श्रद्धांजलि // दूधनाथ सिंह का जाना // विजय केसरी // प्राची - फरवरी 2018

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(अमर कथा शिल्पी दूधनाथ सिंह के महाप्रयाण पर श्रद्धांजलि)

लाहाबाद एक साहित्यिक शहर है। आजादी के पूर्व एवं पश्चात् यह हिन्दी साहित्य का केन्द्र था। यहीं छायावाद की त्रिवेणी-निराला, पंत और महादेवी बहती थी। दूधनाथ सिंह उस दौर में अपनी साहित्यिक आँखें खोलने वाले रचनाकार थे। वे इस साहित्यिक त्रिवेणी से गहराई से जुड़े थे एवं बाद की अनेक साहित्यिक पीढियों के सहचर हुए। वे हलचल भरे साहित्यिक दौर के मूर्तिमान स्वरूप थे। वे इलाहाबाद के साहित्यिक अतीत की अंतिम कड़ी थे। उनके जाने के बाद इलाहाबाद का जीवंत अंतिम व्यक्तित्व का चला जाना है.

आजादी के ठीक ग्यारह वर्ष पूर्व 17 अक्टूबर 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिला के सोबंधा ग्राम में उनका जन्म हुआ था। वे बचपन से ही संघर्षशील और कर्मठ स्वभाव के थे। ग्राम सोबंधा से बलिया, फिर इलाहाबाद के शिक्षा अध्ययन के सफर में कदम पर कदम पर रुकावटें थीं, किन्तु उन तमाम अवरोधों को मुस्कुराते हुए पार करते चले जा रहे थे।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. की पढ़ाई एक झुग्गी में रहकर पूरी की थी। खुद भोजन बनाते थे और पढ़ाई के सारे खर्च का इंतजाम भी स्वयं उठाया करते थे। आज शिक्षा के क्षेत्र में काफी विकास हो चुका है। ज्ञान प्राप्ति के कई विकल्प विकसित हो चुके हैं। दूधनाथ सिंह के जमाने में विश्वविद्यालय का लेक्चर और एक मात्र पुस्तक ही पढ़ाई के साधन हुआ करते थे। और कोई विकल्प नहीं था। वे कभी भी विश्वविद्यालय का लेक्चर मिस नहीं करते थे। अपने प्राध्यापक के लेक्चर को बड़े ही ध्यान से सुनते थे। उनके सहपाठी उनके ऊपर गर्व किया करते थे। उनके नोट्स को पढ़ कर उनके कई सहपाठी पढ़ाई पूरी किया करते थे। उनकी स्मरण शक्ति बहुत ही विलक्षण थी। उनसे पूछे गये सवालों, संदर्भों और उदाहरणों को तुरन्त चुटकी में बता दिया करते थे।

दूधनाथ सिंह के मन-मस्तिष्क में यह बात बचपन से ही एक गांठ की तरह बंधी हुई थी कि उन्हें हिन्दी साहित्य की सेवा करनी थी। उनके जीवन की मंजिल क्या होगी? इस मंजिल तक पहुँचने के लिए उन्हें किस तरह का ज्ञान अर्जित करना है? विश्वविद्यालय की पढ़ाई के समय वे हिन्दी साहित्य के तमाम बड़े रचनाकारों की कृतियों से अवगत होने के साथ अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में क्या कुछ लिखा जा रहा था, भलीभाँति परिचित हो चुके थे।

