कहानी // जगना दा // सुबोध सिंह ‘शिवगीत’ // प्राची - फरवरी 2018

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सुबोध सिंह ‘शिवगीत’

जन्म : 19 जनवरी 1966

पता : ग्राम+पत्रालय-कदमा, हजारीबाग, झारखण्ड-825301

संप्रति : प्राध्यापक-हिंदी, विनोबा भावे विश्वविद्यालय,

हजारीबाग, झारखण्ड

मोबाइल : 8986889240

आकाशवाणी एवं दूरदर्शन केन्द्र से रचनाओं का नियमित प्रसारण एवं देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, आलेख, व्यंग्य एवं समीक्षाओं का प्रकाशन।

सम्पादन : दस्तक (काव्य-संग्रह) एवं हजारीबाग टाइम्स (साप्ताहिक)

प्रकाशित पुस्तकें : पूरब की ओर, प्रपंचतंत्रम् (काव्य संग्रह)

‘हिजड़ा गया है; टोला, मुर्दा हो गए हैं छोकड़े; माय-बहिन को झूमर खेलवाने भर भी माँदर बजाने के दम नहीं रह गये हैं इनकी कमर में। छिः... छिः... धिरिक (धिक्कार) जिन्दगी। डीजे बाजा लाये हैं। चन्दा (बिरही) करके। नकली गीत पर चलेगा असली झूमर, तेरही के औलाद सब। कौन जमाना आ गया भगवान, उठा काहे नहीं लेता है जगना को। ई दिन देखने से तो मउवत (मौत) बढ़िया है गँवात बाबा।’

अपनी अंधेरी कोठरी में पड़ा-पड़ा जगना दा, जो पचास के करीब का है, नशे की हालत में बकता जा रहा है। टोले के अखाड़े पर ऐन ‘करम’ (एक त्योहार) के दिन माँदर के थाप पर जीवंत नाच (झूमर) की जगह डीजे साउंड से गाये जाने वाले गीतों पर नाचती परवैतिनों पर उसे अपार गुस्सा आ रहा है। उसे क्रोध अपने टोले के नौजवान लड़कों पर है, जिन्होंने माँदर की जगह कान-फड़वा डीजे लाकर बजा दिया है- ‘यही है करम। बाप-दादें के जमाने से चले आ रहे तीज-त्योहारों को ये आज के छौंड़ा-छौंड़ी (लड़का-लड़की)लोग बगैर तहस-नहस किए नहीं रहेंगे.’

हालाँकि शराब तो जगना दा ने भी पी रखी थी, पर शराब के नशे में भी वह होश की बात कर रहा था। और सारा टोला बनिस्वत कम नशे में होकर भी आधुनिकता के नवीन नशे में धुत था। जगन राम, वह जगन राम है जो अपनी जवानी में अपना-टोला (मुसहर टोला) क्या पूरी बस्ती में अपने साहसिक एवं जोशभरे कारनामों के लिए मशहूर था। किसी का बैल दलदल में फँस गया हो तो, किसी का भारी-भरकम बाप थौंस कर खटिया-बिछौना हो गया हो तो, या जंगल से सबसे भारी लकड़ी उठा के अकेला ले आना हो तो, सारे गाँव की दृष्टि जगन राम पर होती थी। हालाँकि उस समय के हमारे गाँव में जवानों की कोई कमी नहीं थी। गाँव में खाने-पीने से लेकर कुश्ती व्यायाम तक का जुगाड़ था। गाँव में दस अच्छे जवान हों, इसकी चिंता सारा गाँव करता था। सरपंच साहब के बाबूजी अच्छे खासे पहलवान थे। गाँव में एक किस्सा आज भी प्रचलित है कि उनसे लड़ने की नीयत से गाँव में एक बार राजा अलख नारायण सिंह का पहलवान आया था। वे उस समय पेड़ की एक डाली पर बैठकर भैंसों को आम का पल्लो (पत्तियाँ) खिला रहे थे। संयोग से राजा के पहलवान ने उनसे ही उनका पता पूछा था और कारण स्वरूप उनसे पहलवानी आजमाइश को अपनी ख्वाहिश बतायी थी। फिर क्या था, तड़ाक से पेड़ की डाली से उतरकर पहलवान को उन्होंने कहा था- ‘पहलवान जी, जरा इसी डाली को झुकाकर बैठकर इन भैसों को चारा खिलाते रहिए, हम पहलवान ईश्वर दयाल सिंह से आपको मिलवाते हैं। राजा का पहलवान लाख कोशिश करता रह गया, न आम की वह डाली झुकी, न भैंसों का भोजन मिल सका। इधर-उधर बगलें झाँकते पहलवान को थोड़ी ही देर की बातचीत में पता चल गया कि यही श्रीमान् पहलवान जी हैं और इनसे पहलवानी आजमाना जान का खतरा मोल लेना है। पहलवान दो-चार दिन इनके साथ-साथ रह कर पहलवानी के कई दाँव-पेंच सीखकर हँस-खेल कर विदा हुआ था, सो पुनः इधर नहीं आया।

