श्रद्धांजलि // साहित्य और चिन्तन के युग पुरुष दूधनाथ सिंह // उमाशंकर सिंह परमार // प्राची - फरवरी 2018

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दूधनाथ सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सोबंथा गाँव में 17 अक्टूबर, 1936 को हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम. ए. करने के पश्चात् कुछ दिनों बेरोजगारी का दंश झेलते रहे. बाद में कोलकाता के एक कॉलेज में अध्यापन करने के पश्चात् इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापन करने लगे। सेवानिवृत्ति के बाद अब पूरी तरह से लेखन के लिए समर्पित हो गये थे।

दूधनाथ सिंह भले ही साठोत्तरी पीढ़ी के कथाकार आलोचक व लेखक थे, परन्तु उनके रचनात्मक सम्बन्ध सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रनंदन पंत और महादेवी वर्मा से रहे। वह इन कवियों के अति प्रिय रहे। पन्त जी जब इलाहाबाद आते थे,

दूधनाथ के सानिध्य में रहते थे। इन सम्बन्धों का प्रभाव उनके आलोचना कर्म पर पडा। दूधनाथ सिंह ने सुमित्रानन्दन पन्त, महादेवी वर्मा और निराला पर आलोचनात्मक किताबें लिखीं। इन आलोचनात्मक कृतियों में भी भाषा और शिल्प के स्तर पर काफी तोड़ फोड़ है। न तो इन पुस्तकों को हिन्दी की आलोचनात्मक शब्दावलियों से बोझिल किया गया है और न ही भाषागत शुष्कता है। आलोचना में संस्मरण व औपन्यासिक आनन्द की सृष्टि दूधनाथ सिंह की बडी विशेषता रही।

दूधनाथ सिंह एक ऐसा व्यक्तित्व है जिसने लगभग हर एक विधा पर लिखा है। जिस विधा में लिखा वही रचना उस विधा में कालजयी हो गयी। उनकी आलोचनात्मक कृति ‘निराला आत्महन्ता आस्था’ प्रगतिशील आलोचना की सर्वोत्तम कृतियों में शुमार है तो उनकी द्वितीय आलोचनात्मक कृति ‘मुक्तिबोध : साहित्य की नयी प्रवृत्तियाँ’ ने निराला आत्महन्ता आस्था पढ़ चुके पाठकों का ध्यान बरबस अपनी ओर आकर्षित किया है। मुक्तिबोध की यह आलोचना उच्च अध्ययन संस्थान शिमला के सहयोग से उन्होंने तैयार की है। इसके अतिरिक्त महादेवी वर्मा पर उनकी कृति ‘महादेवी वर्मा’ के अलावा सुमित्रानन्दन पन्त की कविताओं पर आलोचना जो तारापथ की भूमिका के रूप से प्रकाशित है, किसी कालजयी आलोचनात्मक कृति से कमतर नहीं है।

दूधनाथ सिंह मौलिक रूप में कथाकार हैं लेकिन आलोचना पर उनका प्रदेय मौलिक एवं ऐतिहासिक है। विशेषकर निराला की ‘आत्महन्ता आस्था’ की तुलना व महत्ता रामविलास शर्मा की साहित्य साधना से स्थापित की जाती है। मुक्तिबोध पर उनका आलोचनात्मक कृत्य मुक्तिबोध के सम्बन्ध में सर्वथा नयी दृष्टि और नये विजन का संकेत करता है। मुक्तिबोध पर लिखी गयी अब तक समीक्षाओं व दृष्टि को अधूरा करती हुई उनकी यह किताब एक नये पाठ की प्रस्तावना प्रस्तुत करती है। तारापथ की भूमिका से ही दूधनाथ सिंह के समीक्षा औजारों का स्थाई पता चल जाता है. वो किसी भी कवि की कविताओं पर पाठक को ले जाने के पूर्व आलोचना मापदंडों में जो तोड़फोड़ करते हैं वह सबसे महत्वपूर्ण औजार होता है. वैसे तोड़फोड़ उनकी रचनात्मक शैली है. विधाओं की सीमा का अतिक्रमण उनकी नयी स्थापनाओं का आधार है चाहे कथा हो, कविता हो, नाटक या आलोचना, जिस भी विधा पर उनकी कलम चली, वहीं पर उन्होंने अतिक्रमण किया है। विधागत बन्धनों से मुक्ति के कारण ही दूधनाथ की व्यापक समीक्षाएं नहीं हो सकी हैं, क्योंकि परम्परा से हिन्दी आलोचना ने अपना एक रीतिशास्त्र गढ़ लिया है. किसी भी विधा का एक समीक्षात्मक खाका होता है. उस खाके की सीमा रेखा का अतिलंघन करने का साहस किसी लेखक ने नहीं दिखाया, ना ही किसी आलोचक ने खाके को भंग कर कृतियों के भीतर पहुँचने की जहमत उठाई है।

