रूसी कहानी भिखारी // अन्तोन चेख़फ़़ // प्राची - फरवरी 2018

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‘ओ साहिब जी, एक भूखे बेचारे पर दया कीजिए। तीन दिन का भूखा हूं। रात बिताने के लिए जेब में एक पैसा भी नहीं। पूरे आठ साल तक गांव के एक स्कूल में मास्टर रहा। बड़े लोगों की बदमाशी से नौकरी चली गई। जुल्म का शिकार बना हूं। अभी साल पूरा हुआ है बेरोजगार भटकते फिरते हुए।’

बैरिस्टर स्क्वार्त्सोफ ने भिखारी के मैले-कुचैले कोट, नशे से गंदली आंखें, गालों पर लगे हुए लाल धब्बे देखे। उन्हें लगा कि इस आदमी को कहीं पहले देखा है।

‘अभी मुझे कलूगा जिले में नौकरी मिलने ही वाली है.’ भिखारी आगे बोलता गया, ‘पर उधर जाने के लिए पैसे नहीं हैं। कृपा करके मदद कीजिए साहिब। भीख मांगना शर्म का काम है, पर क्या करूं, मजबूर हूं।’ स्क्वार्त्सोफ ने उसके रबर के जूतों पर नजर डाली जिन में से एक नाप में छोटा और एक बड़ा था तो उन्हें एकदम याद आया, ‘सुनिए, तीन दिन पहले मैं ने आपको सदोवाया सड़क पर देखा था,’ बैरिस्टर बोले, ‘आप ही थे न ? पर उस वक्त आपने मुझे बताया था आप स्कूल मास्टर नहीं, बल्कि छात्र हैं जिसे कॉलेज से निकाल दिया गया है। याद आया?’

‘न... नहीं... यह नहीं हो सकता,’ भिखारी घबराकर बुदबुदाया। ‘मैं गांव में मास्टर ही था। चाहें तो कागजात दिखा दूं।’

‘झूठ मत बोलो। तुमने मुझे बताया था कि तुम एक छात्र हो, कॉलेज छूटने की कहानी भी सुनाई थी मुझे। याद आया?’

स्क्वार्त्सोफ साहब का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। घृणा से मुंह बिचकाकर वह भिखारी से दो कदम पीछे हट गए। फिर क्रोध भरे स्वर में चिल्लाए, ‘कितने नीच हो तुम। बदमाश कहीं के। मैं तुम्हें पुलिस के हवाले कर दूंगा। भूखे हो, गरीब हो, यह ठीक है, पर इस बेशर्मी से झूठ क्यों बोलते हो?’

भिखारी ने दरवाजे के हत्थे पर अपना हाथ रखकर पकड़े गए चोर की तरह नजर दौडाई।

‘मैं... मैं झूठ नहीं बोलता।’ वह बुदबुदाया, ‘मैं कागजात...’

‘अरे कौन विश्वास करेगा,’ स्क्वार्त्सोफ साहिब का क्रोध बढ़ता गया। गांव के मास्टरों और गरीब विद्यार्थियों पर समाज जो सहानुभूति दिखाता आया है, उस से लाभ उठाना कितना गंदा, नीच और घिनौना काम है।

स्क्वार्त्सोफ साहब क्रोध से आग बबूला हो उठे और भिखारी को बुरी तरह कोसने लगे। अपनी इस निर्लज्ज

धोखेबाजी से उस आवारा आदमी ने उनके मन में घृणा पैदा कर दी थी और उन भावनाओं का अपमान किया था जो स्क्वार्त्सोफ साहब को अपने चरित्र में सब से मूल्यवान लगती थीं। उनकी उदारता, भावुकता, गरीबों पर दया, वह भीख जो वह खुले दिल से मांगनेवालों को दिया करते थे, सब कुछ अपवित्र करके मिट्टी में मिला दिया इस बदमाश ने। भिखारी भगवान् का नाम लेकर अपनी सफाई देता रहा, फिर चुप हो गया और उसने शर्म से सर झुका लिया। फिर दिल पर हाथ रखकर बोला, ‘साहिब, मैं सचमुच झूठ बोल रहा था। न मैं छात्र हूं न मास्टर। मैं एक संगीत मंडली में था। फिर शराब पीने लगा और अपनी नौकरी खो बैठा। अब क्या करूं? भगवान ही मेरा साक्षी है, बिना झूठ बोले काम नहीं चलता। जब सच बोलता हूं तो कोई भीख भी नहीं देता। सच को लेकर भूखों मरना होगा या सर्दी में बेघर जम जाना होगा, बस। कहते तो आप सही हैं, यह मैं भी समझता हूं, पर क्या करूं?’

