पाठकीय // पाठकों के पत्र // प्राची - फरवरी 2018

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आपने कहा है

प्रसार संख्या बढ़ाने की बेचैनी के दौर में

’प्राची’ का नव-वर्ष प्रवेशांक मिला। पत्रिका के मुख पृष्ठ से ही अंक ने प्रभावित करना शुरू कर दिया। पत्र-पत्रिकाओं की प्रसार संख्या बढ़ाने के लिये बेचैनी के इस दौर में, ’प्राची’ ही सम्भवतः वह पत्रिका है जो स्पष्ट घोषणा करती है कि रचनाओं के प्रकाशन की शर्त उनकी उकृष्टता है। रचनाकार का पत्रिका का सदस्य बनना आवश्यक नहीं है। क्योंकि प्रबंधन यह रहस्य जानता है कि सामग्री रोचक होगी तो प्रसार तो बढ़ेगा ही। अन्यथा अब यह शर्त लगभग अनिवार्य हो चली है। अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशन तो पारिश्रमिक के तौर पर सदस्यता ही थोपने लगे हैं। कुछ को छोड़ कर अधिकांश सरकारी स्तर पर प्रकाशित होने वाली पत्र-पत्रिकायें भी इस राह पर चलने लगी हैं।

आपका सम्पादकीय, ‘खुश रहो कि हम आजाद हैं’ हमारे एक सौभाग्य का संकेत करता है तो किसी स्वतंत्र व्यंग्य की तरह आजादी का दुरुपयोग करने के विरुद्ध चेतावनी भी है। हम सब को याद रखना चाहिये कि आजादी का मतलब निरंकुशता तथा मनमानापन हर्गिज नहीं है। आजादी का अर्थ है अपने अधिकार तथा कर्तव्यों के प्रति सजग रहने के साथ ही, दूसरों के अधिकारों की रक्षा के प्रति प्रतिबद्ध होना। यह भारत है। विविधता में एकता ही इसकी संस्कृति है। संवैधानिक स्थिति भी है। देश का यह रूप बनाये रखने का दायित्व हम सब का है।

पत्रिका के प्रधान सम्पादक, भारत यायावर पर, विजय केसरी द्वारा प्रस्तुत आलेख ‘एक प्रेरक व्यक्तित्व’ अंक का विशेष आकर्षण माना जा सकता है। विलुप्त साहित्य पर शोध प्रवृत्ति तथा वर्तमान पर पैनी नजर रखना उनके व्यक्तित्व की विशेषता कही जा सकती है। रतन वर्मा की आत्मकथा ‘अनचाहा सफर’ अंक दर अंक रोचक तथा जिज्ञासा पूंर्ण होती जा रही है। वह बताती है कि एक रचनाकर्मी की सृजन-यात्रा के मध्य कैसे-कैसे अवसर तथा त्रासदी हो सकते हैं। वही उसकी थाती होते हैं।

कहानी सनत कुमार जैन की हो या रामबाबू नीरव, नीरजा हेमेंद्र, निरंजन धाुलेकर, डॉ. शुभा श्रीवास्तव, राकेश भ्रमर, राजा चौरसिया, अमित शर्मा की हों, सबके अपने-अपने संदेह हैं। रोचकता जैसी अनिवार्यता सब में विद्यमान है। सत्य शुची, रेणु शर्मा, संदीप तोमर, राजेश माहेश्वरी, डॉ. संगीता गांधाी, राकेश भ्रमर की लघुकथायें भी ‘देखन में छोटे लगें, घाव करें गम्भीर’ की तरह हैं। सूर्य नारायण गुप्त ‘सूर्य’, सतपाल ‘स्नेही’, अरविंद अवस्थी, ऋषिपाल धीमान ‘ऋषि’, अभिनव अरुण, अविनाश ब्यौहार, केदारनाथ सविता, कृपाशंकर ‘अचूक’, डॉ. सी बी भारती की क्षणिकाओं, गजल, कविता, गीतों का चयन सजग है।

‘प्राची’ में राजेन्द्र कुमार की समीक्षायें लगातार पढ़ने को मिल रही हैं। समीक्षाओं को पढ़कर उनकी अध्येयतावृत्ति की गहराई को समझा जा सकाता है। बड़ी बात यह है कि वे बिना किसी शोर-शराबे, साहित्यिक दम्भ के अपने कर्म में लीन हैं। आचार्य भगवत दुबे के सम्बंध में कुछ कहना मेरे लिये धृष्टता होगी। निसंदेह, अशोक ‘अंजुम’ तो हिंदी गजल के स्थापित पुरोधा तथा मर्मज्ञ काव्य समीक्षक हैं ही। सनातन कुमार वाजपेयी ‘सनातन’, श्याम सुन्दर मिश्र, डॉ. मधुर नज्मी के आलेख भी उनकी चिंतन प्रवृत्ति के परिचायक हैं।

अंत में, अपने व्यंग्य स्तम्भ, ‘यहाँ वहाँ की’ के लिये कुछ लिखना मेरे लिये अनुचित होगा। यह दायित्व सुधी पाठकों की कसौटी पर ही है।

-दिनेश बैस, झांसी (उ.प्र.)