दूधनाथ सिंह में मूल्याकन की यही समस्या है. जब तक आलोचकीय खाके को नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक उनके प्रदेयों का पुनर्पाठ बेहद कठिन है। तारापथ की भूमिका में दूधनाथ सिंह कवि के वैचारिक सरोकारों व अपनी वैचारिक अवस्थितियों को नहीं थोपते, न ही वैचारिक अन्तर्विरोधों को अधिक तरजीह देते हैं. वो सीधे पाठक से बात करते हैं और पाठक से संवाद करते करते कविताओं के मर्म तक जाकर पाठक को कवि की अन्दरूनी अवस्थितियों से रूबरू करा देते हैं। एक आलोचक किसी कवि से पाठक को कैसे जोड़ता है- वह पाठक से कवि का कैसे सम्वाद कराता है- वह पाठक और लेखक के बीच उपस्थित रहकर भी कैसे अनुपस्थित होता है- तारापथ की भूमिका में देखा जा सकता है। यह उनकी अपनी शैली है जो आलोचनात्मक शुष्कता से अलग हटकर सरसता, संवादमयता, से युक्त हो जाती है। ये गुण संस्मरण के हैं जिसमें लेखक बिम्ब सृजित करता है और बिम्बों का संवेदन पाठक को लेखक से जोड़ देता है। दूधनाथ सिंह आलोचना में बिम्ब तैयार कर देते हैं. यह एक प्रकार का अतिक्रमण ही कहा जाएगा. इस अतिक्रमण को मैं विधागत तोड़फोड़ कहता हूँ। जो दूधनाथ की हर कृति में विद्यमान है। साहित्य की ऐसी कोई विधा नहीं है, जिसमें इनका हस्तक्षेप न रहा हो. आखिरी कलाम, निष्कासन, नमो अन्धकारम् जैसे कालजयी उपन्यासों के अलावा लगभग दर्जन भर कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। आलोचना के क्षेत्र में इनका काम अविस्मरणीय है. निराला, मुक्तिबोध, सुमित्रानन्दन पन्त, महादेवी वर्मा पर इनकी लिखी किताबें और आलेख आलोचना का नया स्थापत्य तय करती हैं. यमगाथा नाटक अपने समय का सर्वाधिक चर्चित नाटक रहा और आज भी इसके विधान की साम्यता का नाटक हिन्दी में नहीं है। ‘लौट आ ओ धार’ संस्मरण है तो अब तक इनके कई कविता संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं।

दूधनाथ सिंह का लेखन परिक्षेत्र व्यापक और दृष्टि सम्पन्न तोड़फोड़ व विधागत अतिक्रमण का बेहतरीन उदाहरण है। कोई भी विधा परम्परागत फार्मेट में नहीं है. सबकी सब विधानगत विधियों का अतिलंघन करती हैं. यही अतिलंघन इनकी रचनाओं को सामयिक और ज्वलन्त बनाते हुए युगबोध का अभिलेख बना देता है। कवि के रूप में दूधनाथ सिंह बडे कवियों मे शुमार किए जाने योग्य हैं, मगर इनके कथाकार व आलोचक व्यक्तित्व ने कविता पक्ष को दबा दिया. फलतः कविताओं पर उतनी बात नहीं हो सकी, जितनी होनी चाहिए. एक बड़ा कथाकार जब कविता लिखता है तो अमूमन कहा जाता है कि यह उसका नया प्रयोग है। कथाकार के पास कथाबिम्ब होते हैं. अपने मन्तव्यों को बिम्ब के माध्यम से व्यंजित करने की शैली होती है। एक बना बनाया सोचा हुआ फार्मेट होता है और कुछ चरित्र होते हैं जिसके सहारे वो अपने आप की अभिव्यक्ति कर देता है। इनमें से कई उपागम एक श्रेष्ठ कविता के भी उपागम हैं। कविता में कथाबिम्ब नहीं होते, मगर यथार्थ को उद्घाटित करने की क्षमता से पूर्ण शब्द बिम्ब अवश्य होते हैं। कविता में चरित्र का होना कवि को महत्वपूर्ण बनाता है। जिस तरह कहानी में लेखक अपने आस पास के अपने लोगों को या खुद को चरित्र के रूप में प्रस्तुत करता है, वैसे ही कविता में भी वह अपने आस पास के देखे भाले लोक को प्रस्तुत करता है.