‘करना क्या है? तुम पूछ रहे हो कि करना क्या है।’ स्क्वार्त्सोफ साहब उसके निकट आकर बोले, ‘काम करना चाहिए। काम करना चाहिए और क्या।’

‘काम करना चाहिए, यह तो मैं भी समझता हूं। नौकरी कहां मिलेगी?’

‘क्या बकवास है। जवान हो, ताकतवर हो, चाहो तो नौकरी क्यों नहीं मिलेगी? पर तुम तो सुस्त हो, निकम्मे हो, शराबी हो! तुम्हारे मुंह से वोदका की बदबू आ रही है जैसे किसी शराब की दूकान से आती है। झूठ, शराब और आरामतलबी तुम्हारे खून की बूंद-बूंद पहुंच चुके हैं। भीख मांगने और झूठ बोलने के अलावा तुम और कुछ जानते ही नहीं। कभी नौकरी कर लेने का कष्ट उठा भी लेंगे जनाब तो बस किसी दफ्तर में या संगीत मंडली में या किसी और जगह जहां मक्खी मारते-मारते पैसे कमा लें। मेहनत-मजदूरी क्यों नहीं करते? भंगी या कुली क्यों नहीं बन जाते? खुद को बहुत ऊंचा समझते हो।’

‘कैसी बात कर रहे हैं आप?’ भिखारी बोला। मुंह पर एक तिक्त मुस्कान उभरी। मेहनत-मजदूरी कहां से मिलेगी? किसी दुकान में नौकरी नहीं कर सकता, क्योंकि व्यापार बचपन से ही सीखा जाता है। भंगी भी कैसे बनूं, कुलीन घर का हूं। फैक्टरी में भी काम करने के लिए कोई पेशा तो आना चाहिए, मैं तो कुछ नहीं जानता।’

‘बकवास कर रहे हो! कोई न कोई कारण ढूंढ़ ही लोगे। क्यों जनाब, लकडी फाड़ोगे?’

‘मैंने कब इनकार किया है। पर आज लकड़ी फाड़ने वाले मजदूर भी तो बेकार बैठे हैं।’

‘सभी निकम्मे लोगों का यही गाना है। मैं मजदूरी दिलवाता तो मुंह फेरकर भागोगे। क्या मेरे घर में लकड़ी फाड़ोगे?’

‘आप चाहें तो क्यों नहीं करूंगा।’

‘वाह रे। देखें तो सही!’

स्क्वार्त्सोफ साहब ने जल्दी से अपनी रसोई से अपनी बावरचिन को बुलाया और नाराजगी से बोले, ‘ओल्गा, इन साहब को जलाऊ लकडी की कोठरी में ले जाओ। इनको लकडी फाड़ने के लिए दे दो।’

भिखारी अनमना-सा कंधे हिलाकर बावरचिन के पीछे-पीछे चल पड़ा। उसके चाल-चलन से यह साफ दिखाई दे रहा था कि वह भूख और बेकारी के कारण नहीं, बस अपने स्वाभिमान की वजह से ही यह काम करने के लिए मान गया है। यह भी लग रहा था कि शराब पीते-पीते वह कमजोर और अस्वस्थ हो चुका है। काम करने की कोई भी इच्छा नहीं है उस की।

स्क्वार्त्सोफ साहब अपने डाइनिंग-रूम पहुंचे जहां से आंगन और कोठरी आसानी से दिखाई दे रहे थे। खिड़की के पास खड़े होकर उन्होंने देखा कि बावरचिन भिखारी को पीछे के दरवाजे से आंगन में ले आई है। गंदी-मैली बर्फ को रौंदते हुए वे दोनों कोठरी की ओर बढ़े। भिखारी को क्रोध भरी आंखों से देखती ओल्गा ने कोठरी के कपाट खोल दिए और फिर धड़ाम से दीवार से भिड़ा दिए।

‘लगता है हमने ओल्गा को कॉफी नहीं पीने दी,’ स्क्वार्त्सोफ साहब ने सोचा। ‘कितनी जहरीली औरत है।’ फिर उन्होंने देखा कि झूठा मास्टर लकड़ी के एक मोटे कुंदे पर बैठ गया और अपने लाल गालों को अपनी मुट्ठियों में दबोचकर किसी सोच-विचार में डूब गया। ओल्गा ने उसके पैरों के पास कुल्हाड़ी फेंककर नफरत से थूक दिया और गालियां बकने लगी। भिखारी ने डरते-डरते लकड़ी का एक कुंदा अपनी ओर खींचा और उसे अपने पैरों के बीच रखकर कुल्हाड़ी का एक कमजोर-सा वार किया। कुंदा गिर गया। भिखारी ने उसे दुबारा थामकर और सर्दी से जमे हुए अपने हाथों पर फूंक मारकर कुल्हाड़ी इस तरह चलाई जैसे वह डर रहा हो कि कहीं अपने घुटने या पैरों की ऊंगलियों पर ही प्रहार न हो जाए। लकड़ी का कुंदा फिर गिर गया।