आपने कहा है

प्राची का जनवरी, 2018 अंक मिला. पत्रिका में प्रकाशित रचनाओं की गुणवत्ता निश्चय ही स्तरीय व पठनीय है. सही अर्थों में प्राची सामयिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विचारों का पोशक व संवाहक है. संपादकीय में विकृत आजादी का चित्रण है, जिसे हम देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं. सरकारी या गैर सरकारी चल-अचल संपत्ति का दोहन आम बात हो गई है. राजनीतिक रसूख के चलते कुछ भी किया जा सकता है. कानून का भय नहीं है. न्यायपालिका में भी सब ठीक नहीं चल रहा है. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधाीश भी मनपसंद वादों को सुनना चाहते हैं. एक तरह की यूनियन बनाकर प्रेस कान्फ्रेंस कर मुख्य न्यायाधाीश पर दवाब बनाते हैं और विपक्षी दल राजनीति करते हैं.

अंक में छः कहानियां हैं. ‘संतगीरी’ में तथाकथित सफेदपोश और सब्जी बेचने वाली महिला को लेकर कहानी लिखी गई है, जिसमें महिला मेहनत और सादगी को संवादों द्वारा प्रभावी ढंग से कहा गया है. ‘औरत न होने का दर्द’ एक मार्मिक व लंबी कहानी है. महिला किन्नर के दर्द को शेखर के माध्यम से कहा गया है कि लड़का, लड़की या किन्नर का जन्म मां-बाप के वश में नहीं है. उनके लिए सभी बच्चे समान और ममता के हकदार हैं. लेकिन समाज का दवाब और पारिवारिक क्लेश सब सुखा देता है. बचते हैं केवल अपमान व आंसू. इस कहानी के विस्तार को कम करके ज्यादा प्रभावी और कसा जा सकता था. ‘छुपकर रोने वाली वो लड़की’ महिला के संघर्श और सफलता की प्रेरक कहानी है. निम्न व मध्यम वर्गीय समाज की बड़ी होती लड़की निशा की कहानी है, जो अन्य लड़कियों की तरह ससुराल के सपने देखती है, किंतु निष्ठुर आतयायी पति की मारपीट से तंग आकर मां-बाप के घर लौट आती है और माथे पर ससुराल से भागी हुई लड़की का कलंक सहते हुए मायके में शरण नहीं पाती. यहीं से उसका संकल्प, उसे नए व्यक्तित्व की ओर ले जाता है. भारतीय पुलिस सेवा में चयन के बाद निशा नागपाल का आत्मविश्वास नई ऊंचाई तक जाता है. वान्या का साथ पाकर वह धन्य हो जाती है. एक प्रेरणादायक कहानी के लिए लेखिका को साधुवाद.

‘आखिरी हंसी’ गांव के सामाजिक और राजनैतिक गठजोड़ की कहानी है. जिसमें सरपंच ही सबकुछ है. लेकिन बिरजू और कजरी के माध्यम से सरपंच की खुशी तिरोहित होने को कहानीकार ने अंत को संवार दिया है. ‘संपूर्णता’ पति-पत्नी के संबंधों को लेकर बुनी गई मार्मिक कहानी, जो एक अलग संसार में ले जाती है. विवाह का अर्थ केवल सप्तपदी है, जो कि जन्मों के बंधन में बांधती है. लेकिन अगर शरीरिक मिलन न हो, पति एड्स से पीड़ित हो, तो पत्नी की कामनाएं और शरीर की मांग के कारण लतिका निष्पक्ष हो जाती है और अपने को व्यस्त रखने के लिए किताबों, पत्रिकाओं की दुकान खोलती है. पति का मौन सहयोग और प्रेमी सिद्धान्त से मिलने के बाद नायिका सामान्य जीवन की ओर जाकर पुनः वैवाहिक बंधन में बंधती है. ‘अनुत्तरित’ तीन पीढ़ियों की कहानी है, जिसमें गिरधारी, उसके बेटे संजीव और पोते अजय के परस्पर संबंधों को भावनात्मक स्तर पर ले जाकर यथार्थ के खुरदरे धरातल पर लाकर पटकती है. गिरधारी बेटे को यथा सामर्थ्य पढ़ाकर ग्रामीण रीतिरिवाज से विवाह कर देता है, वहीं पत्नी प्रभा और पुत्र अजय को छोड़कर शहर जाकर नौकरी करता है और सबको भूलकर शहरी जीवन जीता है. पोते के आग्रह पर जब गिरधाारी शहर में पिता-पुत्र को आमने-सामने खड़ा करता हे तो पोते का कथन- ‘मेरा बाप मर चुका है’, छोटे बच्चे के समय से पहले मानसिक रूप से परिपक्व हो चुके समाज/परिवार में बिखराव की समझ को भ्रमर जी ने रचना कौशल से अविस्मरणीय बना दिया है.