हाँ तो उन्हीं की प्रेरणा और प्रोत्साहन से गाँव में व्यायाम और कुश्ती आज तक जमी है। उनके सहयोग से गाँव के हर जाति के बच्चों में पहलवानी फलते-फूलते रही है। इसका असर निहायत गरीबों की बस्ती मुसहर टोली पर भी है। जगन राम भी ईश्वर बाबा की सेवा-टहल में रहकर अच्छा खासा ताकतवर इंसान बन बैठा।

जगन राम का जोश जितिया, कर्मा और रामनौमी के अवसर पर देखते बनता था। माँदर पर अगर जगन राम ने थाप दे दी तो समझो आज सारे टोले को नाचना ही है-

‘रिंग-रिंग ता....., धिंग....धिंग ता...ता, धिंड़िंग धा...’ बजना आरंभ हुआ कि समझो अपने-अपने घरों में तैयार होकर बैठी कर्म पर्व (छोटानागपुर का प्रचलित भादो-पर्व जिसमें बहनें अपने भाई की लम्बी उम्र के लिए उपवास कर पूजनोपंरात रात-भर अखरे पर नाचती हैं) की परवैतिनें घर से निकल कर अखरे पर हाजिर और झक्काझोर झूमर आरंभ।

‘तेली घर के तेल जरे।

धोबी घर के बाती।

हाय रे करमवा के राती...’

‘ताक धिंग... ताक... ताक...

‘दिंदग... दिंदग... ताक... ताक...’

माँदर की ताल पर टोले भर के युवा एवं वयस्क महिलाओं का दो अलग-अलग शृंखला में हाथ से हाथ जोड़कर कमर झुका-झुकाकर झूमते हुए कदमों के लय ताल के साथ नृत्य आरंभ। गाने और साथ-साथ नाचने के इस अलौकिक दृश्य को देखने के लिए गाँव भर के लोग जुट जाते।

हालाँकि गाँव भर में मुसहरों के कई टोले हैं और करम के अवसर पर हर टोले के लोग अपने-अपने अखरे पर अलग नृत्य की व्यवस्था करते। हर अखरे पर दर्शकों की भीड़ होती थी। पर जगन राम वाले टोले के अखरे पर दर्शकों की सर्वाधिक भीड़ जुटती थी। कारण, जगन राम का जोश, जगन राम की पुरजोर व्यवस्था, जगन राम का माँदर-वादन, एवं गाँव का हर छोटे-बड़े लोगों के साथ जगन राम का कार्य-व्यवहार, आवन-जावन, बल्कि कहें कि नाचने वाले तो गाँव के हर टोले में थे, पर ऐसा बजाने और जोश भर-भर कर नचाने वाला सिर्फ और सिर्फ जगन राम था।

दारू और चखना का इंतजाम ऐसा कि क्या नाचने वाला, बजाने वाला, देखने वाला भी चाहे तो छक कर मजा ले। जगन राम महीने भर दौड़-धूप सिर्फ एक रात की झूमर को झक्काझोर झूमर बनाने के लिए करता था। गाँव के बबुआन लोगों को भी इस पर्व की सफलता के लिए सहयोग करना ही पड़ता था। साल भर इसी टोले के मुसहरों की मिहनत मजदूरी पर उनकी सारी गृहस्थी, खेती-किसानी में रंगत पड़ती थी। जगन राम जिस किसी बाबू के घर चार मजदूर दोस्तों के साथ करम के बिरही (चंदा) के नाम पर पहुँच जाता, दरवाजे से पचीस-पचास लेकर ही उठता। हमें याद है, हमारी दादी हर बार इस चेतावनी के साथ बीस का नोट और पाँच सेर चावल देती- ‘देख भाय जगना, तू आया है तो बिरही (चंदा) दे दे रहे हैं, मगुर ई ख्याल रखना कि पी-पा के जादे नौटंकी नँय करना। उहाँ बड़-छोट हर घर के आदमी रहता है। और हाँ ई भी याद रहे कि करम रात भर के परव है। रात-भर चलना चाहिए। ई नहीं कि आधो रात को पी-पा के सब बुता (ठंढ़ा) जाना और देखवइया सब निराश हो जाय।’

‘नहीं काकी! ऐसा जुलुम जगना के रहते का खा के कोय माय के लाल करेगा। जगना तखनी उसका चमड़ी उधोड़ देगा, चमड़ी- हाँ...’