स्क्वार्त्सोफ साहब का क्रोध टल चुका था। उन्हें खुद पर कुछ-कुछ शर्म आने लगी कि इस निकम्मे, शराबी और शायद बीमार आदमी से सर्दी में भारी मेहनत-मजदूरी किसलिए करवाई।

‘चलो, कोई बात नहीं’, अपने लिखने-पढ़ने के कमरे में जाते समय उन्होंने सोचा, उसकी भलाई ही होगी। एक घंटे बाद ओल्गा ने अपने मालिक को सूचित किया कि काम पूरा हो गया है।

‘लो, उसे पचास कोपेक दे दो’, स्क्वार्त्सोफ साहब ने कहा, ‘चाहो तो हर पहली तारीख को लकड़ी फाड़ने आ जाया करो। काम मिल जाएगा।’

अगले महीने की पहली तारीख को भिखारी फिर आ गया। शराब के नशे में लड़खड़ाने पर भी उसने पचास कोपेक कमा ही लिए। उस दिन से वह जब-तब आया ही करता था। हर बार कोई न कोई काम कर ही लेता। कभी आंगन से बर्फ हटाता था, कभी कोठरी साफ करता था, कभी कालीनों और मेट्रेसों से धूल निकालता था। हर बार वह बीस-चालीस कोपेक कमाता था और एक बार स्क्वार्त्सोफ साहब ने उसे अपने पुराने पतलून भी भिजवाए थे।

नए फ्लैट में जाते समय स्क्वार्त्सोफ साहब ने उसे फर्नीचर बांधने और उठाकर ले जाने में कुलियों की मदद करने को कहा। उस दिन भिखारी संजीदा, उदास और चुप्पा था। फर्नीचर पर हाथ बहुत कम रखता था, सर झुकाए इधर-उधर मंडरा रहा था। काम करने का बहाना भी नहीं कर रहा था, बस सर्दी से सिकुड़ता रहा था और जब दूसरे कुली उसकी सुस्ती, कमजोरी और फटे-पुराने, ‘साहब किस्म के’ ओवरकोट का मजाक उड़ाते थे तो शरमाता रहा था। काम पूरा हुआ तो स्क्वार्त्सोफ साहब ने उसे अपने पास बुला भेजा।

‘लगता है, तुम पर मेरी बातों का कुछ असर पड़ा है’, भिखारी के हाथ में एक रूबल पकड़ाते हुए उन्होंने कहा, ‘यह लो अपनी कमाई। देखता हूं तुमने पीना छोड़ दिया है और मेहनत के लिए तैयार हो। हां, नाम क्या है तुम्हारा?’

‘जी, लुश्कोफ।’

‘तो, लुश्कोफ अब मैं तुम्हें कोई दूसरा और साफ-सुथरा काम दिलवा सकता हूं। पढ़ना-लिखना जानते हो?’

‘जी हां।’

‘तो यह चिट्ठी लेकर कल मेरे एक दोस्त के यहां चले जाना। कागजातों की नकल करने की नौकरी है। सच्चे मन से काम करना, शराब मत पीना, मेरा कहना मत भूलना। जाओ।’

एक पापी को सही रास्ता दिखाकर स्क्वार्त्सोफ साहब बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने लुश्कोफ के कंधे पर एक प्यार की थपकी दी और उसे छोड़ने बाहर दरवाजे तक आए फिर उससे हाथ भी मिलाया। लुश्कोफ वह चिट्ठी लेकर चला गया और उस दिन के बाद फिर कभी नहीं आया।

दो साल बीत गए। एक दिन थिएटर की टिकट-खिड़की के पास स्क्वार्त्सोफ साहब को छोटे कद का एक आदमी दिखाई दिया। वह भेड़ के चमड़े की गरदनी वाला ओवरकोट और एक पुरानी-सी पोस्तीन की टोपी पहने हुए था। उसने डरते-डरते सब से सस्ता टिकट मांगा और पांच-पांच कोपेक के सिक्के दे दिए।

‘अरे, लुश्कोफ, तुम।’ स्क्वार्त्सोफ ने अपने उस मजदूर को पहचान लिया, ‘कैसे हो? क्या करते हो? जिंदगी ठीक-ठाक है न?’

