दहेज ले ले.

पूतों की करामातें आए दिन अखबारों में छपती रहती हैं, टी.वी में दिखाई जाती हैं. धन-सम्पत्ति के लिए वह भाई की ही नहीं, बाप की भी हत्या कर देते हैं. ऐसे पूत हमारे समाज में भरे पड़े हैं. बस उनके पांव कुछ लोगों को दिखाई नहीं देते. दिखाई देते हैं तो सुन्दरता से परिपूर्ण, वह भी केवल पालने में.

अब इन कहावत बनाने वालों को कौन समझाएं कि समय के साथ पांव ही नहीं, सूरत और चरित्र भी बदल जाता है. जैसे एक कहावत है- ‘हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या.’ अब बताइए, आज के जमाने में फारसी कौन पढ़ता है. जिसने फारसी के अलावा कोई अन्य भाषा पढ़ ली, तो क्या वह विद्वान नहीं होगा. और क्या किसी माई का अन्धा, काना पूत उसकी ‘आंख का तारा’ नहीं होता? इसके अलावा आप कहते हैं कि ‘हंसिए दूर, पड़ोसी नाय’ तो फिर ‘निन्दक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय’ का पालन कौन करेगा?

आप पूत के पांव पालने में देखिये, मैं पर्दा गिरा रहा हूं.

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