‘नँय... नँय, ई तो तोरा पर विश्वास है.’ दादी कहती, इस पर फिर जगना दा का डायलॉग शुरू...

‘काकी ई तो करमा, जितिया है कि जगना को घर-घर घूम कर इसका इंतजाम करना पड़ता है. हम नहीं लगें तो ई परब को सब मार देगा। सब को अपना घर का फिकिर (चिंता) है, ए गो जगने है कि टोला के चिंता में दुबरायल (दुबला) रहता है। ठीक है काकी! चलते हैं तो... राम-राम! जै राम जी की.’ (पूरा गाँव जानता है कि करमा का चंदा बगैर मूड बनाये मिलना संभव नहीं है।)

‘ठीक है। ठीक है। जा.....जा.’ कुछ इसी तरह घूम-घूम कर चंदा होता। और साल दर साल जगन राम के नेतृत्व में करमा का पर्व धूम-धाम से यादगार रूप में मनता जाता।

धान की हरियाली के बीच, कार्यों की निश्चिंतता के वक्त, भादो की एकादशी के दिन होने वाला झारखंड का यह लोक पर्व, अपने गाँव में वर्षों-वर्षों से शांतिपूर्ण ढंग से मनता आ रहा है। शराब के नशे में जवान लड़कियों और औरतों के नृत्य का यह पर्व, कभी-कभार छोटी-मोटी लड़ाई भी लगा जाता है। किसी के पैर पर पैर पड़ जाना, किसी बजाने वाले की फरमाइश के अनुसार नृत्य का नहीं होना, सुनने वालों की मर्जी का रंगीला झूमर नहीं गाया जाना। भद्दी फब्तियाँ, सीटी बजा देना। ये छोटे-छोटे कारण कई बार आपस में मारा-मारी, थाप-फैट तक पहुँचते रहे हैं।

एक साल का झूमर तो अजीब ही कोहराम लेकर आया था अपने गांव में। हुआ यह कि मुखिया जी के पिताजी किसी बात को लेकर उलझ गए करम की रात को जगन राम से। जगन राम एक तो जवानी के जोश में, दूसरे करमा के नृत्य, गान, माँदर के साथ-साथ महुए के आगोश में। आव देखा न ताव- लेकर लाठी धुन (पीटना) दिया था बाबू काली सिंह को- ‘साला बुढ़वा मिटकी मारता है, गाँव की लड़की लोग को, लाज शरम सब धो के पी गया है, अभी जगना जिंदा है, जिंदा, रंडी का नाच समझा है, ऐसे गाव, ऐसे बजाव, इसको नचाव, उसको भगाव, उसको बोलाव, तोरा बाप के नौकर हैं जगना का रे’...देह-दना...दन। लाठी पर लाठी मार कर अधमरा कर दिया था जगना ने।

लोग लाख डराते धमकाते रहे, हाथ-बाँह पकड़ते रहे, पर जगना पर मानो भूत सवार हो गया था। यह बात गाँव में फैलते देर न लगी। बबुआन टोला के लोग लाठी-भाला लेकर दौड़े, तब तक जगन राम गाँव की सरहद से बाहर। कुछ लोग जगन को पकड़ने की कोशिश में बहुत दूर तक दौड़ कर गये भी, पर जगन किसी के हाथ न लगा। भागा सो भागता ही चला गया...फिर गाँव की तरफ मुँड़ कर देखा... तो करीब बीस-बाइस वर्ष बाद, एक भिखारी की शक्ल में, झड़े हुए चाँदिल सर, झिंगुर गये बदन, धँसे गाल, आँख और सूखी हड्डियों के खंडहर की शक्ल में।