‘जी हां, ठीक-ठाक है, साहिब जी। अब मैं उसी नोटरी के यहां काम करता हूं, पैंतीस रूबल कमाता हूं।’

‘कृपा है भगवान की। वाह, भाई, वाह। बड़ी खुशी की बात है! बहुत प्रसन्न हूं। सच पूछो तो तुम मेरे शिष्य जैसे हो न। मैंने तुम्हें एक सच्चा रास्ता दिखाया था। याद है, कितना कोसा था तुमको? कान गर्म हुए होंगे मेरी बातें सुनकर। धन्य हो, भाई, कि मेरे वचनों को तुम भूले नहीं।’

‘धन्य हैं आप भी,’ लुश्कोफ बोला, ‘आपके पास न आता तो अब तक खुद को मास्टर या छात्र बतलाकर धोखेबाजी करता फिरता। आपने मुझे खाई से निकालकर डूबने से बचाया है।’

‘बहुत, बहुत खुशी की बात है।’

‘आपने बहुत अच्छा कहा भी और किया भी। मैं आपका आभारी हूं और आपकी बावरचिन का भी, भगवान उस दयालु उदार औरत की भलाई करे। आपने उस समय बहुत सही और अच्छी बातें की थी, मैं उम्र भर आपका आभारी रहूंगा। पर सच पूछिए तो आपकी बावरचिन ओल्गा ही ने मुझे बचाया है।’

‘वह कैसे?’

‘बात ऐसी है साहिब जी। जब-जब मैं लकड़ी फाड़ने आया करता था वह मुझे कोसती रहती, ‘अरे शराबी। तुझ पर जरूर कोई शाप लग गया है। मर क्यों नहीं जाता।’ फिर मेरे सामने उदास बैठ जाती और मेरा मुंह देखते-देखते रो पड़ती, ‘हाय बेचारा’ इस लोक में कोई भी खुशी नहीं देख पाया और परलोक में भी नरक की आग में ही जाएगा। हाय बेचारा, दुखियारा।’ वह बस इसी ढंग की बातें किया करती थी। उसने अपना कितना खून जलाया मेरे कारण, कितने आंसू बहाए, मैं आपको बता नहीं सकता। पर सब से बड़ी बात यह हुई कि वह ही मेरा सारा काम पूरा करती रहती थी। सच कहता हूं साहिब, आपके यहां मैंने एक भी लकड़ी नहीं फाड़ी, सब कुछ वही करती थी। उसने मुझे कैसे बचाया, उसको देखकर मैंने पीना क्यों छोड़ दिया, क्यों बदल गया मैं, आपको कैसे समझाऊं। इतना ही जानता हूं कि उसके वचनों और उदारता की वजह से मैं सुधर गया और मैं यह कभी नहीं भूलूंगा। हां साहिब जी, अब जाना है, नाटक शुरू होने की घंटी बज रही है।

लुश्कोफ सर झुकाकर अपनी सीट की ओर बढ़ गया।


मूल रूसी से अनुवाद- अनिल जनविजय

अनुवादक के संबंध में

नाम : अनिल जनविजय

जन्म : 28 जुलाई 1957, बरेली (उत्तर प्रदेश)

शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.कॉम ।

मास्को स्थित गोर्की साहित्य संस्थान से सृजनात्मक साहित्य विषय में एम.ए.

अध्यापन : मास्को विश्वविद्यालय (रूस) में ‘हिन्दी साहित्य’ और ‘अनुवाद’ का 2001 से आज तक अध्यापन।

प्रसारण : मास्को रेडियो की साढ़े तीन दशकों तक हिन्दी में प्रसारण।

प्रकाशनः

कविता संग्रहः ‘कविता नहीं है यह’ (1982),

‘माँ, बापू कब आएंगे’ (1990),

‘राम जी भला करें’ (2004),

‘दिन है भीषण गर्मी का’ (2016),

रूसी लेखकों की प्रेम कहानी (2016)

चेखफ की दुनिया (2016)

दुनिया में हिन्दी (2015)