दूधनाथ ने अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लिया था. वे चाहते तो किसी भी नौकरी में जा सकते थे। उस जमाने में एम.ए. प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होना बड़ी बात थी। आज की तरह नौकरियों के लिए लम्बी लाईन नहीं थी। वे अपनी प्रतिभा के बल पर इलाहाबाद में अध्यापक की नौकरी तुरन्त पा सकते थे। किन्तु वे ऐसा न कर अपनी लेखकीय प्रतिभा को और धारदार बनाने के लिए कलकत्ता चले गये थे। उस समय कलकत्ता में भी हिन्दी साहित्य की बड़ी गहमागहमी थी। देश के कई बड़े रचनाकार कलकत्ता में सेटल होकर रचना कर रहे थे। वहाँ पर उन्होंने अपने लेखक होने की योग्यता के कई गुर सीखे थे। बहुत कम समय में ही उन्होंने यह साबित कर दिखाया था कि दूधनाथ भी हिन्दी साहित्य का एक उगता हुआ सूरज है।

अपने लेखन में वे भारत की राजनीति के विद्रूप होते रूपों पर एक सेनानी की तरह प्रहार करते नजर आते हैं। उनकी कहानियों की भाषा ऐसी कि सीधे दिल में समा जाए। छोटी कहानी हो अथवा लम्बी सभी एक से एक बेजोड़। कहानियां सिर्फ किस्सागोई भर नहीं थीं, बल्कि समय से संवाद कर रही थीं। वे सामाजिक व्यवस्था की नींव को दुरुस्त करने के लिए रणभूमि में एक वीर योद्धा की तरह हाथों में तलवार लिये अव्यवस्था फैलाने, श्रमिकों का शोषण करने, जातपात फैलाने, गन्दी राजनीति करने, लालची पूँजीपतियों और भ्रष्टाचारियों पर जोरदार प्रहार करते हुए आगे बढ़ते चले जा रहे थे। उनका यह युद्ध जीवनपर्यन्त चलता रहा था। आज भी उनकी रचनायें समाज में गिरते नैतिक मूल्यों को ऊपर उठाने के लिए लड़ रही हैं।

दूधनाथ सिंह बहुत ही जीवट के व्यक्ति थे। अगर वे जीवट न होते तो अर्श से फर्श तक की यात्रा पूरी तय न कर पाते। उनका विचार और दृष्टिकोण बिल्कुल सुस्पष्ट था। शोषण को वे महापाप मानते थे। श्रमिकों के श्रम को समाज में जो दर्जा हासिल था, उससे वे काफी असंतुष्ट थे। उनका कहना था कि पूँजी को समाज में सबसे ऊपर की श्रेणी में रखा जाता है और श्रम को सबसे नीचे की श्रेणी में। यह विचार ही गलत है। पूँजी से श्रम को बाहर निकाल दिया जाए तो क्या ‘पूँजी’ एक तिनका भी इधर से उधर कर सकती है? लेकिन श्रम को पूँजी से अलग कर देने के बाद भी एक श्रमिक अपने श्रम से कुँआ से एक बाल्टी पानी निकाल कर लोगों की प्यास बुझा सकता है। अर्थात श्रम पूँजी से श्रेयस्कर है। इसलिए समाज को अपना नजरिया बदलने की जरूरत है। श्रम के सम्मान से देश व लोगों में समानता का भाव जगेगा।

कई लोगों का यह भी कहना है कि दूधनाथ सिंह गरीबी और अभाव में पले-बढ़े, इसलिए उनका झुकाव वामपंथ व जनवाद की ओर था। जबकि बात ऐसी नहीं है। लाखों-करोड़ों लोग गरीबी और अभावों के बीच पलते और बढ़ते हैं, परन्तु कहाँ सब जनवाद व वामपंथ की ओर जा पाते हैं। दूधनाथ सिंह को इस वैचारिक परिपक्वता और इस मुकाम तक पहुँचने के लिए विराट अध्ययन से गुजरना पड़ा था। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिप्राप्त लेखकों की कृतियों का बारीकी से अध्ययन किया था। देश-दुनिया में क्या कुछ चल रहा है, क्या कुछ फेर बदल हो रहा है? राजनीति किधर जा रही है? इन तमाम जानकारियों से अपने को अपडेट रखा करते थे।