अंक की सभी कहानियां कुछ-न-कुछ संदेश देने में सफल हैं. अंक के गीत व गजलें भी भावपूर्ण हैं. डॉ. सी.बी. भारती की कविताएं सामाजिक असमानता और भेदभाव को स्पष्ट रूप से कहती हैं. जो भी प्रकृति ने दिया है, उस पर सबका समान अधिकार है. लघुकथाएं और व्यंग्य भी ठीक हैं.

रतन वर्मा का ‘अनचाहा सफर’ एक लेखक के संघर्ष और ईमानदारी से जिए गए जीवन को कागज पर उकेरना निश्चय ही दुरूह कार्य है. रतन वर्मा को साहित्य जगत में स्थापित करने में श्री भारत यायावर जी का योगदान अविस्मरणीय है, जिसे उन्होंने स्वीकारा है. हजारीबाग में ही नहीं, उसके बाहर भी अनेक छोटे-बड़े लेखकों को भी श्री भारत यायावर जी का मार्गदर्शन और आशीर्वाद रहा है. अंक में समीक्षा, साहित्य समाचार, पुस्तकें/पत्रिकाएं मिलीं स्तंभ भी सराहनीय हैं.

विजय केशरी का आलेख ‘एक प्रेरक व्यक्तित्व’ श्री भारत यायावर के व्यक्तित्व पर विस्तार से प्रकाश डालता है. श्री भारत यायावर के व्यक्तित्व और कृतित्व का आकलन असंभव है. रेणु जी के रचना संसार को प्रामाणिक रूप में खोजना और प्रकाशित करवाना उनके ही वश की बात थी. एक कठिन और श्रमसाध्य कार्य! आज हमें रेणु का जो साहित्य उपलब्ध है, उसके लिए पाठक श्री भारत यायावर के हमेछाा ऋणी रहेंगे. मैं व्यक्तिगत रूप से श्री यायावर जी से नहीं मिला हूं, पर मोबाइल पर उनका मार्गदर्शन और आशीर्वाद सहज उपलब्ध है. मुझ जैसे नवोदित लेखक के लिए यह गर्व की बात है. श्री यायावर जी की कुछ पुस्तकें पढ़ने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है, जिनसे मैं लाभान्वित हुआ हूं. उनके लेखनकर्म और लगन को कोटिशः प्रणाम्! प्रेरणा के स्रोत और साहित्य-आराधक श्री यायावर जी को शतायु हों, ऐसी कामना है.

राजेंद्र कुमार, नगरा, झाँसी- 284003



लघुकथाओं पर केन्द्रित अंक अच्छा बन पड़ा है

‘प्राची’ के दिसंबर, 2017 की प्रति कल ही मिली है. लघुकथाओं पर केन्द्रित यह अंक बहुत अच्छा बन गया है.

बधाई! इस अंक में मेरी दो लघुकथाएं ‘सरकार और पत्नी’ तथा ‘स्पीडमनी’ प्रकाशित करने के लिये धन्यवाद.

‘प्राची’ के प्रधाान संपादक में श्री भारत यायावर का नाम देख रहा हूं. ये तो हजारीबाग में थे. अब जबलपुर में रहते हैं क्या? इनसे तो तीन दशक पुराना संबंध है.

‘प्राची’ के किसी अन्य विशेषांक या दूसरे अंकों के लिये रचनात्मक सहयोग कभी भी लिया जा सकता है. शुभकामनाओं के साथ!

अंकुश्री, रांची (झारखंड)

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