बीस वर्षों के लम्बे अंतराल में गाँव उस रात की घटना को पूरी तरह भूल गया था। माह दो माह तक काली सिंह के जगना से पिटने की बात जब तक ताजा रही, गाँव का माहौल थोड़ा गर्म रहा था। बबुआन लोग करते भी तो क्या? जगना का कोई माय-बाप तो इस गाँव में था नहीं। मौसी के घर बचपन से पला था। शादी-ब्याह हुई ही नहीं थी। गाँव और खासकर कृषि प्रधान गाँव में परस्पर निर्भरता की लाचारी एक प्रकार का मरहम बन जाती है। गाँव का हर बड़ा-छोटा काका, बाबा, दादा, भइया, काकी, मौसी के रिश्तों में गुँथ कर जीता है। अपने प्राचीन ग्राम व्यवस्था की यही तो सबसे बड़ी खासियत है, जिसमें पाँच अमीर और पचास गरीब सब आर्थिक दृष्टि से तो थोड़ा-बहुत के अंतर में जी लेते हैं, पर सामाजिक-सांस्कृतिक एकता की गाँठ एक-दूसरे से इस कदर जुड़ी होती हैं कि वे न चाहकर भी आपस में पुनः जुड़ ही जाते हैं।

जगना के गाँव से भाग जाने के बाद भी करमा का पर्व हर वर्ष मनता रहा था। जगना का स्थान कई छोटे-छोटे जगना-मगना ने ले लिया था। तीज त्योहारों पर आपसी चंदा-बिरही से गाँव का माहौल लगभग रंगीन ही रहता है। पर जगन राम जैसे जोशीले व्यक्ति का अभाव भी साफ तौर पर झलकता था। अब के नये छोकरे हँसी-खेल की बजाय खाने-पीने वाले अधिक हो गए थे। बात-बात पर माँदर के बोल-

‘रिंग-रिंग-ता-धिन ता’ और फिर उसी के साथ- दस-पाँच झूमर नाचने वाली जोड़ीदारिनों का आपस में हाथ जोड़ कर लयबद्ध स्वर एवं ताल पर नाचना अब लगभग बन्द सा हो चला था। कभी किसी खुशी के अवसर पर अगर कोई सनका (ताव में आना) भी तो घंटे-दो घंटे के ‘नाच-गान’ के बाद सब के सब- टाँय-टाँय फिस। ‘जितिया’, ‘तीज’, ‘करम’ (झारखंड के पर्व) के अवसरों पर भी बस नियम भर चल रहा है। माँदर और गीत का स्थान अब डीजे-बाजा लेता जा रहा है। डीजे के कर्कश स्वर पर स्थानीय भाषाओं- खोरठा, नगपुरिया के कैसेट बजाकर कमर लचका-लचका कर अखरे भर में नाचना झूमना और फिर घंटे-दो घंटे में लड़खड़ाकर (नशे की अधिकता) गिरते-पटकाते वहीं सो जाने का नया रोग लग चुका है- न वो ताकत, न वो जोश।

इतने वर्षों के बाद लौटे जगना को अपने टोले की यह रीति-नीति समझ में नहीं आती। ना गाँव-टोला वह, न जगना वही, जर्जर शरीर, अकेला जगना को पेट पालने के लिए दरवाजे-दरवाजे भीख माँगना पड़ता है। आखिर करे भी तो क्या। दिनभर भीख माँगना, रात अपनी मौसी की टूटी झोपड़ी में कुछ बना-खाकर सो जाना, दिनचर्या हो गई है। मौसी तो कब की मर चुकी है। बीबी बच्चों का तो कोई सवाल ही नहीं।

हाँ, सबकुछ बदल गया, पर नहीं बदला था तो जगन राम का वह तेवर... भीख भी माँगता है, तो रंगबाज आवाज में।

‘मिले मलकिनी... ई... ई... दस... पाँच... रुपया... जगना को...’ यह स्वर होता जगना का बड़े जाति वालों के टोले में, पर वही जगना जब तेली टोला या नाई टोले में पहुँचता तो उसका स्वर थोड़ा तीखा और बदला-बदला होता था...

‘दे... दो माय... जगना को... कुछ तो दे... दो... रुपया...दो रुपया!’ अगर मन लायक मिला तो जगना आसानी से टल जाता, वर्ना चवन्नी-अठन्नी पर तो किच-किच कर बैठता- ‘का एकदमे से भिखमंगे समझ गेलें हे का.’ (क्या पूरा पूरी भिखारी समझ रखे हो क्या)

एक बार तो यादव टोले में लोगों ने जगना को अधमरा कर मारा था, हुआ यह कि जगना ने स्वर लगाया...

