समीक्षा // अधिकारों को जागरूक करती कविताएं // राजेन्द्र कुमार // प्राची - फरवरी 2018

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डॉ. सी. बी. भारती का पहला कविता-संग्रह 1996 में ‘आक्रोश’ नाम से प्रकाशित हुआ था, जो काफी चर्चित रहा है. अब लगभग बीस वर्षों के अंतराल पर आए दूसरे कविता-संग्रह ‘लड़कर छीन लेंगे हम’ की कविताएं नए और तीखे तेवर लिए हैं, जिनमें ऐसी पीड़ा भरी धार है जो सामाजिक भेदभाव पर मार करते हुए चेतना को झिंझोड़ देती हैं. इस संकलन में एक सौ सत्रह कविताएं हैं.

भारती जी उच्च शिक्षित कवि हैं. उनकी भाषा पर अच्छी पकड़ है, जो विद्रोह को प्रभावी ढंग से मुखरित करती है. मानो वह अभी निपटारा चाहते हों. सदियों से चले आ रहे शोषण, न्याय-अन्याय का हिसाब विवेकपूर्ण न होने से लड़कर छीन लेने का आह्वान करते हैं. वे, जिसकी आत्मा को धर्म और संस्कारों के नाम पर वर्षों से दबाकर रखा गया और जो अपनी नियति मानकर चुप बैठने को मजबूर किया गया, ऐसे समूह को भारती जी उनकी आंखों में आंखें डालकर हक की ज्वाला जलाना चाहते हैं. जिसमें पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं है.

संकलन में अलग-अलग मनःस्थिति की कविताएं हैं, जो पौराणिक काल के अन्याय से लेकर आजादी के बाद की जलालत और कुचक्रों को उजागर करती हैं. जातिवाद को लेकर कवि की सोच स्पष्ट और सकारात्मक है- जातिवाद समाप्त हो/समाप्त हो विद्वेश/फैले नहीं उन्माद/जातियों लेकर/अपना समाज बने सुखद/पर क्या मिट रहा है जातिवाद!/हो रहा है लोगों के मन का परिष्कार!/ नहीं-नहीं/स्वार्थवश, बाह्य तो शिष्ट हो रहा है/पर अंतस/जातीयता की घृणा से/विषवृक्ष हो रहा है.

जो, जब आमने-सामने बहस में नहीं टिकते तो गाली को हथियार बनाकर अपमानित करते हैं- तुम्हें कोई कहे चमार/तुम आमादा हो जाते हो मारने-मरने को/मैं तो आजीवन कहलाया चमार/फिर भी फख्र है मुझे इस संबोधन पर/कभी मैंने गिले-शिकवे नहीं किये/क्योंकि साफ है हमारा हृदय/जातियों के छल-छद्म और मिथक/तो तुमने ही बनाए हैं/तुमने कहा भंगी बनाकर छोड़ूंगा/पर मुझे बुरा नहीं लगा/जाने कैसे तुमने इन शब्दों को अपनी सियासत से/गाली बनाया है/यह सब तुम्हारी कूटनीति की ही तो माया है.

कवि शबरी के पौराणिक प्रसंग पर कहता है- जूठन खाने का/यह कैसा तिलिस्म/पुरुष से मर्यादा पुरुषोत्तम हो गए राम/शबरी के जूठन खाकर/और हम पले-बढ़े/जूठन पर ही आजन्म/मगर हम अछूत हो गए/विदुर का शाक खाकर/भगवान हो गए.कृष्ण/और हम पले/शाक-पात पर ही जीवन भर/हम हो गए शूद्र/यह कैसा तिलिस्म/कैसा भेदभाव यह/इस धरती के भगवानों का!