दूधनाथ सिंह अप्रितम व्यक्तित्व के धनी थे। बाँदा अक्सर आते जाते थे. पहले बाबू जी केदारनाथ अग्रवाल के घर उनकी बैठक होती थी. उनके न रहने के बाद वह बाँदा के ही सुधीर सिंह के घर आते जाते थे. सुधीर सिंह दूधनाथ जी के साथ हमेशा रहते थे, उनकी देखभाल और उन्हें कहीं भी ले जाने आने का काम सुधीर सिंह ही करते रहे। दूधनाथ जी केवल प्रोफेसर नहीं थे, वह गुरू थे. अपने आचरण व अपनी प्रतिबद्धता के चलते बहुत से युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित किया. आज समूचे देश में उनको गुरू मानने वालों की बडी संख्या है।

दूधनाथ सिंह जनवादी लेखक संघ से जुडे रहे. वह जलेस के निष्ठावान विचारक रहे. अस्तु उनका रचनात्मक दायरा भारतीय सांस्कृतिक एवं सामाजिक संचेतना के लिहाज से विस्तृत रहा। उनकी प्रतिबद्धता और पक्षधरता ही है. जब बाबरी मस्जिद के ध्वन्स से देश दो वगरें में विभाजित था, तब उन्होंने साम्प्रदायिकता के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का अब तक का सबसे सटीक विवरण कथात्मक रूप में प्रस्तुत किया। उनकी कृति आखिरी कलाम आजाद हिन्दुस्तान की साम्प्रदायिक राजनीति का श्वेत पत्र है। उनके लगभग सभी उपन्यास किसी न किसी सामाजिक संचेतना और सरोकारों को लेकर देश और लोक की सच्चाइयों का तार्किक प्रस्तुतीकरण करते हैं। जलेस में काफी वषरें तक वह वरिष्ठ उपाध्यक्ष रहे। वर्ष 2013 में फरवरी माह में इलाहाबाद जलेस सम्मेलन जिसका नाम ‘साझा सांस्कृतिक संगम’ रखा गया था. इस सम्मेलन में वह जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष चुने गये। तब से अब तक वही अध्यक्ष रहे। इस सम्मेलन में उनका अध्यक्षीय भाषण आज भी साहित्कारों द्वारा याद किया जाता है। उन्होंने कहा था कि ‘दक्षिणपंथ कभी बड़ा साहित्यकार और विचारक नहीं दे सका. क्या कारण है कि सभी लेखक स्वाभाविक रूप से वामपंथी होते हैं। वामपंथ हर जगह से खत्म हो सकता है। वह राजनीति से खत्म हो जाएगा, वह विश्व से खत्म हो जाएगा; लेकिन साहित्य से कभी समाप्त नहीं हो सकता है. यदि लेखक होना है तो पक्षधरता बेहद जरूरी है। पक्षधरता और प्रतिबद्धता ही आपके लेखक होने या न होने का मापदण्ड है। आप यदि लेखक हैं तो जमीन से जुडना होगा। जमीन से विषय चुनना होगा और जनता उस विषय पर क्या सोचती है आपको उसके मनोवेगों के अनुसार लिखना होगा. इसी बात को मुक्तिबोध ने कहा था, ‘कोशिश करो/ कोशिश करो/जीने की...जमीन में गड़कर भी,’ जमीन में गड़ने का मतलब है- जनता का होकर रहना, जनता के लिए, जनता के नजरिए से लिखना.’