वे महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय में अध्ययन के समय से ही जनवादी संगठनों से जुड़ जरूर गये थे, किन्तु ‘परिमल’ और ‘प्रलेस’ के फर्क को जान नहीं पाये थे। कलकत्ता में (1960-62) ढाई वर्ष रहने के बाद दोनों के अन्तर को समझ पाये थे। 1962 में इलाहाबाद लौटने के पश्चात प्रगतिशील लेखक संघ की ओर मुखातिब हुए और उससे जुड़ भी गये थे। अंतिम समय वे जलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति के बाद उनके जीवन में एक स्थायित्व आ गया था। इधर-उधर भाग-दौड़ वाली जिन्दगी, आपाधापी और रोजी-रोटी की समस्या से दूधनाथ जी मुक्त थे। अब उनके सामने जीवन के दो ही लक्ष्य थे- एक विश्वविद्यालय में छात्रों को बेहतर तरीके से शिक्षा देना तथा दूसरा रचना कर्म करना। इन दोनों दायित्वों को उन्होंने पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ निभाया था। निश्चित तौर पर वे एक सफल शिक्षक थे। आज उनके छात्रों को गर्व होता है कि ऐसे महान शिक्षक, लेखक व चिंतक उनके गुरु थे।

रचनाकर्म उनके रोम-रोम में समाया हुआ था। जीविकोपार्जन के लिये जिस कर्म का भी वे चुनाव करते लेकिन रचनाकर्म जरूर करते। उनके लेखन का विषय सात समुन्दर के पार के नहीं थे, बल्कि उनके आस-पास, देश-शहर में जो घटित हो रहा था, वही उनके लेखन का विषय था। इन विषयों पर उन्होंने जम कर लिखा। इतना लिखा कि जिस पर गर्व किया जा सकता है। हर कहानी, उपन्यास और नाटक में एक नया विषय।

हिन्दी साहित्य विधा के हर क्षेत्र में उन्होंने पूरे शिद्दत के साथ लिखा। लिख तो वे छात्र जीवन से रहे थे, किन्तु सन् 1958 से उनकी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। कुछ रचनाओं के प्रकाशन के बाद ही वे जमे-जमाये प्रतिष्ठित लेखकों की दृष्टि में आ गये थे। उनके बीच दूधनाथ की चर्चा होने लगी थी।

उनके लेखन की धार ऐसी थी कि एक दशक के भीतर ही वे देश के प्रमुख लेखकों में गिने जाने लगे थे। राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक पहलुओं पर ऐसी पकड़ थी कि पूर्व के लेखकों से इन्हें एक अलग पहचान मिली थी। वे एक सफल लेखक बन चुके थे। कहानी, उपन्यास, नाटक, समीक्षा, आलोचना आदि विधाओं पर लिखने के साथ ही वे एक महान कवि भी थे।

हिन्दी साहित्य रचनाकर्म का शुभारम्भ उन्होंने कविता से ही किया था। उनकी कविताओं में आमजन के जीवन का संघर्ष और समाज का सच समाहित है। कविता कहीं फरियाद नहीं करती, बल्कि जीवन के झंझावातों से दोस्ती व समन्वय कैसे स्थापित किया जाये, की सीख देती है। जीवन में झंझावात हैं, मुश्किलें हैं, तभी तो जीवन है। इनके बिना जीवन कैसा? ये जीवन के सहचर हैं। ये हमें लड़ना और अमर होना सिखाते हैं।

उनकी कविताओं में एक दार्शनिक की तरह सोच है तो दूसरी ओर एक श्रमिक के बहते पसीने की कहानी है। यहाँ मैं उनकी एक कविता प्रस्तुत करना चाहता हूं, जिसका शीर्छाक है, ‘मरने के बाद भी’

.....मैं/मरने के बाद भी/याद करूंगा/तुम्हें/तो लो, अभी मरता हूँ/झरता हूँ/जीवन/की/डाल से/निरन्तर/हवा में/तैरता हूँ/स्मृतिविहीन करता हूँ/अपने को/तुमसे/हरता हूँ।....