‘दे... दो... माय... जगना को भी... कुछ दे... दो...’ के बार-बार के स्वर पर घर के भीतर से एक महिला थोड़ी देर करके कटोरे में खुद्दी चावल (टूटा हुआ चावल) लेकर आई और जगना के थैले में डाल कर जल्दी से लौटने लगी। जगना तो काफी देर से घर के बाहर खड़ा-खड़ा घर के भीतर, बरामदे पर पसारे गये चना को देखकर ललचाया हुआ था। भीतर से उसकी इच्छा हो रही थी कि थोड़ा सा चना चुपके से उठा ले, पर ऐसा कुछ करता, इसके पहले घर की औरत टूटा चावल लेकर आ गई। जिसे देख हताश जगन के मुँह से अनायास निकल गया-

‘अर ई बुटवा, का खाली भतरे ले पसार के रखले हीं...का. और ये चना क्या सिर्फ तेरे पति के लिए हैं.’

भीख देकर लौटती औरत के कान में इस बात से प्रतिक्रिया यह हुई कि जगना की दम भर पिटाई हो गई। आसपास की औरतों ने मिल कर पीटा था उसे।

‘अब ऐसन गलती फिर नहीं करेंगे, छोड़ दे गे मइया, बप्पा हो... धान ई... सब तो मार के कूच दिया रे बाप।’

‘हम कौनो गंदा विचार से नहीं बोले थे गे बहीन, हमरा बड़ी दिन से बूट भूँज के खाने का मन था ए दी... दी...’ कहता हुआ जगन विलाप करता और बीच-बीच में अपनी टूटी हुई चप्पल से खुद के मुँह पर मारता- ‘चट्ट... चट्ट... चट्ट... और खाने खोजेगा चना, हम तुम्हरे चक्कर में ने आज गाँव के मेहरारू (औरत) लोग से पिटा गये... चट्ट... चट्ट।’

खैर दिन के समय कृषि प्रधान गाँव में अधिक पुरुष लोग खेतों में होते हैं- सो-एक कुछ पुरुष जो टोले में थे, जुटकर जगना को समझा-बुझा कर वहाँ से चलता किए थे।

इसी तरह के और भी कई कारनामें हैं जो गाँव भर में जहाँ तहाँ जगन ने भीख माँगने के क्रम में किए हैं।

हाँ! हम तो भूल ही गए थे, बताना यह था कि सबसे बड़ा कारनामा आज रात में हुआ।

करम की रात अपनी चटाई पर शराब के नशे में पड़ा-पड़ा जगना अपने-अपने में बक-बक कर रहा था। डीजे की आवाज और अपने टोले के जवानों की बुझी-बुझी हरकत से हैरान जगना अपने जवानी के दिनों में खो गया था-

‘स्...साला एक जमाना था, जब भुइयाँ टोली (मुसहर टोला) का करम नाच देखने सारा गाँव जुटता था। का बड़ा, का छोटा। सब रात-रात भर नाच-गा के दूसरा दिन का बारह बजा देता था।

इन्हीं अतीत के पन्नों को पलटता, नशे की हालत में जगना कभी गुनगुनाता- ‘ताक दिंदग ताक-ताक-, हाय रे... करमा के राती। मँगरा के छौड़ी कैलकई एकादशी. साबिड... साबिड..., खेल... ले... भाय..., दिदंग... दिदंग... ताक-ताक.’ कभी अपने... अपने में ही गुनगुनाता...- ‘स्....स्ला... कुत्ता... सियार सब, चंदा करता है। झूमर खेलता है। डीजे बजाता है। रात अभी ठीक से दो पहर गुजरा भी नहीं है कि अखरा छोड़ के फलाट (अत्यधिक नशे) पड़ गया सब। छिः... जवान कहलाएगा सब..’

अचानक बड़बड़ाता हुआ अपने कमरे से निकल कर बाहर आँगन सह अखरे पर आ जाता है। चीख-चीख कर आवाज देता है... अरे होरला!... गुजरा!... मंगरा... रा... कई आवाज के बाद भी जब लोग नींद और नशे की हालत से नहीं जगते, तो पास ही लेटे सभी जवानों को झकझोर-झकझोर कर जगाता है। बारी-बारी से चार-पाँच जवान उसके पास आँख मलते खड़ा होते हैं। चीखते स्वर में जगना सबों से कहता है- ‘स्साला तुम लोग करम को मजाक बना दिया है। डीजे बजाके तुम लोग काहे सुत गया... बोलो... ई कोय बात हुआ। चलो माँदर लाव... बजाव... नाचो... स् सा... ला जगना अभी मरा नहीं है, जिन्दा है जिन्दा... बोलो क्या... क्या चाहिए... अभी देगा... जगना... अभी... स् साला भिखमंगा समझता है हमको...’