भाषण के इस अंश से उनकी प्रतिबद्धता और पक्षधरता के साथ साहित्यिक सरोकारों की भी पुष्टि होती है। यही कारण है साठ के दशक में उन्होंने मध्यमवर्गीय चेतना से संचालित ‘नई कहानी’ आन्दोलन का काशीनाथ सिंह, ज्ञानरंजन, रवीन्द्र कालिया के साथ मिलकर विरोध किया।

वह एक लेखक के साथ बेहतरीन पाठक भी थे. जब किसी का कोई आलेख या पुस्तक पढते थे तो नया लेखक हो या पुराना बडी सरलता से कमजोरियों और अच्छाइयों को बताते थे। रचना की खामियाँ व व्यक्ति के भीतर छिपे व्यक्तित्व को पढ़ना और कहना आज के दौर में दुर्लभ होता जा रहा है. अब आलोचना या तो कीर्तन बन गयी है या फिर काम चलाऊ बेमतलब की कसरत हो गयी है। जिस आलोचना से लेखक और पाठक दोनों फायदा न उठा सकें, उस आलोचना की महत्ता नहीं होती है, लेकिन इस काम का दूसरा पक्ष भी है. आज का लेखक आत्ममुग्ध हो चुका है. वह अपनी रचना की खामियाँ स्वीकार नहीं कर सकता है. वह सुन भी नहीं सकता है. बड़े बड़े सम्बन्ध खराब हो जाते हैं। आलोचक यदि ईमानदार है, खामियाँ कहने का साहस उसके पास है तो उस आलोचक के शत्रु भी बढ़ जाते हैं। दूधनाथ सिंह इस जोखिम को उठाते थे. वह किसी भी कृति पर बेबाक राय देते थे. यही कारण है कि हिन्दी के इस दिग्गज कथाकार पर आज तक एक भी आलोचनात्मक किताब प्रकाशित नहीं हुई है। यह स्थिति उनकी बेबाकी के कारण है। दूधनाथ सिंह ने आखिरी कलाम, लौट आ ओ धार, निराला आत्महंता आस्था, सपाट चेहरे वाला आदमी, यमगाथा, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे जैसी कालजयी कृतियों की रचना की। उनकी गिनती हिन्दी के चोटी के लेखकों और चिंतकों में होती है। वहीं उनके कविता संग्रह भी प्रकाशित हैं। इनके एक और भी आदमी है, और अगली शताब्दी के नाम, और युवा खुशबू हैं. इसके अलावा उन्होंने एक लंबी कविता ‘सुरंग से लौटते हुए’ भी लिखी है.

दूधनाथ सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापक रह चुके हैं। दूधनाथ सिंह उन कथाकारों में शामिल हैं जिन्होंने नई कहानी आंदोलन को चुनौती दी और साठोत्तरी कहानी आंदोलन का सूत्रपात किया। हिन्दी के चार यार के रूप में ख्यात ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह और रवीन्द्र कालिया ने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में हिन्दी लेखन को नई धार दी। लेखकों की एक पीढ़ी तैयार की और सांगठनिक मजबूती प्रदान की। चार यार में अब सिर्फ काशीनाथ सिंह और ज्ञानरंजन ही बचे हैं। भारतेंदु सम्मान, शरद जोशी स्मृति सम्मान, कथाक्रम सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, भारत भारती सम्मान आदि प्राप्त कर चुके हैं.

दूधनाथ सिंह का 11/12 जनवरी, 2018 की मध्य रात्रि करीब 12 बजे निधन हो गया। कई दिनों से वह इलाहाबाद के फीनिक्स अस्पताल में भर्ती थे। कैंसर से पीड़ित दूधनाथ सिंह को दिल का दौरा पड़ा था। उन्हें वेंटीलेटर पर शिफ्ट कर दिया गया था। वह 81 वर्ष के थे। दूधनाथ सिंह पिछले एक वर्ष से कैंसर से पीड़ित थे। उनके परिवार में दो बेटे एवं एक बेटी है। दो वर्ष पूर्व उनकी लेखिका पत्नी का निधन हो गया था। दूधनाथ सिंह के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। हिन्दी कहानी के इस युग पुरुष के निधन से साहित्य ने एक गम्भीर चिन्तक और लेखक खो दिया है.

प्राची और उसकी टीम उनके निधन पर शोक संवेदना व्यक्त करती है। आशा करती है कि उनका परिवार और उनके पाठक इस क्षति से जल्द उबरेंगे।

सम्पर्कः बबेरू, जिला बांदा (उ.प्र.)

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