चन्द बिल्कुल छोटे शब्दों में दूधनाथ ने जीवन की कितनी बड़ी बात कह दी। उनकी हर कविता में इस तरह की उम्दा व गहराई भरी बातें और संदेश है, जो हमें जीवन के यथार्थ से परिचित करवाती हैं।

सामाजिक और पारिवारिक रिङतों को उन्होंने एक नया स्वरूप व अर्थ प्रदान किया था। वे वैज्ञानिक व प्रगतिशील विचार के व्यक्ति थे। स्वयं प्रेम विवाह किया था। जिस कुटुम्ब व जाति से आते थे, जैसी नौकरी में थे, दहेज के रूप में काफी कुछ मिल सकता था। दहेज और जातिप्रथा को वे सामाजिक बुराई मानते थे। रिश्तों के बीच उन्होंने अमीरी और गरीबी को कभी आने नहीं दिया।

इलाहाबाद की झुग्गी से निकल कर जब वे बड़े मकान में शिफ्ट हुए थे, तब भी इनके रहन-सहन और बोल-चाल में कोई फर्क नहीं आया था। मकान बड़ा जरूर हो गया था, तन पर लिबास भी अच्छे हो गये, किन्तु दूधनाथ के मन-मस्तिष्क में कोई बदलाव नहीं आया था। मैं व अहम् का भाव उनके जीवन में कभी नहीं आया था। यह उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। वे साधारण से साधारण व्यक्ति से भी बड़ी विनम्रता के साथ मिला करते थे। विनम्रता इनका विशेष आभूषण था। अपनी रचनाओं में वे जिन मूल्यों को निर्मित व स्थापित करते थे, सदा उस पर चलते रहे थे।

सदाचार उनके जीवन का एक विशिष्ट गुण था। समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए सदाचार होना बहुत जरूरी है। सदाचार से नैतिक ताकत बढ़ती है और समाज में नैतिक मूल्य स्थापित होते हैं। उनका पक्का यह विश्वास था कि दुराचार के कारण ही सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर गिरावट हुई। वे आजीवन इसे ठीक करने के लिए लिखते रहे और बोलते रहे थे। प्रसिद्ध कथाकार काशीनाथ सिंह ने दर्ज किया है कि वे अपनी बेटी की शादी के लिए बेहद परेशान रहा करते थे। अपनी बेटी के लिए योग्य वर और अच्छे घर की तलाश में थे। एक बार स्कूटर में दूधनाथ सिंह के साथ जाते समय उन्हें याद आया कि दूधनाथ का बेटा उनकी बेटी के लिए सबसे उपयुक्त होगा। उन्होंने बहुत सकुचाते हुए मन की यह बात दूधनाथ से कह दी थी।

बस क्या था। दूधनाथ ने स्कूटर को तुरन्त रोक दिया था. दोनों स्कूटर से उतरे. दूधनाथ ने कहा था, ‘अब मैं पूछता हूँ और तुम जवाब दो। यह बताओ कि मेरे बेटे से तुम अपनी बेटी की शादी करोगे?’ यह बात सुन कर काशीनाथ जी कुछ पल के लिए अवाक् रह गये थे। फिर दोनों ने ठहाके लगाकर एक-दूसरे को छाती से लगा लिया था। बस वहीं एक मिनट में शादी तय हो गई थी। इस बात के कुछ ही दिनों बाद दोनों समधी बन गये थे। यह था दूधनाथ का भला और भोला मन।

उन्होंने सिर्फ अपनी कहानियों में ही रूढ़िवादिता, अंध-विश्वास और घिसी-पिटी परम्परा को नहीं तोडा़, बल्कि सचमुच जीवन में भी इनको तोड़ा था।