इतना सुनना था कि अलसा कर डीजे का गाना पर झूमने वाले छोकड़ों में नई रौनक आ गई।

एक ने कहा- ‘नाचे का, बजावें का, जब दारूवे नहीं है।’

दूसरे ने कहा- ‘माल निकालो ने बुड्ढा! झूमर तो दारू के नशा में है...’

तीसरे ने कहा... ‘घर में झोली झाट नहीं, नाचने कहेगा झूमर...’

इतना सुनना था कि जगना पूरे तैश में तथा जोश में आ गया। सबों को खींचते हुए अपने कमरे में ले गया और अपनी फटी चटाई को उठाते हुए जमीन में गड़े हाँड़ियों (मिट्टी का बड़ा बर्तन) जिसे जगन ने गाड़कर बिछावन के नीचे छुपाकर रखा था, की ओर इशारा कर लड़खड़ाते स्वर में लगभग चीखते हुए बोला- ‘लो साला, जेतना चावल निकालना है निकालो, और मँगाव दारू... बनाव भात... खाव... पीओ... और... और नाचो... गावो... रात भर... कोय चीज का कमी हो तो हमको बताव... हमको... अभी जगना जिन्दा है जी। कोय चीज का कमी नहीं है, लो रुपया...’ गाँठ के निकाल कर-दो तीन सौ के करीब खुदरा रुपये भी पटक देता है सबों के सामने।

फिर क्या था सारे जवान रुपया चुनते हैं, चावल झोला (थैला) में भर-भर कर निकालते हैं और बिना पँख के उड़ जाते हैं, शराब की जुगाड़ में। दो एक लड़के भात बनाने का जुगाड़ भी बिठाते हैं। थोड़ी ही देर में आदमी के अभाव में सूना पड़ा अखरा लोगों से गुलजार हो उठता है। क्या औरत, क्या मर्द अखरा एक बार पुनः जाग उठता है।

माँदर की थाप और झूमर के गीत का स्वर अचानक गुंजायमान होने लगता है।

शिथिल पड़े टोले के सारे पाँव नृत्यमान हो उठते हैं। जवान बूढ़े... बूढियाँ सब शराब-भोजन- झूमर के नाच और माँदर के बोल का छककर मजा लेते हैं।

‘धिंग... धिंगा... धिंग... धिंगा... धिंग’

‘छमक... छम... छम, छमक... छम... छम...’

‘हाय रे करमा के राती... ई...’

‘साबिड़... साबिड़... खेल ले भाय...’

पर नशे की अधिकता की वजह से यह सब घंटे-दो-घंटे तो खूब जोरदार अंदाज में चलता है, पर सब धीरे-धीरे फीका पड़ने लगते हैं। बारी-बारी से सारे टोले वाले धीरे-धीरे थक कर सो जाते हैं। और स्वयं जगन राम भी उन्हीं के बीच ही कहीं घुड़मुड़िया कर (सिकुड़कर) सो जाता है।

जबरदस्ती का जोश ईंख के पत्तों की आग की तरह जितनी जल्दी लहकता है, उतनी ही जल्दी बुझ भी जाता है।

देर दिन चढ़े, जब टोले वाले उठते हैं, तो जगना नहीं उठता। लोग बलपूर्वक उठाने का प्रयास भी करते हैं, पर जगना सोया होता, तब न उठता।

टोले की एक लँगड़ी बुढ़िया सबों को बताती है- ‘जगना पाँच बजे भोर के करीब एक बार उठा था... कमरे और गाँठ की हालत देख-दहाड़ मार कर छाती-पीट-पीट कर रोया था... ‘स् साला जगना तो बरबाद हो गया रे। अरे साला होरला...आ... गुजरा... आ, हमको तो कहीं का नहीं छोड़ा रे... हमारा तो जिन्दगी में आग लगा दिया रे... जिन्दगी भर के कमाय पल भर में लूट कर हमको भिखमंगा बना दिया रे। बरबाद कर दिया रे।’ जैसे शब्द जगना दा के मुँह से निकले थे। पर उस समय उसकी चीख-पुकार सुनने वाला कोई जगा हुआ ही नहीं था- सो हार थक कर पहले जमीन पर छाती पकड़कर बैठ गया, फिर सो गया, सो सो गया।


सम्पर्कः प्राध्यापक, हिन्दी विभाग,

विनोबा भावे विश्वविद्यालय,

हजारीबाग (झारखण्ड)

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