रूसी काव्य-संग्रहों का अनुवाद व प्रकाशनः

‘माँ की मीठी आवाज’ (अनातोली पारपरा),

‘तेरे कदमों का संगीत’ (ओसिप मंदेलश्ताम),

‘सूखे होंठों की प्यास’ (ओसिप मंदेलङताम),

‘धूप खिली थी और रिमझिम वर्षा’ (येव्गेनी येव्तुङोंको),

‘यह आवाज कभी सुनी क्या तुमने’ (अलेक्जेंडर पुश्किन),

‘चमकदार आसमानी आभा’ (इवान बूनिन),

जीमा जंकशन और अन्य कविताएँ (2016),

तेरे होठों की प्यास (2016)।

विशेष उल्लेखनीयः

‘द्रुज्या इन्दी’ या हिन्दी में ‘भारत मित्र’ (पंजीकृत) संस्था की स्थापना 1993 में की, जिसके माध्यम से प्रतिवर्ष भारतीय साहित्यकारों को अलेक्जेंडर पूश्किन एवार्ड दिया जाता है तथा भारतीय और रूसी साहित्यकारों के बीच संवाद स्थापित किया जाता है।

सम्प्रति : ‘रूस-भारत संवाद’ नामक रूस की एक हिन्दी वेबसाइट के सम्पादक।

आवासीय पताः

155 Building No 8/1
Flat—155, Dom— 8/1, Ulitsa Fruktovaya, Moscow— 117556, Russia

Email:aniljanvijay@gmail-com

चेखफ की कहानियाँ

चेखफ का कहना था- मानव तभी बेहतर हो सकता है, जब उसे आईना दिखाया जाए। जब मनुष्य के सामने उसकी नैतिकता और मन का दर्पण खोलकर रख दिया जाए। जब मानव आत्मा की गन्दगी, उसके अहम् और उसके स्वभाव की अश्लीलता को मनुष्य के सामने स्पष्ट कर दिया जाए तो वह खुद को

सुधारने की कोशिश करेगा। अन्तोन चेखफ ने अपनी कहानियों में मानव स्वभाव की इसी अश्लीलता को साफ-साफ प्रस्तुत किया है।

आम तौर पर चेखफ अपनी कहानियों में किसी एक व्यक्ति को ही नायक बनाकर उसकी मनः स्थिति का विस्तार से वर्णन करते हैं। वे यह दिखाते हैं कि मानव समाज कैसा चितकबरा है और समाज के अनुकूल ही खुद को ढालने के लिए व्यक्ति कैसे गिरगिट की तरह बार-बार रंग बदलता है। चेखफ की कहानियों के नायक-नायिकाएँ अलग-अलग सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधि हैं। किसी कहानी में कोई भिखारी नायक है तो किसी कहानी में कोई छात्र, व्यापारी, क्लर्क, अध्यापक या जमींदार। चेखफ की कहानियों के पात्र धन और पैसे के प्रति भी अलग-अलग रवैया अपनाते हैं। पैसा किस तरह आदमी को बदल देता है, पैसा किस तरह आदमी की नैतिकता और आत्मा पर प्रहार करता है, कैसे कुछ लोग कंजूस और हद दरजे के लालची होते हैं और कुछ लोग पैसे के प्रति पूरी तरह से निरपेक्ष और तटस्थ रहते हैं, कैसे पैसा मानव-स्वभाव की कमजोरी बन जाता है, इसका भी चेखफ ने अपनी कहानियों में विस्तार से वर्णन किया है।

चेखफ पेशे से चिकित्सक थे। वे सारी जिन्दगी डॉक्टरी करते रहे, इसलिए उनकी कहानियों में डॉक्टरों के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं। कुछ चिकित्सक नैतिक रूप से अपनी जिम्मेदारी का पूर्ण निर्वाह करते हैं तो कुछ चिकित्सकों का इस बुरी तरह से पतन हो जाता है कि वे अपने सहयोगियों का भी शोषण करने से बाज नहीं आते। चेखफ अपनी इन कहानियों में इस बात पर बार-बार जोर देते हैं कि मेहनत की कमाई से ही आदमी खुश रह सकता है। दूसरों के शोषण, चोरी और रिश्वत की कमाई से आदमी की बरकत नहीं होती।

चेखफ की कहानियों में नाटकीयता तब पैदा होती है, जब व्यक्ति अपने जीवन के ध्येय और आदर्श को समझने में पूरी तरह से असफल रहता है। मनुष्य की अपनी कोई दृष्टि, कोई समझ नहीं होती। वह इस दुनिया में अपनी उपस्थिति का कोई कारण, कोई उद्देश्य नहीं समझ पाता और उसके लिए जीवन निरुद्देश्य होता चला जाता है। मनुष्य के इस निराशाजनक जीवन को चेखफ ने बड़ी बारीकी से अपनी कहानियों में उतारा है और उसे एक दिशा दिखाने की कोशिश की है। हमें आशा है कि चेखफ की ये कहानियाँ आपको पसन्द आएँगी।

-अनिल जनविजय

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