प्रख्यात कथाकार काशीनाथ सिंह ने लिखा है कि ‘जितना लेखन दूधनाथ ने किया है, उतना किसी ने नहीं। सच तो यह है कि दूधनाथ ने जिस पर कलम चलाई, चाहे वह महादेवी वर्मा हों या सुमित्रनंदन पंत या मुक्तिबोध, उसमें कुछ अनूठा और अनोखा किया। जिस पर किसी और की नजर नहीं गई थी। उसकी कहानियों और उपन्यासों में जैसे दुर्लभ विवरण और वर्णन मिलते हैं, वैसे बहुत कम लेखकों में है।’

दूधनाथ सिंह की कृतियों की एक लंबी फेहरिस्त है। ‘सपाट चेहरे वाला’, ‘आदमी’, ‘सुखान्त’, ‘प्रेम कथा का अंत’, ‘न कोई’, ‘माई का शोक गीत’, ‘धर्म क्षेत्रे -कुरूक्षेत्रे’, ‘तू फू’ (कथा संग्रह)’, ‘अगली शताब्दी के नाम’, ‘एक और भी आदमी है’, ‘युवा खुशबू’, ‘सुरंग से लौटते हुए’, ‘तुम्हारे लिए (कविता संग्रह)’, ‘आखिरी कलाम’, ‘निष्कासन’, ‘नमों अन्धाकार (उपन्यास)’, ‘यमगाथा (नाटक)’, ‘निराला’, ‘आत्महंता आस्था’, ‘महादेवी’, ‘मुक्तिबोध :साहित्य में नई प्रवृतियां’ (आलोचना), ‘तारापथ (पंत)’, भुनेश्वर समग्र’, ‘दो शरण (निराला)’, ‘एक शमशेर भी है’, ‘ओट में खड़ा मैं बोलता हूँ’ (केदारनाथ अग्रवाल), ‘सात भूमिकाएं (महादेवी वर्मा-संपादन)’, ‘लौट आ, ओ धार’ (संस्मरण), आदि प्रकाशित हैं।

इनकी रचनाओं पर कई शोद्यार्थी पी.एच.डी. की उपाधियां प्राप्त कर चुके हैं। नियमित रूप से कई शोधार्थी इनकी रचनाओं पर शोध कार्य में संलग्न हैं। इसी तरह इनके पुरस्कारों की भी लंबी फेहरिस्त है। सबों को यहाँ देना संभव नहीं है। कुछ चुनिन्दा पुरस्कारों का यहाँ उल्लेख कर रहा हूँ। वह ‘भारत भारती पुरस्कार’, ‘शरदजोशी सम्मान’, ‘साहित्य भूषण सम्मान’, ‘कथाक्रम सम्मान’, आदि सम्मानों से अंलकृत किये गये थे।

मैं कभी भी अमर कथाशिल्पी दूधनाथ जी से नहीं मिल पाया था। हिन्दी साहित्य में बचपन से लगाव रहने के कारण उनकी रचनाओं से भलीभाँति परिचित था। उनके रचना संसार को देखकर विचार करता रहता हूँ कि एक जीवन में उन्होंने इतना सब कुछ कैसे रच लिया था। बढ़ती उम्र भी उनके लेखन के आड़े नहीं आ रही थी। बस वे निर्लिप्त भाव से हिन्दी साहित्य को समद्ध ही करते चले जा रहे थे। रुकना उनके जीवन की डिक्शनरी में नहीं था।

दूधनाथ के रचनाकर्म से प्रभावित होकर देशभर में सैकड़ों रचनाकार रचना कर्म से जुड़े हैं। नव लेखकों की कई पीढ़ियों को उन्होंने लेखन के लिए ही प्रेरित नहीं किया था, बल्कि उनका मार्ग भी प्रशस्त किया था। वे निश्चित तौर पर हिन्दी साहित्य के एक मजबूत स्तंभ बन चुके थे।