शिक्षा प्राप्ति के मूलभूत अधिकारों से वंचित होने पर कवि की पीड़ा टीस बन जाती है- मैं भूखा हूं शिक्षा का/शिक्षा जो तुम्हें सुलभ थी/शिक्षा जिसे देने का/तुम्हारे पास ठेका था/शिक्षा से वंचित कर दिया तुमने/हमें ही नहीं, नारियों को भी इस देश की/यानी जैसी प्रकृति की अनमोल धारा से भी/वंचित कर जाति से जोड़ दिया/याद हैं मुझे विद्यालय के वे दिन/जब हम नहरों व तालाब का गंदा पानी पीते थे/याद है जब मुझे स्कूल की बाल्टी छूने पर/दंडित किया गया था.

धर्म ग्रंथों के आख्यान पर कवि कहता है- सच्चाई है कि सूरज/देता है सभी को रोशनी और जीवन/खोलता है सभी की आंखें/देता है नई दृष्टि/बिखेरता है आलोक/सूरज कभी किसी कुंती का शीलहरण नहीं करता/वह नहीं भोगता किसी सुकुमारी की देह/सूरज कभी भी किसी कर्ण को जन्म नहीं देता.

धर्मराज युधिष्ठिर के आचरण पर कवि ने अपने अर्थ में लिया है- वही हो सकता है/युधिष्ठिर!/जो रहे थिर युद्ध में/निरपेक्ष हों जिसके विचार/आश्रय हो सत्य जिसका/वही हो सकता है/युधिष्ठिर!/ युधिष्ठिर वह नहीं/जो हार जाए अपनी पत्नी को जुए में/और देखता रहे अवाक्/निर्वसन होते हुए/एक नपुसंक मर्द की तरह.

आज के वातावरण में आदमी बंट गया है- आदमी!/आदमी ही नहीं होता/आदमी ब्राह्मण होता है/आदमी क्षत्रिय होता है/आदमी वैश्य होता है/आदमी शूद्र होता है/आदमी अगड़ा होता है/आदमी पिछड़ा होता है/आदती कमजोर होता है/आदमी शक्तिशाली होता है/आदमी अभिजात्य होता है/आदमी अस्पृश्य होता है/आदमी!/आदमी नहीं होता है/बाकी सब कुछ होता है आदमी.

कवि समाज से प्रश्न करता है- कुछ सवाल मेरे सीने में/रह-रहकर/आग से भर जाते हैं/घुप्प अंधेरा मेरे हिस्से में क्यों?/मेरे हिस्से का सूरज तुम क्यों निगल जाते हो?/थोथे संस्कारों की भूल-भुलइयों में मुझे तुम क्यों/सदियों से इधर-उधर भटकाते हो?/हिंदू कहकर भी तुम मुझे आखिर क्यों/अपना नहीं पाते हो?

भारती जी की सभी कविताएं उन समस्त संस्कारों, रीति-रिवाजों, प्रतीकों, पाखंडों और आडंबरों पर प्रहार करती हैं, जो समाज के निचले तबकों पर दैत्य की तरह बैठी हैं, संपूर्ण अस्तित्व को दबाए हुए. समानता और सम्मान हर नागरिक का प्रकृति द्वारा दिया अधिकार है, जिसे कुछ लोगों ने कब्जा कर रखा है। जिसे कवि समझ गया है और सभी को जागरूक करने का उद्घोष करता है. अपने अधिकार को छीनने और लड़ने को भी मानसिक रूप से तैयार है.

भारती जी का यह कविता-संग्रह न केवल दलित साहित्य की अनुपम कृति है, बल्कि समाज के अन्य दबे-कुचले लोगों के हक की जोरदार आवाज है, जो अंतस से उठती लगती है.

समीक्षित कृति : लड़कर छीन लेंगे हम (कविता-संग्रह)

कवि : डॉ. सी. बी. भारती

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002

मूल्यः ृ350/- पृष्ठ 160

समीक्षक सम्पर्क- 282, राजीवनगर, नगरा, झाँसी- 284003 मोबाइल- 9455420727

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