उनके अकस्मात निधन से प्रतीत होता है कि हिन्दी साहित्य का एक मजबूत स्तंभ ढह गया है। मैं जिस शहर हजारीबाग में रहता हूँ, वह साहित्यकारों के शहर के रूप में मशहूर है। प्रख्यात कथाकार रतन वर्मा उनके रचना संसार से पूर्णरूपेण परिचित हैं। वे एक बार किसी गोष्ठी में दूधनाथ सिंह से मिले थे। उस गोष्ठी में दूधनाथ सिंह ने जो व्याख्यान दिये थे, आज भी उन्हें याद हैं।

उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि देश भर में उनके निधन पर शोक सभायें आयोजित हो रही हैं। रतन वर्मा ने उनके निधन पर फेसबुक के एक पोस्ट में दर्ज किया है दूधनाथ सिंह एक उच्च कोटि के लेखक थे। उनके निधन से हिन्दी साहित्य को बड़ी क्षति हुई है। प्रख्यात कवि, आलोचक, संपादक डॉ. भारत यायावर ने बताया कि वे एक जिन्दादिल इंसान थे। उनकी लेखनी सदैव संवाद करती रहेगी। उन्होंने बताया कि वे कई बार दूधनाथ सिंह से मिल चुके थे। इलाहाबाद के कॉफी हाउस में कई-कई घंटे उनके साथ बिताए थे। उनके साथ बिताये हर पल को याद कर वे रोमांचित हो उठते हैं।

दूधनाथ जी मित्रों के मित्र थे। हर दिल अजीज थे। उनकी मुस्कुराहट में भी सृजन की झलक दिखती थी। अपने जीवन के अन्तिम क्षणों में वे कैंसर से ग्रसित हो गए थे, तब भी कभी घबराये नहीं थे। उनकी मुस्कुराहट और ठहाके को अस्पताल के विस्तार भी कम नहीं कर पाये थे। वे उसी तरह लोगों से मिलते रहे थे। इस अवस्था में भी लोगों को साहित्य की शिक्षा देना न भूलते थे। उनकी पहली कहानी सन् 1958 में धर्मयुग में ‘तुमने तो कुछ नहीं कहा’, शीर्छाक से छपी थी। पहली कहानी से लेकर मृत्यु के पूर्व तक के लंबं सफर में उन्होंने हिन्दी साहित्य की जो सेवा की थी, यह अपने आप में एक कीर्तिमान है।

12 जनवरी 2018 को जब सारे देशवासी स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती मनाने में लगे थे, उसी रात्रि दूधानाथ सिंह 82 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को सदा-सदा के लिये अलविदा कह चले गये। सशरीर वे हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु उनकी कालजयी रचनाएं सदैव समाज से संवाद करती रहेगीं।

 

सम्पर्कः पंच मंदिर चौक,

हजारीबाग-825301 (झारखण्ड)


दूधनाथ सिंह की दो कविताएं

जा रहा हूं जीवन की खोज में

जा रहा हूँ जीवन की खोज में

सम्भवतः मृत्यु मिले

सम्भवतः मिले एक सभ्य

सुसंस्कृत जीवन-व्यवहार

साँझ मिले बाँझ

आँच न मिले

जीवन की राख मिले

दसों-दिशाओं में।

क्या ऐसा नहीं हुआ कई बार

कई तथागतों के साथ

कई शताब्दियों में

निरन्तर!

जब भी वह निकला उल्लास

लास भौतिक जीवन पर इठलाता

मिली उसे निरी उदासीनता

मिला उसे कठिन कंकाल

मिला उसे भव्य अन्तराल।

क्या वह नहीं लौटा

विकल-विकल लिए

हाथों में अपना ही तरल रक्त

क्या उसकी आँखों से नहीं

टूटा, निपट उदास टिमटिमाता

सितारा एक?

पृथ्वी थोड़ी और

समृद्ध क्या नहीं हुई

उसके बाद!


जब मैं हार गया

जब मैं हार गया सब कुछ करके

मुझे नींद आ गई।

जब मैं गुहार लगाते-लगाते थक गया

मुझे नींद आ गई

जब मैं भरपेट सोकर उठा

हड़बोंग में फँसा, गुस्सा आया जब

मुझे नींद आ गई। जब तुम्हारे इधर-उधर

घर के भीतर बिस्तर से सितारों की दूरी तक

भागते निपटाते पीठ के उल्टे धनुष में हुक लगाते

चुनरी से उलझते पल्लू में पिन फँसाते, तर्जनी

की ठोढ़ी पर छलक आई खून की बूँद को होंठों में चूसते

खीझते, याद करते, भूली हुई बातों पर सिर ठोंकते

बाहर बाहर-मेरी आवाज की अनसुनी करते

यही तो चाहिए था तुम्हें

ऐसा ही निपट आलस्य

ललित लालित्य, विजन में खुले हुए

अस्त-व्यस्त होंठों पर नीला आकाश

ऐसी ही धवस्त-मस्त निर्जन पराजय

पौरुष की। इसी तरह हँसती-निहारतीं

बालक को जब तुम गईं

मुझे नींद आ गई।

जब तुमने लौटकर जगाया

माथा सहलाया तब मुझको

फिर नींद आ गई।

मैं हूँ तुम्हारा उधारखाता

मैं हूँ तुम्हारी चिढ़

तंग-तंग चोली

तुम्हारी स्वतंत्रता पर कसी हुई,

फटी हुई चादर

लुगरी तुम्हारी फेंकी हुई

मैं हूँ तुम्हारा वह सदियों का बूढ़ा अश्व

जिसकी पीठ पर ढेर सारी मक्खियाँ

टूटी हुई नाल से खूँदता

सूना रणस्थल।

लो, अब सँभालो

अपनी रणभेरी

मैं जाता हूँ।

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आइए अब पढ़ते हैं दूधनाथ सिंह द्वारा रचित एक लघु कहानी

सरहपाद का निर्गमन

चौरासी सिद्धों में सर्पोपरि थे सरहपाद।

मठ के महंत। विचारक। दार्शनिक। सिद्ध ब्राह्मण।

मठ में टहलते हुए रोज एक कुँवारी, कमसिन दासी पर नजर पड़ती थी, जो हमेशा झाड़ू लगाती दिखती थी। सरहपाद उसे न देखते हुए भी प्रतिदिन देखते। जब वह आगे बढ़ जाते, उन्हें लगता, वह दासी उनकी पीठ को तक रही है। उन्हें अपनी पीठ में चुभे हुए दो नैन दिखते। प्रतिकूल दिशा में देखते हुए भी उन्हें लगता कि उसे देख रहे हैं। लगातार उसे देख रहे हैं। टहलते हुए वे मठ के बाहर दूर-दूर तक निकल जाते। अचानक उन्हें लगता कि सिद्धों की टोली उनके पीछे है। सभी को उनकी चिंता होने लगी। सरहपाद वापस लौटते। उनकी आँखें उसे ढूँढतीं- न ढूँढ़ते हुए भी ढूँढ़तीं। फिर वे अपने बिस्तर में, अपनी नींद में, अपनी अनिद्रा में, अपने स्नान में, ध्यान में, अध्यान में, हद में-बेहद में, अनहद में, ब्रह्मांड में- हर जगह उसे ढूँढ़ने लगे।

रात भर वे सुबह होने की प्रतीक्षा करते, कि वे बाहर निकलेंगे और रात को खूब ढेर-सारी पत्तियाँ गिरी होंगी और वह लड़की बुहार रही होगी। वे बुहारने की खरखर आवाज कानों में घोलने की सोचते। उन्हें लगता कि एक कालातीत, विश्वजनीन पतझर का मौसम लगातार चल रहा है। पत्तियाँ हैं, जो वर्षा की तरह झर रही हैं और वह लड़की है जो बुहारे जा रही है, बुहारे जा रही है। उन्हें लगता, सारी दुनिया में सिर्फ झाड़ू लगाने का कार्यक्रम चल रहा है। उनकी नींद में भी खरहर चल रहा है। वे अनिंद्राग्रस्त हैं। उनकी प्रशांति नष्ट हो गई है। उनकी साधना खंडित हो गई है।

तब एक दिन... रात के पिछले पहर में महाऋषि सरहपाद अपने आसन पर बैठे-बैठे रोने लगे।

अगली सुबह वे निकले।

हल्का अँधेरा था। विक्रमशिला के स्तूप के पीछे सूर्योदय का आभास था। उधर आकाश में हल्की लाली बिखर रही थी। मुँह अँधेरे ही वे उस ओर बढ़ते गए, जिधर चौदह वर्षीय वह दलित बालिका झाड़ू लगा रही थी। सरहपाद उसके निकट जाकर खड़े हो गए। ‘ठहरो।’ उन्होंने झाड़ू को रोकने का इशारा किया। लड़की डर गई। लगा उसकी रोजी गई। उसे महागुरु काम से निकाल देंगे। उसके काम में खोट है। वह बुहारती जाती है और उसके पीछे पत्तियाँ झरती जाती हैं। महागुरु रोज सवेरे, झलफले में उसे देखते हुए जाते हैं।

‘क्या अपराध हुआ, महाराज?’ लड़की ने झाड़ू के साथ ही अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा।

‘क्या तुम मठ से बाहर मेरे साथ चलोगी?’ सरहपाद ने पूछा।

‘कहाँ महाराज?’

‘यह तो मैं भी नहीं जानता। लेकिन यहाँ से बाहर, मेरे साथ, मेरे संग, मेरे जीवन के साथ।’

लड़की चुप।

‘मैं यह मठ छोड़ दूँगा। मैं यह साधना छोड़ दूँगा। मैं अपनी पगड़ी उतारता हूँ धरती पर। मैं पतन की ओर निकलना चाहता हूँ। मैं तुम्हारी देह, तुम्हारी आत्मा, तुम्हारी त्वचा, तुम्हारा मन, तुम्हारा समूचा अस्तित्व- सब तुमसे माँगता हूँ। मैं तथागत के प्रतिकूल, स्त्री-देह, स्त्री-संसार, स्त्री के होठों की ओर प्रत्यागमन करना चाहता हूँ। क्या तुम मेरा साथ दोगी?’ अचानक सरहपाद ने झाड़ू समेत उस चौदह वर्षीय बालिका के हाथ पकड़ लिए।

लड़की ने झाड़ू नीचे रखी।

‘उसे उठा लो, उसी की जरूरत है।’ महागुरु सरहपाद ने कहा।

लड़की ने झाड़ू उठाया और दूसरे हाथ से सरहपाद का हाथ पकड़ विक्रमशिला के बाह्य-द्वार की ओर चल पड़ी।

सरहपाद ने पलटकर पीछे देखा।

वहाँ तिरासी सिद्ध हकबकाए हुए खड़े थे

‘आप लोग सिद्ध हैं, साधक हैं- आप सबको प्रणाम।’ सरहपाद ने रास्ते की धूल में लेटकर साष्टांग दंडवत किया।

‘यह क्या हो रहा है!’ डोडिम्भपा ने हड़बड़ाकर पूछा।

‘मुझे मेरा सत्व मिल गया। आप लोग सँभालिए अपना मठ, अपनी साधना, अपनी कीर्ति, अपना संगठन, अपना इतिहास, अपना काल-खंड। मैं अब जाता हूँ।’

और महाऋषि सरहपाद उस लड़की का हाथ थामे मठ के मुख्य द्वार से बाहर चले गए।

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